





मंगल मूर्ति श्री गणेश का केवल इतना ही परिचय नहीं है, वरन इससे कहीं अधिक विस्तार में उनका पावन चरित्र अति विशाल है। उनकी लीला स्वरूपों का वर्णन तो यद्यपि विस्तार से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु साधकों के मध्य उनके अनेक स्वरूपों की साधना पद्धतियों से ज्ञात होता है कि किस प्रकार से वे साक्षात ज्ञात स्वरूप होने के साथ ही साथ प्रचण्ड तांत्रोक्त रूप में भी विद्यमान है। बाह्य स्वरूप से सर्वथा शांत होने के साथ ही साथ उनके भीतर जिस प्रकार का दावानल छिपा है, उसका साक्षात तो केवल साधक ही साधना के माध्यम से कर सकता है।
प्राचीन साहित्य में उन्हें केवल शिव-पार्वती का पुत्र ही नहीं साक्षात् ब्रह्म स्वरूप माना गया है। जिस प्रकार शक्ति में सत, रज एवं तम तीनों गुणों का समावेश है, ठीक उसी प्रकार से प्रथम स्मरणीय देव श्री गणेश में भी तीनों ही गुणों की धारणा की गई है। भगवान श्री गणपति को साधना जगत में अत्यन्त सौम्य, श्रेष्ठ एवं सर्वोच्च माना गया है, पश्चिम भारत में भगवान श्री गणपति की उपासना सर्वाधिक प्रबल रूप से होती है, लेकिन उपासना एवं साधना में पर्याप्त भेद होता है, इस तथ्य से कोई विद्वान असहमत नहीं हो सकता।
उपासना का सीधा सा अर्थ- देव विशेष को अपने सुख दुःख का साक्षी स्वीकार कर लेना एवं उनके समक्ष सब कुछ निवेदित कर देना, उन्हें अपने जीवन का आधार बना लेना। जबकि साधना में उस देव विशेष के गुणो, तत्वों से परिचय प्राप्त कर तदनुकूल अपने आप में ही पात्र बनने की क्रिया होती है। इस प्रकार उन्हें आवाहित किया जाता है, कि वे साधक की इच्छानुसार स्वरूप में आकर उसके शरीर में समाहित हो जाय तथा उसे उसका अभीष्ट प्रदान करें।
विशिष्ट स्वरूप: विशिष्ट ध्यान
भगवान श्री गणपति का स्वरूप चतुर्दिक फल प्रदायक है, वे सांसारिक जीवन के सभी पक्षों को सम्बलता प्रदान करने वाले देव हैं। उदाहरण के लिए जहां उनका ध्यान सभी प्रकार के मंगल कार्यों में किया जाता है, वहीं उन्हें शत्रु संहार करने वाला एवं अनिष्टों का निवारक भी कहा जाता है अर्थात् वे सर्व विघ्नहर्ता भी हैं। एक ओर वे देवत्व की गरिमा से आपूरित स्वरूप में आह्लाद एवं अभिभावकत्व के भावों से भरे हुए उपस्थित होते हैं, वहीं दूसरी ओर शत्रु संहार के लिए अत्यन्त विकट एवं भयानक स्वरूप में भी प्रकट होते हैं। उच्चकोटि के साधक इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि भगवान श्री गणपति का तांत्रोक्त एवं तीव्र स्वरूप भी होता है। इसीलिए ऐसे साधक भगवान श्री गणपति के उसी तीव्र एवं उन्मत्त स्वरूप का आवाहन अपनी साधनाओं की रक्षा हेतु करते हैं।
भगवान गणपति की साधनाओं से संबन्धित मंत्र जाप एवं साधना विधि से भी अधिक महत्वपूर्ण है भगवान श्री गणपति के उस स्वरूप का चिन्तन करना, जिससे सम्बन्धित साधना सम्पन्न की जा रही हो। शुभता व मंगलमयता के लिए उन्हें रत्न सिंहासन पर बैठे हुए चतुर्भुज स्वरूप में ध्यायित किया जाता है, वहीं शत्रु संहारक व विघ्नों के हरण के लिए धूसर वर्ण और नृत्य मुद्रा में ध्यान किया जाता है, जिनके नेत्र क्रोध एवं उन्माद से पीत वर्ण के हो गए हों। श्मशान में तांडव नृत्य में रत होने का यही अर्थ है, कि वे समस्त अशुभ शक्तियों को अपने अधीन कर रहें हों, जिससे उनके किसी भी साधक का अहित ना हो।
