





हिप्नोटिज्म…वशीकरण… आप कुछ भी कहें, यह प्रयोग इतना तीक्ष्ण है, कि सामने वाले को वश में होना ही पड़ता है, चाहे वह देवता हो, अप्सरा हो, प्रेमी हो या प्रेमिका…
सम्मोहन प्रयोगान्ते अवश्यं वश्यमेव च।
न रिक्त इत् प्रयोगश्च दुर्लभो प्राप्यते नरः।।
इस प्रयोग का प्रभाव खाली जा ही नहीं सकता, क्योंकि यह दुर्लभ और गोपनीय है तथा पत्रिका के पन्नों पर उतारा जा रहा है ।
जीवन में हर ऋतु आती है और चली जाती है और फिर आती है, लेकिन प्रेम ऋतु जीवन में केवल एक बार ही आती है, जो कि जीवन को रस, सौन्दर्य और आनन्द की फ़ुहार से आप्लावित कर सराबोर कर देती है। प्रेमी कोई शब्द नहीं, अपितु भाव है— हृदयानुराग है, जो दैहिक न होकर आत्मिक है, कितनी ही उपमाये, कितने ही प्रेम के पर्याय बने हों, किन्तु द्वापर युग के राधेश्वर अर्थात् श्रीकृष्ण क्या किसी के भी मानस से विस्मृत हो सके ? अतः भाव को प्रेम का सार कहा गया है और भाव की पराकाष्ठा की विग्रह स्वरूपा श्री राधा हैं – हृादनी सार ”प्रेम” प्रेम सार ”भाव”, भावेर परम काष्ठा नाम ”महाभाव”।
महाभाव स्वरूपा श्री राधा ठकुरानी, सर्वगुण खानि, कृष्ण कान्ता शिरोमणी। श्री राधा-कृष्ण का प्रेम तो विभु अर्थात् सर्वव्यापक है, वह तो निरन्तर, प्रतिक्षण वृद्धि को ही प्राप्त होता है और वह भी नित्य नवीन भाव से।
अस कहि चरण परी अकुलाई।
कहि कहि मेरे प्राण कन्हाई।।
राधा के तो बाहर और भीतर श्रीकृष्ण ही विद्यमान है, जहां-जहां उनकी दृष्टि पड़ती है, वहां-वहां उन्हें श्रीकृष्ण की ही अनुभूति होती है, और इसीलिये वे कृष्णमय कहलाई और राधा-कृष्ण कोई दो व्यक्तित्व नहीं वे तो दो होते हुए भी एक ही हैं, यही द्वैत और अद्वैत भाव हैं, यही निर्गुण और सगुण रूप है और जो इस भाव को समझ सका, वह भव-सागर से पार उतर गया।
कृष्ण के लीलामयी स्वरूप को जान पाना इतना सरल नहीं, क्योंकि कृष्ण ने अपने ही एक मधुर, प्रेममयी, सौम्य स्वरूप को राधा के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत कर, समाज को प्रेम के यथार्थ रूप से परिचित कराया। कृष्ण तो अपने-आप में पूर्ण सौन्दर्य व आनन्द से परिपूर्ण प्रेम के साक्षात् प्रतिरूप हैं, वे ही प्रेमी और वे ही प्रेमिका रूप में हमारे समक्ष विद्यमान हैं, उनकी मनमोहक मुस्कान एवं चितचारे छवि का दर्शन कर चराचर-जगत् उनके प्रेम से आविर्भूत हो उठा, इसीलिए कृष्ण स्वयं कहते हैं –
कृष्ण रूप हूं मो कहं जानो,
हम दोउन बिच भेद न मानौ।
इमि जिन तत्वज्ञान प्रगटायौ,
अनुष्ठान विधिवत् जिन भायो।।
