





भुवनेश्वरी शब्द ‘भुवन’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘भुवनत्रय’ अर्थात् तीनों लोक, अतः भुवनेश्वरी तो तीनों लोकों की अधिष्ठात्री देवी है, उनकी नियन्ता है और इन तीनों ही लोकों में सबके द्वारा पूजनीय है ………………
यदि व्यक्ति एक ही साथ उच्च स्तरीय आध्यात्मिक उत्थान एवं पूर्ण भौतिक सफलता का आकांक्षी है, तो उसे हर हालत में भुवनेश्वरी साधना करनी ही चाहिये, क्योंकि अन्य कोई ऐसी साधना है ही नहीं, जो एक ही साथ ये दोनों स्थितियां प्रदान कर सके।
भुवनेश्वरी बीज मंत्र सम्पुटित साधना
यद्यपि भुवनेश्वरी मंत्र एक ही है परन्तु अलग-अलग कार्यों के लिये अलग-अलग बीज है, मंत्र जप से पूर्व तथा उस दिन के मंत्र जप की समाप्ति पर एक माला बीज मंत्र की जपनी चाहिये। इस प्रकार मंत्र बीज सम्पुटित हो जाता है, जो साधक जिस कामना से साधना करना चाहे वह संबंधित बीज का ही उपयोग करे।
कामना बीज मंत्र
निष्काम भावना के लिए श्रीं
प्रत्यक्ष दर्शन के लिए यं
आर्थिक उन्नति के लिए क्रीं
व्यापार वृद्धि के लिए आं
सुख-समृद्धि के लिए हं
शत्रु संहार के लिए रं
मुकदमे में सफलता के लिए दं
रोग निवारण के लिए वं
अनायास धन प्राप्ति के लिए खं
ऋण मोचन के लिए गं
सुख – शान्ति के लिए जं
पुत्र प्राप्ति के लिए तं
पत्नी या पति प्राप्ति के लिए नं
मोक्ष प्राप्ति के लिए लं
कीर्ति, यश एवं सम्मान के लिए क्षं
भाग्योदय के लिए अं
विद्या प्राप्ति के लिए एं
खोये हुए व्यक्ति को प्राप्त करने के लिए ओं
तांत्रिक प्रभाव दूर करने के लिए कं
समस्त प्रकार के अभ्युदय के लिये ठं
जैसा कि मैंने ऊपर बताया है कि यह मंत्र जप कुल मिलाकर एक लाख होना चाहिए, अतः साधक नित्य गणना करे, और नौ दिन में एक लाख मंत्र जप पूरा कर ले।
नौ दिन में यह साधना सम्पन्न होती है, साधक चाहे तो इस मंत्र जप को दिन में कर सकता है या रात में कर सकता है। यदि वह चाहे तो इसके लिये दिन और रात दोनों का उपयोग कर सकता है।
आसन पर बैठने के बाद वह इक्कीस मालाएं फेरने के बाद कुछ समय के लिये विश्राम ले सकता है। इस प्रकार प्रत्येक इक्कीस मालाओं के बाद कुछ समय का विश्राम लेकर पुनः मंत्र जप में बैठ सकता है।
साधना काल में ध्यान रखने योग्य तथ्य
जो साधक या गृहस्थ भुवनेश्वरी साधना करना चाहे, उसे निम्न तथ्यों का पालन करना चाहिये जिससे कि वह अपने उद्देश्यों में सफलता प्राप्त कर सके-
6.आसन ऊनी और सफेद रंग का होना चाहिये। साधक को नित्य पूर्व या उत्तर की तरफ मुंह करके बैठना चाहिये। सामने घी का दीपक लगाना चाहिये। यदि साधक चाहे तो अखण्ड दीपक लगा सकता है अन्यथा जब तक मंत्र जप चले तब तक दीपक जलता रहना चाहिए, अगरबत्ती लगाना अनिवार्य नहीं है।
7.यदि कोई साधक स्वयं मंत्र जप न कर सके तो किसी जनेऊ धारित गुरू दीक्षित शिष्य या पण्डित को बुलाकर प्राण प्रतिष्ठित यंत्र के समक्ष अपने घर में मंत्र जप करा सकता है।
8.यदि केवल भुवनेश्वरी देवी का दर्शन करना हो तो भुवनेश्वरी मंत्र का जप करना चाहिए, पर यदि कोई इच्छा हो तो मंत्र से पूर्व और अन्त में संबंधित बीज लगाना चाहिये। उदाहरण के लिये रोग निवारण हेतु ‘वं’ बीज है और ‘ह्रीं’ भुवनेश्वरी देवी का मंत्र है अतः यदि रोग मुक्ति के लिये मंत्र जप करना हो तो ‘वं ह्रीं वं’ मंत्र जप होना चाहिये। इस प्रकार भुवनेश्वरी देवी के मंत्र के दोनों ओर संबंधित बीज लगाकर मंत्र पढ़ने से एक मंत्र माना जाता है। इस प्रकार एक लाख मंत्र जप का विधान है।
9.प्रातः स्नान कर, शुद्ध स्वच्छ वस्त्र धारण कर साधक को मंत्र जप में बैठना चाहिये। यदि साधक दूसरी रात्रि को भी पुनः साधना में बैठता है तो उसे पुनः स्नान कर सफेद वस्त्र धारण कर बैठना चाहिये। यदि सर्दी हो तो सफेद कम्बल या ऊनी वस्त्र ओढ़ सकता है। सिले हुए वस्त्र पहनना निषिद्ध है। रेशमी वस्त्र दूसरी बार पहना जा सकता है, परन्तु यदि सूती वस्त्र हो तो एक बार पहनने के बाद धोकर सुखा लेना चाहिये और फिर उसका पुनः प्रयोग करना चाहिए।
12.भुवनेश्वरी देवी के यंत्र और चित्र को कांच के फ्रेम में मढ़वाकर, उसके सामने बैठकर ही मंत्र जप हो सकता है, बिना यंत्र या चित्र के मंत्र जप निरर्थक होता है।
अनुभूतियां
