





शास्त्रों की ऐसी घोषणा है और सभी विचारशील पुरूष इस बात को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य-जीवन का चरम लक्ष्य भगवत्प्राप्ति है। संसार में बहुत से लोग इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये यत्किंचित् चेष्टा भी करते हैं, परन्तु ऐसे सौभाग्यशाली पुरूष बहुत थोड़े होते है, जो शीघ्र ही लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हों। शास्त्रकारों ने और अनुभवी सन्तानों ने भगवत्प्राप्ति मार्ग में कई विघ्न ऐसे बतलाये हैं, जिनको पार किये बिना भगवान की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ना बहुत ही कठिन है। उन विघ्नों में प्रधान विघ्न हैं- अहंकार, ममता, कामना और आसक्ति। अज्ञान या मोह तो इन सबका मूल कारण ही है। अज्ञान के नाश से इन सबका नाश अपने आप हो जाता है। अज्ञान कहते हैं न जानने को। अज्ञान यानी भगवान के स्वरूप को न जानना। जिनको भगवान के स्वरूप की जानकारी हो जाती है, वे इन सारे विघ्नों को सहज ही पार कर जाते है, बल्कि उनके लिये इन विघ्नों का सर्वथा नाश ही हो जाता है, परंतु जब तक अज्ञान-नाश न हो, जब तक भगवान के तत्त्व-स्वरूप की जानकारी न हो, तब तक क्या हाथ पर हाथ धरे यों ही बैठे रहना चाहिये? नहीं। आसक्ति, कामना, ममता और अहंकार का प्रयोग बुद्धिमानी पूर्वक भगवान में करना चाहिये। आदर्श ऐसा होना चाहिये कि एकमात्र श्रीभगवान में ही आसक्ति हो, एकमात्र श्रीभगवान् को पाने की ही अनन्य कामना हो, एकमात्र श्रीभगवच्चरणों में ही अहेतु की ममता हो, एकमात्र श्रीभगवान् के दासत्व का ही भक्त हृदय में शान्ति-सुधा बरसानेवाला आदरणीय अहंकार हो। इस प्रकार इन चारों के दिशा-परिवर्तन का अभ्यास करने से क्रमशः इनका दूषित रूप नष्ट होता जायेगा। तब ये मोहके पोषक न होकर उनका नाश करने में सहायता देंगे और ज्यों-ज्यों मोह का नाश होगा, त्यों-त्यों भगवान के स्वरूप की जानकारी होगी और ज्यों-ज्यों भगवान के स्वरूप का ज्ञान होगा, त्यों-त्यों एकमात्र उन्हीं के साथ इन चारों का ज्ञान होगा, त्यों-त्यों एकमात्र उन्हीं के साथ इन चारों का सम्बन्ध बढ़ जायेगा। फिर तो इनका नाम भी बदल जायेगा। और इन्हें विशुद्ध अव्यभिचारिणी भक्ति के रूप में पाकर भक्त कृतार्थ होगा। उस भक्ति के द्वारा भगवान् की यथार्थ जानकारी- भगवतत्त्व का सम्यक् ज्ञान होगा और उस ज्ञान का प्रादुर्भाव होते ही भक्त अपने भगवान् का साक्षात्कार प्राप्त करके कृतार्थ हो जायेगा।
विषयों के दुःख दोष भरे भयंकर स्वरूप का और भगवान के चिदानन्दमय अनन्त सौन्दर्य-माधुर्य का भगवान के स्वरूप का, स्वभाव का हमें ज्ञान नहीं है, इसी से हमारी चित्त वृत्तियों की प्रवृत्ति भगवान की ओर न होकर विषयों की ओर हो रही है। यदि श्रीभगवान की परमानन्दरूपता और विषयों की भयानकता पर वस्तुत विश्वास हो जाय तो मनुष्य का मन विषयों की ओर कभी नही जाय। आज यदि किसी से कहा जाय कि तुम्हें बहुत रूपये दिये जायेंगे, तुम एक तोला अफीम या थोड़ा सा संखिया खा लो, तो कोई भी खाने को तैयार नहीं होगा, क्योंकि अफीम और संखिया खाने से मृत्यु हो जायेगी, इस बात पर उसका शंकारहित निश्चित विश्वास है। भगवान ने कहा है-‘यह लोक अनित्य और असुख (सुखरहित) है अथवा यह जन्म अनित्य और दुःखालय है, इसे पाकर तुम मुझको ही भेजो।’
यदि भगवान के इस कथन पर शंका रहित निश्चित विश्वास होता और यदि इन वचनों के अनुसार जगत् के विषय में हमें यथार्थ में दुःखरूप और अनित्य जान पड़ते तो हम उनमें क्यों रमते? और यदि भगवान् के अखिल-आनन्दसुधासिन्धु-स्वरूप पर जरा भी विश्वास होता तो हम क्यों उसकी अपेक्षा करते? परंतु ऐसा करते हैं, इसलिये यही सिद्ध होता हे कि हम पढ़ते, सुनते और कहते तो हैं, परंतु यथार्थ में हमें इन बातों पर पूरा विश्वास नही हैं। इसी से हम इन बातों की परवाह न करके विषयों की ओर दौड़ रहे हैं और जैसे दीपक की ज्योति के रूप मोह में फँसकर उसकी ओर जानेवाला पतंग जलकर भस्म हो जाता है, उसी प्रकार हम भी भस्म हो जाते है!
