





किसी भी प्रकार के पूजन में सबसे पहले गणपति का पूजन किया जाता है। गणपति समस्त गणों के अधिपति हैं। गणपति का वेदों में भी उल्लेख है और वे पूर्ण कल्याणकारी देव माने गये हैं।
ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं और महेश सृष्टि के संहारकर्ता के रूप में पूजे जाते हैं। सृष्टि में प्रत्येक कार्य चाहे वह संरचनात्मक हो, संचालन का हो या संहारत्मक हो, प्रत्येक कार्य में प्रथम पूज्य गणपति ही हैं।
एक बार देवर्षि नारद ने महादेव से पूछा- ‘हे महेश! कृपा कर यह बतायें, कि गणेश की प्रथम वन्दना क्यों की जाती है? हे कैलाश पति! मैं यह जानना चाहता हूँ, कि वे आपसे सर्वाधिक स्नेह कैसे प्राप्त कर लेते हैं।’
तब महादेव ने कहा – ‘ हे ऋषि श्रेष्ठ! उनमें इस बात का तनिक भी अहं नहीं, कि उनकी वन्दना सब देवों से पहले होती है, वे अपने आपको स्वयं में अत्यन्त नगण्य मानते हैं और अपने प्रत्येक कार्य को हमारी ही आज्ञा मान कर करते हैं और सबसे अधिक बुद्धिमान भी हैं। इसलिए हे ऋषिवर! वे हम दोनों के अत्यन्त स्नेह और कृपा के पात्र हैं।’
इस पर नारद ने कहा – ‘हे देव। मैं उनकी परीक्षा लेना चाहता हूँ, कि उनमें कितनी भक्ति है, वे कितने आज्ञापालक हैं और प्रथम पूज्य क्यों है ?’
महादेव ने गणपति और कार्तिकेय को बुलाया और कहा – ‘तुम दोनों को पृथ्वी की सात परिक्रमा करनी है और जो पहले आयेगा वह हम दोनों का अत्यन्त स्नेही होगा।’ यह आज्ञा देने पर महादेव के दोनों पुत्र अपने पिता की आज्ञा पालन करने को तैयार हुए। श्री कार्तिकेय तो पृथ्वी की सात परिक्रमा लगाने के लिए दौड़े, ताकि वे पहले पहुँच कर, अपने माता-पिता के स्नेह को प्राप्त कर, उनके प्रिय बन सकें।
लेकिन गणपति ने प्रार्थना की-
‘हे माता-पिता! आप दोनों साथ-साथ बैठ जायें, ताकि मैं आपकी परिक्रमा कर सकूं, क्योंकि माता-पिता के चरणों में तो पूरा ब्रह्माण्ड निहित है।’
और उन्होंने अपने माता-पिता गौरी-शंकर की परिक्रमा लगाई और चरण स्पर्श किया। यह देख कर महामुनि नारद ने कहा – ‘यह तो गलत है, गणेश ने तो पृथ्वी की परिक्रमा की ही नहीं , फिर आप उन्हें कैसे प्रिय मान रहे हैं?
