





शायद स्वयं के किये कुछ हो भी न सकेगा। अगर अंधेरा गहरा हो, अगर भीतर बेहोशी हो, तो हम जहां भी चलेंगे, जहां भी जायेंगे, वहीं हम अंधेरे को पायेंगे, वहीं हम बेहोशी को पायेंगे।
संसार में दो तरह की प्रणाली है। एक प्रणाली है जो मानती है कि व्यक्ति के संकल्प से परमात्मा निकट आता है। दूसरी प्रणाली है जो मानती है कि स्वयं के समर्पण से ही वह निकट आता है। क्योंकि संकल्प तो अज्ञान से भरा हुआ व्यक्ति ही करेगा। संकल्प् भी अज्ञान से ही निकलेगा। ज्ञान तक पहुँचना कैसे होगा? तुम्हारी चेष्टा भी तो अंधेरी रात से ही शुरू होगी। उस चेष्ठा का जन्म ही अंधकार में है, तो उसका अंत प्रकाशपूर्ण कैसे होगा? तुम जो करोगे, तुम ही करोगे। अहंकार की छाया पड़ेगी उस पर।
तुम्हारी छाया से तुम्हारा कृत्य मुक्त न हो सकेगा।
इसलिये दूसरी प्रणाली कहती है, हम केवल अपने को छोड़ सकते है उसके हाथों में। करना हमारा सवाल नहीं है, वही करें। हम समर्पण कर सकते हैं। संकल्प हमारे वश के बाहर है। संकल्प सिर्फ परमात्मा ही कर सकता है। हम सोए हुए है, उसके चरणों में अपने को छोड़ दें, इतना ही काफी है।
और चरणों में छोड़ने के लिये उसके चरण खोजने की जरूरत नहीं है, सिर्फ चरणों में छोड़ने का भाव काफी है। यह भाव असहाय से असहाय व्यक्ति भी कर सकता है। यह भाव अज्ञानी से अज्ञानी चित भी कर सकता है। कितनी ही गहन बेहोशी हो, चलना न हो सके, गिरना तो हो ही सकता है। यात्रा न हो सके, असहाय प्रार्थना और पुकार तो हो ही सकती है। उठने का बल न हो, चलने का बल न हो, तो भी आंखों में आंसू तो भर ही सकते हैं।
तो एक मार्ग है, जो मान कर चलता है कि तुम्हारी शक्ति से तुम पहुँचोगे। उस मार्ग से कभी करोड़ में कोई एकाध व्यक्ति पहुँचता हो, उसे अपवाद समझ लें। वह नियम नहीं है। उस मार्ग पर लाखों चलते है, कभी कोई एकाध पहुँचता है। वह भी शायद भूले-भटके ही पहुँच जाता है। वह भी शायद टटोलते-टटोलते ही पहुँच जाता है। शायद वह भी अपने श्रम से नहीं पहुँचता, उसके श्रम की आत्यंतिकता देख कर ही परमात्मा की करूणा उस पर हो जाती है। वह भी शायद अपने संकल्प से नहीं पहुँचता, लेकिन उसके संकल्प का बल देख कर, उसका उठना और गिरना देख कर, हर चेष्ठा में उसके चलने की चेष्टा देख कर, खोज देख कर अनंत की करूणा उस पर बरस जाती है, इसलिये वह भी पहुँच जाता है।
लेकिन दूसरा मार्ग, जिसको संतो ने भक्ति का मार्ग कहा है, उस पर जो भी चलता है, पहुँच जाता है। क्योंकि उस पर चलना चलना है ही नहीं, उस पर तो गिरना है। मंजिल भक्त के लिये दूर नहीं है, जहां भक्त गिरा, वहीं मंजिल है। जहां उसने सिर झुकाया, वहीं मंदिर है।
संकल्पवान परमात्मा को खोजेगा, फिर झुकेगा। पहले उसके चरण खोज लेगा, फिर सिर झुकायेगा। समर्पण से भरा हुआ व्यक्ति, भक्त, सिर झुकाता है, और जहां सिर झुका देता है, वहीं उसके चरण पाता है। गिर पड़ता है, आँखे आंसू से भर जाती है। रोता है, सीखता है, पुकारता है, विरह की वेदना उसे घेर लेती है। और जहां उसके विरह का गीत पैदा होता है, वहीं परमात्मा प्रकट हो जाता है।
कभी-कभी तो ऐसा हुआ कि संकल्प से चलने वाले लोगों ने भी अंत में यही कहा है। चले संकल्प से, पहुँचे समर्पण से।
बुद्ध के साथ यही हुआ। क्षत्रिय का खून था, समर्पण आसान नहीं। क्षत्रिय को संकल्प आसान है। लड़ सकता है, मिट सकता है, झुकना उसे नहीं आता। टूट जाना सुगम है, झुकना बड़ा दुर्गम। सारी शिक्षा-दीक्षा, संस्कार क्षत्रिय के-वह भी राजपुत्र के! संघर्ष के। समर्पण के नहीं हो सकते, संघर्ष के ही होंगे।