अर्थात् ”कृष्ण ही राधा और राधा ही कृष्ण हैं, दोनों में कोई भेद है ही नहीं और यही प्रेम की पराकाष्ठा है, चरम परिणति है, जिसे प्राप्त करना पूर्णत्व को प्राप्त करना है, इसलिए प्रेम और कृष्ण दोनों एक-दूसरें के पर्याय माने जाते है।” कृष्ण कोई शरीर मात्र का प्रस्फ़ुटीकरण नहीं, अपितु प्रेम तत्व का प्राकाटय स्वरूप हैं, जिन्होंने साकार रूप में उन गोप-ग्वालों के समक्ष विद्यमान हो, प्रेम के प्रगाढ़तम स्वरूप को प्रतिपादित किया है।
प्रेम कृष्ण प्रेमहि श्री राधा, वृंदावन हूं प्रेम अगाधा।
सहचरियन हूं प्रेम स्वरूपा, सिगरहि भजन भगति रति रूपा।।
कृष्ण के अतिरिक्त किसी और में प्रेम को प्रकट करने की सामर्थ्य ही नहीं है और यदि जीवन में प्रेम नहीं, तो फिर जीवन की सार्थकता कैसी? जीवन में प्रेम का आविर्भाय, प्रस्फ़ुटन ही तो जीवन्त जीवन की आनन्दानुभूति है और यही जीवन की सर्वोत्कृष्टा भी है, कृष्ण साकार रूप में उद्घटित हो प्रेमास्पद को प्रेम और सौन्दर्य का रसास्वादन करते हैं। मीरा उनके इसी सौन्दर्यमयी स्वरूपं का वर्णन करती हुई कहती है –
बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहिनी मूरत सांवली सूरत,
नैना बने बिसाल।।
अधार सुधारस मुरली राजती,
उर बैजन्ती माल।
छुद्र घंटिका कटि तट सोभित,
नूपुर सबद रसाल।।
मीरा प्रभ संतन सुखदाई,
भगत बछल गोपाल।
बसो मेरे नैनन में नन्दलाल।
कृष्ण के जन्म के अवसर पर ही उनके अप्रतिम रूप-सौन्दर्य का पान कर समस्त ब्रजवासी, गोप-ग्वाले अपनी सुध-बुध खो बैठे थे, और उसी क्षण से ही उनके हृदय में प्रेम का अंकुरण प्रस्फ़ुटित हो गया उनकी नित्य नवीन क्रीड़ाओं व लीलाओं ने सभी के प्राणों को झंकृत कर दिया, जिस प्रेम-रस से आपूरित मधुरिम संगीत की आवाज सुन राधा भी अपने-आप को न रोक सकी, और अपने अस्तित्व को उन्हें सौंप पूर्णतः उनमें विलीन हो गई और उनकी आह्नदिनी शक्ति कहलायी, क्योंकि शक्तिमान के भीतर ही शक्ति का समाहितीकरण होता है, अतः फिर वे उनकी हृदयगामिनी कहलाई, क्योंकि यह सम्बन्ध देह का नहीं प्राणों का है।
अतः प्रेम का यह दार्शनिक रूप प्रेम तत्व के गूढ़तम रूप का प्रतिपादन करना मात्र है, क्योंकि कृष्ण ने शक्तिमान और शक्ति की ऐक्यता को उजागर कर प्रेम और प्रेमिका, आत्मा और परमात्मा, गुरु और शिष्य के मध्य की घटना को उद्घटित किया है। कृष्ण का धारा पर अवतरण ही जीवन को सरल ढंग से जीने, मन में नई हिलोर पैदा करने जीवन को पूर्णरूप से रसमय तथा मधुरतम बनाने और जीवन्तता प्रदान करने के लिये हुआ और इसी सौन्दर्य, रसमयता, मधुरता व जीवन्तता के प्रतीक हैं श्रीकृष्ण। जो कृष्णमयी अर्थात् प्रेममय हो गया, जिसने देह से ऊपर उठ कर प्राणों को झंकृत कर, आत्मा रूपी कमल दल की पंखुडियों को खोल लिया, उसने तो प्रेम करने की कला ही सीख ली, उसने तो परमात्मा को पा लिया, फिर तो आत्मा और परमात्मा दो भिन्न रूप न होकर, अभिन्न हो गये और यही प्रेममयता ही तो सम्पूर्ण जीवन का रहस्य है।
