एक कथा मैंने पढ़ी थी कि एक ततैया ने विशाल भवन के बाहर खिड़की के पास अपना घर बनाया था। वह सर्दियों में वही सोती, विश्राम करती, गर्मियों में उड़ती, नाचती, फूलों से पराग इकठ्ठा करती, प्रसन्नचित्त और बड़ी आनंदित रहती थी। परन्तु वह ततैया बड़ी विचारक थी, अतः वह दूसरी ततैयों के बारे में बुरा सोचती, निन्दा के भाव रखती, क्योंकि उसका जीवन बस वासना का जीवन था। उसने शास्त्रों का कभी चिन्तन-मनन नहीं किया, मात्र शास्त्रों के शब्द रट लिये थे, जिससे वह अपने आपको बड़ी विद्वान पंडित मानने लगी थी और जिस भवन में वह रहती वस्तुतः वह एक बड़ा ग्रंथालय था। अतः वहां पर बहुत से अध्यापक आते, साहित्यकार आते, दार्शनिक आते, कवि आते, अक्सर वहां पर ऐसे ही लोगो का आना होता था।
कुछ ततैया को बाहर निकाल देते लेकिन वह फिर भी लौट-लौट कर आ जाती। धीरे-धीरे उसने कुछ चोरी छिपे। बिना गुरु के पढ़ना-लिखना भी सीख लिया, जिससे व जल्दी से दर्शनशास्त्र की बड़ी -बड़ी मोटी किताबें पढ़ने लगी, विज्ञान और काव्य के बड़े शास्त्र पढ़ने लगी, मुनिचर्या के मूलाचार श्रेष्ठ साधु के समयसार आदि ग्रन्थ पढ़ने लगी, धवला और जय धवला की बाते करने लगी। अतः अब तो उसे दूसरों में दोष ही दोष दिखने लगे। अब तो वह दूसरी ततैयों को देखना ही पसंद न करें, दूसरों की बात ही उसे बरदाश्त न हो, उसे सभी नारकीय दिखने लगे। उसका अहंकार बहुत बड़ा हो गया था, जिससे उसका चित्त भी विक्षिप्त रहने लगा था। अतः अब उसके रात-दिन दूसरों को नीचे दिखाने के विचार ही चलते रहते, जिससे अब वह एक जगह बैठी रहती और घूमना-फिरना भी उसने बंद कर दिया, वृक्षों के चक्कर काटना, हवाओं में उड़ना आदि वह सब भूल गई। अब अधिकतर वह बैठी रहती और गहन चिन्तन करती, सोचती विचारती, कि संसार किसने बनाया, क्यों बनाया? अस्तित्व कहां से आया, कहां जा रहा है? इस प्रकार के अनूठे प्रश्न उसके हृदय में घर कर गये।
एक दिन उड्डयन विज्ञान की एक पुस्तक पढ़ते वक्त वह बड़ी मुश्किल में पड़ गई। क्योंकि उसमें लिखा था कि ततैया का शरीर उसके परों (पंखों) से बहुत वजनी होता है, अतः ततैया को उड़ना नहीं चाहिये। कारण उसके पंख बड़े कमजोर व छोटे-छोटे होते हैं और शरीर वजनी व बड़ा होता है। तो वह इस प्रकार पढ़कर घबड़ा गई। क्योंकि अभी तक उसे पता ही न चला था कि उसका शरीर बड़ा और पंख छोटे हैं। आज पहली बार ही उसे पता चला था और फिर जो शास्त्रों में लिखा है, उसे इन्कार करना संभव ही नहीं है, कारण जो वैज्ञानिकों ने कहा है- उसके विपरीत तो चलना संभव ही नहीं है। अतः वह उदास हो गई और अपने छत्ते पर ही बैठी रही, उठ न सकी। पैदल चलते हुई ही आई, क्योंकि विज्ञान के विपरीत उड़ना तो असंभव ही है। इसलिये उसने अब हिलना-डुलना भी बंद कर दिया। यद्यपि वह अभी भी दूसरी ततैयों को उड़ती देखती। लेकिन फिर भी मन में उनके प्रति दया आती कि बेचारी ये अज्ञानता वश उड़ रही है। काश, यदि उन्हें पता होता, काश यदि इन्होंने विज्ञान जाना होता, तो यह सब उड़ना बंद कर देती। क्योंकि ततैया उड़ कैसे सकती है? क्योंकि उसके पंख छोटे होते हैं और शरीर बड़ा होता है। जैसे आपके विद्वान, पंडित, पुरोहित सोचते है कि पंचम काल में सच्चे साधु कैसे हो सकते हैं? काश यदि इन्हें कुछ शास्त्रों का ज्ञान होता, तो ये सन्त होने से बच सकते। ठीक इसी प्रकार वह ततैया दूसरी ततैया के बारे में सोचती।
