





जब सद्गुरु का ही दृढ़ संकल्प साधकों के साथ चलने का हो तो विशाल लक्ष्य भी सहज, सफलता पूर्वक सम्पन्न हो जाते हैं। मनुष्य का शरीर पंचतत्वों से मिलकर बना है, उनमें से ही एक तत्व है-‘अग्नि तत्व’। अग्नि तत्व ऐसा जागृत तत्व है जो निद्रा को जागरण बना सकता है।
मनुष्य की प्रवृत्ति रही है कि वह सदा से ही अपने अपने विशुद्ध अन्तःकरण में व्याप्त शाश्वत, अजर-अमर और चेतन ऊर्जा से सदैव विकर्षित होता रहा है। वह शाश्वत, चैतन्य आत्मा के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के बजाय सांसारिक, क्षणिक सुखों की ओर ही निमग्न रहता है। प्रत्येक युग को उसके प्रतिनिधि, युगपुरुष स्वरुप ‘सद्गुरु’ ने अपने तपोबल से सदैव ही साधकों को संपन्नता और पूर्णता के राह पर अग्रसर किया है। जीवन के आंतरिक मलिनता का समूल नाश करते हुये अपने आत्म तत्व की पूर्णता पर पहुँचने हेतु सद्गुरुदेव द्वारा दिया गया प्रवचन उनके ही तेजस्वितापूर्ण वचनों में-
बहूनि सन्ति तीर्थानि, दिवि भूमौ रसासु च।
बदरी सदृशं तीर्थं, न भूतो न भविष्यति।।
इस पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल में अनेक-अनेक पवित्रतम् तीर्थ हैं, परंतु बद्रीनाथ के सदृश न तो कोई तीर्थ पहले कभी हुआ था और न ही भविष्य में कभी होगा।
हमारा शरीर सांसारिक जीवन में जिस तरह से प्रत्येक भावों को, क्रियाओं को आत्मसात कर लेता है। ठीक उसी प्रकार प्रकृति में भी जैसे-जैसे परिवर्तन होता है वैसे-वैसे हम भी अपने आपको परिवर्तित करते हैं अर्थात् उस प्रकृति के साथ अपने आपको जोड़ लेते हैं और जो सही रुप में प्रकृति के साथ, Nature के साथ अपना जुड़ाव नहीं कर पाता है, वह व्यक्ति बहुत अधिक परेशान और अधिर सा रहता है। इसलिये प्रयास कीजिये कि हमें जैसा भी प्रकृति से वातावरण मिले और हमारे सांसारिक जीवन में जैसी भी स्थितियां निर्मित हो उनके साथ जुड़ाव रखिये, सामंजस्य रखिये तो वास्तव में जीवन में बहुत अधिक आनन्द प्राप्त होगा और जब जीवन में आनन्द प्राप्त होगा, जीवन में रस की वृद्धि होगी तब इस आनन्द के साथ, रस के साथ जीवन को जीने की कला का भी ज्ञान रहेगा कि किस तरह से जीवन को संचालित करना है।
जब-जब भी हम व्यथित तथा परेशान से होते हैं तो इसका अर्थ यह है कि हम अपने आपको Adjust नहीं कर पा रहे हैं, समायोजित नहीं कर पा रहे हैं। और इसका यही कारण है कि गृहस्थ व्यक्ति के जीवन में ये स्थितियाँ आनी ही, आनी है। उसे इस बात का एहसास तो है परन्तु वह फिर भी उन स्थितयों को, उन क्रियाओं को समझ नहीं पाता है और हम सभी जानते हैं कि जहाँ नासमझी का भाव होता है वहाँ नाश की स्थितियां धीरे-धीरे विस्तारित होने लगती हैं, बढ़ने लगती हैं। इस प्रकार का जीवन जो अपने सद्गुरु के प्रकाश से रहित है तथा अज्ञान रूपी घने अंधकार से ढका हुआ है। जो स्वयं के आत्मा का हनन (उपेक्षा या अज्ञानवश नाश) करता है, वह मृत्यु के पश्चात भी उसी अंधकार में भटकता रहता है।
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।।
यह श्रेष्ठतम तीर्थ स्थान जो सप्तपुरी में सर्वश्रेष्ठ है। आप मेरे पास यही भाव-विचार लेकर आयें हैं कि गुरुजी हम तो बैठे रहें और आप सामने खड़े ही रहें जिससे कि आपकी छत्र-छाया में हम और अधिक आनन्द, प्रसन्नता के साथ अपने आपको महसूस कर सकें और जैसा मैनें कहा कि यह सप्तपुरी श्रेष्ठतम धामों में से एक है। भगवान विष्णु का यह स्थान है और कहा जाता है कि नर और नारायण ने भी सृष्टि की वृद्धि के लिये गंधमादन पर्वत पर तपस्या किया था और तपस्या अंश के रुप में ही भगवान विष्णु यहाँ विराजमान हुये।
