





शिशु का पालन-पोषण कितना दायित्वपूर्ण काम है, इस पर हम अक्सर विचार ही नहीं करते हैं, नवजात शिशु, बालकों और युवा के शरीर में बहुत अतंर होता है, वह न तो बोल सकता है और न ही अपनी तकलीफ को व्यक्त कर सकता है, गर्भ के बाहर आते ही शिशु पूर्ण पराधीन हो जाता है, वह केवल पीड़ा में रोने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता, ऐसे में शिशु की देखभाल करना अत्यधिक सूझबूझ का काम है, यह तभी संभव हो सकता है जब मां शिशु के पालन-पोषण करने के नियमों से पूरी तरह से अवगत हो, यही कारण है कि शिशु के पालन-पोषण को अत्यधिक महत्व देते हुए अष्टांग आयुर्वेद में ‘कौमारभृत्य’ नामक अंग को प्रमुखता दी गयी है, इसमें गर्भाधान से लेकर शिशु पालन-पोषण, बच्चों के रोग, स्तन्यशोधन, धात्री चिकित्सा, रोगोपचार आदि का विशद वर्णन किया गया है- सुश्रुत संहिता में उल्लेख है-
जन्म के बाद शिशु का पालन-पोषण करने वाली धाय (आया) के गुण-दोष का पता लगाना, शिशु को दिए जाने वाले आहार, जैसे-दूध, उसके दोष और दूध को शुद्ध करने के उपाय, दूषित दूध से उत्पन्न होने वाले रोग और उनका शमन, ग्रहों से उत्पन्न होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा क्या है, इसके बारे में जानना आदि कौमारभृत्य के अंतर्गत आते हैं, अधिकतर देखने में आता है कि आजकल कुछ बच्चें थोड़ी-सी असावधानी के कारण शीघ्र ही मृत्यु के गोद में समा जाते हैं- इसका एक मात्र कारण है, मां का पालन-पोषण करने के नियमों से अनजान होना बहुत ही काम लोगों को, विशेषकर गांव की माताओं को शिशु-पालन संबंधी बातों का ज्ञान होता है, जबकि हर मां बनने वाली स्त्री जिस तरह शिशु के लिए लालायित रहती है, उसी तरह उसके पालन-पोषण के लिए नहीं।
अतः शिशु स्वास्थ्य की रक्षा के उपायों पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है- गर्भिणी परिचर्या से लेकर शिशु के रोग निदान, उपचार की जानकारी, माता-पिता व अभिभावकों को पता होना जरूरी है, क्योंकि विपरीत ढंग, तामसिक माता-पिता का खान-पान, रहन-सहन, माता का शिशु को दुग्धपान तथा बाहरी दुधपान एवं भौतिक कुरीतियों के कारण शिशु के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
शिशु का ध्यान रखना अति आवश्यक होता है, क्योंकि प्रसव के समय शिशु को बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं अतः बालक कुछ मूर्च्छित-सा होता है तथा पूरा श्वास भी नहीं ले पाता है- उत्पन्न होने के बाद शिशु स्वयं रोता है- यह रोना उसके लिए बहुत अच्छा एवं आवश्यक होता है, क्योंकि इस रोने के द्वारा वह प्रथम बार सांस लेता है तथा उसके फेफडों में हवा जाती है- यदि बालक स्वयं न रोये तथा होश में न आए तो उसे होश में लाने तथा डराकर रूलाने का प्रयास करना चाहिए।
नवजात शिशु में कई दिनों तक उष्णता का नियंत्रण ठीक तरह से नहीं होता है जिसके कारण उसको सर्दी-जुकाम आदि बहुत जल्दी होते हैं, ऐसी स्थिति में यदि सावधानी न रखी जाए तो ये अत्यंत घातक परिणाम तक उत्पन्न कर देते हैं इसी प्रकार उष्णता का नियंत्रण न होने से उनके तापमान में वृद्धि भी बहुत जल्दी हो जाती है।
