





पूरे वर्ष में ऋतु परिवर्तन के साथ नवरात्रि पर्व आता है साल में हर तीन महीने के अंतराल में ऋतु परिवर्तन होता है, मनुष्य की प्रकृति व्यवहार, स्वभाव में अन्तर आता है। ऐसे ऋतु परिवर्तन में दो और नवरात्रियां आती है जिन्हें गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। ऐसे समय में यदि आद्या शक्ति भगवती दुर्गा की और उसके स्वरूप की आराधना करता है तो उसका जीवन उच्च हो जाता है। जीवन के परिवर्तन उस पर विपरीत प्रभाव नहीं डालते और वह जीवन संग्राम में भगवती दुर्गा की कृपा से अटल, अडिग रहता है और जीवन का महाभारत अर्जुन की भांति जीत ही लेता है।
नवरात्रियों का यह समय तीव्र साधनाओं को सम्पन्न करने के लिये सिद्ध मुहूर्त माना गया है जो साधक एक बार संकल्प कर इस गुप्त नवरात्रि में बिना प्रचार-प्रसार के स्वयं की आत्मोन्नति के साथ-साथ अपने परिवार के पूर्ण कल्याण और अपनी बाधाओं पर विजय प्राप्त करने के लिये साधना सम्पन्न करता है तो उसमें उसे सफलता अवश्य ही प्राप्त होती है।
इस गुप्त नवरात्रि के अवसर पर साधकों के लिये शक्ति प्रदायिनी साधना दी जा रही है। बाधाओं के निवारण हेतु वाराही साधना साधकों के लिये दी जा रही है। साधक नवरात्रि के नौ दिनों में ये साधना सम्पन्न करें और साधना करने के पश्चात् ही वे जान पायेंगे कि उनके जीवन में कितना परिवर्तन हुआ है क्योंकि गुप्त नवरात्रि की साधना में ऋतु प्रभाव से व्यक्ति अपने घर में ही एकान्त में साधना सम्पन्न करता है। प्रकट नवरात्रि की तरह उसे कोई मेला उत्सव, ध्यान से विचलित नहीं करता। इस समय एकाग्र चित्त होने की शक्ति भी विशेष बढ़ जाती है। ऐसी नवरात्रि में साधना करना पूरे परिवार के लिये सौभाग्य का अवसर है।
बाधानाशक वाराही साधना
यह ठीक है कि जीवन है तो बाधाएं आती ही रहती हैं और मनुष्य अपनी शक्ति से उन बाधाओं का सामना करता है, लेकिन यदि निरन्तर एक के बाद दूसरी बाधा आ जाती है अथवा बाधाओं का हल प्राप्त नहीं होता है तो मनुष्य क्या कर सकता है? ऐसी स्थिति में मनुष्य को देवी शक्तियों का उपयोग अवश्य ही करना चाहिये। देव, देवता, देवियां मनुष्य की आंतरिक शक्ति का ही वायुमण्डल में विस्तार है। जो व्यक्ति इन दैवी शक्तियों का अपने भीतर की शक्ति से मिलन करवा देता है, वह जीवन में प्रत्येक बाधा को सरलता पूर्वक पार कर लेता है और जीवन सरस हो जाता है। वाराही अपने आप में आत्म उन्नति की तीव्र शक्ति साधना है।
विनियोग
ऊँ अस्य विघ्न नाशक मंत्रस्य, कपिल ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, वाराहीदेवता आत्मनोऽअभीष्ट सिद्धयर्थे विनियोगः।
षड्ंगन्यास विधि
ऊँ ऐं ग्लौं ह्नदयाय नमः।
ऊँ ठं शिरसे स्वाहा।
ऊँ ठं शिखायै वषट्।
ऊँ इं कवचाय हुम्।
ऊँ हूं नेत्रत्रयाय वौषट्।
स्वाहा अस्त्राय फट्।
संकल्प
दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ऊँ अस्य अमुक मासे (महीने का नाम) अमुक पक्षे (पक्ष का नाम) अमुक तिथौ (तिथि का नाम) अमुक गोत्रः (अपना गोत्र) अमुक नाम (अपना नाम) मम सर्व बाधा नाशाय मंत्र जप करिश्ये।’
ध्यान
दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें-
विद्यद्रोचिर्हस्तपद्मैर्दधाना पाशं शक्ति मुद्गरं चाड्कुशं च।
नत्रोद्भूतैर्वीतिहोत्रैस्त्रिनेत्रा वाराही नः शत्रुवर्ग क्षिणोतु।।
गुप्त नवरात्रि में अथवा किसी भी मंगलवार या शुक्रवार को दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके लाल आसन पर रात्रि दस बजे साधना के लिये बैठें। सामने किसी पात्र में वाराही यंत्र को स्थापित करके स्नान, तिलक, धूप, दीप एवं पुष्प से पूजन करें। इसके बाद काली हकीक माला से निम्न मंत्र की पांच माला जप करें।
यह 11 दिन की साधना है। मंत्र अत्यंत तीक्ष्ण और प्रभावकारी है अतः शुद्धता का अवश्य ध्यान रखें। शुद्ध भोजन एवं ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करें। साधना समाप्ति पर सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। इसके बाद किसी छोटी कन्या को भोजन कराके उचित दक्षिणा प्रदान करें।
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