यही रहस्य उनके पीत वर्णीय नेत्रों का भी है। यहां पीत वर्ण का सम्बन्ध सांसारिक जीवन में प्राप्त होने वाले विषों से है। जिसका तात्पर्य है, कि भगवान श्री गणपति ने उन समस्त अशुभों को अपने मे भीतर समाहित कर लिया है, जो साधकों के लिए अनिष्ट घटित करती है। शायद यही कारण है कि शास्त्रों में उनकी संज्ञा गणपति की है, जिसका सीधा सा तात्पर्य है कि वे समस्त गणों के स्वामी हैं। उनके इस स्वरूप में उनकी चारों भुजाओं में क्रमशः परशु, त्रिशूल, गजदन्त एवं चक्र पूर्णतया संहार मुद्रा के परिचायक हैं।
श्री गणेश ऐसे देव हैं जो जीवन के समस्त अभावों न्यूनताओ, धनहीनता, शत्रु बाधा, निर्बुद्धि का संहार कर जीवन में सर्वमंगलमयता और शुभ का संचार करते हैं, साधक के जीवन में चुतर्दिक प्रगति, सुख-समृद्धि भगवान श्री गणेश के द्वारा ही संभव है।
व्यक्ति अपने जीवन में अपने लक्ष्यों को पूर्णता तक पहुंचाना चाहता है और वह इसके लिए किसी भी प्रकार की हानि भी नहीं चाहता। प्रत्येक सांसारिक मनुष्य की इच्छा रहती है कि उसके चारों ओर सर्वत्र मंगलमय चेतना का विस्तार हो और वह अपने जीवन की सभी आवश्यकताओं में पूर्णता प्राप्त कर सके।
अधिकांश लोग इच्छा तो रखतें हैं, परन्तु जिस क्रिया की अनिवार्यता होती है, उसे नजर अंदाज करते रहते हैं। यही कारण है कि उनकी इच्छाएं व लक्ष्य ख्याली पुलाव बनकर ही रह जाता है, जीवन को मंगलमय चेतना से आपूरित करने के लिए विशिष्ट क्रियाओं में निरन्तरता की आवश्यकता है।
श्री गणपति ऐसे देव हैं, जिन्हें मंगलमूर्ति अर्थात् मंगलमय जीवन प्रदान करने वाला कहा गया है, जिनकी साधना, आराधना से जीवन को सर्वलाभ युक्त बनाया जा सकता है। भगवान श्री गणेश चुर्तदिक वृद्धि कर्ता हैं, जो साधक को निरन्तर वृद्धि, प्रगति की ओर अग्रसर करते हैं।
13 सितम्बर सांय 7 बजे के पश्चात् अपने पूजा स्थान में एक मखमली आसन पर पुष्प पंखुडि़यां बिछाकर मंगलमूर्ति विग्रह स्थापित कर दें। फिर रक्त चन्दन, पुष्प, धूप, दीप से पूजन कर निम्न मंत्र का 108 बार जप करें।
पश्चात् विग्रह को पूजन स्थान में स्थापित रहने दें।
मनुष्य जीवन शारीरिक, मानसिक व आत्मिक शक्ति और सामर्थ्य के सामंजस्य से ही श्रेष्ठ रूप में गतिशील हो सकता है। यदि व्यक्ति शरीर से बलिष्ठ हो, क्षमतावान हो और उसके पास सामाजिक चातुर्यता, बात-चीत में निपुणता, अपने कार्य को किसी भी हाल में पूरा करने का उत्साह और आत्मबल हो तो वह संसार में कहीं भी, किसी भी स्थिति में श्रेष्ठता से जी सकता है।
