





मनुष्य के जीवन का लक्ष्य एक ऐसी अवस्था को प्राप्त करना होता है जिसमें व्यक्ति सांसारिक आसक्ति, अहंकार, स्वार्थ और फल की ईच्छा का त्याग करके आत्मज्ञान और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सके। सन्यास का तात्पर्य केवल घर-परिवार को छोड़ देना नहीं है, अपितु इसका मूल भाव अंदर से आसक्ति और कर्तापन का त्याग है।
साधना मार्ग में सबसे बड़ा बाधा मोह, क्रोध, लोभ और वासनाओं का वह अदृश्य जाल है जो मनुष्य को भौतिकता में ही बांधकर रखता है। जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन के समस्त कर्तव्यों को निभाते हुये भी भीतर वैराग्य, आत्मसंयम, साधना और ध्यान-चिन्तन करता है, अपने परिवार, रोजगार द्वारा धन अर्जित करता है परन्तु लोभ से पूर्णतः तटस्थ रहता है और सामाजिक जिम्मेदारियों से भागता नहीं तथा घर में रहते हुये भी घर को अपने भीतर बसने नहीं देता है। इस प्रकार का साधक गृहस्थ सन्यासी कहलाता है।
इस यंत्र को विशिष्ट मंत्रों से पूर्णतः चैतन्य किया गया है, जिसे अपने साधना कक्ष में स्थापित करने से साधक का जीवन में योग वाली सुस्थितियों का निर्माण होना प्रारंभ हो जाता है। उसके दोष-विकार समाप्त होने लगते हैं। यंत्र की ऊर्जा के प्रभाव से ही धीरे-धीरे साधक का मन शांत होता है, उसका आंतरिक संघर्ष व भ्रम समाप्त सा हो जाता है। साधनाओं में सफलता की अनुभुति प्रारम्भ हो जाता है। साधक यदि पूर्ण श्रद्वा भाव से गुरु निर्देशन में ध्यान-चिन्तन व साधना सम्पन्न करे तो उसके कुण्डलिनी शक्ति में भी विस्फोट होना प्रारंभ होने लगता है।
इस यंत्र को अपने साधना कक्ष में स्थापित कर साधक निम्न मंत्र का 30 मिनट जप 21 दिनों तक करें-
।। ऊँ हुं ह्रीं हुं ऊँ।।
OM HUM HREEM HUM OM
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