हमारी वृत्तियाँ सदा ही बहिमुखी रहती हैं, विषयों में-कार्यजगत् में ही लगी रहती हैं। इसमें जहाँ-जहाँ हमें इन्द्रियों को तृप्त करने वाले पदार्थ दिख सुन पड़ते हैं, वहाँ-वहाँ ही हमारा चित्त जाता है। हम उन्हीं में सुख खोजते हैं, परंतु यह नही जानते कि दिन के साथ रात की तरह इस सुख का सहचर दुःख सदा इसके साथ रहता है। हम सुख चाहते हैं और दुःख से बचना चाहते हैं, इसीलिये हमें दुःख भोगना पड़ता है, यदि वास्तव में हमें दुःख से बचना है तो सुख की स्पृहा भी छोड़ देनी पड़ेगी। हम उस परम सुख को तो चाहते नहीं जो सदा रहता है, जो कभी घटता-बढ़ता नहीं, जो असीम और अनन्त है। हम तो चाहते हैं क्षणिक इन्द्रियसुख को, जो वास्तव में है नहीं, केवल भ्रम से भासता है और बिजली की भाँति एक बार चमत्कार तुरंत नष्ट हो जाता है। परंतु हम अबोध इस बात को जानते नहीं, इसी से उसके पीछे पड़े रहते हैं और एक दुःख के गढ्डे से निकलकर तुरंत ही दूसरा गहरा गढ्डा खोदने लगते हैं।
इस इन्द्रियसुख के प्रधान साधन माने गये हैं-दो पदार्थ। एक ‘स्त्री’ और दूसरा ‘धन’। इसीलिये शास्त्रों ने बड़े जोरों से इनकी बुराईयों की घोषणा करके कामिनी-कांचन के त्याग का बार-बार उपदेश किया है। बात यह है कि विषयासक्त मनुष्य की बहिर्मुखी इन्द्रियाँ स्वाभाविक ही आपातरमणीय विषयों की ओर दौड़ती हैं। कामिनी-कांचन में रमणीयता प्रसिद्ध है। इनकी ओर लगने के लिये किसी को उपदेश नहीं करना पड़ता। इन्द्रियाँ अपने-आप ही मन को इनकी ओर खींच ले जाती हैं। जगत् के इतिहास को देखने से पता लगता है कि संसार के महायुद्ध में-भीषण नरसंहार में ‘कामिनी और कांचन’ ही प्रधानता कारण रहे हैं। यहाँ इतनी बात और याद रखनी चाहिये कि पुरूष के लिये जैसे स्त्री आकर्षक है, वैसे ही स्त्री के लिये पुरूष है। ‘कामिनी’ शब्द से यहां केवल स्त्री न समझकर यौनसुख प्रदान करनेवाला व्यक्ति समझना चाहिये-स्त्री के लिये पुरूष और पुरूष के लिये स्त्री। जैसे पुरूष का चित्त कामिनी-कांचन के लिये छटपटाया करता है, प्रायः उसी प्रकार स्त्री का चित्त भी पुरूष और धन के लिये ललचाता रहता है।
परिणाम नहीं जानते, इसलिये पुरूष नारी के सौन्दर्य पर और नारी पुरूष के सौन्दर्य पर मोहित होते हैं और इसलिये विलासिता का सामान एकत्र करने की अभिलाषा नर-नारी धन की ओर आकर्षित होते हैं। जैसे स्त्री या पुरूष के अधिक भोग से धन, धर्म और जीवनी-शक्ति का नाश होता है, वैसे ही धन के लोभ में भी स्वास्थ्य, धर्म, कर्म और जीवन की बलि देनी पड़ती है। एक बार इनकी प्राप्ति या संयोग में कुछ सुख सा दिखायी देता है, परंतु परिणाम में भयानक दुःख और अशान्ति की प्राप्ति अनिवार्य होती है। जब तक इनका वास्तविक त्याग नहीं हो जाता, तब तक कभी शान्ति नहीं मिलती। शान्ति की प्राप्ति तो इनके सर्वतोभाव के त्याग से ही होती है।
