



चन्द्रग्रहण प्रारम्भः 18 सितम्बर, प्रातः 06:11 AM से प्रातः 10:17 AM तक


यह कथा एक हस्तलिखित पांडुलिपि से ली गई जो कई पीढ़ियों से सुरक्षित थी।
क्या हो गया है मुझे…… मेरा दिल मेरे ही बस में नहीं है! यह मेरे मन पर किसका आधिपत्य हो गया, इसी विचार में करवटें बदलते-बदलते रात गुजर जाती….. जो आंखे किसी स्त्री की तरफ नहीं उठती थी, वे इस कायां के इतनी वशीभूत क्यों हो गई?
उसे देखकर ऐसा लगता, कि जैसे विधाता ने उसके एक-एक अंग-प्रत्यंग को बड़ी कुशलता के साथ गढ़ा है, उसका सौन्दर्य ऐसा अद्भूत था, जो उसे सामान्य नारी-सौन्दर्य की श्रेणी से अलग दर्शाता था, उसे देखकर ऐसा ही अनुभव होता, जैसे वह एक साधारण स्त्री न होकर सौन्दर्य की देवी हो।
क्योंकि आज तक पृथ्वी पर मैंने तो कभी ऐसा आश्चर्यचकित कर देने वाला सौन्दर्य देखा ही नहीं था।
ऐसा क्या था उसके सौन्दर्य में, जिसने मेरा सब कुछ लूट लिया था, इसी ख्याल में डूबा रहता मैं!……. और मन ही मन उससे प्रेम कर बैठा, अब उसको पा लेना ही मेरी मंजिल, मेरा लक्ष्य हो गया…. किन्तु उस जादू कर देने वाली रूपसी में आकर्षण के साथ ही इतना अधिक तेज भी था, कि मेरे पांव वहां तक न जा पाते, मेरे होंठ अपने प्रेम का इजहार तक न कर पाते, ऐसा क्यों होता, कुछ समझ में न आता।
और इसी कारण मैं शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में अस्वस्थ रहने लगा, मेरी इस अवस्था को देखकर घर के सभी सदस्य घबरा गए, अच्छे से अच्छा इलाज कराने पर भी मेरा स्वस्थ होना असंभव सा हो गया था, क्योंकि वैद्य समझ ही नहीं सके कि रोग कौन-सा है, सभी इस बात से दुःखी व परेशान रहने लगे। यह तो मैं ही जानता था, कि मेरे अन्दर द्वन्द्व चल रहा है, कितनी घुटन हो रही है- न जी पा रहा हूँ और न मर सकता हूँ, क्योंकि दोनों ही मेरे हाथ में नहीं था।
लेकिन इस आंतरिक पीड़ा को और ज्यादा न सह पाने के कारण, एक दिन अचानक अपने एक मित्र को सारी बात कह डाली और अगले दिन ही उसने अपने घर आने के लिये मुझे कहा। मैं स्नानादि से निवृत हो सबुह-सबुह ही उसके घर पहुँच गया, वहां पहुँच कर लगा, जैसे वह मेरे ही इंतजार में बैठा हो, बातचीत के दौरान उसने मुझसे एक सन्यासी का जिक्र किया और कहा- ‘हो सकता है वे तुम्हारी कुछ मदद कर सकें, ऐसा कहकर उसने मुझे उनके पास जाने के लिये पूछा, मैं भी उसकी बात मानते हुए उन संन्यासी के पास पहुँचा, जो कि एक आश्रम में रहते थे।
मित्र को देखते ही उन्होंने एक करूणामयी दृष्टि से उसकी और देखा और मुस्कराने लगे, क्योंकि वे संन्यासी मेरे मित्र के गुरू थे, और उसकी सेवा और उनके प्रति उसके समर्पण से वे बेहद ही प्रसन्न थे। उनकी मनमोहक मुस्कान ने पहली नजर में ही मुझे प्रभावित कर लिया था।
मित्र के आग्रह करने पर उन्होंने उस रूपसी के पूर्वजन्म का लेखा-जोखा मुझे स्पष्ट शब्दों में कह सुनाया, जिसे सुनकर मैं हतप्रभ सा रह गया, उन्होंने जो कहा, वह तो मेरी कल्पनाओं से भी परे था।
