





भगवती लक्ष्मी सांसारिक जीवन में साधकों को पालन शक्ति की चेतना व क्रियाभाव प्रदान करती हैं। जिससे साधक अपने जीवन को सही स्वरूप में निर्मित करने की ऊर्जा से युक्त होता है और यह ही सांसारिक जीवन की अहम क्रिया भी है कि व्यक्ति अपने जीवन को सर्व स्वरूपों में श्रेष्ठता से युक्त कर सके। दीपावली महापर्व लक्ष्मी अमावस्या की दिव्य शुभ बेला इन्हीं भावनाओं के साथ महालक्ष्मी की उपासना, साधना करने का चैतन्य दिवस है, जब साधक आने वाले नूतन वर्ष के लिए अपने सांसारिक जीवन को महालक्ष्मी की चेतना शक्ति से आप्लावित करने की साधनात्मक क्रिया सम्पन्न करता है। पद्मावती कुबेर धन लक्ष्मी साधना इन्हीं मानस-चिंतन, भावों को रूप देने की दुर्लभ-अक्षुण्ण साधना है।
चैतन्य विघ्नहर्ता गणेशः प्राचीन साहित्य में भगवान गणेश को साक्षात् ब्रह्म स्वरूप माना गया है। जिनमें सत्, रज व तम तीनों गुणों का समावेश है। सत् का तात्पर्य जो शुद्ध भाव है, वह निर्मित करना, रज द्वारा समस्त विघ्नों का हरण करना और तम के माध्यम से भक्त को श्रेष्ठता प्रदान करना। इस तरह श्री गणेश जीवन की समस्त अशुभता, शत्रु बाधा, निर्बुद्धि का संहार कर सर्वमंगलमयता और शुभ का संचार करते हैं।
भौतिक सुख प्रदाता कुबेरः सांसारिक जीवन में धन प्राप्ति के बाद उसका सद्पयोग और वृद्धि की स्थितियां बनायें रखना सबसे कठिन कार्य है। गला-काट प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, वैमनस्यता की कुटिल स्थितियां आदि ऐसे अनेक कारण हैं, जिसमें अत्यधिक सूझ-बूझ और विवेकपूर्ण निर्णय का ज्ञान भगवान कुबेर की ही भांति विनम्र स्वभाव और शांत चित्तमय होना आवश्यक है।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के चल-अचल सम्पत्ति के कोषाध्यक्ष कुबेर की साधना से अतुल्य धन प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यदि महालक्ष्मी की साधनाओं से धन की प्राप्ति संभव होती है, तो वहीं कुबेर यह निर्धारित करते हैं कि धन की रक्षा और निरंतर वृद्धि का भाव बना रहे। इनकी ही आराधना व सहयोग से समस्त देव लोक में श्री तथा सम्पन्नता स्थायित्व रूप से विद्यमान है। कुबेर अपने विनम्र स्वभाव के कारण कोषाध्यक्ष पद की प्राप्ति कर पाये और इसी स्वभाव के कारण शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं।
कुबेरवत् चेतना आत्मसात करने का तात्पर्य यही है कि विनम्रता के साथ जीवन में निरन्तर वृद्धिमय स्थितियों का निर्माण होता रहे और अतुल्य धन व उन्नति-प्रगति के मार्गों का अनवरत चक्र चलता रहे।
सौभाग्य पदमावती लक्ष्मीः भगवती लक्ष्मी को सृजन शक्ति की अधिष्ठात्री अर्थात् नवनिर्माण व वृद्धि का भाव और चेतना महालक्ष्मी शक्ति से ही प्राप्त होता है। भगवती लक्ष्मी की साधना से कर्म भाव के प्रति निष्ठा जाग्रत होता है और यही कर्म भाव सृजन करने की चेतना प्रदान करता है। साथ ही इन्हें विष्णुप्रिया भी कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है कि भगवती लक्ष्मी-नारायण की ही भांति साधक जीवन में भरण- पोषण, पालन शक्ति की चेतना प्रदान करती हैं। पदमावती लक्ष्मी साधना साधक जीवन से दरिद्रता, कायरता, कटुता और हीनता समाप्त करने की प्रक्रिया है। इस साधना से व्यक्ति का अभावहीन, धनहीन व दरिद्र बने रहना संभव ही नहीं है, जिस प्रकार पदमगंध छुपाये नहीं छुपता और आस-पास का समस्त वातावरण अपनी मधुर सुगंध, श्रेष्ठता और दिव्यता से भर देता है, उसी प्रकार पदमावती लक्ष्मी साधक जीवन को श्रेष्ठमय सुस्थितियों से युक्त सभी प्रकार से सम्पन्न व समृद्धि युक्त बनाती है। इस साधना का एक स्वरूप सौभाग्य जागरण का भी है, जिसके माध्यम से दुर्भाग्य व दरिद्रता को समाप्त कर साधक को सर्व सम्पन्न बनाना है।