लेकिन एक दिन, एक पक्षी ने अचानक झपट्टा मारा, अर्थात उस ततैया को सुबह का नाश्ता बना लेना चाहा। परन्तु घबड़ाहट में वह ततैया शास्त्र भूल गई और उड़कर दूर जाकर एक झाड़ी में उतरी। कुछ समय में थोड़ा होश लौटा, घबड़ाहट बंद हुई, तब उसने सोचा कि यह क्या हुआ? शास्त्रों के अनुसार ततैया उड़ नहीं सकती और मैं उड़ी। लगता है जरुर कोई अवरोध मेरे मन में बैठा था जो मेरी उड़ने की स्वाभाविक क्षमता को रोक रहा था। लेकिन अब संकट के कारण, भय और खतरे के कारण टूट गये जिसमें मैं उड़ने में पूर्ण स्वतंत्र हो गई हूं।
मुझे लगता है जिस प्रकार उस ततैया के लिये मनौविज्ञान की पढ़ी हुई किताब उड़ने में अवरोध बन रही थी, उसी प्रकार आपको यह मुनिचर्चा के शास्त्र आगे बढ़ने में व्यवधान बने हुये हैं। लेकिन जैसे उस ततैया ने विज्ञान की किताब पढ़ना छोड़ दिया तो उड़ना सीख गई, ठीक इसी प्रकार आप भी यदि शास्त्रीय ज्ञान को छोड़ दे, तो पार हो सकते हैं क्योंकि भार रहित ही पार होता है। तो जिस प्रकार उस ततैया के मन से दूसरी ततैयों के प्रति निंदा भी चली गयी उसी प्रकार आपके मन में भी दूसरे के प्रति उठने वाली निन्दा भी चली जायेगी। क्योंकि शास्त्र दूसरे की निंदा करने के लिये नहीं होते, अपने स्वयं के दोषों को देखने के लिये होते हैं और जो शास्त्र दूसरों की निंदा से भरे, उड़ने में अवरोध बनें, तो समझ लेना वह शास्त्र नहीं शस्त्र हैं। क्योंकि शास्त्र स्वभाव में लाते हैं, विभाव में नहीं पहुंचाते, अतः जो शास्त्र आपको दूसरों के प्रति प्रेम से भरें और अपने अन्दर छिपे हुये परमात्मा की अनुभूति कराये वही सच्चे शास्त्र हैं, बाकी सब शस्त्र हैं, जो आत्मघात कराते हैं।
आज लोगों को गीता कंठस्थ हो जाती है किन्तु उनके मुख से गीत सुनाई पड़ते शब्दों से मस्तिष्क भर जाता है किन्तु हृदय नहीं भींगता। बाहर यंत्र की भांति दोहराते हैं किन्तु भीतर सब अछूता होता है। इसलिये कहता हूं कि आप शास्त्रों को इकठ्ठे करने में मत लग जाना, अन्यथा शास्त्र आपके लिये काराग्रह बन जायेंगे। जिससे फिर आपके पंख उन्मुक्त न होंगे, आप उड़ न पायेंगे, आप स्वाभाविक न हो पायेंगे। क्योंकि आज जितने लोग शास्त्रों के कारण अस्वाभाविक हो जाते हैं उतने किसी और के कारण नहीं होते। अगर आप समझ सको तो मैं कहना चाहूंगा कि आज शास्त्रों के कारण जितने लोग अधार्मिक हो गये है उतने किसी और कारण नहीं हुये। जितना आदमी शास्त्र पढ़ता है उतना अंधा होता है, क्योंकि वह कहने लगता है मैं तो सब जानता हूं। यह किताब रखी है सब पढ़ लेगे, समझ लेंगे। जो पाप लग रहे हैं, जो पाप हो रहे है उसका प्रायश्चित कर लेंगे।
लेकिन काश यदि इतना सस्ता होता समझना तो सारी दुनिया समझदार हो गई होती। क्योंकि आज घर-घर में गीता, रामायण, कुरान, पुराण और बाइबिल है। क्या कमी है शास्त्रों गन्थों की? परन्तु शास्त्रों के स्वाध्याय से कोई समझदार नहीं हो पाता, सत्संगति से समझदार बन पाता है। सत्संगति से ही बोध होता है और बोध वाला ही जान पाता है कि भार रहित ही पार होता है। जैसे पहले मैंने एक कहानी कही थी कि ततैया के जीवन में कोई अवरोध नहीं था, कोई उसकी ग्रंथि खराब नहीं थी, मात्र उसने एक किताब पढ़ ली थी जो जीवन में सबसे बड़ी तकलीफ बन गई। कारण वह किताब पढ़ने में इतनी कुशल हो गई कि वह दूसरी अन्य ततैयों की निन्दा करने लगी और अपने आपको बड़ी विद्वान पंडित मानने लगी। क्योंकि उसने किताब में पढ़ लिया था कि ततैया का शरीर भारी होता है और उसके पंख छोटे होते इसलिये वह उड़ नहीं सकती। अतः वह एक जगह बैठी रहे और शेष सभी उड़ने वाली ततैयों की निंदा करें।