गन्धमादनकूटस्थं नरनारायणात्मकम्।
बदरीखण्डमध्यस्थं श्रीबद्रीशं नमाम्यहम्।।
भगवान विष्णु के फलस्वरुप ही सांसारिक जीवन में, प्रकृति में, सृष्टि में सदैव वृद्धि हो सके और उसी के लिये, उस तपस्यांश के फलस्वरुप सप्तपुरी का यह श्रेष्ठतम, दिव्यतम धाम धीरे-धीरे पूर्णता की ओर क्रियाशील हुआ। संसार में चाहे जैसा भी आस्तिक भाव युक्त व्यक्तित्व हो वह बद्रिनाथ धाम में अवश्य ही आता है। यही भाव-चिन्तन लेकर कि मेरा भी सांसारिक जीवन प्रत्येक पक्ष से उत्तम बन सके और उन दैविय शक्तियों के माध्यम से जीवन की जो भी अपूर्णताये हैं, जो अधूरापन है वह समाप्त हो सके और मैं ‘पूर्णमदः पूर्णमिदं’, पूर्णता की ओर क्रियाशील हो सकूं। तात्पर्य कि देवी-देवताओं की शरण में, गुरु की शरण में जाने का मंतव्य यही रहता है कि जीवन की जो भी नाकामियां हैं, जो भी अभाव है, पराजय की स्थितियां हैं वे सब स्थितियां समाप्त हो सकें और उन नाकामियों को, अभाव और अपूर्णता की स्थितियों को गुरुत्व शक्ति के माध्यम से, दैवीय शक्तियों के माध्यम से उस रिक्त स्थान को पूर्ण रुप से भर सकूं अर्थात् मेरे जीवन की न्यूनतायें समाप्त हो सके जिससे मेरे जीवन में रस, आनन्द की प्राप्ति हो सके। इसलिये ही मैनें पुस्तक में लिखा था कि आज हम ‘सर्व दुःख भंजन साधना’ सम्पन्न करेंगे।
हम सभी जानते हैं कि हमारे जीवन में किस-किस रुपों में दुःख रुपी स्थितियां हैं और इन दुःख रुपी स्थितियों का निर्माण भी स्वयं ही करते हैं। उसके लिये एक कथा है –
एक व्यक्ति की चार पत्नीयां थी। चौथी पत्नी से वह बहुत अधिक प्यार करता था। उसका श्रेष्ठतम तरीके से ध्यान रखता था। किसी भी प्रकार से पीड़ा नहीं हो, वह दुःखी नहीं हो; इसका वह बराबर ख्याल रखता था। तीसरी पत्नी से वह प्रेम करता था और जब बहुत तकलीफ में होता था तो वह दूसरी पत्नी से सलाह लेता था। उस सलाह को जीवन में क्रियाशील करता तो वह सफल हो जाता था अर्थात् कहीं वह तकलिफ में आता था कि इस कार्य को किस तरह सम्पन्न करना है और उस समय उसकी मति काम नहीं कर रही है तो वह दूसरी पत्नी से सलाह लेता था।
चौथी पत्नी से तो अत्यधिक प्यार करता था, तीसरी पत्नी से वह प्रेम तो करता था परन्तु उसे हर समय डर रहता था कि वह किसी के साथ चली न जाय। वह हर समय भयभीत रहता था। जब कभी वह किसी मुसीबत में पड़ जाता था तो दूसरी पत्नी से सलाह लेता था और जो पहली पत्नी थी उससे वह बिल्कुल बात ही नहीं करता था, ध्यान ही नहीं देता था, फिक्र भी नहीं करता था। इस तरह से उसके जीवन में यह द्वन्द्व चल रहा था। धीरे-धीरे शरीर वृद्धावस्था की ओर, जर्जर अवस्था की ओर क्रियाशील होने लगा। वह अत्यधिक बीमार रहने लगा और उसे धीरे-धीरे यह एहसास हो गया कि मेरी मृत्यु निकट है, जीवन की समाप्ति निकट है। तो उसने विचार किया कि मेरी तो चार-चार पत्नियां हैं तो क्यों न अपनी सेवा के लिये एक पत्नी को अपने पास रखूं।
सर्वप्रथम वह जिससे अत्यधिक प्रेम करता था उससे कहा कि -“तुममेरेसाथरहो, मेरा शरीर अत्यधिक जर्जर हो चुका है और मृत्यु की अवस्था की ओर अग्रसर हो रहा है। न जाने कब मेरी सांस खत्म हो जाय।”