किसी भी व्यक्ति का सबसे बड़ा धन उसकी स्वयं की योग्यता, क्षमता, विवेक, बुद्धि, विचार और संस्कार होते हैं। भगवान गणेश तो बल-बुद्धि के देव कहे गए हैं, वे बुद्धि, ज्ञान, शक्ति, सामर्थ्य के प्रदाता हैं। इस साधना से विद्यार्थी वर्ग चार्तुय, ज्ञान, विवेक, क्षमता, साहस, उत्साह, सुसंस्कार आदि से युक्त होकर सर्वोच्चता प्राप्त करता है, तो वहीं साधक इससे सांसारिक कार्यों में दक्षता प्राप्त करता है, यह साधना पूर्ण शारीरिक, मानसिक व आत्मिक विकास करने में समर्थ है। इसे कोई भी साधक-साधिका, बालक-बालिका सम्पन्न कर सकते हैं।
13 सितम्बर प्रातः 7 बजे अपने पूजा स्थान में एक ताम्रपात्र में बल-बुद्धि प्रदाता चैतन्य लॅाकेट स्थापित कर पंचोपचार पूजन कर घी का दीप जला दें और निम्न मंत्र का 108 बार उच्चारण कर लॅाकेट धारण कर लें।
शत्रुओं के अनेक रूप होते हैं, जिसे किसी एक तथ्य के साथ स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। इसके स्वरूप, गुण, प्रभाव में अक्सर भिन्नता देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए आप किसी कम्पनी में कार्यरत हैं और वहां आपको अनुकूल वातावरण या सहयोग नहीं मिल रहा अथवा आप अपने सीनियर के द्वारा उपेक्षा के शिकार हैं। ऐसा ही कभी-कभी पारिवारिक सम्बन्धों में भी होता है, जिसे शत्रु बाधा भी नहीं कहा जा सकता।
देवांतक नाशकारी साधना एक ऐसी साधना है, जो उन शत्रु पक्ष पर प्रहार करती है, जो नित्य जीवन में किसी ना किसी कारण अवरोध उत्पन्न करते हैं, प्रगति का, विकास का मार्ग बाधित करते हैं। उनके इस भावना-विचार का इस साधना के द्वारा नाश होता है अर्थात् वह ईर्ष्या का भाव, विचार जो आपके प्रति किसी व्यक्ति का है उसको समाप्त करने देने की साधना देवांतक नाशकारी साधना है।
13 सितम्बर रात्रि 9 बजे पीला वस्त्र धारण कर दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाएं, अपने माथे पर रक्त चंदन का त्रिपुण्ड लगायें, सामने भूमि पर चंदन से त्रिभुज अंकित कर उसके मध्य देवांतक जीवट रख दें। फिर निम्न मंत्र का 3 माला मंत्र जप शत्रु विनाशक माला से करें।
जप पश्चात् सभी सामग्री अग्नि में भस्म कर दें। न्
आज-कल मानव जीवन चारों ओर से घिरा होता है, कभी समस्याओं से, कभी शत्रु हावी हो जाते हैं, कभी ऐसी कोई बाधा आ जाएगी, जिससे पूरी परिस्थितियों में ही उथल-पुथल मच जाती है। पारिवारिक, सामाजिक, न्यायिक, प्रशासनिक आदि अनेक ऐसे कारण जीवन में उपस्थित होते रहते हैं, जो हमारी सफलता के लिए अवरोध होते हैं। इसके साथ ही तांत्रिक, मलिन प्रयोग करने वाले गुप्त शत्रु भी समय-समय पर अपना प्रभाव दिखाते रहते हैं।
ऐसे में आवश्यक है कि हम अपने चारों ओर एक ऐसा साधना सुरक्षा चक्र बना लें, जो चतुर्विघ्नहर्ता हो अर्थात् जीवन की जो भी बाधायें, अवरोध, शत्रु हो उनसे हमें हानि ना पहुंचे, हमारे सभी कार्य सही समय पर पूर्ण हो सके।
13 सितम्बर रात्रि 8 बजे अपने सामने बाजोट पर चतुर्विघ्न नाशिनी गुटिका स्थापित कर अष्टगंध से तिलक करें, फिर तेल का दीपक जला दें और निम्न मंत्र से 51 बार काली सरसों से आहूति दें।
जप पश्चात गुटिका को भी अग्नि में भस्म कर दें और भविष्य में जब कभी भी बाधाएं, परेशानियां, प्रतिकूलताओं से घिरे हों, तो यह साधना सम्पन्न कर लें।
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