तो किताब पढ़कर जो दशा ततैया की हो गई थी, वही दशा आज के पंडित विद्वान की हो रही है। एक बहुत पुरानी कहानी मैंने पढ़ी थी कि एक शतपदी, सौ पैरों से चलने वाला जानवर राह से गुजर रहा था। जिसे देखकर एक खरगोश बड़ा हैरान हुआ, अतः उसके मन में जिज्ञासा हुई कि वह जानवर कौन सा पैर पहले उठाता होगा? कौन सा पीछे उठाता होगा? और फिर सौ पैरों का हिसाब-किताब रखना और चलना जरूर बड़ा कठिन काम होगा। इसलिये उसने कहा- रूको भाई, पहले मेरे एक सवाल का जवाब दे दो फिर जाना। मैं यह जानना चाहता हूं कि आप सौ पैरों में से पहले कौन-सा पैर उठाते हो? और कौन सा पीछे उठता है? कारण इतना हिसाब लगाकर चलना अति कठिन है और फिर आप चलने में डगमगाते भी नहीं, लड़खड़ाते भी नहीं और ऐसा भी नहीं कि दस-बीस पैर इकठ्ठे उठाते हो, क्योंकि ऐसा करने में जरूर गिर जाओंगे। अतः आप अपना गणित बताईये?
पूछने के पहले तक तो शतपदी ने भी कभी नहीं सोचा था, मात्र जन्म से जब से होश पाया कि चलता रहा। कभी उसके मन में भी यह सवाल न उठा। अतः वह अपने आप को ऊपर से नीचे देखकर घबड़ा गया, कि सौ पैर। गिनती भी इतनी नहीं आती थी उसको। अतः उसने कहा- भई अभी तक तो मैंने भी नहीं सोचा था। लेकिन अब सवाल उठा दिया है, तो मैं जरूर सोचूंगा, परीक्षण करूंगा, निरीक्षण करूंगा फिर आपको शीघ्र ही खबर दूंगा।
परन्तु फिर व शतपदी चल न सका। क्योंकि वह एक कदम चला और लड़खड़ा कर गिर गया, कारण सौ पैर में पहले पैर उठाने का सवाल था? जान छोटी और पैर सौ। बुद्धि छोटी और पैर सौ। इतने बड़े हिसाब लगाने में गडबड़ तो होगी ही। अतः वह खड़ा हो कि गिर पड़े, जिससे परेशान होकर उसने कहा- अरे ना समझ खरगोश तूने मेरी मुसीबत खड़ी कर दी। अब मैं कभी भी नहीं चल पाऊंगा, क्योंकि यह सवाल मेरा पीछा करेगा।
आपने कभी ख्याल किया, आप जिन छोटी-छोटी चीजों का चिन्तन बना लोगे, वही आप को बड़ी मुसीबत खड़ी कर देंगी। आप कोशिश करके देखो। जब भोजन करना तो मात्र इतना सोचना कि आप भोजन पचाते कैसे हो? जरा सात दिन ध्यान करना कि भोजन कैसे पचाते हो? कैसे खून-हड्डी, मांस-मज्जा बनाते हैं? यह कोई छोटी घटना नहीं है। वैज्ञानिक भी कहते हैं कि यह दुनियां का सबसे बड़ा चमत्कार है। रोटी खाते हो और खून-हड्डी, मांस-मज्जा बनी जाती है, मस्तिष्क के शरीर के सूक्ष्म तंतु बन जाते हैं, विचार-वासना बन जाती है। इस छोटे से पेट की फैक्ट्री में सब रूपांतरण हो जाता है। यदि आप सात दिन तक विचार करें कि यह कैसे हो जाता है? तो अपच हो जायेगा, स्वास्थ खराब हो जायेगा, पेट गड़बड़ हो जायेगा। जैसे उस शतपदी के पैर गड़बड़ा गये थे। मात्र सब मन का खेल है। जैसे ततैया के मन की भ्रांति उड़ने नहीं दे रही थी। उड़ सकती थी लेकिन किताब पढ़ ली। जब तक किताब न पढ़ी थी तब तक उड़ रही थी, लेकिन किताब पढ़कर भ्रमित हो गई। ठीक इसी प्रकार आज के आदमी को गीता-रामायण, वेद-शास्त्र, कुरान-पुराण पढ़कर भ्रांति हो जाती है। फिर वह शास्त्र शस्त्र हो जाते हैं। जिससे बचना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि जैसे ततैया ने शास्त्र पढ़ा तो वह उड़ न सकी, केवल एक जगह बैठ गई, जिससे शरीर और मोटा हो गया, उड़ने में मुश्किल हो गई। जिससे शास्त्र और भी ठीक मालूम हुआ कि बिल्कुल ठीक लिया है। लेकिन और जो ततैये उड़ रही थी, उन्हें देखकर इसने सोचा कि सब ना समझ, मूर्खता अज्ञानता के कारण उड़ रही है। उनको पता नहीं है कि शास्त्रों में क्या लिखा है। अगर उनमें थोड़ी भी बुद्धि होती, तो वह कभी का उड़ना रोक देती, क्योंकि वैज्ञानिक जो भी कहते हैं, वह सोच-विचार कर कहते हैं। अरे पंख छोटे और शरीर बड़ा फिर भी ना समझ उड़ती चली जा रही है, लगता है उस ना समझ ने यही सोचा होगा कि मैं समझदार ज्ञानी हूं।