चौथी पत्नी ने कहा-“येअसम्भवहै, मैं तुम्हारे पास नहीं रह सकती।”वहबहुतपरेशानहुआ।
तीसरी पत्नी से पूछा -“मेरेहाथ-पांवभीनहींउठपारहेहैं, चलने की क्षमता भी नहीं है। तुम मेरा थोड़ा साथ दो।”
तीसरी पत्नी ने कहा-“नहीं, जीवन बहुत लंबा-चौड़ा है, मैं तो तुम्हारा साथ नहीं दे सकती। तुम यदि मृत्यु को प्राप्त हो गये तो मैं किसी दूसरे के पास चली जाउंगी।”वहव्यक्तिऔरअधिकद्रवीतहुआकिअबक्याकियाजाय……
दूसरी पत्नी से पूछा-“तुमहमेशामुझेसलाहदेतीरहती हो और मैं हमेशा तुम्हारे सलाह के अनुसार ही काम करता रहता हूँ। जिससे मेरे काम भी सफल हो जाते थे। अब मुझे तुम्हारी आवश्यकता है, तुम मेरे साथ तो रहो।”
तो पत्नी ने कहा-“मैंतुम्हारासाथनहींदेसकती; तुम्हारी मृत्यु होने पर ज्यादा से ज्यादा श्मशान तक चल सकती हूँ।”
वह व्यक्ति बहुत परेशान हो गया। चौथी, तीसरी, दूसरी पत्नीयों ने किसी तरह का साथ देने का वादा नहीं किया।
अचानक एकदम से पहली पत्नी बहुत उत्साहित होकर आई -“मैंतुम्हारेसाथरहूंगी।”
“वास्तव में प्रत्येक सांसारिक मनुष्य के जीवन में यह चार पत्नीयां होती हैं।”चौथीपत्नीजिससेहमअत्यधिकप्रेमकरतेहैंवहहमारा‘शरीर’है।शरीरकीहमपूरेजीवनबहुतअधिकध्यानदेतेहैं।किमेराशरीरहरओरसेसौन्दर्यमयरहे, नाना प्रकार के श्रृंगार करके, पाउडर इत्यादि वस्तुएं लगा के, अच्छे-अच्छे कपड़े पहन के हम शरीर को बहुत सुन्दर बना के रखते हैं। हमें ज्ञात तो है कि शरीर धीरे-धीरे जर्जर अवस्था की ओर जा रहा है, झुर्रियां (Wrinkles) आ रही हैं, परन्तु हम शरीर का सदैव ध्यान रखते हैं उस चौथी पत्नी की तरह। इसे और सरलता पूर्वक समझने हेतु ‘कठोपनिषद’ के इस श्लोक को समझना चाहिये-
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते।।
इंसानी दिमाग की यह फितरत है कि वह जब किसी नई चीज (जैसे नया फोन, नई कार या नया पद) को देखता है, तो उसे लगता है कि इससे मिलने वाली खुशी हमेशा रहेगी। नचिकेता यहाँ इसी ‘भ्रम’ पर चोट करते हुये यमराज से कहते हैं -“हेयमराज! आपमुझेजोभीसुख-सुविधायें, गैजेट्स या साम्राज्य दे रहे हैं, उन सब पर एक अदृश्य Expiry Date लिखी हुई है। ये मुफ्त नहीं हैं। इन्हें भोगने के बदले में मेरी इंद्रियों का ‘तेज’ (Energy) समाप्त होगा। इस सुख को भोगने के फलस्वरुप ये मेरी जीवन ऊर्जा को चूसकर धीरे-धीरे मुझे बूढ़ा कर देंगे।’’ इस विचार को आज की भाषा में ‘डोपामाइन’ (Dopamine Burnout) कहते हैं।
इस श्लोक का अगला वाक्य क्या है? ‘अपि सर्वं जीवितमल्पमेव।’ यमराज ने नचिकेता को हजारों साल के लम्बी उम्र का ऑफर दिया। परन्तु नचिकेता का दृष्टिकोण इतना विशाल (Cosmic) है कि उन्होनें कहा कि ब्रह्मांड के समय चक्र के सामने हजारों साल भी एक ‘पल’ के बराबर हैं। वे यमराज से कहते हैं-“आपमुझेलंबीउम्रकालालचदेरहेहैं, लेकिन अनंत समय के सामने वह लंबी उम्र भी एक छोटी सी ‘शिफ्ट’ (Shift) जैसी है। तो मैं एक छोटी शिफ्ट के लिये अपनी अनंत आत्मा का सौदा क्यों करूँ?” नचिकेता ने यमराज के सामने खड़े होकर निडरता पूर्वक कहा-“अपनीयेआलीशानगाड़ियां, ये पार्टियां और ये नाच-गाना आप अपने पास ही रखिये।”मुझेवहचाहिये जो आपके पास भी नहीं है अर्थात् ‘आत्मज्ञान’।