गणेश ने कहा- ‘हे मुनि श्रेष्ठ! समस्त ब्रह्माण्ड मेरे माता-पिता के चरणों में निहित है। अतः मैंने सिर्फ पृथ्वी की ही नहीं, अपितु समस्त ब्रह्माण्ड की सात बार परिक्रमा की है और सबसे पहले उनको श्री चरणों में उपस्थित हुआ हूँ इसलिए मैं उनके अत्यन्त स्नेह का पात्र हूँ।’
इस पर महामुनि ने कहा – ‘वास्तव में गणेश आपके श्रेष्ठ पुत्र हैं और गणेश की वन्दना ही प्रथम होनी चाहिये। गणेश का अगर एक स्वरूप विघ्नहर्ता है, तो दूसरा स्परूप अत्यन्त आज्ञाकारी पुत्र और अत्यधिक उच्चभक्ति का भी है। अतः उनकी साधना करने पर व्यक्ति के विघ्न तो खत्म होंगे ही, उसके साथ ही यदि साधक गणपति की साधना गौरी नन्दन के रूप में करेगा, तो उसे एक श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति भी होगी, जो आज्ञाकारी होगा।’
और इसी रूप की साधना जीवन में आवश्यक है क्योंकि इस युग में तो माता-पिता अपने बच्चों को अत्यधिक परिश्रम कर, उन्हें उच्च से उच्च शिक्षा दिलाने का प्रयत्न करते हैं, लेकिन बच्चे गलत संगत में पड़कर उनकी सारी आशाएं धूमिल करने के लिए तैयार हो जाते हैं। वे यह समझ भी नहीं पाते, कि उनके माता-पिता उनके लिए कितना अधिक परिश्रम कर रहे हैं उन्हें योग्य बनाने के लिए, क्योंकि वे अनेक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं अपने पुत्र को समाज की प्रत्येक समस्या से निपटने योग्य बनाने के लिए, क्योंकि वे माता-पिता अपने पुत्र को समाज में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं।
प्रत्येक माँ- बाप का यही स्वप्न रहता है, कि वे अपने पुत्र को समाज के एक प्रतिष्ठित, सम्मानित एवं सुयोग्य व्यक्तित्व के रूप में देखें और उनका पुत्र उनके प्रयत्नों को सार्थक बनाये। कभी-कभी पुत्र प्रयत्न करने पर भी अपने कार्यों में सफल नहीं हो पाता। वह प्रत्येक कार्य को प्रसन्नतापूर्वक उत्साह से करता है, लेकिन कुछ न कुछ विघ्न उसके कार्यों को सफल नहीं होने देते और वह अपने प्रयत्नों में असफल होकर गलत राह पर निकल पड़ता है। पुत्र की सद्बुद्धि के लिए यह साधना अत्यन्त सटीक है, क्योंकि पुत्रों की वजह से जीवन में कई समस्याएं खड़ी हो जाती हैं।
यह साधना मात्र उन गणेश की ही नहीं है, जो ज्ञान और आनन्द के निर्मल स्वरूप हैं, बल्कि इसके माध्यम से उन गौरी की भी अर्चना होती है जो शिव की शक्ति हैं और एक श्रेष्ठ पुत्र को उत्पन्न करने वाली माँ हैं। इस साधना की सिद्धि से साधक को श्रेष्ठ, सुन्दर मुख वाला, श्रेष्ठ आचरण वाला, मातृ-पितृ भक्त, उनकी दी हुई आज्ञाओं का पालन करने वाला, अपने समस्त कर्तव्यों का भली प्रकार से निर्वाह करने वाला पुत्र प्राप्त होता है और इस साधना के फल स्वरूप वह सद्मार्ग पर अग्रसर होने लगता है।
यह साधना आप गणपति अवतरण पर्व को कर सकते हैं । यह एक दिवसीय साधना है और यह प्रातःकाल या रात्रि किसी भी समय की जा सकती है। इस साधना में ‘गणेश यंत्र’, ‘गौरी गुटिका’ तथा ‘विघ्न हरण माला’ की आवश्यकता होती है। इसमें आप शुद्ध स्वच्छ सफेद वस्त्र पहन कर ‘गुरू पीताम्बर’ धारण कर पूर्वाभिमुख होकर साधना करें।
गणपति का ध्यान करें, कि वह आपके जीवन की इच्छाओं को पूर्ण कर समस्त विघ्नों का नाश करें-
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णक।।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायक।।
धुम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजानन।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।।
इसके बाद ‘विघ्नहरण माला’ से निम्न मंत्र का 21 माला जप करें-
जप समाप्ति के बाद 21 बार उपरोक्त मंत्र बोलते हुए तिल से हवन करें। साधना समाप्त होने के पश्चात अगले दिन समस्त सामग्री नदी में विसर्जित कर दें।
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