उस ततैया ने तो यही सोचा था कि मैं समझदार हूं बाकी ये सभी मूढ़ न समझ उड़े जा रही है, इसलिये सिद्धांत के प्रतिकूल, शास्त्रों के प्रतिकूल उड़ रही हैं। इनको कुछ पता ही नही है कि शास्त्र क्या कहते हैं। जो हो नही सकता, ये वही कर रही है। उन्हें यह ख्याल ही नही आता कि जो नहीं हो सकता, वह अज्ञान में कैसे हो सकता है? लेकिन वह तो सौभाग्य था कि सुबह एक पक्षी ने हमला कर दिया, जिससे वह घबराहट में सब ज्ञान भूल गई, बिसर गया वेद, शास्त्र, कुरान और एक क्षण भर में अज्ञानी होकर उड़ गई। लेकिन जब बैठी वापस छाया तले, तब उसने सोचा उड़ तो मैं भी गई, अतः अब मैं उड़ सकती हूं, अब मैं निश्चिन्त होती हूं—!
आज यही हो रहा है कि लोग साधु-संतो की बातों को नहीं मानते, लेकिन लिखी हुई बातों का जादू होता है। यदि कोई आप से भी कहे, तो शायद आप भी न मानोगे, लेकिन यदि लिखी हुई किताब में बता दे, तो आप फौरन मान जाओगे। क्योंकि किताब में लिखे हुये शब्दों का बड़ा असर होता है। छपे हुये शब्दों का बड़ा प्रभाव होता है। इसलिये तो लिखे हुये शब्दों को तल्लीनता से पढ़ा-सुना जाता है कि एक शब्द भी न चूक जाये। ततैया ने भी तो यही किया था, कि किताब को याद कर लिया तो उड़ न सकी, लेकिन एक पक्षी के झपट्टा मारने से घबरा गई और उड़ गई। ठीक इसी प्रकार यदि गुरु आपको झपट्टा मारें, तो आप घबराहट के कारण उसी क्षण अपने स्वरूप को पहचान सकते हो, जिससे आपका सत्य से साक्षात्कार हो सकता है।
तो यही कारण है कि आपको गुरु से डर लगता है, जिससे आपको सत्य से भय लगता है, जिससे आप संतो के पास न जाकर उनकी निन्दा करते हो। लेकिन फिर भी गुरु को आप पर दया भी आती है और हंसी भी आती है। कारण आप बीमार नहीं हो फिर भी बीमार बनते हो इसलिये हंसी आती है और आप बीमार बनकर बैठ गये हो, दुख भोग रहे हो इसलिये दया भी आती है। दुख भोग रहे हो इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन दुख अकारण भोग रहे हो, इसमें भी कोई शक नहीं है। क्योंकि दुख मात्र आपके मन की गलत भ्रांति में है, इसलिये मात्र भ्रांति को तोड़ना है। स्वभाव से तो आप सदा स्वस्थ ही थे। परमात्मा ने आपको क्षणभर के लिये भी नही छोड़ा, वह तो आपके रोए-रोए में समाया है। वह आपको एक क्षण के लिये भी दुखी नही होने देता, लेकिन सिर्फ आपके मन ने जो गलत ख्याल पकड़ रखा है, उसे छोड़ना है। आदमी का सबसे बड़ा भ्रम तो यह है कि उसका अहंकार अपने को सही मानता है। और वह यही सोचता है कि मोक्षमार्गी संत पंचमकाल में हो ही नही सकते, फिर यह कैसे संत बने घूम रहे हैं। जैसे ततैया सोचती थी कि कोई भी ततैया उड़ ही नहीं सकती, फिर यह दूसरी ततैयां क्यों उड़ रही, शायद ना समझ अज्ञानी होगी। इसलिये उड़ रही है। मुझे लगता है उस ततैया का ज्यादा बुद्धिमान होना ही उसका बुद्धूपन साबित करता है, जैसे पंडितों का ज्यादा ज्ञानी होना उनकी अज्ञानता को प्रकट करता है। यही कारण है कि वह अपने स्वभाव में नहीं, अस्वभाव में जीते हैं। स्वयं के दोष को नहीं देखते, दूसरों की निंदा करते हैं, जैसे ततैया दूसरी ततैयों की निंदा करती थी। वह कहती न इन्हें कोई शास्त्रों का ज्ञान है, न विशेष अध्ययन है, न कोई सोच-विचार, न कुछ जीवन का ख्याल, मात्र अज्ञानता के कारण ऊंचे उड़ रही है। भूलों में नाच रही है, ऐसे फालतू में अपना जीवन गवां रही है। सिर्फ मैं ही विशिष्ट हूं बाकी तो ये सब निकृष्ट हैं, तो अज्ञानता के कारण भटक रही है। लेकिन जैसे ही पक्षी ने झपट्टा भरा कि उसका अहंकार अज्ञान रूपी अंधकार तत्क्षण टूट गया और वह उड़ने लगी, ठीक इसी प्रकार यदि पंडित विद्वानों को भी संतो की ठोकर लगे तो उनका भी अज्ञान अहंकार रूपी अंधकार नष्ट होकर आत्म बोध प्रकट हो सकता है, जिससे उनका मनुष्य जन्म लेना सार्थक हो जाये।