हम सुंदर शरीर, चमकती त्वचा, सुडौल अंगों और शारीरिक आकर्षण (Physical Attraction) के दीवाने रहते हैं, नचिकेता उसे ‘श्वोभावा’ कहते हैं। अर्थात् इस शरीर को ही सब कुछ मानकर इसके रख-रखाव, इसके आराम और इसके अहंकार में पूरा जीवन बिता देते हैं। हम भूल जाते हैं कि इस शरीर की सांसें गिनी-चुनी हैं। इसलिये ही नचिकेता मृत्यु के स्वामी से कहते हैं-“येशारीरिकआकर्षणआपअपनेपासहीरखें, मुझे चमड़ी के पीछे छिपे उस शाश्वत चैतन्य (आत्मा) को जानना है जो कभी बूढ़ा नहीं होता।”मैंतुम्हें अपने शरीर से नफरत करना नहीं सिखा रहा, बस तुम्हें स्वयं या किसी विशेष शरीर के प्रति अंध-मोह को तोड़ता है। और वास्तिविकता भी यही है “शरीरएकसाधन (Vehicle) है, साध्य (Destination) नहीं।”
तीसरी पत्नी जो कि ‘धन’ के रुप में होती है। जिसका हम संग्रह करते हैं। हमें भी इस बात का एहसास है कि मृत्यु के पश्चात धन हमारे पास नहीं रहेगा, वह किसी और के पास चला जायेगा। और हम… और अधिक धन की प्राप्ति हो, लक्ष्मी की प्राप्ति हो, कार्य क्षेत्र में वृद्धि हो, मैं धन का अर्जन कर सकूं। हम सदैव उस धन का संग्रह करते रहते हैं, उसका विस्तार करते रहते हैं। वह भी हमारे साथ नहीं चलता है।
दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये संचयो न कर्तव्यः।
पश्येह मधुकरिणां संचितमर्थं हरन्त्यन्ये।।
इस श्लोक में धन के उपयोग के तीन चरण बताये गये हैं- दान (Sharing), भोग (Enjoyment) और ‘धन का संचय करने पर निषेध’।
वास्तव में धन एक ‘ऊर्जा’ (Energy) है और ऊर्जा का नियम है कि वह हमेशा बहती (Flow) होती रहनी चाहिए। अगर आप पानी को एक जगह रोक देंगे, तो वह सड़ जायेगी; लेकिन अगर वह बहती रहेगी, तो किसी पथिक की प्यास बुझायेगी।
आपने मधुमक्खी को देखा है, वह मीलों उड़ कर, दिन-रात एक-एक करके फूलों से रस इकट्ठा कर शहद का निर्माण करती है। परन्तु वह उस शहद को न तो स्वयं पूरा पी पाती है और न ही किसी और को देती है। वह सिर्फ छत्ते में उसे ‘जमा’ करती रहती है और अंत में एक दिन शिकारी आता है, धुंआ करके मधुमक्खियों को भगा देता है और सारा शहद ले जाता है।
आपने अपने आस-पड़ोस, रिश्तेदारों को या स्वयं के परिवार में भी ऐसे व्यक्ति को जरूर देखा होगा जो बहुत धनवान तो हैं; परन्तु वह धनवान होने पर भी फटे-पुराने कपड़े पहनेगा, अच्छे भोजन पर पैसे नहीं खर्च करेगा, बीमार होने पर अच्छे अस्पताल नहीं जायेगा और न ही कभी किसी गरीब या सामाजिक कार्य में कुछ मदद करेगा। वह सुबह से रात तक सिर्फ बैंक बैलेंस देखकर ही खुश होता रहता है और अपना सारा जीवन अभावों में ही व्यतीत कर देता है। फिर अचानक एक दिन उसकी मृत्यु हो जाती है। उसके जाने के बाद उसके बच्चे उसके पैसे पर लड़ने लगते हैं, फिर कोर्ट-कचहरी में जायेगें, मुकदमा करेगें, उन पैसों को ऐशो-आराम और व्यसनों (गलत आदतों) में खपा देते हैं। जिस पैसों के लिये उसने पूरी जिंदगी भर ‘जीना’ छोड़ दिया, उस पैसों का सुख उसे कभी मिला ही नहीं। उसका जीवन भी मधुमक्खी के सदृश ही होता है। अथक परिश्रम से उसने छत्ते का निर्माण तो किया परन्तु संचय की भावना के फलस्वरुप स्वयं ही शिकार हो गया।
दूसरी पत्नी जो कि हमारे ‘सगे-संबंधि’ हैं, ‘रिश्तेदार’ हैं, ‘पुत्र-पुत्रीयां’ हैं। वे हमारे मृत्यु के बाद श्मशान घाट तक हमारे साथ चलते हैं।