तो बुद्ध ने छह वर्ष तक अथक तपश्चर्या की। जो-जो कहा है शास्त्रों में, सब पूरा किया। थोड़ा ज्यादा ही पूरा किया। जितना कहा था, उससे भी अति की। क्योंकि कहीं चूक न जाएं, कहीं यात्रा अधूरी न रह जाये। गुरू थक गए। जिन गुरूओं के पास बुद्ध गए, उन्हीं गुरूओं ने कहा कि हम तुमसे अब कुछ भी कह नहीं सकते। क्योंकि जो भी तुमसे हमने कहा करने को, तुमने उसे जरूरत से ज्यादा किया। ऐसा शिष्य पाना दुर्लभ है।
गुरूओं ने हाथ जोड़ लिये। उन्होंने कहा कि इससे ज्यादा अब हमारे पास कुछ है नहीं।
और बुद्ध रास्ते में राजी न थे। छोटी-मोटी उपलब्धि को कोई मूल्य न देते थे। परमात्मा को ही जानना था। और परमात्मा को भी ऐसे नहीं जानना था कि वह दूर खड़ा हो ओर हम दूर खड़े हो। उसे भी ऐसा जानना कि वह हमारा अंतरतम हो! तभी तो जानना जानना है। ऐसा देख लिया आँख भर कर, कौन जाने सपना हो! आंख तो सपने को भी सच मान लेती है। उसकी आवाज सुन ली कानों से, कौन जाने सपना हो! आंख तो सपने को भी सच मान लेती है। उसकी आवाज सुन ली कानों से, कौन जाने सपना हो! क्योंकि सपने में भी तो आवाज सुनी जाती है। नहीं, यह कोई जानना जानना न हुआ, यह तो परमात्मा भी माया का ही हिस्सा हुआ।
जानना है अंतरतम की भांति। बाहर नहीं, इंच भर की दूरी को सुविधा नहीं है। अपने स्वरूप की तरह जानना है, तभी जानने पर भरोसा होगा। जो आंख के पीछे छिपा है और देखने वाला है-देखने वाले की तरह जानना है। दृश्य की तरह नहीं, दृष्टा की तरह जानना है।
थक गए गुरू, उन्होंने हाथ जोड़ लिए। उन्होंने कहा, ‘तुम अपने मार्ग पर जाओ। अब हम और कुछ कह नहीं सकते।
कुंडलिनी जागरण के अनुभव हुए। बुद्ध ने कहा, इससे क्या होगा? अगर रीढ़ में विद्युत की श्रृंखला उठने लगी तो इससे क्या होगा? जब शरीर ही छूट जाना है, तो शरीर में जागी कुंडलिनियों का हिसाब रख कर क्या करेंगे? प्रकाश दिखाई पड़े। बुद्ध ने कहा, इनको देख कर भी क्या होगा ? बच्चो के खेल-खिलोने है। क्योंकि प्रकाश को देखने से भी तो मैं प्रकाश नहीं हो गया। यह भी सब मन का ही खेल है। प्रतिमाएं उठी होंगी परमात्मा की। लेकिन बुद्ध ने कहा कि नहीं, प्रतिमाएं नहीं चाहिये। रूप-आकार नहीं चाहिये। नाम-रूप नहीं चाहिये। वह परम सागर ही जानना है, जिसका न कोई अंत है, न कोई आदि है।
थक गए गुरू। आखिर बुद्ध अकेले विचरण करने लगे। मान-मान कर बहुत से प्रयोग किये थे, अब सोच-सोच कर प्रयोग करने लगे, लेकिन संकल्प की यात्रा जारी रही। छह वर्ष एक पल भी नहीं खोया, हर पल का उपयोग किया, लेकिन कहीं न पहुँचे। थक गए, बुरी तरह थक गए। हताश हो गए, असहाय हो गए, ऐसी गहन हताशा ने पकड़ लिया कि राज्य भी छोड़ा, संसार भी छोड़ा, वह व्यर्थ था। अब यह साधना, तप, योग, यह भी व्यर्थ है, यही भी छोड़ा। छोड़ना उस दिन पूरा हो गया।
उस रात विश्राम किया उन्होंने। वह पहली रात थी जीवन में जब विश्राम किया। जब कुछ करने को ही न बचा, तभी कोई विश्राम कर सकता है। और विश्राम में भक्ति का जन्म है। सोचा भी न था, खयाल में भी न था कि जिसे श्रम करके न पा सके, उसे विश्राम में पा लेंगे। उस रात वे सिर्फ सो गए। कुछ भी न बचा करने को, तो कोई सपना भी न उठा रात। क्योंकि सपने भी तुम्हारे कृत्य के ही अधूरे हिस्से है। जो दिन में छूट गया है, नहीं पूरा हो पाया, वहीं सपने में पूरा होने की कोशिश करता है। जो महल बनाने चाहे थे और नहीं बना पाए, वे ही सपने में बन जाते है। जो धन की राशि इकट्ठी करनी चाही थी, नहीं हो पाई, उसे ही सपने में मन अपने को समझा लेता है।
कोई सपना नहीं, कोई विचार की तरंग नहीं। सबुह नींद खुली, आखिरी तारा डूबता था। उस आखिर तारे को डूबता बुद्ध देखते रहे और परम ज्ञान को उपलब्ध हो गए।
