





यहां शक्ति शब्द का तात्पर्य उस शाश्वत निखिल तत्व से है, उस गुरुत्व शक्ति से है, जिससे समस्त ब्रह्माण्ड गतिशील है और वह शक्ति जिसके पुंजीभूत होने से अनेक देवी-देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ है। जब साधक गुरु के शक्तिमय स्वरूप की आराधना करता है, तो सद्गुरु उसी रूप में साधक के आत्म तत्व में स्थापित हो जाते हैं और फिर जैसे-जैसे साधक साधनाओं में निरत होकर निरंतर साधनाओं की प्रक्रिया पूर्ण करता जाता है तो यही शक्ति बीज रूप से पूर्ण वृक्ष बन जीवन में शीतलता प्रदान करती है।
शक्ति मूल रूप में नारी स्वरूपा ही है और जब गुरुदेव के इस स्वरूप की साधना साधक सम्पन्न करता है, तो उसे स्वतः ही उनकी करूणा और वात्सल्यता प्राप्त होने लगती है। क्योंकि निखिल तत्व में सभी तत्व सम्पूर्णता से समाहित हैं। मानव कल्याणार्थ वे अलग-अलग स्वरूपों में अवश्य ही दृष्टित होते हैं, परन्तु उनके मूल में निखिल तत्व है और अन्ततः सभी तत्व पूर्ण रूप से निखिल में ही समाहित होते हैं। इसीलिए जब साधक भगवती शक्तिमय गुरु साधना का आश्रय लेता है, तो उसके सामने शिष्य जीवन की कठिन और कड़ी परीक्षाओं की कसौटियां इतनी दुरुह नहीं रह जाती है, वह शिशु की तरह गुरु मातृ-पितृ दोनों भावों को आत्मसात कर पाता है जिससे वह मातृ स्वरूप सद्गुरुदेव की वात्सल्यता से सरल और सहज रूप में भौतिक व आध्यात्मिक सफलता व सम्पन्नता प्राप्त कर लेता है और पितृ स्वरूप में सद्गुरुदेव करुणा के वशीभूत अपने शिष्य को गोद में उठाकर अत्यन्त मधुरता से जीवन की सभी कलाओं में उसे पारंगत बनाते हैं और शिशुवत शिष्य को पता भी नहीं चल पाता कि उसके अन्दर विशेष शक्तियों की स्थापना हो गई है।
इस साधना के द्वारा शिष्य में जहां एक ओर करूणा, स्नेह, प्रेम, मातृत्व भावों का विकास होता है, वहीं दूसरी और उसके व्यक्तित्व में एक प्रखरता और प्रचण्डता भी आ जाती है। एक ऐसा तेज उसके भीतर विकास करने लग जाता है, जिसके द्वारा उसकी आन्तरिक और बाहरी दोनों तरह की शक्तियों में प्रवाह का भाव विद्यमान होता है।
इस साधना से साधक के अन्दर जिस गुरुत्व शक्ति के बीज का स्थापन होता है, वही साधक को जीवन पर्यन्त गतिशील भी करता है। जिस प्रकार अग्नि तीव्र होने पर ऊपर उठती है, उसी प्रकार साधक के भीतर शक्ति तत्व का विकास होने पर वह अपने जीवन में उच्चता प्राप्त करता जाता है। गुरुदेव की यह शक्ति उसी साधक को प्राप्त होती है जिसके भीतर स्वाभिमान का सागर लहरा रहा होता है। जिसमें परम आस्था और अटल विश्वास हो।
इस साधना की विशिष्टता का वर्णन संभव नहीं है, यह तो मात्र भावना की गहराई में उतर कर ही समझा जा सकता है। अन्ततः केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि यह एक ऐसी साधना है, जो जीवन को श्वास के भांति गतिशील करती है, जिस तरह जीवन के लिए ऑक्सीजन की परम आवश्यकता है। उसी तरह सम्पन्न, समृद्धि, शक्ति- ऊर्जामय, सुख-शांति और आध्यात्मिक जीवन की सफलता हेतु यह साधना प्रत्येक शिष्य के लिए अनिवार्य है। संन्यास शक्ति की चेतना से आपूरित कार्तिक पूर्णिमा दिवस पर माँ भगवती व सद्गुरुदेव नारायण के इसी शक्तिमय स्वरूप की साधना आप सभी के लिए प्रस्तुत है, जिसे सम्पन्न कर निश्चित रूप से आप अपने जीवन में सद्गुरुदेव नारायण भगवती की सिद्धाश्रम शक्ति युक्त चेतना, प्रेम, करूणा व वात्सल्यता को साक्षात स्वरूप में अनुभूति कर सकेंगे।
इस साधना को कार्तिक पूर्णिमा 23 नवम्बर अथवा निखिल जन्मोत्सव, गुरु पूर्णिमा, किसी भी माह की 21 तारीख या किसी भी गुरुवार के दिन सम्पन्न कर सकते हैं। प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पीली धोती व गुरु चादर धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठ जायें। सामने सद्गुरुदेव नारायण भगवती चित्र का स्थापन कर संक्षिप्त पूजन करें, फिर सिद्धाश्रम चैतन्य यंत्र को अक्षत के ढे़री पर स्थापित कर यंत्र के दायीं ओर सर्वशक्ति प्रदाता जीवट स्थापित करें। फिर सद्गुरुदेव का निम्न मंत्र से ध्यान करें-
जिनके शरीर का वर्ण सिन्दूर के समान लाल है, जिनके तीन नेत्र हैं, जिनके शिरोभाग में माणिक्य जटित मुकुट, सुशोभित हो रहा है, जो मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं, जो अपने दोनों हाथों में मणिमय पात्र तथा रक्त कमल धारण किये हैं, जिनका स्वरूप सौम्य है, जिनके चरण रत्न युक्त घड़े पर स्थित हैं, ऐसे परम प्रिय सद्गुरुदेव का मैं ध्यान करता हूं।
इसके बाद यंत्र का क्रमानुसार पूजन सम्पन्न करें-
ऊँ ह्रीं एतत् पाद्यं समर्पयामि नमः। (पाद्य)
ऊँ ह्रीं एतत् अर्घ्यं समर्पयामि नमः। (अर्घ्य)
ऊँ ह्रीं इदं स्नानं समर्पयामि नमः। (स्नान)
ऊँ ह्रीं एतं गन्धं समर्पयामि नमः। (कुंकुम)
ऊँ ह्रीं इदं चन्दनं समर्पयामि नमः। (चन्दन)
ऊँ ह्रीं एतं धूपं आघ्रापयामि नमः। (धूप)
ऊँ ह्रीं एतं दीपं दर्शयामि नमः। (दीप)
ऊँ ह्रीं इदं नैवेद्यं निवेदयामि नमः। (नैवेद्य)
ऊँ ह्रीं एतं पुष्पांजलिं समर्पयामि नमः। (पुष्प)
यंत्र पूजन के बाद जीवट पर रक्त चन्दन व अक्षत चढ़ायें और सभी स्वरूपों में शक्तिमय बनने की कामना व्यक्त करें, इसके बाद निम्न मंत्र की भगवतीमय शक्ति माला से पांच माला जप करें-
इसके बाद जप समर्पण कर आरती सम्पन्न करें और व्यक्तिगत रूप से सभी साधना सामग्री गुरु चरणों में अर्पित कर गुरुदेव से आशीर्वाद् प्राप्त करें साथ ही एक माह तक नित्य इस मंत्र का 108 बार मंत्र जप करते रहें।
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