उन्होंने बताया, कि वह कोई साधारण गृहस्थ स्त्री या मानवी नहीं है, अपितु एक अप्सरा है, जिसका नाम ‘दिव्यांगना‘ है।
जैसा उसका नाम था, वैसा ही उसका रूप-सौन्दर्य भी, यौवन के भार से लदा हुआ, सुन्दरता से गढ़ा हुआ- अनूठा अनुपम, जिसे देखकर देवता भी ठगे से रह जाये…… ऐसा ही था उसका आकर्षक और निर्मल रूप, भोली, निर्दोष, मुखाकृति, जो उसे सभी अप्सराओं से श्रेष्ठ घोषित करती थी।
अपनी इस अद्वितीयता के कारण ही वह अन्य अप्सराओं में श्रेष्ठ और दिव्य मानी जाती थी, क्योंकि अपने नाम के ही अनुरूप दिव्य अंगों से विभूषित होने के कारण ही उसका नाम ‘दिव्यांगना‘ पड़ा।
एक बार ‘वैश्रव्य ऋषि’ अपने पिता की आज्ञा मान तपस्या में रत थे, उनका दृढ़ व्यक्तित्व अपने आप में अनोखा और अद्वितीय था, जिसे देखकर उस ‘दिव्यांगना’ अप्सरा का हृदय काबू में न रह सका, अपने रूप-जाल में उन्हें फंसाने के लिये उसने नृत्य के द्वारा और अपने अंग-प्रत्यंगो के आकर्षण से उन्हें रिझाने का भरसक प्रयास किया और उनकी तपस्या को भंग कर दिया, जिसे देखकर वैश्रव्य के पिता ने क्रोध से तिलमिलाते हुए श्राप दिया- दिव्यांगना! तुमने वैश्रव्य की तपस्या को भंग कर एक घोर अपराध किया है, जिसका दण्ड तुम्हें मिलना ही चाहिये। मैं तुम्हें यह श्राप देता हूं कि ‘तुम्हारा जन्म पृथ्वी पर एक मानवी के रूप में होगा, और तुम चाह करके भी अब इन्द्र लोक में विचरण नहीं कर सकती, और न ही इस प्रकार किसी ऋषि की तपस्या को भंग करने का दुस्साहस कर सकोगी। ’
फिर गुरूदेव ने रूककर……. कुछ सोचते हुए मेरी ओर देखकर कहा, कि यह वही अप्सरा है, किन्तु तुम चाह कर भी उससे विवाह नहीं कर सकते, क्योंकि वह एक अप्सरा है, कोई साधारण स्त्री नहीं, यह बात अलग है कि श्राप के कारण वह अपनी वास्तविकता, अपनी तेजस्विता को विस्मृत कर बैठी है, तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि तुम यह विचार अपने मन से निकाल दो, यह कह कर वे विश्राम गृह में चले गये….. और मैं घर लौट आया, किन्तु उस विचार को अपने मन से न निकाल सका।
मैंने पुनः विनती की-मुझे ऐसी विधि बताएं, जिससे मैं उसे प्राप्त करने में समर्थ हो सकूं, मैं जब पहली बार आप से मिला था, उसी दिन से मैंने मन ही मन आपको अपना गुरू स्वीकार कर लिया था।
मैं उनके मना करने के बावजूद भी अपनी जिद्द पर अड़ा रहा, और कई दिन-रात उनकी सेवा में, आज्ञा-पालन में व्यतीत कर दिए।
एक दिन उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर कहा- ‘मैं तुम्हारी सेवा से अत्यधिक प्रसन्न हूँ, और तुम्हें यह विशेष आशीर्वाद देता हूँ, कि तुम जो भी मुझसे मांगोगे, तुम्हारी वह इच्छा अवश्य पूरी हो जायेगी।
तब मैंने कहा-‘मेरी तो पहली और आखिरी इच्छा ही यही है, कि मैं दिव्यांगना को प्राप्त कर सकूं और यही मेरे जीवन का ध्येय है।‘