बाद में जब लोग बुद्ध से पूछते थे कि कैसे पाया? तो बुद्ध कहते, बड़ी मुश्किल है बात। जब तक पाने की कोशिश की, तब तक तो पाया ही नहीं। पाया तब, जब हताशा परिपूर्ण हो गई थी, असहाय हो गए थे।
भक्त कहता है, असहाय होना ही उसके सहारे को पाने का उपाय है। जब तुम्हारी असहाय अवस्था ऐसी हो गई कि तुम जानते हो कि रत्ती भर भी मेरे किए कुछ न होगा……
ध्यान रखना, यह जानना पड़ेगा, कहने की बात नहीं है। ऐसे तो अपने को कह सकते हो कि बिलकुल हताश हो गया हूँ। लेकिन भीतर तुम जानते हो, अभी अहंकार जीवित है। अभी भरोसा अपने पर खोया नहीं। अभी अहंकार का सहारा जारी है। अभी तुम जानते हो कि अभी पूरे प्रयास नहीं किए, कुछ और करेंगे तो मिल ही जायेगा। अभी अपने पर भरोसा नहीं खोया है, समर्पण हो नहीं सकता।
लेकिन जब तुम जान ही लोगे, जब यह जानना ऐसे चुभ जायेगा, तीर की तरह हृदय में आर-पार बेध देगा, तब तुम गिरोगे, वहीं गिरना समर्पण है। तब तुम्हारी आंखों से आंसुओं की धारा बहेगी। वही आंसुओं की धारा प्रार्थना है, पूजा है। बाकी सब धोखा है जो तुम कर रहे हो। मंदिर गए, फूल चढ़ा आए, आंसू न गिरे-पूजा नहीं हुई। रोए नहीं- प्रार्थना नहीं हुई। प्रार्थना शब्दों से नहीं आंसुओं से। आंसू इसलिये कि उन्हीं आंसुओं में तुम्हारी हताशा प्रकट होगी। उन्हीं आंसुओं में तुम कहोगे कि मैं काफी नहीं हूँ। तेरे बिना कुछ भी न होगा। मैं गिरता हूँ। और मुझे तेरे चरणों का कोई पता ही नहीं, मैं यही गिरता हूँ जहां खड़ा हूँ। जाने का कोई उपाय भी नहीं है। सब तरफ भटक कर देख लिया, तेरा मंदिर कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता। अब मैं गिरता हूँ।
और जिस दिन तुम ऐसे गिर पड़ोगे, जैसे कोई खाली थैले को छोड़ दें और थैला गिर जाए……. ध्यान रखना, खाली थैले को कोई छोड़ दे, तो खाली थैला गिरता भी नहीं, क्योंकि गिरने का भी कोई खाली थैला निर्णय नहीं लेता। कोई संकल्प नहीं करता कि अब मैं गिरूंगा। क्योंकि जब तक तुम निर्णय कर रहे हो मैं गिरूंगा, तब तक गिरना अधूरा होगा। तुम बाकी रहोगे। गिरना धोखा रहेगा। जहां मैं नहीं बचता और थैले का सब सहारा छूट जाता है, कोई पकड़ नहीं रह जाती, थैला गिर जाता है। उसी क्षण, वहीं परमात्मा के चरण है। वहीं उसके मंदिर का शिखर प्रकट हो जायेगा ।
धर्म की दृष्टि में सांसारिक आदमी चोर है। उसने चोरी की या नहीं, यह सवाल नहीं है। उसने किसी का छीना या नहीं छीना, यह सवाल नहीं है। मेरा है, ऐसा दावा ही चोरी है।
जब तक तुम दावा करोगे मेरे का, तुम चोर हो। जिस दिन दावा इस भांति खो जायेगा कि तुम यह भी दावा न करोगे कि मैं भी मेरा हूँ, मेरे का भाव ही तिरोहित हो जायेगा। तुम होओगे, मेरे का भाव न होगा, उसी क्षण अचौर्य प्रकट होता है। समस्त परिग्रह चोरी है। परिग्रह का भाव ही चोरी है। परिग्रह के करने वाले में ही सारी चोरी छिपी है।
शायद तुम्हें कभी ख्याल आता हो। जब भी तुम कहते हो मेरो, तभी मैं को गति मिलती है, बल मिलता है। जितना मेरे का विस्तार होता है, उतना ही मैं मजबूत होता है। निश्चित ही सम्राट का अहंकार बड़ा होता है भिखारी के अहंकार से। क्योंकि सम्राट के मैं को बहुत सहारे होते है। भिखारी के पास सहारा भी क्या है? एक टूटा-फूटा भिक्षा का पात्र है, गुदड़ी है, बस यही उसका सारा राज्य है। तो मैं की भी यही सीमा है। मेरे की सीमा ही मैं की भी सीमा है। जितना तुम्हारा मेरा बढ़ता जाता है, उतना तुम्हारा मैं बढ़ता जाता है। इसीलिये तो हम पागल होते है कि वस्तुएं बढ़ती जायें।
कोई ठीक से सोचता नहीं कि आदमी वस्तुओं को बढ़ाने के लिए इतना पागल क्यों होता है?