विष्णु शक्ति कच्छपः समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने कच्छप का रूप धारण किया था, इसलिये कच्छप को भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है। कच्छप स्वरूप में श्री यंत्र और प्रतीक स्वरूप में भगवान विष्णु जहां स्थित हों, भगवती लक्ष्मी स्वयं कहती हैं कि- विष्णु जिस स्वरूप में भी रहें वही मेरी आत्मा है और वहां जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में कमी होना संभव ही नहीं है। इस दिव्य चैतन्य कच्छप श्री यंत्र को पूजा स्थान, दुकान, फैक्ट्री, कार्य स्थल पर स्थापित करने से आरोग्यता, आयु वृद्धि, सम्मोहन शक्ति की वृद्धि, कार्य-व्यापार वृद्धि में निरन्तरता बनी रहती है।
सुस्थिति प्रदाता सद्गुरु श्री यंत्र लॅाकेटः श्री यंत्र चैतन्य शक्ति व सद्गुरु प्रणीत इस लॅाकेट को नित्य धारण करने से सद्गुरु अपनी आभा के माध्यम से साधक के जीवन में सुस्थितियों का निर्माण करते हैं, जिससे नये रोजगार का आरम्भ, रोजगार प्राप्ति, प्रमोशन आदि सुस्थितियों की प्राप्ति होती है।
वर प्रदायिनी मालाः यह महालक्ष्मी के वर-वरदायिनी स्वरूप को व्यक्त करता है। जीवन में सुहाग वृद्धि, रूप, ओज-तेज सौन्दर्य, आकर्षण, संतान सुख व परिवार के सदस्यों में सुसंस्कारों की वृद्धि के फलस्वरूप आनन्दमय वातावरण की प्राप्ति होती है। भगवती महालक्ष्मी वरदायिनी भी हैं, जिनके वरदायिनी स्वरूप को आत्मसात करने से साधक उक्त सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सफल होता है।
पदमावती कुबेर धन लक्ष्मी साधना : साधक-साधिका ध्यान, चिंतन के माध्यम से इन सभी भावों को पूर्णता से आत्मसात कर सकें और अपने जीवन को लक्ष्मी के सहस्र रूपों की चेतनामय ज्योति से प्रकाशित करने में सफल हों क्योंकि अष्ट सिद्धि-नव निधि युक्त जीवन प्राप्ति का सर्व श्रेष्ठ महापर्व दीपावली ही है।
जिस तरह से शुद्ध जल को जिस पात्र में भी डालते हैं, वह उसी के अनुसार रूप ग्रहण कर लेता है। पौधा में वह रस प्रदान स्वरूप में, सांसारिक मनुष्यों में रक्त और साधक व ज्ञानियों में चेतना स्वरूप धारण कर लेता है। ठीक उसी तरह से अपने संस्कार व गोत्र अनुसार चैतन्य साधना को ऐसे श्रेष्ठ महोत्सव पर क्रियान्वित करने से जीवन में कर्मफल का भाव सुस्थितियों के स्वरूप में प्राप्त होता ही है।
सीमित संख्या में साधना पैकेट निर्मित किये हैं, अतः अग्रिम राशि भेजने वालों को प्राथमिकता स्वरूप स्पीड पोस्ट से भेजी जायेगी।
व्यापार कार्य वृद्धि, नवीन बही खाता, रोकड़ मिलान, धन लाभ हेतु पूजन
अमृत लाभ- प्रातः 06: 55 से 09: 38 तक
शुभ- प्रातः 11:00 से 12: 00 तक
लाभ बेला- सांय 05: 24 से 06: 52 तक
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ग्रह दोष निवारण पूजन मुहुर्त
मेष, मिथुन, कन्या, वृषभ, धन, कुंभ, मीन के साधको के जीवन में राहु और शनि वक्री दोष निवारण हेतु साधना पूजन
चर लाभ- सांय 03: 05 से 05: 48 तक
शुभ अमृत- सांय 05: 27 से 09: 31 तक
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महालक्ष्मी दीप पूजन – 07 नवम्बर
नूतन व्यापार, तिजोरी, स्वर्ण-आभूषण वृद्धि
प्रदोष काल- सांय 05: 48 से 08: 12 तक
वृषभ लग्न- सांय 06: 19 से 08: 14 तक
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भवन-निवास, परिवार वृद्धि पूजन मुहुर्त
