





हर तीन वर्ष के अंतराल में पड़ने वाले अतिरिक्त माह को शास्त्रों में ‘पुरूषोत्तम मास’ तथा अधिक मास कहा गया है। कालान्तर में इसे ‘मल मास’ अथवा अशुद्ध मास या ‘मलिमाछ’ के रूप में प्रचारित कर दिया गया। यह कहा जाने लगा कि इस मास में कोई शुभ, मांगलिक, विवाह, गृह प्रवेश, भवन निर्माण इत्यादि नहीं हो सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार इसे पुरूषोत्तम मास कहा गया है और पुरूषोत्तम भगवान विष्णु का स्वरूप है। इस मास में दान, धर्म, तीर्थ यात्रा, उपासना का विशेष महत्व है। वास्तव में यह तो विष्णु और लक्ष्मी की साधना करने का उत्तम मास है।
प्राचीन शास्त्र विलुप्त होते जा रहे हैं और उनके स्थान पर एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी का कही गई बातों को आधार माना जाने लगा है। पिछले पांच-छः सौ वर्षों में शास्त्रों की ओर ध्यान ना देकर लोक कथाओं के रूप में जो परिपाटी चली आ रही है उस पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा तथा अर्द्ध ज्ञान से युक्त तथाकथित पड़ितों ने जो कह दिया वही सामाजिक सत्य माना जाने लगा। हमारे अनुभव में यह आया है कि पिछले पांच-छः सौ वर्षों में हिन्दू धर्म में भय की भावना उत्पन्न कर पूजा दान इत्यादि पर बल दिया जाने लगा। इस मास में शुभ कार्य हो सकता है, इस मास में शुभ कार्य नहीं हो सकता, इस मास में दान विशेष करना चाहिए।
इस प्रकार की कई भ्रंतियां फैलती गई और जब धर्म में भय के आधार पर कोई कार्य होता है तो मनुष्य वह कार्य अपनी इच्छा से नहीं करता। वह उसे एक परिपाटी मानकर सम्पन्न करने का प्रयास करता है और जब बिना भावना के मनःशक्ति के अभाव में कार्य किया जाता है तो वह पूजा साधना भी सफल नहीं होती।
ज्यादातर विधानों में यह वर्णन आता है कि अमुक पूजा नहीं करोगे तो देवता नाराज हो जायेंगे। यह बात सुनने में ही विचित्र लगती है। देवताओं का कार्य मनुष्य के जीवन में उन्नति देना है, मनुष्य शरीर में देवताओं का निवास है और कोई टोना-टोटका रूपी पूजा नहीं की गई तो देवता, ईश्वर कैसे नाराज हो सकते हैं?
जिस प्रकार हर दिन सूर्य उदय होता है उसी प्रकार हमारे जीवन में भी प्रत्येक दिन एक नया अध्याय प्रारम्भ होता है। प्रत्येक दिन कार्य करने के लिये शुभ है, हमारे भीतर भावना तीव्र एवं बलवती होनी चाहिये जिससे हम जीवन में निरन्तर निर्माण की ओर अग्रसर हो सकें। यही सद्गुरूदेव जी का आशीर्वाद है।
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में चंद्र पंचांग की प्रमुखता है और चंद्र पंचांग में हर तीन वर्ष में एक मास अधिक हो जाता है। जिस प्रकार चन्द्र मास में अधिक मास होता है उसी प्रकार चंद्र मास में कई बार एक मास कम भी हो जाता है। जिसमें केवल 11 महीने ही होते हैं। लेकिन ऐसा चंद्र वर्ष जिसमें केवल 11 महीने हों अपने आप में अनोखी घटना की जाती है यह घटना कही जाती है यह घटना 140 साल में अथवा 190 वर्ष में एक बार घटित होती है। लेकिन अधिक मास हर तीसरे वर्ष आ जाता है क्योंकि सामान्यतः 12 महीनों से एक मास बढ़ जाता है। इसलिये इसे अधिक मास कहा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस मास में सूर्य संक्रान्ति नहीं आती वह मास अधिक बन जाता है। वशिष्ट सिद्धांत में स्पष्ट किया गया है कि अधिक मास प्रत्येक 32 महीने 16 दिन 11 घटी (1 घटी- 24 मिनट के बराबर तथा 60 घटी 24 घंटों के बराबर होती है।) से प्रारम्भ होता है। सूर्य विज्ञान के सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और 6 घंटे का होता है और चंद्र वर्ष 354 दिन का होता है। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि हमारी पृथ्वी 365 दिन और 6 मिनट में सूर्य की 1 परिक्रमा पूरी कर लेती है। इस प्रकार सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष में 11 दिन 1 घंटा 31 मिनट 12 सैकेण्ड का अंतर होता है। प्रति वर्ष यह अंतर बढ़ता जाता है और इस प्रकार करीब 3 वर्ष में (32-33 महीने) में एक महीने के बराबर हो जाता है।
यह तो सब जानते हैं कि चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है तथा पृथ्वी की परिक्रमा 27.3 दिन में पूरी करता है। पृथ्वी 29.79 कि.मी. प्रति सैकण्ड की गति से चलती हुई 365.2422 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूर्ण करती हैं।
इसका मतलब है कि एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक चंद्रमा को 2.2 दिनों तक अतिरिक्त भ्रमण करना पड़ता है। इसका कारण है कि पृथ्वी अपनी वक्र कक्षा में सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है। चन्द्रमा धरती के चारों तरफ एक पूर्ण कक्षा भ्रमण 27.3 दिनो में करता है। परन्तु धरती और सूर्य के साथ सीधी रेखा में आकर पूर्ण चन्द्रमा बनाने के लिये चंद्रमा को 29.531 दिन लगते हैं। एक चन्द्र महीने में 29.531 दिन होते हैं जिससे 12 महीनों के चन्द्र वर्ष में 354.372 दिन होते हैं। जबकि सूर्य वर्ष में 365.2422 दिन होते हैं। इस प्रकार प्रति चन्द्र वर्ष एवं सूर्य वर्ष के बीच करीब 10.79 दिनों का अंतर होता है।
इसीलिये इस अंतर को पूर्ण करने के लिये करीब 32-33 महीनों में ऋषियों ने एक अतिरिक्त मास की गणना की और वह अधिक मास कहलाता है।
महर्षि हमाद्रि के अनुसार अधिक मास में वह क्षमता होती है कि मनुष्य उस समय पूजा, साधना, तपस्या इत्यादि सम्पन्न कर अपने पूर्व जन्म कृत दोषों का निवारण कर सकता है तथा दान, दया, त्याग, तप इत्यादि द्वारा जीवन में शारीरिक एवं मानसिक शुद्धता ला सकता है। पुराणों में वर्णित एक कथा के अनुसार राजा नहुष ने मल मास में साधना सम्पन्न की जिससे वे सभी स्थितियों से मुक्त हो गये और देवताओं के अधिपति इन्द्र का सिंहासन प्राप्त कर लिया।
देवी भागवत के अनुसार मल मास में विशिष्ट पूजा, धार्मिक कार्य, साधना इत्यादि करने से विशेष फल प्राप्त होता ही है। देवी भागवत में तो यहां तक लिखा है कि जिस प्रकार एक अणु जितना बीज एक विशाल वृक्ष को बना सकता है उसी प्रकार अधिक मास में किये गये थोड़े शुभ कार्य पूजा साधना भी महान् फल देते हैं। जैसा कि ऊपर लिखा है कि अधिक मास को पुरूषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस सम्बन्ध में भी पुराणों में एक अत्यन्त सुन्दर कथा आती है।