परंतु क्या मनुष्य के लिये इनका त्याग सम्भव है? है तो फिर उस त्याग का स्वरूप क्या है और वह त्याग कैसे हो सकता है? पुरूष हो या स्त्री, संसार में उसका शरीर माता-पिता के रज-वीर्य से ही बनता है। पालन-पोषण भी माता-पिता या बहन-भाई आदि के द्वारा ही होता है। इसी प्रकार सर्वत्यागी संन्यासी को भी कौपीन, फटे कंथे और भिक्षा की आवश्यकता होती है। ऐसी परिस्थिति में कोई भी स्त्री या धन का सर्वथा त्याग कैसे कर सकता है?
इन प्रश्नों का उत्तर यह है कि पहले त्याग के अर्थ को समझना चाहिये। किसी वस्तु का ग्रहण या व्यवहार न करना बाहरी त्याग है और उस वस्तु में आसक्तिहीन रहना भीतरी त्याग है। अब विचार कीजिये, हम एक चीज का त्याग कर देते हैं, परंतु मन-ही-मन उसकी आवश्यकता समझते हैं, उसका अभाव हमारे मन में खटकता है और उसे प्राप्त करने की इच्छा होती है। ऐसी हालत में उस वस्तु का बाह्य त्याग वास्तविक त्याग नहीं हैं। असली त्याग तो वही है, जिससे उस वस्तु में आसक्ति न रहे। जिस त्याग में वस्तु का चिन्तन और आस्वाद मन-ही-मन होता है, वह त्याग वास्तविक नहीं है। अवश्य ही भोगमय जीवन की अपेक्षा आन्तर त्याग के साधन रूप में बाह्य त्याग सराहनीय है और आवश्यक भी है, उससे आन्तर त्याग में सहायता मिलती है और त्यागी की वृत्ति स्वाभाविक रूप में बढ़ती है, परंतु द्वेष, भय, हर्ष, शोक आदि का भी स्वाभाविक त्याग हो जाता है। फिर आगे चलकर त्याग के अभिमान और त्याग की स्मृति का त्याग करना पड़ता है। यही त्याग का स्वरूप है और इस त्याग की प्राप्ति आसक्ति के दोष और भगवान् के यथार्थ स्वरूप को जानने से होती है। यह सत्य है कि स्वरूप से स्त्री और धन का त्याग सर्वांश में होना कठिन है, तथापि शास्त्र इसीलिये इनके त्याग पर इतना जोर देते हैं कि सर्वथा त्याग की बात कहने से ही मनुष्य इनका कहीं उचित रूप में व्यवहार रूप में ग्रहण करेंगे। मन से तो त्याग होना ही चाहिये। बाह्य त्याग में पुरूष को चाहिये कि स्त्री जाति में देवी की भावना करे-
‘विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः, स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।’’
और भगवती जानकर उन्हें मातृभाव से नमस्कार करे। स्त्रियों को चाहिये कि पुरूषों को पिता, भाई या पुत्र के रूप में देखें। जहाँ तक हो सके, किसी भी रूप में स्त्री-पुरूष का परस्पर ज्यादा मिलना-जुलना लाभदायक नहीं है, जहाँ बहुत आवश्यक हो, वहाँ उपर्युक्त भाव से मिले। इसी प्रकार न्याय मार्ग से उतना ही धनोपार्जन करने की चेष्टा करें, जिससे गृहस्थ का कार्य सीधे-सादे रूप में चल जाय। इन्द्रियों को तृप्त करने के लिये और शरीर के आराम के लिये परमेश्वर को भूलकर, न्याय पथ को त्यागकर, दूसरे को धोखा देकर, दूसरे का हक मारकर और असत्य आश्रम लेकर धनोपार्जन करने की चेष्टा कभी न करें।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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