कुछ गहरा कारण होगा। वस्तुओं को बढ़ाने में किसी की उत्सुकता नहीं है, लेकिन वस्तुओ के बिना बढ़े मैं के बढ़ने की सुविधा नहीं है। तो जितनी बड़ी जमीन होगी, उसके बीच में उतने ही बड़े मैं का सिंहासन होगा। जितने धन की राशि होगी, उतना ही ऊपर मैं का सिंहासन होगा। कोई वस्तुओं के लिये वस्तुओं को प्रेम नहीं करता।
अगर सारा मेरे का भाव छिन जाए, गिर जाए, तो मैं बचेगा? बैसाखी अलग हो गई, मैं लंगड़ा जायेगा, वहीं गिर पड़ेगा।
त्याग का अगर कोई अर्थ था तो इतना ही था कि तुम उन सब सहारों को अलग कर लेना, जो मैं को मजबूत करते है, बल देते है, भोजन देते है। सहारे अलग हो जायेंगे, मैं गिर जायेगा।
लेकिन मैं बड़ा कुशल है। वह त्याग को भी अपनी बैसाखी बना लेता है। वह कहता है, मैने इतना त्याग किया! तब मैं लंगड़ाया नहीं, उसने नये सहारे खोज लिए। मेरे पास लाखो रूपये थे, तब मेरे पास एक बैसाखी थी। लाखों रूपये की। अब मैंने लाखों रूपयों को लात मार दी, अब मेरे पास एक नई बैसाखी है-पुराने से भी ज्यादा मजबूत-कि मैंने लाखों का त्याग कर दिया है। तुम भोग करो तो मैं को बनाते हो, तुम त्याग करो तो मैं को बनाते हो। तुम धन को पकड़ो तो मैं निर्मित होता है, तुम धन को छोड़ो तो मैं निर्मित होता है। और मैं ही असली रोग है, महारोग है। और जब तक मैं है, तब तक तुम चोर हो।
भक्त साधक नहीं है। भक्त कहता है, मैं तो साधना भी करूंगा तो पाप हो जायेगा। मैं तो ध्यान भी करने बैठूंगा तो अकड़ आ जायेगी कि मैं ध्यानी। मैं तो दान भी दूंगा तो भी अहंकार ही उससे सजेगा, संवरेगा। वे अहंकार के ही आभूषण सिद्ध होंगे। मैं सिर्फ क्षमा ही मांग सकता हूँ, कोई और उपाय नहीं, असहाय हूँ।
साधक का अर्थ ही होता हैः वह , जो अभी उपाय में लगा है। जो कहता है, मैं कुछ करूंगा। पाप किया है? कोई फिक्र नहीं, पुण्य करके पाप को काटूंगा। बुरा किया है? कोई फिक्र नहीं, अच्छा करूंगा, चोरी की थी, दान कर दूंगा।
ऊपर-ऊपर फर्क हो जायेंगे, काले वस्त्रों की जगह सफेद वस्त्र आ जायेंगे, लेकिन हृदय की कालिख न मिटेगी। दुनिया भला कहेगी,सम्मान मिलेगा, कोई अपमान न करेगा। लेकिन भीतर? भीतर अवस्था पहले से भी बुरी हो गई। क्योंकि पहले तो कुछ पीड़ा भी होती थी, स्वयं को भी अनुभव होता था, कांटा चुभता था, कि बुरा कर रहा हूँ। अब तो भीतर अकड़ और बढ़ गई कि भला कर रहा हूं। अब तो फूल ही फूल खिल गए, सब कांटे खो गए। अब तो भीतर, संभावना भी थी क्रांति की, वह भी समाप्त हो गई।
इसीलिये कभी-कभी बुरा आदमी भी परमात्मा को पा लेता है, भले आदमी मुश्किल से पाते है। दुर्जन भी पहुँच जाते, सज्जन का पहुँचना बड़ा मुश्किल हो जाता है। क्योंकि सज्जन यह मानता ही है कि अगर परमात्मा को मिलना हो तो खुद ही आ जाए। सज्जन तो यह मानता है कि वह परमात्मा पर थोड़ी कृपा ही कर रहा है- इतने पुण्य कर्म कर रहा है!
कभी-कभी पापी भी पहुँच जाते है, लेकिन पुण्यात्मा नहीं। क्योंकि पुण्य तो तुम करोगे ही कैसे? तुम जो भी करोगे, पाप होगा।
पाप का संबंध परिणाम से नहीं है, पाप का संबंध स्त्रोत से है।
लोग कहते है पाप, अगर उसका परिणाम बुरा हो। तुमने किसी को मार डाला, क्योंकि वह मर गया, इसलिये पाप। तुम गए, और बीमार आदमी की सेवा की और वह बच गया, इसलिये पुण्य। परिणाम तुम्हारे कृत्य का अगर बुरा हुआ तो पाप, अगर भला हुआ तो पुण्य। यह साधारण नैतिक परिभाषा है। इससे कानून जीता है, अदालत जीती है।
धर्म की परिभाषा बहुत गहरी है। धर्म कहता है कि परिणाम से कोई संबंध नहीं है। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है, तुम बुरा करना चाहते थे और परिणाम अच्छा हो जाता है। और कभी-कभी ऐसा भी होता है, तुम अच्छा करना चाहते थे और परिणाम बुरा हो जाता है। तुमने दवा बड़ी हितेच्छा से दी थी और मरीज मर गया। और एक आदमी रास्ते पर चला जा रहा था, तुमने क्रोध से पत्थर उठा कर मार दिया, उसकी खोपड़ी में चोट लग गई। उसको मानसिक बीमारी थी, वह चोट लगने से समाप्त हो गया। कभी परिणाम अच्छे हो जाते हैं।
इसलिये परिणाम गौण है, स्त्रोत! कहां से आता है कृत्य ! पाप आता है अहंकार से, पुण्य आता है निरहंकार से। पाप तुम करते हो, पुण्य परमात्मा करता है।
तो पुण्य करने का उपाय क्या है? एक ही उपाय है कि तुम उसे करने दो, तुम कर्ता न रह जाओं। तुम छोड़ दो अपने को उसके हाथों में। वह जहां से ले जाए।