आज भी कृष्ण का नाम लेते ही लोग अपनी सुध-बुध बिसरा बैठते हैं, अतः इसीलिये शास्त्रों, पुराणों आदि में जन्माष्टमी के पर्व को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है, क्योंकि प्रेम के मूल अर्थ को समझना है, तो जन्माष्टमी के मूल अर्थ को भी समझना आवश्यक होगा, क्योंकि प्रिय मिलन का इससे सुमधुर अवसर तो शायद और कोई नहीं, यही जीवन के आनन्दास्वादन का अवसर है। हृदय-कमल में नये प्राण स्पंदित कर प्रेम-वर्षा की रिमझिम फ़ुहार में भीग जाने का अवसर है, यही अवसर है स्वयं निहित शक्ति को प्रस्फ़ुटित करने का, आत्म-पक्ष को चैतन्य कर परम तत्व को प्राप्त करने का यही अवसर है, यह जन्माष्टमी मात्र कृष्ण का जन्मोत्सव ही नहीं, वरन् इसे स्वयं के अन्दर आह्नदिनी शक्ति स्वरूपा श्री राधा का समाहितीकरण ही कहा जा सकता है और यह एक जो जाना ही अमरत्व की प्राप्ति कर लेना है, अतः –
प्रेमी भोक्ता सोई रसपाई, प्रेमास्पद प्रिय भोग सदाई
रति स्वरूप इन प्रेरक जानौ, रसन बिधान बिधायक मानौ।।
प्रेम, प्रेमी और प्रेमास्पद अर्थात् जो रसपान करने वाला अथवा रसपान करने योग्य होता है और इसकी प्रेरणा देने वाला भी प्रेम ही होता है, अतः प्रेम, प्रेमी और प्रेमास्पद अलग नहीं है, एक ही हैं।
– किन्तु इस एक होने की प्रक्रिया के पीछे जो गूढ़ रहस्य छिपा है, वह क्या है – यह जानना अत्यन्त जरूरी है, जब तक उस रहस्य का ज्ञान नही होगा, तब तक उस जटिल क्रिया को भी समझना असम्भव है, जो कि प्रेम, प्रेमी और प्रेमास्पद के बीच की एक कड़ी है, एक होने का माध्यम है, जिससे कि ये तीनों भिन्न-भिन्न होते हुए भी अभिन्न है।
लौकिक दृष्टि से यदि देखा जाय, तो इस अभिन्नता की एकमात्र क्रिया है – ”प्रैक्टिकल सम्मोहन”, जिसे वशीकरण भी कहा जाता है। एक-दूसरे के प्रति सम्मोहन, एक ऐसा आकर्षण एक ऐसी चुम्बकत्व शक्ति, जो परस्पर इन्हें जोड़े हुये है, जिसके फ़लस्वरूप ये कहीं भी, किसी भी प्रकार से अलग नहीं दिखाई देते। – और न ही ये अलग है, क्योंकि इस क्रिया के माध्यम से अथवा इस आह्नदिनी शक्ति के माध्यम से, जो प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों के अन्दर निहित होती है— वह प्रेम छिछलापन या हल्कापन लिये हुए नहीं होता, अपितु गाम्भीर्य युक्त होता है, जो मनुष्य को देव योनि में प्रविष्ट कर देता है, फि़र उसका प्रेम साधारण न रहकर दिव्य हो जाता है, फि़र उसमें कृष्ण की भांति प्रेम का आदान-प्रदान करने की क्रिया स्वतः ही आ जाती है और तब वह स्वयं कृष्णमय हो जाता है।