और पहली पत्नी कौन होती है…? ‘हमारी आत्मा’। उसका हम ख्याल ही नहीं रखते हैं। आत्मा का हम कभी विवेचन नहीं करते कि वास्तव में आत्मा हमारी क्या कर रही है? हमें ध्यान है कि धन-दौलत होनी चाहिये, ध्यान करते हैं कि मेरा शरीर अच्छा होना चाहिये, ध्यान करते हैं कि मेरे सगे-संबंधी सब साथ में होने चाहिये, प्रत्येक जगह मेरा वर्चस्व रहे, हर जगह मेरा ही होर्डिंग लगा रहे, मेरा आधिपत्य रहे, मेरा सम्मोहन सभी पर बना रहे…, ये सब हम ख्याल रखते हैं। परन्तु हमारे अन्दर जो आत्मा है, हम उसका ध्यान नहीं रखते। इसलिये कहते हैं न -‘आत्मा अजर-अमर है।’ जो अजर अमर है उसका हम ख्याल नहीं रखते हैं बाकि जो अजर-अमर है ही नहीं, जो नाशवान है; हमारा शरीर नाशवान है, धन-दौलत है मेरे पास परन्तु वह भी नाशवान है मेरे साथ जायेगी नहीं, सगे-संबंधी मेरे साथ चलेंगे नहीं और हम उनका ही ज्यादा से ज्यादा ध्यान रखने की कोशिश करते हैं कि मेरे धन-दौलत का विस्तार हो, मेरे पैसों का क्या होगा? मेरे शरीर का क्या होगा? मुझे भी एहसास है कि मेरा शरीर वृद्धावस्था की ओर क्रियाशील हो रहा है। मृत्यु मेरे निकट आ रही है, दरवाजा खट-खटा रही है परन्तु जो हमारे भीतर की आत्मा है उसका हम कभी भी, कहीं भी ध्यान नहीं रखते और यही कारण है कि हम अपने जीवन में दुःखी अवश्य रहते हैं।
आत्मा तो अमर है ही। वह इस नाशवान शरीर के साथ ही रहती है और यह शरीर उस नष्ट न होने वाले आत्मा का केवल एक प्रकट रूप (घर) है। ये दोनों साथ रहते हुये भी अलग-अलग दिशाओं में कार्य करते हैं (शरीर मिट्टी में मिल जाता है और आत्मा आगे बढ़ जाती है। सामान्य मनुष्य अपनी आँखों से केवल नाशवान शरीर को देख पाता है और असामान्य साधक अमर आत्मा को।
हम सब मोबाईल का उपयोग करते हैं। हमारा शरीर मोबाइल के बाहरी ढांचे (Hardware) जैसा है, और आत्मा उसका सॉफ्टवेयर (Software) या सिम कार्ड है। अब यदि आपका मोबाइल फोन टूट जाये या पुराना हो जाये, तो आप नया फोन खरीद लेते हो और पुराने फोन का डेटा, ईमेल आईडी और सिम कार्ड को नए फोन में डाल देते हो। उसके बाद आपका पुराना फोन यानि शरीर तो (मर्त्य/नाशवान) कचरे में चला जायेगा, लेकिन आपका डेटा और नंबर (अमर्त्य-अमर) अनाशवान आत्मा सदैव जीवंत रहता है। ठीक इसी प्रकार हमारी आत्मा भी एक शरीर से दूसरे शरीर में अपने “कर्मोंकाडेटा”लेकरचलीजातीहै।
यदि हम इस सत्य को स्वीकार कर लें तो हमारे जीवन में ‘मृत्यु का डर’ पूरी तरह खत्म हो जायेगा। हम छोटी-छोटी शारीरिक दिक्कतों, भेदभाव, कुस्थितियों, अभाव और उम्र बढ़ने की चिंताओं से ऊपर उठकर एक शांत, साहसी और निर्भिक जीवन व्यतीत करने लगेंगे।
अमर्त्यो मर्त्येना सयोनिर्मर्त्यो अमर्त्यस्य केतुः।
ता ववसानौ चरतः विषूची न्यन्यं पश्यन्त्य न्यं न पश्यन्ति।।
ऋग्वेद जैसा महानतम वेदग्रन्थ इस श्लोक के माध्यम से आत्मा के Mechanism के बारे में स्पष्ट वर्णन करता है। जिस दिन से हम आत्मा का विचार करना शुरु कर देंगे, आत्मा का हम चिन्तन करना शुरु कर देंगे कि मेरी आत्मा क्या कह रही है? मेरा हृदय पक्ष क्या कह रहा है…? मेरा दिल क्या कह रहा है..? यह हम नित्य विचार करना शुरु कर देंगे तो जीवन में इस तरह के दुःखों का विस्तार नहीं होगा। प्रत्येक साधकों को यही विवेचन करना है कि मेरे जीवन में आ रहे दुःख का मूल कारण क्या हैं? क्या मेरे दुःख का मूल कारण मेरा शरीर है…? क्या मैं अपने शरीर का ध्यान रख रहा हूँ…? और उससे मैं जीवन में क्या प्राप्त कर रहा हूँ…?