कृष्ण द्वारा सारी गीता इस एक छोटी सी बात को समझाने के लिए कही गई है। अर्जुन नैतिक परिभाषा से उलझा है। वह कहता है, ये मेरे है। इनको मारूंगा, पाप लगेगा। इतने लोगों को मारूंगा, सारे प्रियजन मर जायेंगे, सम्राज्य भी मिल जायेगा तो क्या फायदा है? कौन सुखी होगा उस साम्राज्य को देखकर? मै बैठ जाऊंगा, मरघट पर सिंहासन रख लूंगा।
लेकिन वह कहता है, ये मेरे है। इसलिये मारने से डरता है। अगर ये मेरे न होते, तो अर्जुन को जरा भी चिंता न थी। अगर इनमें प्रियजन न होते, भीष्म न होते, द्रोण न होते, भाई-बंधु न होते, तो अर्जुन को जरा चिंता न होती। उसने घास-पात की तरह इनको काट दिया होता। ये मेरे हैः इनका मुझसे अहंकार का संबंध है।
और यह बात जरूर सच है कि अगर अपने ही सब जो है, वे मर जाएं, तो साम्राज्य तुमने जीत लिया, यह किसको दिखाओगे-झाडों को, वृक्षों को? आदमी प्रतिष्ठित होता है तो चाहता है कि परिवार के लोग जान ले, मित्र-प्रियजन पहचान लें। अगर तुम चले जाअें दूर अफ्रीका के किसी एकांत कोने में और वहां तुम्हारी पूजा भी होने लगे, तो भी तुम्हारे मन में आकांक्षा यही होगी कि पूना के लोगों को खबर हो जाए। क्योंकि वहां पूजा का मतलब भी क्या है? जो तुम्हें सदा से जानते हैं, निकट है, प्रिय है, उनके सामने ही तुम्हारी पूजा हो, तो ही अहंकार का कुछ मजा है। अगर जंगल में तुम चले जाओं और आकाश से फूल भी बरसने लगे, देवी-देवता भी तुम्हारी पूजा करें, तुम्हें कुछ मजा न आयेगा। क्योंकि झाड़, वृक्ष, जंगली जानवर देखेंगे, आदमी तो कोई होगा नहीं, आदमी कम से कम देख ले। क्योंकि आदमी से चाहे कितना ही अपरिचय हो, फिर भी आदमी तुम्हारा है, समान-जातीय है, एक गुणधर्मी है।
अर्जुन कह रहा है, मेरे है, इसलिए मारने से डरता हूं, पाप होगा। और कृष्ण उसे यही समझा रहे है कि मेरे का ख्याल ही पाप है। तू मरे के ख्याल को छोड़ दे, तू निमित्त मात्र हो जा। तू कर्ता मत रह, परमात्मा को करने दे। फिर जो परमात्मा को करना हो। तू बीच में मत आ। फिर जो भी होगा, वह पुण्य होगा।
चूंकि अर्जुन बन सका निमित, इसलिये व्यास जी ने कुरूक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा है। वह युद्ध धर्मयुद्ध हो गया, क्योंकि वह फिर अर्जुन ने नहीं लड़ा, परमात्मा ही अर्जुन के माध्यम से लड़ा। अर्जुन सिर्फ खूंटी हो गया। परमात्मा ने अपने को उस खूंटी पर टांग दिया। अर्जुन कोई भी न रहा, वह बीच में बाधा न बना। वह बांसुरी हो गया, स्वर उसके गूंजने लगे, गीत उसका उतरने लगा।
संसार को छोड़ कर भक्त नहीं भागता। क्योंकि भक्त कहता है, भाग कर जाऊंगा कहां? इसलिये भक्ति के जितने संप्रदाय है, वे कोई भी त्यागवादी और भगोड़े नहीं है। उन्होंने पलायन नहीं सिखाया है। भक्त कहता है, भाग कर कहां जाऊंगा? भाग कर किससे जाऊंगा? अगर किसी और के कारण पाप हो रहा था, तो भागने से बच जाता। पाप अपने कारण हो रहा है।
तो जंगल में तुम अकेले बैठोगे तो भी तुम विचार तो वही करोगे जो तुम यहां करते थे। हो सकता है करने का भी मौका न मिले, तो सपने देखोगे, सपनों में करोगे, लेकिन धारा तो जारी रहेगी। अनवरत श्रृंखला वही बहती रहेगी। बाजार जारी रहेगा। तुम भला एकांत में बैठे रहो, भीड़ मौजूद रहेगी। तुम वही करते रहोगे भीतर , जो तुम यहां कर रहे थे। अगर तुम क्रोध यहां कर रहे थे, तो वहा भी तुम क्रोध करोगे। हो सकता है आदमी न मिलेंगे क्रोध करने को, तो कौआ यहा बीट कर देगा वृक्ष के ऊपर से, सिर पर बीट गिर जायेगी, क्रोध आ जायेगा। परिस्थिति तो कुछ न कुछ मौजूद रहेगी। अगर परिस्थिति से तुम आविष्ट हो जाते हो, क्रोध आ जाता है, दुःख आ जाता है, पीड़ा आ जाती है, तो परिस्थिति तो मिटेगी नहीं, हिमालय पर भी रहेगी। अगर कोई भी क्रांति होनी है, तो वह मनः स्थिति की है। परिस्थिति की क्रांति से कोई प्रयोजन नहीं है।
यह बहुत बड़ी क्रांति का क्षण है जब तुम्हें समझ में आ जाये कि कहां भाग कर जायेंगे? नहीं, कोई शरण नहीं है, कोई बचाव नहीं है, कोई सुरक्षा नहीं है। गिरना ही पडे़गा। छोड़ना ही पड़ेगा। अस्मिता को। वह जो भाग-भाग कर बच रहा है, वह भी अहंकार है। वह आखिरी कोशिश में लगा है कि कोई उपाय खोज लेंगे। पुण्य का आवरण बना लेंगे, प्रार्थना के वस्त्र बना लेंगे, पूजा के आभूषण बना लेंगे। संसार बुरा है, बुराई हो जाती है। मंदिर में छुप कर बैठें रहेंगे, बाहर निकलेंगे ही नहीं।