अहंकार आपकी विनम्रता को नष्ट कर देता है और विनम्रता नष्ट होते ही जीवन का विकास रूक जाता है। सीखने की क्षमता खो जाती है। मोक्ष का द्वार बंद हो जाता है। क्योंकि विनय ही मोक्ष का द्वार है, लघुता से ही प्रभुता आती है। विनयवान का ही सत्य से साक्षात्कार होता है, अहंकारी तो बहुत बड़ी भ्रांति में जीता है। अहंकारी की भ्रांति यह है कि जैसे मै केन्द्र हूं सारे विश्व का, जैसे सब मेरे लिये है और मैं किसी के लिये नहीं, जैसे सब मेरा साधन है और मैं साध्य हूं। इसलिये अहंकारी सोचता है कि यदि मेरे सुख के लिये सभी को दुखी भी होना पड़े तो भी ठीक है। क्योंकि मैं साध्य हूं और सब साधन हैं। अतः सबके कंधों पर मेरे पैर रखने पड़े तो रखूंगा। सबके सिर की सीढि़यां बनानी पड़े बनाऊंगा। क्योंकि सब सीढि़यां होने को ही बने हैं। अहंकारी अपने को अस्तित्व का केंद्र मानता है। अहंकारी मद में चूर होता है। उसकी आंखों में देखने की क्षमता खो जाती है। उसका बोध विलुप्त हो जाता है। वह एक तंद्रा और निद्रा में जीता है। लेकिन विनयवान को सत्य का बोध होता है। वह कहता है मैं तो कुछ भी नहीं हूं। इस विराट संसार में मेरा क्या अस्तित्व है। मेरा होना तो एक सपना मात्र है- जो रात देखा सुबह खो जाएगा। मेरा होना कोई ठोस पत्थर की तरह नहीं, पानी की लकीर की तरह है। अतः फिर मैं किस पर मद करुं। अरे, मद तो सब कुछ नष्ट कर देता है। मान के कारण ही तो व्यक्ति अहंकारी होता है, इसलिये तो कहा जाता है कि मान विनय को नष्ट करता है औरा माया मैत्री को नष्ट करती है।
छल-छिद्र, कपट, मायाचारी मैत्री को नष्ट करती है। मैत्री का अर्थ होता है- आप किसी के साथ ऐसे हो जैसे अपने साथ। आपके और मित्र के बीच में कोई रहस्य नहीं छुपा, कोई दुराव नहीं है। आप अपने मित्र के सामने बिलकुल नग्न हो। क्योंकि आप जानते हो कि आप जैसे हो, आपका मित्र आपको वैसा ही स्वीकार करेगा। उसका प्रेम बेशर्त है। यदि आपको मित्र से भी कुछ छिपाना पड़ता है, तो समझना आप मित्र को भी शत्रु मान रहे हैं।
मैक्यावली ने लिखा है कि मित्र से भी ऐसी बात मत कहना जो आप शत्रु से न कहना चाहते हो। क्योंकि कौन जाने जो आज मित्र है कल शत्रु हो जाये तो फिर पछताओंगे कि अच्छा होता यदि इससे यह बात न कही होती। इसलिये मैक्यावली कहता है कि आप मित्र के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करना जैसा आप शत्रु के साथ करते हो। क्योंकि यहां पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं। मित्र की तो बात ही छोड़ों, आप शत्रु के साथ भी ऐसा व्यवहार करना जैसा मित्र के साथ करते हो। क्योंकि कौन जाने जो आज शत्रु है, कल मित्र हो जाये, इसलिये उससे कुछ ऐसी बाते मत कह देना, जो कल लौटना बड़ी मुश्किल पड़ जाये। क्योंकि फिर थूक को चाटने जैसा होगा। अक्सर लोग दुश्मन को राक्षस कहते हैं। जिसमें कल तक नर में नारायण छिपा था उसी में आज राक्षस हो गया। लेकिन यदि कल पुनः मैत्री हो गई तो फिर कहां मुंह छुपाओगे? फिर कैसे कहोगे कि नर में नारायण छिपा है। फिर कैसे राक्षस को नारायण मानोगे?