क्या मैं जीवन में धन का संग्रहण कर रहा हूँ? यदि “हाँ”तोउसकामैंकितनाउपयोगकरपारहाहूँऔर70 वर्ष-80 वर्ष में मेरे मृत्यु के बाद उस धन-दौलत का उपयोग क्या होगा? इसका विवेचन हम कर नहीं रहे। बस जिन्दगी भर यही सोचते रहते हैं कि मेरे बच्चों का क्या होगा, मेरी पत्नी का क्या होगा, पड़ोसियों का क्या होगा, रिश्तेदारों का क्या होगा…? हम बस उन्हीं के खयालों में लगे रहते हैं कि मेरे बाद इनका क्या होगा…?
आपके तो बाप-दादा भी चले गये आपको छोड़कर, उसके बाद आपका क्या हुआ? आपके बाप-दादा के जाने से कोई फर्क पड़ा। मेरे माता-पिता के जाने से मुझे कोई फर्क पड़ा? “संसार की क्रियायें तो वैसी की वैसी ही चलती रहेंगी।”स्व-विवेकसेविचारकरनाहैकि“मुझेअपनेजीवनमेंअपना, स्वयं का उद्भव-विकास कैसे करना है…?” संसार का चिन्तन नहीं करना है, परिवार का चिन्तन नहीं करना है। आपने भी इच्छाओं को समेटा होगा कि अपने सद्गुरु की आज्ञानुसार मुझे सप्तपुरी धाम में, बद्रिनाथ धाम में, गंगोत्री धाम में पहुँचना है और आप किसी न किसी तरह से अपने लक्ष्य तक पहुँच गये। इसी तरह से अपने जीवन का भी लक्ष्य बनाना है कि मुख्य रुप से हमारे जीवन का मर्म, लक्ष्य, उद्देश्य क्या है ?
क्या जीवन का मुख्य उद्देश्य केवल खाना-पीना, आराम करना, सोना, बच्चे उत्पन्न करना, खेलना-कूदना ही है…? या ये उद्देश्य है कि मैं 60 वर्ष तक नौकरी करता रहूँ, 70 वर्ष तक व्यापार करता रहूँ फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाउं। यही उद्देश्य है ?
वास्तव में हमारे जीवन का मुख्य ध्येय, मुख्य लक्ष्य इस बात को एहसास करना है कि “मेरेजीवनकामुख्यलक्ष्य, चिन्तन-भाव क्या है?” जिस समय आपको यह एहसास होना प्रारम्भ हो जायेगा कि मेरी आत्मा क्या पुकार रही है, मेरा आत्म-चिन्तन क्या कह रहा है? उस दृष्टिकोण से जब आप विचार करना शुरु कर देंगे और निरन्तर अग्नि भाव को पूरी तरह प्रज्वलित रखेंगे तो निश्चिंत मानिये आपके जीवन में किसी प्रकार की दुःख रुपी स्थितियां नहीं रहेंगी।
अग्नि तत्व हमारे जीवन का आधार है, इसके माध्यम से ही साधक का सर्वांगीण विकास संभव हो पाता है। अग्नि तत्व का अर्थ केवल लौ जलाना नहीं है, बल्कि अपनी चेतना को उस प्रवणता की ओर उन्मुख करना भी है जो अज्ञान के अंधकार को भस्म कर देता है। यदि अग्नि तत्व शरीर में संतुलित है, तो व्याधियाँ व्याप्त नहीं होती। इसीलिये हमारे वेदों में…, विशेष रुप से ऋग्वेद में अग्नि तत्व के बारे में कहा गया है कि –
‘अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।’
अपने जीवन की दिशा को सदैव सद्गुरु के प्रकाश की ओर ही उन्मुख करना चाहिये, ताकि हम अज्ञान के अंधकार से बच सकें, नकारात्मकता से मुक्त हो सकें।
और ठीक उसी प्रकार की क्रिया हम ‘सर्व दुःख भंजन साधना’ के माध्यम से करेंगे। भंजन का अर्थ होता है- तोड़ना, नष्ट करना। पत्थर का जब भंजन होता है तो वह चूर-चूर हो जाता है उसी तरह से हमारे जीवन के दुःख हैं…. अनेकों प्रकार के संताप-दुःख हैं। अब पूछोगे-“क्योंदुःखहैं?” क्योंकि हम समाज में बैठे हैं, परिवार में बैठे हैं। इसलिये हमारे जीवन में दुःखों का विस्तार होता जा रहा है।