लेकिन ध्यान रखना, जब तक तुम पलायन करोगे, तब तक तुम रूपांतरित न होओगे। पलायन का अर्थ ही है कि तुम रूपांतरण से बचने की कोशिश कर रहे हो। किसी तरह जैसे हो वैसे ही रह जाओ, परिस्थिति भर बदल जाये। यही तो हर आदमी कर रहा है। गरीब आदमी से पूछो। वह कहता है, मैं दुःखी हूँ, क्योंकि धन नहीं है। धन की तलाश कर रहा हूँ, धन मिलते ही सुखी हो जाऊंगा।
धनी आदमी से पूछो। वह कहता है, धन तो मिल गया, लेकिन मैं सुखी नहीं हूँ। मैं पद की तलाश कर रहा हूँ। क्योंकि धन से अकेला क्या होगा? जब तक राष्ट्रपति न हो जाऊं, प्रधानमंत्री न हो जाऊं, कुछ भी धन से न होगा। तो लुटा दूंगा सारा धन चाहे चुनाव में, लेकिन प्रधानमंत्री होना है। एक दफा प्रधानमंत्री हो जाऊं, तो सुख ही सुख है।
कोई सुखी नहीं दिखाई पड़ता। जो जहां है, वहीं दुःखी है। लेकिन इस आशा में कि कहीं और सुख होगा, आदमी दुःख के मूल को नहीं देख पाता। यह नहीं देख पाता कि मेरे होने के ढंग में दुःख है। तो मैं अगर प्रधानमंत्री हो जाऊं तो प्रधानमंत्री होना है। एक दफा प्रधानमंत्री होकर दुःखी होऊंगा।
गरीब आदमी अपने झोपड़े में दुःखी होता है, अमीर आदमी अपने महल में दुःखी होता है। दुःख में कोई फर्क नहीं पड़ता। गरीब आदमी गरीब ढंग से दुःखी होता है, अमीर आदमी अमीर ढंग से दुःखी होता है। लेकिन दुःख में कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि दुःख का कोई संबंध बाहर की किसी स्थिति से नहीं है। दुःख पैदा होता है अहंकार के चुभने से, और वह भीतर है।
फिर ऐसी घड़ी आ जाती है कि संसार भर दुःख है, ऐसा भी अनुभव होने लगता है, तो आदमी संसार को छोड़ कर भागता है। फिर भी अहंकार को नहीं छोड़ता, संसार को छोड़ता है। पहले गरीबी को छोड़ता था, अमीरी को पकड़ता था, अब संसार को छोड़ता है, संन्यास को पकड़ता है। लेकिन अभी भी यात्रा बाहर ही होती है। संसार और संन्यास दोनों बाहर है। अभी भी वह घड़ी नहीं आई जहां उसको समझ में आ जाये।
और कोई जगह नहीं है, जहां छुटकारा हो सके। तुम बिन कहिं न समाहिं! बस तुम्ही हो एक, जहां समाना हो सकता है, और कहीं समायेंगे न।
जल्दी मत करना। क्योंकि अगर तुमने जल्दी की तो पके नहीं रहोगे तुम। एक तो पके फल का गिरना है। न तो वृक्ष को चोट लगती है, कानों-कान किसी को खबर भी नहीं होती, पका फल चुपचाप गिर जाता है। एक कच्चे फल का गिरना है। पत्थर मारो, लकड़ी से चोट करो, तब भी कच्चा फल प्रतिरोध करता है, रूकने की कोशिश करता है। अभी पका ही नहीं है, गिराने की कोशिश शुरू हो गई। फिर तुम उसे गिरा भी लो, तो वह कच्चा है, किसी योग्यता का नहीं है। फिर उसे तुम गर्मी में रख कर किसी तरह पका भी लो, तो उसमें स्वाद नहीं है, सुगंध नहीं है। वह अपनी नैसर्गिक निष्पति को उपलब्ध नहीं हुआ।
जब सब शोध कर कोई देख लेता है, जीवन के सब अनुभव जी लेता है, तब तक पकान, एक परिपक्वता आती है। तुम गिर पड़ते हो पके फल की भांति।
जरा सी भी रेखा नहीं रहती भीतर कोई- कि शायद थोड़ी देर और वृक्ष पर रह जाते तो सुख मिलता, कि शायद इस वर्षा और टिक जाते तो सुख मिलता, कि शायद हवा का एक झोंका आने को था और सुख की वर्षा हो जाती और पहले ही छूट गए। अगर जरा सी भी रेखा आशा की शेष रह गई है, तो तुम गिर भला जाओ, वह गिरना समर्पण न होगा। और अगर समर्पण न होगा, तो परमात्मा के चरण उपलब्ध न होंगे।
इसे ठीक से समझ लो। इसे मैं फिर दोहराता हूँ। तुम्हारी परिपक्वता से पैदा हुआ तो समर्पण है, वहीं परमात्मा के चरण प्रकट होते है। अगर तुम कच्चे गिर गए, तो न तो तुममें स्वाद होगा, न तुममें सुगंध होगी, न परमात्मा के चरण तुम्हें उपलब्ध होंगे।
प्रत्येक व्यक्ति को सारे अनुभवों से गुजरना पड़ता है। यहां कोई शार्टकट, कोई जल्दी पहुँच जाने का मार्ग नहीं है। परमात्मा शार्टकट में भरोसा ही नहीं करता। क्योंकि जितनी जल्दी घटना घट जाये, उतने ही अधपके तुम रहे जाओगे।