इसलिये भगवान महावीर कहते- मित्र तो मित्र है ही, लेकिन शत्रु को भी मित्र मानना। क्योंकि जो आज शत्रु है कल वह मित्र हो सकता है। तो यदि महावीर की बात मानकर चलोगे तो शत्रु भी मित्र हो सकते हैं और यदि मैक्यावली की बात मानकर चले तो धीरे-धीरे मित्र भी शत्रु हो जायेंगे। क्योंकि आपने उनसे कभी मित्र जैसा व्यवहार ही नहीं किया। यदि मित्र से भी कुछ छिपाने पड़े तो मायाचारी है और माया मैत्री को नष्ट करती है।
माया का अर्थ है- सच न होना, धोखा देना, जैसे आप नहीं हो, वैसे दिखना। माया का अर्थ है- प्रमाणिक न होना, प्रपंचना, दिखावा, धोखा, आंख में आंसू भरे थे, लेकिन मुस्कुराने लगे, किन्तु यह मैत्री न हुई। क्योंकि मित्र के सामने आप रो भी सकते हैं। यदि मित्र के सामने न रो सके तो फिर कहां रो सकोगे? यदि मित्र के सामने आप अपना दुख, पीड़ा, संताप, दीनता सभी कुछ प्रकट न कर सके तो कहां करेंगे? मित्र के सामने तो आप अपना कलुष अपना पाप, अपना अपराध, सभी कुछ प्रकट कर सकते हैं। क्योंकि मित्र पर विश्वास है, मित्र ने आपको चाहा है।
किन्हीं कारणों से नहीं, अकारण चाहा है। इसलिए मित्रता किन्हीं कारणों से टूटेगी नहीं। ऐसा नहीं कि मित्र देख लेगा कि अरे, आपने और ऐसा पाप किया, तो दोस्ती खत्म! नहीं, मित्र आपके पापों के प्रति भी करुणा भाव रखेगा। वह आपको समझाने की कोशिश करेगा। सच्चा मित्र निंदा नहीं करेगा। यदि वह डांटेगा भी तो बड़े प्रेम से। वह व्यंग नहीं करेगा। बल्कि प्रेम से आपके पापों को दूर करने की चेष्टा करेगा। मैत्री बड़ी अनूठी घटना है। लेकिन आजकल मैत्री दुनिया में कम बची है। मात्र मैत्री शब्द ही रह गया है। क्योंकि मैत्री के फूल खिलने के लिए दो निष्कपट व्यक्ति चाहिये। जिनके बीच मायाचारी न हो।
क्योंकि माया, मैत्री को नष्ट करती है और लोभ सब कुछ नष्ट कर देता है। यदि आपकी जिन्दगी में खंडहर ही खंडहर मालूम पड़ता हो, मरुस्थल का कहीं कोई पता भी न चलता हो, मरुस्थल ही मरुस्थल हो, तो एक बात निश्चित जान लेना कि आपने लोभ के ढंग से जीना सीखा है। इसलिये आपके जीवन में सब कुछ नष्ट हो गया, क्योंकि लोभ सब कुछ नष्ट कर देता है। जिसने मैत्री सीखी, जिसने प्रेम सीखा, जिसने मैत्री के लिये माया छोड़ी, जिसने प्रेम के लिये क्रोध छोड़ा, जिसने विनय के लिये मान छोड़ा और जिसने जीवन को सृजनात्मक गति देने के लिये लोभ से बिदा ली, उसने परमात्मा की आकांक्षा पूरी कर दी। उसके हृदय में परमात्मा का कमल खिल गया। उसकी आंखों में परमात्मा का वास हो गया।
लोभ से लाहो सव्व विणासणो! सब कुछ नष्ट हो जाता है और प्रेम से सब उपलब्ध हो जाता है। लोभ और प्रेम विपरीत है। इसे जरा समझ ले, लोभी व्यक्ति प्रेम नहीं कर पाता- कर ही नहीं सकता। क्योंकि प्रेम बांटना पड़ता है, देना पड़ता है और लोभी कृपण होता है, वह बांटेगा कैसे? लोभ तो इकठ्ठा करता है, देगा कैसे? लोभ तो एकत्र करके उसकी रक्षा में लग जाता है, उसमें से कोई एक पैसा भी खींच न ले। इसलिये इस देश में कहावत है कि लोभी मर कर सांप होता है। कुंडली मार के बैठा जाता है खजाने पर। वह सांप सोने को भोग नहीं सकता- भोगने का तो सवाल ही नहीं उठता।