हम अपने सद्गुरु के सानिध्य में कम बैठते हैं। हम अपनी पूजा-अर्चना, ध्यान-चिन्तन में कम बैठते हैं। हम भगवान का पूजन-अर्चन कम करते हैं। इसलिये दुःखों का विस्तार ज्यादा हो रहा है। हम कितना मंत्र-जाप करते हैं, कितना आरती करते हैं, कितना हम दीपक धूप-बत्ती जलाते हैं, सद्गुरु का ध्यान चिन्तन करते हैं, कितना हम उनके प्रति नमन भाव रखते हैं, अच्छे Festivel को उत्सव के रुप में, मंत्र जप के रुप में, साधना के रुप में, कितनी साधनायें करते हैं…? इसी के कारण से हमारे जीवन में दुःखों का विस्तार होता जा रहा है।
और यदि हम समय रहते ही आत्मिय भाव से उनका चिन्तन करें, मंत्र जप करें, उनकी साधना करें। तो शक्ति भाव की प्राप्ति से हमारे दुःख समाप्त होंगे ही होंगे। हम Instantly चाहते हैं कि हमारा दुःख खत्म हो जाये। हम भगवान के मन्दिर में गये, गुरु के मन्दिर में गये; चढ़ावा चढ़ा दिया, दीक्षा ले लिया और हमारे दुःख समाप्त हो जाये। अरे भाई! पाप हम करते रहें, अर्नगल क्रियायें हम करते रहें और दुःख दूर करें हमारे देवी-देवता, सद्गुरु। अनर्गल कर्म, पाप मैनें किये और प्रार्थना करते हैं भगवान से, गुरु से कि हे गुरु! मुझसे ऐसा-ऐसा हो गया अब मेरे कष्ट समाप्त करो।
भजन, पूजा, साधना करने के लिये मेरे पास समय नहीं है और कुकर्म करने के लिये मेरे पास समय ही समय है। परन्तु उस भाव को कि मैं अनर्गल काम कर रहा हूँ, अनर्गल चिन्तन कर रहा हूँ, उस कर्म को करने के पश्चात मेरी आत्मा क्या कह रही है। आत्मा को तो हम मार देते हैं। जबकि हम सभी जानते हैं कि आत्मा अजर-अमर है, आत्मा कभी मरती नहीं है।
हम निरन्तर आत्मा की पुकार को सही तरीके से सुन सकें और अपनी आत्मा के पुकार के अनुसार हमारे जीवन के दुःख-संताप धीरे-धीरे न्यूनतम स्थितियों में पहुंच सके और धीरे-धीरे वह समाप्ति की ओर क्रियाशील हो सके। देह को समाप्त नहीं करना है, देह तो स्वतः ही समाप्त हो जायेगा। आप नहीं चाहते हैं कि आप वृद्धावस्था को प्राप्त हों परन्तु वह स्वयं वृद्धावस्था को प्राप्त हो रहा है। आप तो यही चाहते हैं कि मैं हर समय युवा रहूं, बस बाल्यावस्था की तरह खेलता-कूदता रहूँ। हर प्रकार से जो भी अगड़-बगड़ खाउं वो सब सुपाच्य हो जाये। चाहते बहुत कुछ हो परन्तु होता नहीं है।
यह तो हमें भी ज्ञात है कि होता नहीं है। परन्तु जो चीज संभव है उसके लिये तो क्रिया कर सकते हैं। वैसी ही क्रिया हम ‘सर्व दुःख भंजन साधना’ के रुप में सम्पन्न करेंगे। जब आपके जीवन में दुःख-कष्ट-पीड़ा हो, आपको लगे कि जीवन में बहुत विकट, कठिन समस्या आ गई है। कोई शत्रु मेरे ऊपर हाबी हो रहा है, ऑफिस में मुझे परेशानी सी हो रही है या घर में कलुषितता बहुत ज्यादा हाबी हो रहा है तो रात्रि काल में ‘सर्व दुःख भंजन मंत्र’ की नित्य एक माला ‘सर्व दुःख भंजन माला अथवा सर्व सुख प्रदायिनी माला’ से संपन्न करें।
जायफल को तीन बार अपने सिर पर घुमाकर पीछे की ओर फेंक देना है और पीछे की ओर नहीं देखना है। जिससे कि मेरी जो कलुषिततापूर्ण स्थितियां हैं, जो मेरे बाल्यावस्था में आयी हैं, युवावस्था में आयी हैं या वृद्धावस्था में आ रही हैं… तीन बार घूमाने का तात्पर्य यही है कि वे सारी कलुषिततायें दुःख भंजन के रुप में चूर-चूर सी हो जायें।
सर्व दुःख भंजन मंत्र
।। ऊँ क्रीं क्रीं अलकनंदे शिवाय मम् सर्व संताप दुःख नाशाय फट्।।