शिशु आठ मास का होने पर सबसे आवश्यक उसका भोजन (माता का दूध) और निद्रा है- शिशु जब रोये, तो मां का दूध पान कराने की प्रथा अच्छी नही हैं, ऐसे समय में चम्मच भर पानी अथवा अजवायन के अर्क में मधु मिलाकर दिया जा सकता है, अधिक दूध से बालक को अजीर्ण वमन, अतिसार (दस्त) आदि उपद्रव हो सकते हैं- अतः दूध पिलाने का समय निश्चित होना चाहिए यदि माता का दूध न हो तो यथोक्त गुणवाली धात्री (आया) का दूध या कृत्रिम दूध भी आवश्यकता अनुसार दिया जा सकता है। समय-समय पर बच्चे को दूध पिलाने से वह स्वस्थ, प्रसन्न और निरोगी भी रहता है।
शिशु को औढ़ने-बिछाने के कपड़े पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए, छोटे बच्चे बिछौने को मल-मूत्र से भिगो देते हैं, इसके लिए एक मोटा बिछावन बिछाकर उसके ऊपर रबर की चादर डालकर उसके ऊपर एक मोटा और नर्म कपड़ा बिछाकर बच्चे को सुलाना चाहिए, भीगने पर इसे बदलते रहना चाहिए ओढ़ने-बिछौने को नित्य धूप में डालना चाहिए, ताकि उनकी गंदगी दूर होती रहें-
पहनने के कपड़े ढीले हों- लेकिन इतने ढीले नहीं कि बच्चा हाथ-पैर उलझाकर गिर पडें छाती किसी भी दशा में कसी नहीं होनी चाहिए छोटे होते ही कपड़ों को बदल देना चाहिए।
पालन-पोषण के उपयोगी सुझाव
इसका कारण यह है कि स्तनपान कराने वाली मां और उसके शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ता बहुत मजबूत होता है। इसके अलावा मां के दूध में कई प्रकार के प्राकृतिक रसायन भी मौजूद होते हैं।
बच्चों के रोगों,विशेषकर छोटे बच्चें के रोगों का पता लगाना मुश्किल काम होता है, बच्चों की अवस्था के अनुसार बालकों को तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है-
क्षीराद- नवजात शिशु जन्मकाल से 9 महीने तक अर्थात दूध पर पलने वाले शिशु।
क्षीरअन्नाद- दुध और अन्न् पर पलने वाले बालक 2 वर्ष से 10 वर्ष तक। अन्नाद- अन्न से पलने वाले बालक 10 से 18 वर्ष तक इनमें क्षीराद बालकों के रोगों का निदान करना कठिन होता है, क्योंकि शिशु जब नवजात होता है वह बोल नहीं सकता, उस काल में शिशु के रोग का निदान करना चिकित्सक या दादी मां के अनुभव पर ही सफल चिकित्सा संभव हैं, एक वर्ष बाद शिशु चलना, बोलना सीख लेता है, एक साल के कम उम्र वाले बच्चे रोकर अपनी तकलीफ को प्रकट करते हैं, कश्यप संहिता में कुछ बाल रोगों के लक्षण निम्न प्रकार है।
सिरदर्द होने पर शिशु अपने सिर को बार-बार हिलाता है, आंखें बंद करना, रात को सोते समय चिल्लाना, नींद का न आना आदि भी शिशु सिरदर्द के प्रमुख लक्षण है।
मुख रोग होने पर शिशु के मुख से लार टपकती है, तथा दूध पीने पर उल्टी कर देता है।
जब शिशु के पेट में दर्द होता है, तो वह बार-बार रोता है, दूध ठीक से नहीं पीता है, तथा चेहरे पर पसीना आता है।
बार-बार अंगों को सिकोड़ना, जंभाई लेना, मां से एकाएक चिपक जाना, खांसी, दूध न पीना, सिर गर्म होना आदि लक्षणों के होने पर समझ लेना चाहिए कि बच्चे को बुखार है।
इसी तरह बच्चों के दांत निकलते समय सिरदर्द, अंगदर्द, ज्वर, दस्त, उदरशूल, खांसी, दूध व अन्न सेवन में अरूचि आदि लक्षण होते हैं।
शिशु की मालिश बहुत ही सावधानीपूर्ण करनी चाहिए। ऐसा करने से बच्चों का शारीरिक विकास होता है और उनकी हडि़यां मजबुत बनती हैं। और यह उन्हें सोने के लिए और रक्त परिसंचरण और पाचन में सुधार करने में मदद करता है। अपने हाथों पर थोड़ी मात्रा में बेबी ऑयल या लोशन, जैतून का तेल, बादाम का तेल, इस्तेमाल करें इसके बाद धीरे से उसके शरीर की मालिश करें व उससे बात करें। बच्चे की मालिश उसके स्नान से पहले करें।
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