तो लोभी भी भोगता नहीं है, वह धन इकठ्ठा कर लेता है, किन्तु उसे खर्च नहीं करता। खर्च करने में तो प्राण निकलते हैं, घबड़ाहट होती है। इकठ्ठा कर लेना ही उसका भोग है। जबकि धन एक संतुष्टि मात्र है। आप सोने की ईट रख के बैठे रहो या मिट्टी की इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। बिना भोगे तो मिट्टी की ईट और सोने की ईट बराबर है। लोभी बड़ा अद्भुत आदमी होता है, वह धन पास में होने पर भी खर्च नहीं करता। बांटता नहीं है और जब बाहर के धन को नहीं बांट सकता तो भीतर के धन को क्या खाक बांटेगा? ठीकरे नहीं बांट सकता, तो हृदय कैसे लुटायेगा? जबकि प्रेम के लिये हृदय लुटाने वाला चाहिये, बांटने वाला, देने वाला चाहिये। क्योंकि प्रेम तो बांटने की कला है और लोभ इकठ्ठे करने की कला। मगर आप जो इकठ्ठा करते हो वह सब व्यर्थ है। इसलिये लोभी से ज्यादा दरिद्र दुनिया में कोई आदमी नहीं होता। तो लोभ कभी प्रेम नहीं कर सकता।
क्योंकि प्रेम की यात्रा तो बिल्कुल उल्टी है। प्रेम देने में खुश होता है और लोभ लेने में खुश होता है। प्रेमी बांटता है और लोभी संग्रह करता है। इसलिये कहता हूं कि लोभ तो एक तरह से कब्जियत की बीमारी है। क्योंकि लोभ सिर्फ रोकता है। जैसे कब्जियत मन को रोकती है। लेकिन प्रेम देता है, बांटता है और सच पूछो तो प्रेमी लेने-देने में कंजूस नहीं करता। वह दिल खोलकर देता भी है और लेता भी है। प्रेम एक संतुलन बनाकर चलता है। उसके पक्षी जैसे दो पंख होते है लेने-देने के, इसलिये खुले आकाश में स्वतंत्र उड़ता है लेकिन लोभी सब कुछ नष्ट कर देते हैं। तो क्रोध को क्षमा से जीते, मान को नम्रता से जीते, माया को ऋजुता से जीतें और लोभ को संतोष से जीतकर अपने जीवन को सफल व सार्थक बनायें।
तो क्षमा से क्रोध का हनन करें। क्षमा का अर्थ आपकी कोई अपेक्षा नहीं, जो दूसरा कर रहा है, वह वही कर सकता है इसलिये कर रहा है। जैसे कोई गाली दे रहा है, तो वह गाली ही दे सकता था सो दे रहा, अतः देने दो। जब मुझे नहीं चाहिये तो वह उसी के पास रहेगी। क्रोध मात्र दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यदि आप सोचते हैं ऐसा नहीं होना चाहिये था जैसा हुआ है तो क्रोध आयेगा। क्रोध का अर्थ है- अपेक्षा के विपरीत काम होना अथवा जहां अपेक्षा की उपेक्षा होती है, वहीं क्रोध आता है। क्रोध में अपेक्षा छिपी रहती है। अगर कुत्ता आकर भौंक जाये तो आप नाराज न होंगे, क्योंकि आप जानते हैं कि कुत्ता है तो भौंकेगा ही और यदि आदमी आ करके भौंक जाये तो आप नाराज हो जायेंगे। कारण आदमी में उसकी अपेक्षा छिपी थी। जबकि क्षमावान व्यक्ति सोचता है जिसके पास जो होगा वही तो देगा। गाली वाला गाली देगा और गीत वाला गीत देगा। क्षमा का अर्थ है- हमारी कोई अपेक्षा नहीं है। मैं कौन होता हूं आपसे अपेक्षा रखने वाला कि आप ऐसा व्यवहार करें तो ठीक है और यदि ऐसा न किया तो क्रोधित हो जाऊंगा।
