





जगत के पालन कर्त्ता भगवान विष्णु हैं और विष्णु शुद्ध तत्व युक्त निराकार- साकार स्वरूप है और भगवती लक्ष्मी उनका माया स्वरूप है, प्रकृति स्वरूप है। यह लक्ष्मी ही है जो कि अपनी शक्ति प्रकृति द्वारा संसार को इच्छा मोहमाया भौतिकता प्रदान करती है। योगियों के लिये यह विद्या लक्ष्मी है जो उनमें कुण्डली जागरण की क्रिया प्रदान करती है। वहीं संसारिक व्यक्तियों के लिये यह सौन्दर्य, भाग्य, श्रेष्ठ दृश्य, प्रकृति, माधुर्य, प्रेम, उन्नति, संगीत, पंचतत्व और उनका समायोजन, मन, प्राण चेतना का स्वरूप है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जगत में मनुष्य के पंच तत्व, पंच इन्द्रियां बाह्य रूप से और आंतरिक रूप से लक्ष्मी की कृपा से ही क्रियाशील रहती है और लक्ष्मी के कारण से ही उसके जीवन में मधुरता आती है।
सामान्य रूप से यह माना जाता है कि लक्ष्मी की आवश्यकता केवल गृहस्थ व्यक्तियों को ही पड़ती है, संन्यासीयों को लक्ष्मी की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में तो सन्यासीयों को गृहस्थ व्यक्तियों से अधिक लक्ष्मी की आवश्यकता पड़ती है। गृहस्थ व्यक्ति लक्ष्मी के माध्यम से अपने घर-परिवार का पोषण करता है और स्व उन्नति की ओर अग्रसर होता है, जबकि श्रेष्ठ योगी, संन्यासी पूरे समाज में चेतना देने का कार्य करते है। उन्हें महान् कार्य करने पड़ते हैं और अपने कार्यों का विस्तार केवल एक स्थान पर नहीं अपितु हजारों स्थानों पर करना होता है इसलिये योगियों के लिये, संन्यासीयों के लिये सरस्वती एवं लक्ष्मी दोनों की विशेष आवश्यकता रहती है।
जगत् गुरू शंकराचार्य ने तो अपने जीवन में अल्प आयु में ही पूर्ण सफलता प्राप्त करने हेतु तथा सनातन धर्म की स्थापना के लिये देवी त्रिपुर सुन्दरी, लक्ष्मी और सरस्वती की ही साधना पूरे जीवन सम्पन्न की और उन्हीं की कृपा से वे छोटी सी आयु में इतने महान् कार्य सम्पन्न कर सके।
स्कन्द पुराण में वर्णित विवरण के अनुसार गृहस्थ पुरूष-स्त्री को यह साधना सम्पन्न करनी चाहिये। श्रावण शुक्रवार के दिन ही यह साधना सम्पन्न की जाती है। इस बार दो श्रावण होने के कारण प्रत्येक पूर्णिमा से पहले पड़ने वाले शुक्रवार को विशेष मुहूर्त बन रहे हैं। ये तिथियां हैं- 28 जुलाई या 25 अगस्त।
वर लक्ष्मी का तात्पर्य है जो अपने भक्त को वर प्रदान करें। स्त्रियों के लिये वर लक्ष्मी का तात्पर्य है उनका सौभाग्य अक्षुण्ण रहे, पुरूषों के लिये वर-लक्ष्मी का तात्पर्य है वे जो भी कार्य करें उसमें विशेष सफलता प्राप्त हो और लक्ष्मी वर मुद्रा में उनके घर में सदैव स्थापित रहे।
लक्ष्मी का तात्पर्य केवल धन और सांसारिक सम्पत्ति नहीं है। वर-लक्ष्मी धन के साथ-साथ मनुष्य को शुद्ध ज्ञान बुद्धि, आत्मिक चेतना प्रदान करती है। विद्या लक्ष्मी के रूप में वह जगत् पिता विष्णु से मनुष्य को जोड़ती है जिस कारण मनुष्य अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त करता हुआ पुरूष से पुरूषोत्तम बनने की क्रिया करता है, धर्म के साथ काम और अर्थ को भोगता हुआ मोक्ष प्राप्त करता है।
