





जिस अवसर पर योगी-यति-संन्यासी विशेष साधनाएं करते हैं।
कालखण्ड के ये क्षण बार-बार नहीं आते और जो काल खण्ड के विशेष क्षणों का उपयोग कर लेता है वह सर्वत्र विजयी रहता है।
भारतीय साधना के क्षेत्र में ग्रहण का अपना अलग ही महत्त्व है। वैसे तो ग्रहणकाल कई कार्यो के लिये वर्जित है, उस समय तो भोजन इत्यादि ग्रहण नहीं करना चाहिये, क्योंकि उस समय जो रश्मियां गतिशील होती है, वे प्रायः नुकसानदायक होती हैं, परन्तु यह बात भी सत्य है, कि विष भी कई बार अमृत की तरह लाभकारी होता है और वह जान लेने के बजाय जीवन देता है।
इस प्रकार ग्रहण में वैज्ञानिक रूप से भले ही बुराइयां क्यों न हों, पर उसमें एक गुण अवश्य है, और वह यह, कि ग्रहण,साधना हेतु अत्यधिक उपयोगी काल है। साधारण समय में किया गया एक लाख जप, सूर्य ग्रहण के समय किये गये कुल मंत्र जप के बराबर होता है अर्थात् ग्रहण के समय किया गया मंत्र जप साधारण समय के किये गये मंत्र जप से कई गुना अधिक प्रभावी होता है। इस तरह कोई भी साधना यदि ग्रहण काल में सम्पन्न की जाये, तो उसका शतगुना फल साधक को प्राप्त होता है, जिससे कि उसकी सफलता निश्चित होती है।
जीवन में सब कुछ तो दुबारा भी प्राप्त किया जा सकता है, परन्तु वह क्षण जो बीत गया उसे दुबारा वापस नहीं लाया जा सकता। नक्षत्रों का जो संयोग, ग्रहण का जो प्रभाव इस बार बन रहा है, वह एक बार बीत गया तो दुबारा नहीं आ सकेगा। सूर्य ग्रहण तो आयेगा पर जो नक्षत्र संयोग इस बार है, वे ठीक उसी प्रकार नहीं होंगे। हो सकता है, आपको अपने जीवनकाल में दस सूर्य ग्रहण का लाभ उठाने का अवसर मिले, परन्तु जो अवसर एक बार चूक गये तो जीवन में मात्र नौ ही ग्रहण बचेंगे और कौन जाने कल कैसी परिस्थिति हो, साधना कर सकें या नहीं कर सकें? इसलिये श्रेष्ठ साधक वे ही हैं जो क्षण के महत्त्व को पहचान कर निर्णय लेने में विलम्ब नहीं करते हैं।
साधना की प्रक्रिया उतनी कठिन या जटिल नहीं होती, महत्त्व तो क्षण विशेष का होता है, भारतीय ऋषियों ने काल ज्ञान और ज्योतिष पर इतने अधिक ग्रंथ लिखे हैं तो उसके पीछे मंतव्य यही है कि काल बहुत बलवान होता है।
साधक के जीवन में अनेक प्रकार की इच्छाएं होती हैं। ऐसा स्वर्णिम ग्रहण-संयोग जीवन में सब कुछ दे सकता है-धन, पद, प्रतिष्ठा, यश, मान, ऐश्वर्य, कुण्डलिनी जागरण, पूर्णता, श्रेष्ठता, तेजस्विता और जीवन में वह सब जो हम चाहते हैं क्योंकि ऐसे अद्वितीय ग्रहसंयोग में की गई साधना कभी निष्फल नहीं होती है।
हम जीवन में चाहते हैं कि दीर्घायु हों, हमारा सुखी परिवार हो, श्रेष्ठ पुत्र-पुत्रियां हो, श्रेष्ठ व्यापार-नौकरी हो, हम आर्थिक दृष्टि से उन्नति करें, किसी प्रकार की कोई राज्य बाधा हमारे जीवन में नहीं आये, हम पूर्ण स्वस्थ हों, हम ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जान सकें, सद्गुरूदेव व सिद्धाश्रम के दर्शन कर सकें और इसी जीवन में पूर्णत्व प्राप्त कर सकें-कई प्रकार की मनोकामनाएं हो सकती है साधक के जीवन में।
मुण्डकाली तंत्र सूर्य साधना
सूर्य ग्रहण के समय यदि साधक ‘मुण्डकाली प्रयोग’ को सम्पन्न कर लेता है, तो उसके चेहरे पर व्याप्त दुःख, निराशा, अपने-आप ही समाप्त हो जाती है, क्योंकि यह प्रयोग महाकाली का तंत्र प्रयोग है और महाकाली का रक्त रंजित, मुण्ड हाथ में लिये, रक्त से सनी तलवार लिये हुये है। वह साधक को अभय प्रदान करने वाला है ग्रहण काल में महाकाली शीघ्र सिद्ध होती है यह निर्विवाद तथ्य है। यह प्रयोग गोपनीय, दुर्लभ और तीक्ष्ण प्रभावकारी है….. आप स्वयं इस साधना को अवश्य करें-
ग्रहण काल में इस प्रयोग को निम्नलिखित कार्यो की पूर्ति हेतु सम्पन्न किया जा सकता है-
वस्तुतः इस प्रयोग को इन विशिष्ट क्षणों में सम्पन्न करने पर निश्चित लाभ प्राप्त होता ही है।
साधना विधान
मंत्र
।। ऊँ उदित्यं जातवेदसे नमः।।
मंत्र
।। ऊँ ऐं मुण्डायै सर्वं साधय ऐं नमः।।
यह प्रयोग अपने आप में दिव्य और शीघ्र फलदायी है, इस ग्रहण काल में जिस मनोकामना की पूर्ति के लिये साधना की जाती है, वह अवश्य पूर्ण होती है।
यह सूर्य ग्रहण जो अपने आप में समस्त सिद्धियों को समेटे हुये है, इसलिये इस क्षण को चूकना, व्यक्ति के दुर्भाग्य का ही सूचक होगा, जो इतने बहुमूल्य क्षण को ही यों ही गंवा दें।
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