जैसे कोई बच्चा जल्दी जबरदस्ती मशीन की सहायता से जवान कर दिया जाये। तुम जानते हो कैसी मुसीबत हो जायेगी। हवा भर दी जाये उसके भीतर और उसके शरीर को बड़ा कर दिया जाये। वह रहेगा तो बच्चा ही, दिखने लगेगा जवान। अब और मुश्किल होगी। अगर वह बच्चा ही था, तो लोग उसको माफ भी कर देते, अब लोग उसको माफ भी न कर पायेंगे। अब वह दिखता तो जवान है और भीतर बच्चा है। अगर तुम उसे रास्ते पर खिलौने से खेलते देखोगे, तो हंसोगे। कहोगे, पागल है। छोटा बच्चा था और खिलौने से खेलता, कोई पागल न कहता। वह बिलकुल योग्य था, तालमेल था, गणित सीधा था। अब यह बच्चा है। दिखता जवान है, दाढ़ी-मूंछ उग गई, खेल रहा है खिलौनों से। लोग हंसेंगे। लोग कहेंगे, तुम पागल हो।
अगर किसी को जबरदस्ती बूढ़ा कर दिया जाये, उसकी जिंदगी तो वहीं अटकी रहेगी जहां तक स्वभाव उसे लाया था। तुमने जबरदस्ती उसे बूढ़ा कर दिया, हार्मोन के इंजेक्शन दे दिये और किसी तरह ठोक-पीट कर उसको बड़ा कर दिया। वह बूढ़ा भी मूलतः तो बच्चा रहेगा और बड़ी बेचैनी में, दुविधा में पड़ जायेगा।
ऐसे मैंने बहुत लोग देखे हैं। सन्यास लेकर बैठ गए, जंगल में कुटी बना ली। मन अभी बाजार में था। मन अभी बच्चे का था। अभी खिलौने और कुछ दिन चाहिये थे। अभी सब शोध कर न देखा था और परमात्मा का लोभ पकड़ गया। यह भी लोभ है, यह समझ नहीं है। क्योंकि परमात्मा की तरफ जब कोई जाता है तो दो तरह से जा सकता है। या तो जीवन के अनुभव ने उसे भेजा, पकाया, पूरा हुआ, वृक्ष छूट गया संसार का। छोड़ा नहीं, छूट गया। फल गिर गया। और एक लोभ के कारण- कि सुना कि संत कहते है बड़ा आनंद है, कि परम आनंद है, परमानंद है परमात्मा को पाने में। लोभ जगा, भाग खड़े हुए बाजार से, संसार से, परमात्मा की तलाश में लग गये।
ऐसे आदमियों से परमात्मा भागता है और बचता है। क्योंकि ये अभी योग्यता को अर्जित ही न कर पाये। अभी इनका स्वर्णपात्र तैयार भी न हुआ था और अमृत की खोज में निकल गये।
स्वर्णपात्र तैयार हो, तो ही अमृत उस पात्र में गिरेगा। पात्रता न हो, तो अमृत के अवतरण की कोई संभावना नहीं है।
परमात्मा क्षमावान है। लेकिन अगर तुम अहंकारी हो, तो तुम पहाड़ की तरह हो, तुम्हारी तरफ क्षमा बह नहीं सकती। अगर तुम एहसास करते हो कि मैं क्षमा-योग्य भी नहीं। सब गुनाह ही गुनाह मेरे हाथ है, पाप ही पाप। प्रारंभ से आज तक बुरा ही बुरा मुझसे हुआ है। बेहोश था, सोया था, ठीक होने का कोई उपाय न था। तुम विनम्र हुये। क्षमा बहनी शुरू हो जायेगी।
बहुत बड़ा विवाद है पंड़ितों में, धर्मशास्त्रियों में- कि परमात्मा क्षमावान है या न्याययुक्त?
बहुत पुराना विवाद है। भक्त कहते है, क्षमावान है। साधक कहते है, न्याययुक्त है। भक्त और साधक में एक बुनियादी फासला सदा बना रहता है।
साधक कहते है, न्याययुक्त है। क्योंकि जिसने ठीक किया है, उसे वह सुख देगा। जिसने गलत किया है, उसे वह दंड देगा। न्याय का अर्थ होता है कि ठीक को ठीक परिणाम मिले, गलत को गलत परिणाम मिले। क्षमावान का अर्थ होता है कि गलत को भी क्षमा मिल सकती है। साधक को वह सहनीय नहीं है। साधक कहता है, इसका तो मतलब हुआ कि हम जो बैठे रहे आसन लगाए, शीर्षासन किये, व्रत-उपवास किये, सब व्यर्थ गये, तुम शराब पीते रहे और क्षमा मिल गई? यह बर्दाश्त के बाहर है। साधक का अहंकार इसे स्वीकार नहीं कर पाता।
अहंकार से ज्यादा बासी कोई चीज संसार में नहीं है। क्यों? क्योंकि अहंकार तुम्हारे अतीत का जोड़ है। तुम जो अब तक थे, जो तुमने किया, जो तुमने जाना, जो तुमने पाया, उस सब का जोड़ तुम्हारा अहंकार है। अहंकार यानी अतीत। अहंकार यानी जो बीत गया, उसका संग्रह। कूड़ा-करकट है अहंकार। ताजा कभी भी नहीं होता अहंकार। अहंकार सदा बासा है। अहंकार सदा मरा हुआ है, जीवित कभी भी नहीं। जीवित तुम हो, अहंकार मुर्दा है। लेकिन तुमने अपने मुर्दे को अपने जीवन पर ओढ़ रखा है। जीवन तो छिप गया है, मुर्दा छा गया है।
तुमसे कोई पूछे कि तुम कौन हो? तो तुम कहां से उत्तर लाओगे?। अतीत से उत्तर लाओगे। तुम कहोगे, फलां का बेटा हूँ, फलां परिवार से आता हूँ, राजघराने से हूँ, इतना पढ़ा-लिखा हूँ, डॉक्टर हूँ, इंजीनियर हूँ, प्रोफेसर हूँ। यह सब अतीत का है। अगर कोई तुमसे पूछे कि अभी और यहां तुम कौन हो? तो तुम्हारे पास कोई भी उत्तर न होगा। अगर तुमने पीछे उत्तर न खोजा, तो यहां और अभी तुम एकदम खाली हो जाओगे।
तुम तो नये हो। अहंकार पुराना है, जराजीर्ण है। अहंकार खंडहर है।
शरीर बंधन नहीं है, शरीर के साथ आसक्ति बंधन है। शरीर के साथ मोह बंधन है। मैं शरीर हूं, ऐसी धारणा बंधन है। शरीर बंधन नहीं है। शरीर क्यो बंधन होगा?
