





भारतीय सनातन संस्कृति में भगवान विष्णु के दस अवतारों की अवधारणा है, जिसे ‘दशावतार’ कहा जाता है तथा उनका अवतरित होना अभी शेष है। इन दशावतारों में अंतिम अवतार ‘कल्कि अवतार’ के रूप में जाना जाता है, जो कलियुग के अंत में प्रकट होंगे। कल्कि जयंती उस दिवस को समर्पित है जब यह माना जाता है कि भगवान कल्कि का जन्म होगा तथा उनकी ऊर्जा इस धरती पर प्रकट होगी। यह पर्व हर वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है।
यह मानव विकास यात्रा के अंतिम पड़ाव का अवतार है। जो समस्त मानव जीवन को एक साथ लाएगा और संपूर्ण मानव जाति के लिए कार्य करेगा और विकास की यात्रा को पूर्ण विराम लगाएगा। मनुष्य को उनके जीवन का वास्तविक उद्देश्य से परिचय करवाएगा। भागवत के बारहवें स्कंध के द्वितीय अध्याय में भगवान विष्णु के कल्कि अवतार का विस्तृत वर्णन है। उसके अनुसार श्री विष्णु सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर जब गुरू, सूर्य एवं चन्द्रमा एक साथ पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करेंगे तब कल्कि के रूप में अवतरित होंगे। उनके जन्म स्थान का उल्लेख भी एक श्लोक में मिलता है-
सम्भल ग्राम मुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मन।
भगवान विष्णुयशस: कल्कि प्रादुर्भाविष्यति।।
अर्थात् सम्भल गांव में विष्णुयश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के पुत्र के रूप में भगवान कल्कि का जन्म होगा। पुराणों में यह भी वर्णित है कि इनकी माता का नाम सुमति होगा, इनके माता-पिता भगवान विष्णु के परम भक्त एवं वेदों के ज्ञाता होंगे। इनके सभी भाई देवताओं के अवतार होंगे और धर्म की स्थापना में इन्हें सहयोग देंगे। भगवान विष्णु के श्री कल्कि अवतार 64 कलाओं से युक्त होंगे। इनके गुरू चिरंजीवि परशुराम जी होंगे जो वर्तमान में महेन्द्र पर्वत पर ध्यान मग्न हैं। गुरू परशुराम जी भगवान कल्कि को युद्ध कलाओं में निपुण बनायेंगें तथा इनके निर्देश पर ही कल्कि भगवान शिव की तपस्या कर दिव्य शक्तियों को प्राप्त कर अधर्म का अंत करेंगे।
कई जगहों पर एक कथा का वर्णन भी आता है कि स्वयंभू मनु ने गोमती नदी के तट पर नैमिषारण्य में भगवान विष्णु को तीन जन्मों में अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करने का सौभाग्य पाने के लिये तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने स्वयंभू मनु से प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान दिया कि वह स्वयंभू मनु के पुत्र के रूप में भगवान राम, कृष्ण और कल्कि के रूप में प्रकट होंगे। इस प्रकार, स्वयंभू मनु दशरथ, वासुदेव और फिर विष्णुयश के रूप में प्रकट होंगे। पद्म पुराण के अनुसार – ‘भगवान विष्णु स्वीकार करते हैं कि वह कलयुग में जन्म लेंगे।’
वेदों, पुराणों जैसे कल्कि पुराण, भविष्य पुराण, विष्णु पुराण, भगवत गीता आदि कई ग्रंथों में कलियुग को सबसे अंधकारमय काल के लक्षण बताये गये हैं। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना भूल जायेगा, पुरुष स्त्री का सम्मान करना भूल जायेगा तथा स्त्री पुरुष की तरह व्यवहार करेगी, पुरुष प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करते हुये पशु मांस का भोजन करने लगेगा, पृथ्वी, वायु और जल में प्रदूषण अपने चरम सीमा पर होगा जिससे मानवता के कई नियम टूटेंगे, सभी अच्छे कार्यों का दमन होगा और बुरे कार्यों का निःसंकोच पालन किया जायेगा, आदि।