साधक जब साधना में बैठता है तो तीसरे दिन उसे साधना कक्ष में सुगन्ध सी अनुभव होती है, वह सुगन्ध अपने आप में अवर्णनीय होती है। पांचवें दिन उसे मधुर घुंघुरूओं की आवाज सुनाई देती है और आठवें दिन उसे जगतजननी मां भुवनेश्वरी के दर्शन हो जाते है। इसके लिये अखण्ड श्रद्धा, पूर्ण विश्वास और विधि विधान के साथ साधना आवश्यक है। यदि साधक कामना पूर्ति के लिये साधना करता है तो साधना पूरी होने के बाद जल्दी से जल्दी उसकी कामना पूर्ति हो जाती है।
ध्यान रखने योग्य तथ्य
यदि साधना काल में परिवार या परिजन में किसी की मृत्यु हो जाय या बालक का जन्म हो जाय तो उससे साधना में कोई अन्तर नहीं पड़ता। साधक चाहे तो बीच में ही साधना समाप्त कर सकता है और वह चाहे तो साधना को निरंतर रखता हुआ उसे पूर्ण कर सकता है।
यदि साधना काल में नींद आ जाये या झपकी आ जाये या हाथ से माला गिर जाए तो वह माला पुनः प्रारम्भ करनी चाहिए। यदि बीच में दीपक बुझ जाये तो माला पूरी होने पर उस दीपक को पुनः लगा लेना चाहिये।
साधना विधि
प्रथम दिन स्नान कर, शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण कर सफेद आसन पर, पूर्व या उत्तर की तरफ मुंह कर, सामने दीपक लगाकर तथा भुवनेश्वरी यंत्र व चित्र को स्थापित कर, भुवनेश्वरी यंत्र व चित्र की पूजा करनी चाहिए। इसमें केसर, अक्षत, रोली, इत्र और पुष्प सामग्री ही पर्याप्त है। हिन्दी भाषा में ही, यंत्र पर केसर लगाकर निवेदन किया जा सकता है कि, मैं आपको केसर समर्पित कर रहा हूं। इस प्रकार पांचों वस्तुएं समर्पित की जा सकती है। यंत्र व चित्र को जल से स्नान कराना उचित नहीं है। इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर हिन्दी में ही संकल्प लिया जा सकता है कि इस तारीख से इस तारीख तक एक लाख मंत्र जप अमुक कार्य के लिये कर रहा हूं, भगवती भुवनेश्वरी मुझे शक्ति दें, जिससे कि मैं अपनी साधना में सफलता प्राप्त कर सकूं। ऐसा कहकर हाथ में लिया हुआ जल छोड़ देना चाहिये।
जब आठवें या नवें रोज एक लाख मंत्र जप पूरे हो जाएं जब भूमि पर अग्नि लगाकर भुवनेश्वरी मंत्र से सौ आहुतियां घी की देनी चाहिये, तथा अपने परिजनों व बहनों को बुलाकर भोजन कराना चाहिये, यदि कोई ब्राह्मण मिले तो उसे भी भोजन कराना चाहिये। इसके बाद यह साधना सम्पन्न मानी जाती है और उस यंत्र व चित्र को पूजा स्थान में स्थापित कर देना चाहिये।
भुवनेश्वरी मंत्र एक अक्षर का बीज है, जो कि अपने आप में चैतन्य है, इसी मंत्र का एक लाख जप किया जाना चाहिये।
वस्तुतः भुवनेश्वरी महादेवी कलियुग में कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फल देने वाली है, और इसकी साधना सरल होने के साथ-साथ शीघ्र प्रभाव युक्त है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस प्रकार की साधना करने से साधक को किसी प्रकार की हानि नहीं होती अपितु उसे लाभ ही होता है, और वह एक महाविद्या सिद्ध कर लेता है।
वस्तुतः यह हमारा सौभाग्य है, कि हमें इस प्रकार का सुयोग्य अवसर प्राप्त हुआ है, जबकि हम एक श्रेष्ठ साधना में संलग्न हो सकते हैं।
भुवन अर्थात इस संसार की स्वामिनी भुवनेश्वरी, जो ‘ह्रीं’ बीज मंत्र धारिणी हैं, वे भुवनेश्वरी ब्रह्मा की भी अधिष्ठात्री देवी हैं। महाविद्याओं में प्रमुख भुवनेश्वरी ज्ञान और शक्ति दोनों की समन्वित देवी मानी जाती है। जो भुवनेश्वरी सिद्धि प्राप्त करता है, उस साधक में आज्ञा चक्र जाग्रत होकर ज्ञान-शक्ति, चेतना-शक्ति, स्मरण-शक्ति अत्यन्त विकसित हो जाती है। भुवनेश्वरी को जगत्धात्री अर्थात् जगत-सुख प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। दरिद्रता नाश, कुबेर सिद्धि, रतिप्रीति प्राप्ति के लिये भुवनेश्वरी दीक्षा उत्तम मानी गई है। इस महाविद्या की आराधना एवं दीक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्ति की वाणी में सरस्वती का वास होता है। इस महाविद्या की दीक्षा प्राप्त कर साधना सम्पन्न करने से साधक को चतुर्वर्ग लाभ प्राप्त होता ही है। यह दीक्षा प्राप्त कर यदि भुवनेश्वरी साधना सम्पन्न करें तो निश्चित ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।
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