तुम्हारे कपड़े बंधन है? हो सकते है बंधन, अगर तुम इतने मोहग्रस्त हो जाओं कि तुम कहो, मैं कपड़े उतार ही नहीं सकता। मैं मर ही जाऊंगा अगर कपड़े उतारूंगा। कपड़े मैं बदल ही नहीं सकता, क्योंकि इसमें तो मैं मर ही जाऊंगा। मैं कपड़ा हूँ। अगर तुम्हें कपड़े के साथ ऐसी भ्रांति हो जाये कि मैं कपड़ा हूँ। अगर मेरा कपड़ा किसी ने छीन लिया तो मरे। कपड़ा अगर चोरी चला गया तो मर गये। फिर जरा-जीर्ण भी हो जाये कपड़ा, सड़-गल जाये, तो भी तुम बदल नहीं सकते, नया कपड़ा नहीं ले सकते, क्योंकि यह कपड़ा ही तुम हो। तो फिर कपड़ा भी बंधन हो जायेगा। कपड़ा अभी बंधन नहीं है। क्योंकि तुम जानते हो, कपड़ा अलग है, तुम अलग हो।
शरीर भी कपड़ा है। शरीर बंधन नहीं है। जिन्होंने कहा, गलत कहा होगा। या तुमने गलत समझा होगा। शरीर बंधन है, अगर तुमने समझा कि मैं शरीर हूं। तब मन भी बंधन है, अगर तुमने समझा कि मैं मन हूँ। तो आसक्ति बंधन है, तादात्म्य बंधन है। न तो शरीर बंधन है, न मन बंधन है। अगर तुमने जान लिया कि मैं शरीर में हूँ, लेकिन शरीर नहीं हूँ, तुम मुक्त हो गये। तुमने अगर पहचान लिया कि मैं मन के भीतर हूँ, मन नहीं हूँ, तुम मुक्त हो गये। कोई न रोकेगा। तुम्हें कोई नहीं रोक सकता, कहीं भी नहीं रोक सकता। तुम्हारी आसक्ति ही रोक सकती है।
आसक्ति को तो बंधन नहीं कहते, शरीर को बंधन कहते हो। क्योंकि आसक्ति को कहोगे तो तुम जिम्मेवार होओगे, शरीर को कहा तो तुम जिम्मवार नहीं हो, शरीर जिम्मेवार है। दूसरे पर जिम्मेवारी टालने का हमारा बड़ा मन होता है। उसमें हमारी झंझट मिट जाती है। कह दिया शरीर बंधन है, बिलकुल निश्चिंत हो गये। अब करें भी क्या? शरीर है, इसके रहते तो मोक्ष हो नहीं सकता। मन जब तक मिटेगा नहीं, कैसे मोक्ष होगा? मन बंधन है। तुम निश्चिंत हुए, तुम्हारा दायित्व समाप्त हुआ। तुम्हें ऐसे लगने लगा कि किसी और के कारण तुम बंधे हो, अपने कारण थोड़े ही! और यही बड़ी से बड़ी भूल है।
शरीर बंधन नहीं है, आसक्ति बंधन है। और अगर आसक्ति बंधन है तो मोक्ष का उपाय है। अगर शरीर बंधन है तो फिर मोक्ष का उपाय ही नहीं है। तब तो बुद्ध भी शरीर में थे, महावीर भी शरीर में थे। महावीर और बुद्ध दोनों चालीस साल के करीब उम्र के थे जब ज्ञान को उपलब्ध हुये, मुक्त हुए। फिर चालीस साल और जिंदा रहे। तो यह तो कहानी झूठ हो गई। मुक्त हो गई । मुक्त हो ही नहीं सकते, अगर शरीर बंधन है।
लेकिन हम जानते है कि लोग शरीर में रहते मुक्त हो गये। क्योंकि मुक्त होना शरीर से संबंधित नहीं है, आसक्ति के टूट जाने से संबंधित है। आसक्ति का सेतु हट गया। शरीर जारी रहा, शरीर अपना कृत्य करता था, लेकिन भीतर से उस कृत्य को पकड़ रखने की कोई आकांक्षा न रही। जब तक चला, अपने से चला। जब गिर गया, अपने से गिर गया। लेकिन भीतर से कोई आसक्ति न रही कि यह मैं हूँ। अपना भिन्न होना प्रतीत हो गया, अनुभव हो गया। शरीर से अतिक्रमण हो गया। शरीर के भीतर रहते जान लिया कि मैं शरीर के पार हूँ, मुक्ति हो गई।
मोक्ष स्वयं की पहचान है। शरीर से उसका कुछ लेना-देना नहीं। स्वयं की ठीक-ठीक पहचान, सम्यक ज्ञान मोक्ष है। शरीर हो या न हो, इससे कुछ लेना-देना नहीं।
तुम आधार हो। तुम्हारी आसक्ति बंधन है। सार में कहें तो आसक्ति बंधन है, अनासक्ति मोक्ष है।
परम पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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