पति-पत्नी संतान के साथ परिवार गृहस्थ सुख, सौभाग्य, संतान वृद्धि हेतु पूजन
महानिशीथ काल- रात्रि 11: 55 से 12: 48 तक
सिंह लग्न- रात्रि 12: 46 से 03: 02 तक
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तांत्रोक्त साधना सिद्धि पूजन मुहुर्त
सिंह लग्न- रात्रि 12: 31 से 03: 02 तक
साधना सामग्रीः चैतन्य विघ्नहर्ता गणपति, भौतिक सुख प्रदाता कुबेर व सौभाग्य पद्मावती स्वरूप लक्ष्मी चित्र, गोमती चक्र, विष्णु सद्गुरु शक्ति कच्छप, सुस्थिति प्रदाता श्री यंत्र लॅाकेट, वर प्रदायिनी माला।
महालक्ष्मी सिद्धि दिवस 07 नम्बर को मुहुर्त विवरण अनुसार किसी भी मुहुर्त में पूजन प्रारम्भ करें अथवा प्रत्येक मुहुर्त में अपनी इच्छानुसार मंत्र जाप कर सकते हैं। अपने सामने बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर कुंकुम से स्वस्तिक बनाएं उस पर प्राण-प्रतिष्ठित चैतन्य गणेश, कुबेर व लक्ष्मी चित्र स्थापित कर दें।
चित्र के सामने चावल की ढ़ेरी पर विष्णु शक्ति कच्छप व चित्र के दायीं ओर पुष्प, अक्षत के आसन पर गोमती चक्र और बायीं ओर श्री यंत्र लॅाकेट स्थापित करें, साथ ही धूप व एक बड़ा दीपक प्रज्ज्वलित कर लें। पूजन से पूर्व सद्गुरुदेव जी का ध्यान कर अपना गौत्र उच्चारण कर संकल्प लें, फिर गणपति ध्यान करें-
गणपति ध्यान- हाथों में पुष्प लेकर गणेश भगवान का ध्यान कर अर्पित कर दें-
गजाननं भूत गणाधि-सेवितं कपित्थ जम्बूफल चारुभक्षणं ।
उमासुतं शोक विनाश कारकं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम् ।।
श्री गणेशाय नमः ध्यानं समर्पयामि ।।
नवग्रह शांति प्रार्थना- हाथ जोड़कर नवग्रह शांति की प्रार्थना करें-
ऊँ ब्रह्म मुरारिस्त्रि-पुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसतो बुधश्च, गुरुश्च, शुक्रः शनि राहुकेतवः सर्वेग्रहाः शांतिकरा भवन्तु ।।
गुरु प्रार्थना- पूर्ण भक्तिभाव से सद्गुरुदेव से सर्वमंगल की प्रार्थना करें-
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, मिष्ठान, दक्षिणादि से सद्गुरुदेव का पूजन करें।
लक्ष्मी ध्यान- ध्यान मंत्र उच्चारण कर भगवती लक्ष्मी को पुष्प चढ़ायें-
सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि भुक्ति-मुक्ति प्रदायिनी मंत्रपूते सदा देवि महालक्ष्मी
नमोऽस्तु ते नमस्ते तु महामाये श्रीपाठे सुरपूजिते शंख चक्र गदा हस्ते
महालक्ष्मी नमोस्तु ते श्री महालक्ष्म्यै नमः ध्यानं समर्पयामि ।।
अब कच्छप को किसी दूसरे पात्र में पंचामृत स्नान फिर शुद्ध जल स्नान कराकर चावल की ढ़ेरी पर पुनः रख कर अष्टगंध अर्पित करें व धूप, दीप दिखाएं। गोमती चक्र व श्री यंत्र लॅाकेट पर रक्त चन्दन का तिलक कर पुष्प अर्पित करें। परिवार के सभी सदस्यों का तिलक कर मौली बांधे, पश्चात् वर-प्रदायिनी माला को दाहिने हाथ में लेकर तीन आचमनी जल छिड़के फिर परिवार के सभी सदस्यों का नाम उच्चारित कर निम्न मंत्र का पांच-पांच माला मंत्र जप करें-
जप पूर्ण होने पर सपरिवार लक्ष्मी आरती एवं गुरु आरती सम्पन्न करें। श्री यंत्र लॉकेट को नित्य पूजा के समय धारण करें, चैतन्य फोटो, गोमती चक्र व श्री शक्ति कच्छप पूजा स्थान या तिजोरी में रख दें और नित्य धूप, दीप दिखाते रहें, कार्तिक पूर्णिमा 23 नवम्बर तक उक्त मंत्र की एक-एक माला नित्य जप करें। कार्तिक पूर्णिमा पश्चात् सभी सामग्री गुरु चरणों या किसी पवित्र नदी में विसर्जित कर दें।
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