तब उन्होंने ‘तथास्तु‘ कहते हुये मुझे उस सर्वश्रेष्ठ साधना को सम्पन्न करने को कहा, जिसके माध्यम से उस ‘दिव्यांगना अप्सरा’ को प्राप्त किया जा सकता है और साथ में यह भी बताया, कि दिव्यांगना को प्रेमिका रूप में आसानी से सिद्ध किया जा सकता है।
मैंने बड़ी मेहनत, लगन और उमंग के साथ उस अद्वितीय साधना को उनके बताये अनुसार सिद्ध कर, उसे प्रेमिका रूप में प्राप्त कर व्यावहारिक और सामाजिक मर्यादा के अनुसार उससे विवाह कर लिया, विवाह के बाद ही मैं और दिव्यांगना दोनों ही उन सन्यासी बाबा का आशीर्वाद ग्रहण करने उनके आश्रम में पहुँचे और उन्हें श्रद्धापूर्वक, भक्तिभाव से प्रमाण कर आशीर्वाद ग्रहण किया।
गुरूदेव ने प्रसन्नता के साथ अपने दाहिने हाथ के अंगूठे को उसके मस्तिष्क पर रखा और दिव्यागंना को उसके वास्तविक स्वरूप का परिचय दिया, जिससे उसे यह स्मरण हो आया, कि वह साधारण स्त्री नहीं अपितु ‘दिव्यांगना अप्सरा‘ है, जो इस पृथ्वी लोक की प्राणी नहीं है, वरन इन्द्र की सभा की सर्वश्रेष्ठ अप्सराओं में से एक है, और तभी उसे यह आभास भी हुआ, कि ये जो मेरे सामने संन्यासी वेशभूषा में है, वे और कोई नहीं, वैश्रव्य ऋषि के पिता ही है, जिनके श्राप से मुझे मानवी रूप धारण कर इस पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा, साथ ही यह भी ज्ञात हुआ, कि जो मेरे पति है, वे और कोई नहीं स्वयं वैश्रव्य ऋषि ही है।
यह दृश्य देख वह आश्चर्यचकित हो उनके चरणों से लिपट, फूट-फूट कर रोने लगी, और अपने अपराध की क्षमा मांगते हुए उनके करूणामयी नेत्रों की ओर याचना की दृष्टि से देखने लगी।
सन्यासी ने गंभीर स्वर से कहा- उठो! और मेरी बात ध्यान से सुनो। उन्होंने दिव्यांगना को बताया -‘तुम्हारी मुक्ति इससे विवाह करके ही संभव थी, क्योंकि वैश्रव्य ने जब से तुम्हारी एक झलक देखी थी, उसी क्षण से उसका मन तुम्हारे प्रति आसक्त हो गया था, और तुम्हें पा लेने की लालसा इसके मन में एक झीना सा आवरण लिये मचल उठी थी, जिस कारण इसकी तपस्या भंग हो गई थी, और तुम्हारे प्रति इस प्रकार के चिन्तन के आ जाने से यह उन गुह्य एवं श्रेष्ठ साधनाओं को सम्पन्न न कर सका, इसके मन में भी मानव रूप लेकर तुम्हें प्राप्त कर लेने की इच्छा प्रकट हो गई, जिस कारणवश मजबूर हो मुझे इसे साधरण मानव बनाकर तुम्हें प्राप्त कर लेने का आर्शीवाद देना पड़ा-‘मानव रूप धारण करने के बाद भी तुम विशिष्ट साधना को सम्पन्न कर ही दिव्यांगना को प्राप्त कर सकोगे।‘ इसने उस साधना को सम्पन्न किया और तुम्हें प्रेमिका व पत्नी के रूप में प्राप्त कर सका। अब तुम इसके मन को स्थिरता प्रदान कर इसे गुह्य साधनाओं में सिद्धहस्त बनने में सहायक बनोगी। इस प्रकार ‘दिव्यांगना‘ और ‘वैश्रव्य‘ का मिलन इस धरा पर सम्भव हुआ।