आपको जीवन में शांत रहना है। आप जितना शांत रहेंगे, जीवन में उतनी ही शान्तिपूर्ण स्थितियां बनेंगीं और जितना आप अपने दिमाग को गर्म रखेंगे, उतना ही शरीर का खून ज्यादा जलेगा। चिन्तन आपको करना है कि अपने भीतर के खून को भस्म करना है या अपने जीवन में रस की वृद्धि करनी है। अन्दर ही अन्दर खून जलाते रहेंगे तो…. कहा भी गया है कि यदि सबसे जलते ही रहेंगे तो कुछ नहीं कर पायेंगे। हमारे जीवन की जो भी अनेक-अनेक विसंगतियां हैं उन विसंगतियों को समाप्त करना है और अच्छी स्थितियां हैं उनको विस्तारित करना है। आपके जीवन में जो सर्व दुःख, रोग-संताप हैं सब चूर-चूर हो सकें, सब भंजन की तरह सद्गुरु के चरणों में विसर्जित हों सकें, समाप्त हो सकें और सदैव आपके जीवन में अष्ट सिद्धि, नव निधि युक्त जिस कामनापूर्ति की आपको चाह है, जिस रुप में आप स्वयं को बनाना चाहते हैं, वो बनते हुये अपने आप को लक्ष्मी स्वरुप निर्मित कर सकें।
संताप का तात्पर्य होता है -‘अग्नि रुपी कुस्थितियां’। जो आपको सदैव अधोगति की ओर अग्रसर कर रही हैं, जो आपको शक्तिहिन बना रही हैं, उसे संताप कहते हैं। दुःख भंजन का अर्थ होता है कि मेरे दुःख इस अलकनंदा में समाहित हों। गंगा तो तारिणी हैं अर्थात् सृष्टि से दुःख-संताप को तारने वाली हैं, तीनों लोकों का उद्धार करने वाली हैं।
देवी सुरेश्वरि भगवति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे।
शंकरमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले।।
इसलिये ही गंगा को पवित्रतम माना जाता है, उन्हें ‘अलकनन्दा’ कहा जाता है, ‘भागीरथी’ कहा जाता है, गंगा को शक्ति स्वरुपा ‘भगवती’ भी कहा जाता है। कहीं का गंगा जल हो उसका अमृतत्व उसमें सदैव व्याप्त रहता ही है। चाहे हरिद्वार का जल हो या काशी का, उस जल का चरणामृत के रुप में सेवन करते हैं, घर में स्नान करते समय पानी में एक-दो बूंद डाल कर स्नान करते हैं तो हमें ये एहसास होता है कि हमने बहुत अच्छा पुण्य लाभ प्राप्त किया है।
भगवान ने यहाँ साधना किया तभी तो यहाँ इतना भव्य, दिव्यतम तीर्थमय स्थान बना। उनको भी इस सृष्टि की वृद्धि के लिये भावना आयी तभी तो उन्होंने यहाँ साधना किया। साधनायें क्यों एकांत स्थल पर ही की जाती हैं, शांत स्थल पर ही की जाती हैं? उसके पीछे का मुख्य लॉजिक यही है। सैकड़ों ऐसे तीर्थ स्थान हैं जो ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों की चोटीयों पर निर्मित हैं और वहाँ का कुछ न कुछ लॉजीक है कि वहाँ शांत वातावरण बनता है, प्रकृति भी हमारी Support करती है और हम जो भी भजन-साधना-मंत्र जाप, पूजा-अर्चना करते हैं उसका कोटि-कोटि गुना लाभ सृष्टि में व्याप्त होकर पुनः हमें ही प्राप्त होता है। अर्थात् हम जीवन में जो भी कर्म कर रहे हैं उसका कोटि गुना लाभ हमें प्राप्त हो रहा है। इसके विपरित यदि हम गलत कार्य कर रहे हैं तो गलत परिणाम प्राप्त होता है।
आप प्राकृतिक नजारों को देखें, सर्वथा नवीन स्थलों का भ्रमण करें। स्वस्थ और सौ वर्ष की आयु प्राप्त करते हुये अपने जीवन के आध्यात्मिक लक्ष्यों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को पूर्ण कर सकें। जिससे आपके भीतर शतेन्द्रिय स्वरुप में चेतना की समस्त परतें और शक्तियां जागृत हों तथा अपने पाँच ज्ञानेंद्रियों तथा पाँच कर्मेंद्रियों के अनगिनत भेदों का ज्ञान प्राप्त कर सकें और आपके अन्दर वीर्य, तेज, आत्मबल, पराक्रम और सामर्थ्य व्याप्त हो सके। वैदिक ऋषि ‘याज्ञवल्क्य’ द्वारा रचित ‘यजुर्वेद’ के इस श्लोक के साथ मैं हृदय भाव से यही आशीर्वाद प्रदान करता हूँ –
‘भवति शतायुर्वै पुरुषः शतेन्द्रिय आयुरेवेन्द्रियं वीर्यमात्मन्धत्ते।’
परम पूजय सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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