इस साधना में मूल रूप से एक ताम्र कलश, ‘वर लक्ष्मी यंत्र’, ‘रक्षा सूत्र माल्य’ की आवश्यकता रहती है। यह रक्षासूत्र माल्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है और कलश के चारों ओर इसे लपेट कर रखने से घर में सदैव लक्ष्मी की रक्षा होती है तथा व्यर्थ की धन हानि नहीं होती।
श्रावण पूर्णिमा से पहले पड़ने वाले शुक्रवार अर्थात् 28 जुलाई या 25 अगस्त सुबह प्रातः जल्दी उठकर स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। पुरूषों के लिये आवश्यक है कि वे श्वेत वस्त्र धारण करें तथा स्त्रियां पीला, केसरीया अथवा लाल वस्त्र धारण करें। अपने सामने एक बाजोट पर अक्षत से नौ खाने बना कर नवग्रह मण्डल बना दें तथा उसके बीचों-बीच चावलों से भर कर यह कलश स्थापित कर दें। कलश में ही चार पत्ते रख कर उस पर नारियल स्थापित कर दें। इस कलश के सामने वर-लक्ष्मी यंत्र स्थापित कर दें तथा कलश के कंठ में वर-लक्ष्मी रक्षासूत्र माल्य पहना दें, कलश के चारों तरफ चार बिन्दी लगा दें तथा षोडशोपचार पूजन से अथवा दैनिक साधना में दी गई विधि अनुसार कलश एवं यंत्र का पूजन करें। यंत्र एवं कलश के सामने लाल-पीले पुष्प समर्पित करें तथा वर-लक्ष्मी का निम्न मंत्र से विनियोग करें। विनियोग हेतु दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें तथा निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
ऊँ अस्य श्रीवरलक्ष्मीमन्त्रस्य हिरण्यगर्भ ऋषिः अनुष्टुप्छनदः श्रीवरलक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः श्रीं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं मम सर्वक्लेशषपीडापरिहारार्थ सर्वदुःखदारिद्रयनाशानार्थ सर्वकार्यसिद्धयर्थ च श्रीवर-लक्ष्मी-मन्त्रजपे विनियोगः।
विनियोग के पश्चात् बाये हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से जल को अपने मस्तक, नेत्रों, कंठ, भुजाओं, वक्षः स्थल पर स्पर्श करायें तथा वर-लक्ष्मी की प्रार्थना करते हुये निम्न लक्ष्मी गायत्री मंत्र का उच्चारण ‘वर-लक्ष्मी रक्षासूत्र माल्य’ से करें।
Om Mahadevayae Cha Vidmahe Vishnupatnayae
Cha Dhimahi Tannaom Lakshmi Prachodayat
इस शुभ मुहूर्त 28 जुलाई या 25 अगस्त को इस मंत्र की एक माला जप तो अनिवार्य है अर्थात 108 बार तो मंत्र जप करना ही है इससे अधिक संख्या में मंत्र जप करें तो और अधिक श्रेष्ठ है लेकिन मंत्र जप एक माला, तीन माला, पांच माला, सात माला, अथवा ग्यारह माला होना चाहिये।
मंत्र जप के पश्चात् लक्ष्मी की आरती सम्पन्न करें तथा वर-लक्ष्मी को समर्पित प्रसाद स्वयं ग्रहण करें तथा परिवार के सदस्यों में बांट दें।
यह सम्पूर्ण सामग्री श्रावण पूर्णिमा के दिन पवित्र सरोवर जल में स्वयं विसर्जित करनी है और विसर्जन करते समय यह प्रार्थना करनी है कि हे वर-लक्ष्मी जिस प्रकार आप जल में विष्णु के साथ सदैव विराजमान रही है उसी प्रकार मेरे घर में सदैव विराजमान होकर मुझे अपनी कृपा का वर प्रदान करती रहें।
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