यह एक पौराणिक कथा थी, जिसे काण्ठमाण्डू में रहने वाले एक साधक ने एक प्राचीन पुस्तक में पढ़ा था, और जिसे पढ़कर उसके मन में भी ‘दिव्यांगना अप्सरा’ को प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत हो गई।
उस साधक ने भी उस पुस्तक में लिखी विधि अनुसार, जिस विधि से वैश्रव्य ने साधना सम्पन्न की थी, उस साधना को सम्पन्न किया, जो इस प्रकार है-
यह ‘वैश्रव्य ऋषि’ द्वारा सम्पन्न की गई दुर्लभ और सर्वश्रेष्ठ साधना है, जिसे स्त्री-पुरूष कोई भी सम्पन्न कर सकता है।
साधक चन्द्र ग्रहण की रात्रि के समय ही इस साधना को सम्पन्न करें। स्नानादि कर शुद्ध, सुन्दर एवं आकर्षक वस्त्र धारण कर लें, तथा पहले से ही पूजा सामग्री एकत्र करके रख लें, जिसमें एक थाली में धूप, दीप, कुंकुम, अक्षत, गुलाब या सुगन्धित फूल की माला, एक साबुत सुपारी, मेवे का नैवैद्य रखा होना चाहिये तथा साथ ही ‘दिव्यांगना यंत्र’ और ‘दिव्यांगना माला’ जो कि वैश्रव्य ऋषि द्वारा प्रणीत मंत्रों से चैतन्य एवं प्राण प्रतिष्ठित हो, पहले से मंगवाकर रख लेना चाहिये।
इसके पश्चात् साधक पूजा-गृह को पहले से ही जल से धोकर स्वच्छ कर लें, और अकेले ही उस साधना काल में वहां बैठकर मंत्र-जप सम्पन्न करें, अन्य किसी को न आने दे। सर्वप्रथम, गुरूदेव का संक्षिप्त मानसिक पूजन सम्पन्न करें, और लकड़ी के एक बाजोट पर नया, गुलाबी वस्त्र बिछाकर उस पर यंत्र को स्थापित कर दें, चावल की एक ढेरी बनाकर उस पर सुपारी रख दें, जो कि गणेश जी का प्रतीक है, फिर भगवान गणपति का पूजन करें, तथा यंत्र का पूजन आरम्भ करें। सर्वप्रथम कुंकुम, फिर अक्षत, उसके बाद पुष्पमाला चढ़ा दें और मेवे का भोग लगाएं।
इस प्रकार पूजन प्रारम्भ कर, फिर हाथ में जल लेकर संकल्प लें- मैं इस कारण हेतु इस साधना को सम्पन्न कर रहा हूँ, ऐसा कहकर जल को जमीन पर छोड़ दे, फिर उत्तरभिमुख हो, आसन पर बैठकर 27 माला ‘दिव्यांगना माला’ से निम्न मंत्र का जप करें-
मंत्र जप सम्पन्न करने के पश्चात् माला को अपने गले में धारण कर लें और यंत्र को वहीं पूजा स्थान में रखा रहने दे, तत्पश्चात् गुरू आरती सम्पन्न करें और भोग ग्रहण कर लें, ऐसा करने से उस साधक को सफलता प्राप्त होती ही है, लेकिन आवश्यकता है, उस साधना के प्रति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास की।
साधना काल में साधक को विभिन्न अनुभव होते है, कभी सुगन्ध आती हुई महसूस होती है, तो कभी उसके स्पर्श का एहसास होता है, या कभी स्वप्न में उसके दर्शन हो जाते है, तो कभी साक्षात् स्वरूप में भी वह प्रकट हो जाती है, इस प्रकार की अनेकों घटनाएं, जो व्यक्ति को आश्चर्यचकित कर देने वाली होती है, इस साधना काल में घट जाती हैं।
वास्तव में वे साधक सौभाग्यशाली होते है जिन्हें जीवन में अप्सरा साधना में सफलता मिलती है। अप्सरा साधना ‘काम साधना‘ नहीं अपितु दिव्यता की आध्यात्मिक साधना है। जिससे भौतिक जीवन में आनन्द आ सकें।
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