





वज्रेश्वरी देवी की कहानी वज्र नामक अस्त्र से जुड़ा हुआ हैं। हमारे शास्त्रों में हजारों वर्ष पूर्व मिलता है। शास्त्रों में मिले उल्लेख के अनुसार कल्लिका नामक एक राक्षस रहता था। कल्लिका के दुराचरण से सभी ऋषि-मुनि परेशान थे। जिसके बाद महर्षि वशिष्ठ ने एक यज्ञ किया। ऋषि-मुनि के यज्ञ से आद्या शक्ति प्रसन्न हुई। पर उस यज्ञ में देवताओं के राजा इंद्र को आहुति नहीं दी गई, जिसके कारण इंद्र क्रुद्ध हो गये और अपने “वज्र” नामक अस्त्र से ऋषि-मुनियों पर प्रहार कर दिया। वज्र को आते देख ऋषि-मुनि सभी भयभीत हो गये। जिसके बाद सभी ने आद्या शक्ति की स्तुति की। इंद्र द्वारा भेजे गए वज्र से ऋषि-मुनियों की रक्षा के लिये माता पार्वती ने ‘अवतार’ लिया था। पार्वती ने वज्र को निगल कर, सभी को अपने शरण मे लेकर रक्षा किया। इसलिये उन्हें वज्रेश्वरी कहा जाता है।
एक प्रसिद्ध लेखक तथा तांत्रिक व ज्योतिषी से मिलने का सपना संजोय मैं जोधपुर गया। जोधपुर में जब मैं गुरूदेव जी से मिला, तो उन्होंने बहुत ही आत्मीयता पूर्वक व्यवहार किया, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने घर के किसी जिम्मेदार सदस्य से मिल रहा हूँ। मुझे यह एहसास नहीं हुआ, कि मैं पहली बार मिल रहा हूं। यही लगा जैसे मैं पहले भी कई बार मिल चुका हूं, क्योंकि वार्तालाप का क्रम ही गुरूदेव ने शुरू करते हुये कहा- ‘आ गये तुम? अच्छा किया’।
मुझे साधनात्मक चर्चा के अन्तर्गत अकस्मात अपने दादाजी की याद आ गई और उनके कहे हुए शब्द फिर से मेरे मानस में उभरने लगे। मैं गुरूदेव जी से पूछा- ‘मैं वज्रेश्वरी साधना के बारे में आपसे पूछना चाहता हूं’। वे कुछ क्षण के लिये मेरी ओर तीक्ष्ण दृष्टि से देखते रहे और पूछा- ‘यह साधना किसने तुम्हें बताई है?’ मैंने कहा- ‘अंतिम समय में मेरे दादाजी ने इस साधना के विषय में बताया था। उन्होंने कहा था, कि यह साधना व्यक्ति अपनी तथा अपने परिवार के साथ ही साथ गांव-घर आदि की सुरक्षा के लिये करता है’… किन्तु इसके अतिरिक्त वे मुझे कुछ भी नहीं बता सके और उनका देहावसान हो गया’।
मेरे आग्रह और मेरे द्वारा अत्यन्त जिज्ञासा प्रकट करने पर पूज्य गुरूदेव जी ने मुझे इस साधना की विधि समझाई और कहा- यह साधना अत्यन्त तेजस्विता युक्त है और प्रभाव अत्यन्त तीक्ष्णता से प्रदान करती है।
इस साधना के प्रभाव को मैंने शैशवावस्था से ही एहसास किया है, यह साधना वास्तव में ही सर्वविध रक्षा करती है।
साधना विधान-
इस साधना के लिये आवश्यक सामग्री है- ‘वज्र कड़ा’ तथा ‘वज्रेश्वरी माला’।
09 अगस्त या किसी भी कृष्ण पक्ष की तृतीया को दक्षिणाभिमुख होकर गहरे नीले रंग के वस्त्र धारण कर, रात्रि 9 से 10 बजे के बीच इस साधना को प्रारम्भ करें।
सरसों के तेल का दीपक लगायें। ‘वज्र कड़ा’ पर पांच काजल की बिन्दियां लगा कर अपने बायें हाथ में रख लें। कड़े के ऊपर ही दीपक को भी रखें, फिर आप जिस उद्देश्य से साधना कर रहे हैं, उसका उच्चारण कर उसके पूर्ण होने की प्रार्थना करें। कड़ा और दीपक सामने रख दें।
वज्रेश्वरी माला से निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप दीपक की लौ को देखते हुये करें। यह मंत्र आपको पद्मासन या वीरासन में बैठकर करना है।
मंत्र जप के पश्चात् माला को कड़े के ऊपर लपेट दें। दीपक, माला तथा कड़े की किसी मिट्टी के पात्र में रख कर उस पात्र को किसी कपड़े में बांधकर, जमीन में गहरा गड्ढ़ा खोद कर दबा दें। यदि आप किसी कारणवश ऐसा नहीं कर सकते हैं, तो नदी में प्रवाहित कर दें।
जब कभी आप को परेशानी का सामना करना पड़े, आप उपरोक्त मंत्र का 21 बार उच्चारण करें तथा वज्रेश्वरी देवी से रक्षा की प्रार्थना करें।
पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से की गई साधना का फल आजीवन प्राप्त होता ही है। संशय का भाव असफलता प्रदान करता है।
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