एक फकीर रास्ते से गुजर रहा था। एक आदमी ने उसको लाठी मारी और घबराकर भागने लगा, लेकिन घबड़ाहट में हाथ से लाठी छूट गई तो फकीर ने लाठी उठाकर उसको दे दी और कहा भाई यह लाठी तो ले जा। पास खड़े व्यक्ति ने कहा- यह क्या माजरा है? इस आदमी ने चोट पहुंचाई और आपने उसकी लाठी उठाकर उसको दे दी? आखिर आपने उससे कुछ कहा क्यों नहीं? फकीर ने कहा- अब कहना क्या है? यदि मैं रास्ते से गुजरा रहा हूं और एक वृक्ष की शाखा गिर पड़े जिससे सिर फूट जाये, तो क्या करूंगा? कुछ भी नहीं न! इसलिये अब करने की बात ही कहां रह गई? अरे वह तो संयोग है कि मैं निकला और वृक्ष की शाखा टूटकर आकस्मिक सिर पर गिर गई। ठीक इसी प्रकार आदमी को मारना था और हम मिल गये। अब कहना क्या है? जो वह कर सकता था सो वही उसने किया है। न कर सकता होता तो करता ही क्यो? जो इसके भीतर था वही इसने बाहर व्यक्त कर दिया। मैं कौन होता हूं रोकने वाला।
यह संसार अपेक्षा से चल रहा है, इसलिये सभी क्रोधित होते हैं। जिसकी जितनी ज्यादा अपेक्षा है वह उतना ज्यादा क्रोधित होता है। पति, पत्नी पर क्रोधित होता है, तो पत्नी, पति पर आग बगूला हो जाती है। हर किसी पर नहीं होती। क्योंकि हर किसी से कुछ अपेक्षा ही नहीं है। जिससे अपेक्षा है उसी पर क्रोध आता है। बाप-बेटे पर क्रोधित हो उठता है। क्योंकि बाप ने बड़ी-बड़ी आशायें बांधी थी जो उसने तोड़ दी। सोचा था- यह बनेगा, वह बनेगा, बड़े सपने देखे थे और सब उल्टा हो गया। तो पुत्र पर पिता क्रोधित होता है, पड़ोसी के लड़के पर नहीं। क्योंकि पड़ोसी के लड़के से कोई अपेक्षा नहीं होती और क्षमा अर्थ भी यही है कि अपेक्षा रहित होना। जो हो जाये उसे प्रेम से स्वीकार कर लेना।
क्षमा करो, अपेक्षा मत रखों क्योंकि आप कौन हो गलत-सही का निर्णय करने वाले? इसलिये क्षमा से क्रोध को जीतो और नम्रता से मान को जीतो। नम्रता का अर्थ है- अपनी स्थिति को जानना। यह कोई साधना नहीं है, सिर्फ अपने तथ्य को पहचानना है कि मेरी स्थिति क्या है? किस चीज का अभिमान करना, सांस बंद होने पर सब समाप्त हो जायेगा। आज हूं कल नहीं रहूंगा। नम्रता का अर्थ है- अपनी वास्तविक स्थिति को जानना कि हमारा क्या है? अहंकार किस बलबूते पर करुं? दुनिया में क्या चीज मेरी है। फिर घमंड किस बात का? जब कुछ भी शाश्वत नहीं है तो मान क्या करना। अतः मान को नम्रता से जीतो और माया को सरलता, ऋतुजा से जीतो।
ऋजुता, सरलता का अर्थ है- प्रामाणिकता, सीधा सादापन। ऋजुता का अर्थ है बच्चे जैसा भोलापन। सीधी लकीर की तरह जीवन। ऋजुता में दो व्यक्ति के बीच निकटतम दूरी होती है। उन्हें जो कहना है, जो करना है, जो चाहता है, वही कहते है और ऋजुता का अर्थ ही है- जो कहते हो वही हो जाओ। तो अपने अन्दर के छल-कपट, प्रपंच को छोड़कर सरल हो जाओ, क्योंकि सरलता से ही सुख सम्पदा मिलती है। सरलता से ही शांति मिलती है। सरलता से ही जटिलता कट जाती है। अतः सरलता-विनम्रता ऋजुता से मान को जीतो और संतोष से लोभ को जीतो।
कल्याण हो—-!!
परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली
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