





भारत में पूरे वर्ष पर्यन्त पर्व एवं त्यौहार आते हैं, कभी अहोई अष्टमी, तो कभी नाग पंचमी, तो फिर कभी अक्षय तृतीया।ये पर्व अपने आप में पूर्ण चैतन्य दिवस है, जब ग्रह स्थिति शुभ कार्यो एवं साधना हेतु पूर्ण अनुकूलता लिये होती है। इन दिनों की विशेषता यही है, कि इनमें किया हुआ सुव्यवस्थित कार्य हमेशा फलदायी रहता है। ऐसा ही एक पर्व है ‘अनन्त चतुर्दशी।’
अनन्त चतुर्दशी वास्तव में भगवान विष्णु का प्रिय पर्व है। उन भगवान नारायण का जिनके सो जाने पर समस्त प्रकृति एवं ब्राह्माण्ड में प्रलय की स्थिति बन जाती है और जब वे पुनः जाग जाते हैं, तो उनके आदेश से ब्रह्मा नवीन सृष्टि का निर्माण करते हैं।
जिस प्रकार से सृष्टि का विनाश एवं निर्माण होता ही रहता है, उसी प्रकार मानव जीवन में भी यह क्रिया निरन्तर गतिशील रहती है। विभिन्न, गुण, दोष उभरते रहते हैं, तो साथ ही साथ नष्ट भी होते रहते हैं, पर विचारवान एवं ज्ञानवान व्यक्ति वही है, जो अपने जीवन के सभी कुसंस्कारों, अवगुणों एवं कमियों को नष्ट करता हुआ, अपने जीवन में शुभ लक्षणों एवं स्थितियों का निर्माण करें। कुछ ऐसा करें, जिससे वह सामान्य स्तर से, एकदम से छलांग लगाता हुआ अद्वितीयता की श्रेणी में जाकर खड़ा हो जाये। जहां पर फिर वह सभी प्रकार के पाशों से मुक्त हो, एक दिव्य पथ का पथिक बन कर मानव जीवन को सार्थक बना सके।
पर आज का वातावरण इतना विषैला है, कि व्यक्ति अगर पवित्र, निर्मल जीवन जीना भी चाहे, तो यह प्रायः असम्भव ही है क्योंकि आज भोग और विलास का आकर्षण अति प्रबल है, खान-पान में पवित्रता नहीं, यहां तक कि जो वायु श्वास क्रिया के लिये उपयोगी है वह भी दूषित है। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति बेशक, चाहता तो बहुत कुछ है पर अंततः हार मान लेता है और झुंझला उठता है। जीवन में निराश हो जाता है और थक कर बैठ जाता है।
निश्चित ही इसमें उसको कोई दोष नहीं, क्योंकि ऐसी स्थिति में कोई कर ही क्या सकता है? पर फिर भी हमारा साहित्य, इतिहास इस बात का गवाह है, कि जिस व्यक्ति के अंदर अटूट विश्वास, जीवन शक्ति और दृढ़ निश्चय हो, उसके साथ ही साथ वह साधनात्मक शक्ति प्राप्त कर ले, तो फिर कोई भी इस संसार में उसकी उन्नति को रोक नहीं सकता।
ऐसी ही एक अद्वितीय साधना है ‘नारायणाक्षी प्रयोग’ जिसे सम्पन्न करने से व्यक्ति सहज ही अपनी सभी कमियों को मूल से ही नष्ट कर, सभी प्रकार से श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है। कमियां व्यक्ति के जीवन में अनेक हैं- दरिद्रता, रोग, शत्रु भय, मुकदमें आदि, अवगुण भी जीवन में अनेक हैं-काम, क्रोध, मोह, लोभ, प्रमाद आदि, इनको इस मन से पूर्ण रूप से समाप्त कर व्यक्ति अपना पुनः निर्माण कर सकता है, और धन, ऐश्वर्य, शत्रु-दमन, रोगमुक्ति की स्थिति प्राप्त कर एक निर्मल एवं पवित्र जीवन की ओर अग्रसर हो सकता हैऔर अगर व्यक्ति यह साधना सम्पन्न कर लेता है, तो फिर कोई विपरीत परिस्थिति उसके लिये बाधा नहीं बन सकती। वह उन सब से अछूता रहता हुआ निरन्तर अपने मार्ग पर गतिशील रहता है, जो प्राचीन काल से ही अत्यधिक सम्मानीय रही है-