आमतौर पर देखा जाता है, कि हल्के स्तर पर या मात्र शारीरिक देह दृष्टि से निकटता या शारीरिक आकर्षण को ही लोग प्रेम के नाम से सम्बोधित करने लगते हैं और तब वह प्रेम नहीं, मात्र एक वासनात्मक आकर्षण अथवा वासनात्मक सम्बन्ध ही कहा जा सकता है जो कि मात्र प्रदर्शन होता है, प्रेम नहीं, यही कारण है, कि उनके व्यवहारिक सम्बन्ध कमजोर पड़ने लगते हैं, उनमें कटुता आ जाती है या सन्देह, भ्रम आदि के कारण उनके प्रेम-सम्बन्धों में दरार पड़ने लगती है और इस तरह अनेक परेशानियां प्रेमी और प्रेमास्पद के बीच दीवार बनकर उनके सम्बन्ध को तोड़ डालती है, उनके जीवन को नष्ट-भ्रष्ट कर डालती है, किन्तु प्रेम की परिभाषा तो यह है ही नहीं। प्रेम तो वह है, जो नष्ट नहीं करता, अपितु निर्माण करता है नव जीवन का, आनन्द का, रस का, मधुरता का। किन्तु इस आनन्द को प्राप्त करने की क्रिया तो केवल कुछ बिरले लोगों तक ही सीमित रह गई, जिन्होंने प्रेम की चरम सीमा अर्थात् उच्चता को प्राप्त कर लिया और प्रेम शब्द को अमर कर, स्वयं भी अमर हो गये।
और वह क्रिया है – एक ऐसी चुम्बकत्व शक्ति, जो प्रेमी और प्रेमिका को दो रहने ही नहीं देती, इस क्रिया के द्वारा वे एक ऐसे तत्व में विलीन होते चले जाते हैं, जहां उन्हें स्वयं का भी भान नहीं रहता और ऐसी स्थिति में वह ऐक्य भाव उन दोनों के मध्य एकता स्थापित करने लग जाता है, जिसे प्रेम की प्रगाढ़ता कहा गया है, प्रेम की पूर्णता कहा गया है, ब्रह्मानन्द कहा गया है, दिव्यानन्द कहा गया है और वह प्राप्त होता है, इस ‘‘प्रैक्टिकल सम्मोहन प्रयोग’’ के माध्यम से, जो अपने-आप मे एक ऐसा तीक्ष्य प्रयोग है, जिसे सिद्ध करने पर सामने वाले को वश में होना ही पड़ता है, चाहे वह देवता हो, अप्सरा हो या प्रेमिका।
यह इतना जटिल, दुर्लभ एवं गोपनीय है, कि इसका प्रभाव, अचूक, शीघ्र एवं तीव्र फ़लदायी होता ही है। आपने वैसे तो सम्मोहन, वशीकरण आदि प्रयोग अनेकों किये होंगे, किन्तु यह प्रयोग, जो कि अत्यन्त दुर्लभ है, पहली बार ही आपके समक्ष पाठकों के लिये प्रस्तुत है, उसी प्रेम-भाव को द्विगुणित करने हेतु, एक अमोघ अस्त्र स्वरूप अत्यन्त सरल एवं सहज भाषा में इन पन्नों पर प्रस्तुत किया जा रहा है— और जब यह क्रिया पूर्ण होगी तो हर कोई राधा और हर कोई कृष्ण बन सकता है क्योंकि जिसे उस आनन्द को लेने की क्रिया आ जाती है, जो एकाकार होने की क्रिया को समझ लेता है, वह स्वयं में ही देवतुल्य हो जाता है, अतः फिर वही प्रेमी और वही प्रेमास्पद कहलाने लगता है फिर कोई भेद रहता ही नहीं।
प्रयोग विधि:
मंत्र:
।। ऊँ श्रीं हीं सम्मोहनाय फट् ।।
Om Shreem Hreem Sammohnaya Phat
यह प्रयोग सर्वथा नवीन एवं नूतन है, जिसका प्रभाव अपने-आप में तीक्ष्ण प्रभावकारी है, और यदि प्रेमपूर्वक, पूर्ण श्रद्धा भाव एवं विश्वास से इस प्रयोग को किया जाय, तो पूर्णता प्राप्त होती ही है, यह निश्चित है।
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