भगवान कल्कि हिन्दु धर्म के वे पहले देवता व भगवान विष्णु के ऐसे पहले अवतार हैं जिन्हें अवतरित होने से पहले ही पूजा जाने लगा है। पुराणों में कल्कि अवतार के कलियुग के अंतिम चरण में आने की भविष्यवाणी की गई है। कल्कि अवतार कलियुग व सतयुग के संधिकाल में होगा। मत्स्य पुराण के द्वापर और कलियुग के वर्णन में कल्कि के होने का वर्णन मिलता है।
कल्कि का मुख्य कार्य संसार में अच्छाई को पुनः स्थापित करना है। वे बुद्ध के बाद आयेंगे, जिन्होंने लोगों को जीवन जीने का सही मार्ग सिखाया। कल्कि का कार्य उन लोगों के विरुद्ध कार्य करना है जिन्होंने अपना व्यवहार नहीं बदला। कलियुग, चारों युगों में अंतिम होने के कारण, वह युग है जिसमें मानवीय मूल्य अपने चरम पर पहुँच जाते हैं। जब यह निम्नतम बिंदु आता है, तब विष्णु कल्कि के रूप में अवतार लेकर संसार को स्वर्ण युग में पुनर्स्थापित करते हैं। भगवत पुराण, विष्णु पुराण और अग्नि पुराण जैसे ग्रंथों में वर्णन है कि जब धरती पर अधर्म, अन्याय, भ्रष्टाचार, पाप और हिंसा अत्यधिक बढ़ जायेगा, तब भगवान विष्णु अपने दसवें और अंतिम अवतार ‘‘कल्कि’’ के रूप में प्रकट होंगे। वे एक श्वेत अश्व (घोड़े) पर सवार होकर, हाथ में तलवार लिये अधर्म का नाश करेंगे और सतयुग की स्थापना करेंगे।
कल्कि जयंती एक आध्यात्मिक चेतना का पर्व है। यह मनुष्य को यह संदेश देती है कि अधर्म का प्रभाव अत्यधिक प्रबल क्यों न हो परन्तु धर्म की रक्षा के लिये ईश्वर सदैव उपस्थित रहेंगे तथा शत्रुओं का विनाश कर सृष्टि में एक आदर्श समाज की स्थापना करेंगे।
भगवान कल्कि का विवाह पद्मा के साथ होने का वर्णन भी मिलता है। पद्मा देवी लक्ष्मी की अवतार होंगी और उनका जन्म सिंहल देश (श्रीलंका) में राजा बृहद्रथ की पत्नी कौमुदी के गर्भ से होगा।
भगवान कल्कि के नौ गुरु हैं। उनके नाम नीचे दिए गए हैं:
(i) परशुराम (ii) कृपाचार्य (iii) वशिष्ठ (iv) व्यास (v) धौम्य (vi) अकृतव्रण (vii) अश्वत्थामा (viii) मधुच्छंद और (ix) मंदपाल।
भगवान कल्कि भी भगवान कृष्ण और भगवान बुद्ध की तरह एक ‘मौन अवतार’ ही हैं। यही कारण है कि लोगों को भगवान कल्कि के आगमन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराण में यह भविष्यवाणी की है कि भगवान कल्कि कलियुग में गुप्त रहेंगे।
भगवान कल्कि का पहला युद्ध कीकटपुर में होगा। हालाँकि कीकटपुर की पहचान अभी तक अनिश्चित है, लेकिन वहाँ के लोग ईश्वर की पूजा नहीं करेंगे, पुनर्जन्म (परलोक) में विश्वास नहीं करेंगे और न ही वे वेदों, आत्मा या कुल आदि को मानेंगे। वह बर्बरों, म्लेच्छों, शकों, कंबोजों, यवनों, किरातों और पुलिंदों आदि के साथ युद्ध करेंगे। अंत में, वह वल्लत नगर के राजा शशिध्वज के साथ युद्ध करेंगे। युद्ध के समय वह ‘देवदत्त’ नामक सफेद घोड़े पर सवार होंगे और उनके पास ‘रत्नसारू’ तलवार होगी।
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