प्रह्लाद ‘नारायणाक्षी प्रयोग’ को सम्पन्न करके तीनों लोकों के स्वामी बन सके।
पांडवों ने भी इस प्रयोग को सम्पन्न किया, जो महाभारत जैसे दुर्धर्ष महासंग्राम में विजय श्री प्राप्त करने में सहयोगी बना और बार-बार कठिनाईयों का सामना करते हुए भी वे लाभ प्राप्त कर सके।
तिब्बत के लामा ‘औलम्मा’ के अनुसार- “यहप्रयोगअपनेआपमेंहीसर्वश्रेष्ठहै, और जो कोई भी इसको जीवन में एक बार सम्पन्न कर लेता है, उसे फिर जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता नहीं रहती है।”
ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जब इस साधना को सम्पन्न कर व्यक्ति अपने जीवन का अभीष्ट प्राप्त कर सका।
‘नारायणाक्षी प्रयोग’ का अर्थ है नारायण का नेत्र, और विष्णु के बारे में कहा गया है-
सहस्त्रशीर्षा पुरूषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्।
स भूमि (गू) सर्वतस्यूत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्।।
जो व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न कर लेता है वह स्वयं नारायण् के समान चेतनावान, क्षमतावान हो जाता है। उसकी सभी इन्द्रियां पूर्णतः जाग्रत हो जाती हैं और हर क्षण गतिशील रहती है, जिसके फलस्वरूप वह आसानी से किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जित कर लेता है।
इस साधना को सम्पन्न करने से निम्न स्थितियां व्यक्ति के जीवन में आ जाती हैं-
साधना विधान-
यह साधना अनन्त चतुर्दशी 24 सितम्बर को सम्पन्न करें या फिर किसी गुरूवार को सम्पन्न करें।
यह रात्रिकालीन साधना है। इसके लिये साधक को ‘नारायणाक्षी दिव्य यंत्र’, लोचन, एवं ‘नारायणाक्षी माल्य’ की आवश्यकता होती है।
सर्वप्रथम साधक स्नान कर रात्रि में दस बजे स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर, उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें।
अपने सामने बाजोट पर सफेद वस्त्र बिछाकर कुंकुम से आंख की आकृति बना कर, उस पर ‘नारायणाक्षी यंत्र’ स्थापित कर उसका विधिवत पंचोपचार पूजन करें। नारायण का ध्यान करें-
ध्यान-
करूणापरायणपदं श्रुति शास्त्रसारं
ध्यायामि सत्यार्थ परं प्रसन्नं।
तं चिन्तयामि सततं भवरोग वैद्यम्,
नमोऽस्तु नारायण देव देवम्।।
उसके बाद यंत्र पर ‘लोचन’अर्पित कर साधना में सफलता के लिये प्रार्थना करें। अगर कोई विशेष मनोकामना हो तो उसका उच्चारण करें।
‘नारायणाक्षी माल्य’ से निम्न मंत्र का 21 माला मंत्र जप करें-
मंत्र –
।। ऊँ ह्रीं नमो नारायणाय अनन्ताय श्रीं ऊँ नमः।।
।। Om Hreem Namo Narayanaya Anantaya Shreem Om Namah ।।
यह एक दिवसीय साधना है। साधना के उपरान्त यंत्र, माला तथा गुटिका को किसी विष्णु मंदिर अथवा जलाशय में अर्पित करें। ऐसा करने से साधना फलीभूत होती है।
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