चन्द्र वर्ष के अनुसार प्रत्येक वर्ष में 12 महीने होते हैं तथा प्रत्येक महीना एक देव को समर्पित है। लेकिन चंद्र वर्ष और सूर्य वर्ष की आपस में गति के संयोजन ना होने के कारण से ऋषि मुनियों ने गणना की और एक अधिक मास का निर्माण किया। प्रत्येक महीने के एक अधिपति ब्रह्मा ने निश्चित कर लिये। लेकिन अधिक मास को कोई देव वरण करने हेतु तैयार नहीं हुआ क्योंकि यह हर तीन वर्ष में एक बार आता है। इस पर अधिक मास पुरूष रूप में दु:खी एवं सन्तप्त होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचा और कहा कि मुझे किसी भी देवता से संयुक्त नहीं किया गया है और मल मास, मलिमुच्छा के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन सब स्थितियों से मैं अत्यन्त दु:खी और संतप्त हूं तथा आपकी शरण में आया हूं। आप ही जगत के पालक और सृष्टि को चलाने वाले हैं। आपसे निवेदन है कि मेरे लिये कुछ उचित व्यवस्था करें।
इस स्थिति को देख कर भगवान विष्णु को बहुत दया आई और कहा कि आज से अधिक मास का अधिपति मैं स्वयं होऊंगा और यह मास पुरूषोत्तम मास कहा जायेगा। इस मास की विशेषता अन्य सभी महीनों से अधिक होगी। तथा इस मास में अच्छे कार्य सम्पन्न कर विशेष सिद्धि प्राप्त की जा सकेगी। पुरूषोत्तम मास के सम्बन्ध में तो एक पूरा ग्रंथ ही लिखा गया है जिसे पुरूषोत्तम ग्रंथ कहा जाता है जिसमें इस माह की विशेष व्याख्या धार्मिक, आध्यात्मिक महत्व का विवेचन किया गया है।
भविष्योत्तर पुराण में यह विवेचन आया है कि पुरूषोत्तम मास में उपवास अथवा व्रत शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन प्रारम्भ करना चाहिये और कृष्ण पक्ष के अन्तिम दिन इसे पूर्ण करना चाहिये।
पुराणों में तो अधिक मास के बारे में अत्यधिक विस्तार से विवेचन आया है। पुराणों में लिखा है कि अधिक मास में पूजा करने से, मंत्र जप करने से, इच्छा रहित शुद्ध भाव से क्रिया करने से, श्रेष्ठ ग्रंथों का अध्ययन करने से फल प्राप्ति अवश्य ही होती है। अधिक मास विष्णु एवं लक्ष्मी की पूजा का मास है। इस मास में ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर राधा कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण का षोडशोपचार पूजन सम्पन्न करना चाहिये। यदि नजदीक में कोई मंदिर है तो वहां जाकर विभिन्न देवताओं की पूजा साधना अवश्य सम्पन्न करनी चाहिये। अधिक मास में सात्विक भोजन, शाकाहारी भोजन, दूध, फल, वनस्पत्तियों, फलाहार, नारियल इत्यादि का सेवन करना चाहिये।
भविष्योत्तर पुराण में लिखा है कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि अधिक मास में केवल भगवत् साधना करने के उद्देश्य से की साधनाओं से लौकिक एवं परालौकिक दोनों ही फल प्राप्त होते हैं। मनुष्य अपने जीवन में लौकिक दृष्टि से विशेष सफलता प्राप्त करता है तथा अपघात, दुर्घटना, आकस्मिक मृत्यु, दुःख, चिंता, दुर्भाग्य का निवारण होता है।
जैसा कि इस बार श्रावण रूप में मास 19 वर्षों के बाद आया है। इस मास में साधकों द्वारा लक्ष्मी पूजा, विष्णु पूजा, कृष्ण पूजा अवश्य ही सम्पन्न की जानी चाहिये।
विशेष- भ्रांति एक ऐसा तत्व है जो मनुष्य के जीवन में तत्काल प्रभाव डालती है और इन्हीं भ्रान्तियों के कारण मनुष्य ने मलमास को अनुचित मान लिया है वास्तव में तो यह ग्रहों की गति का सामंजस्य है तथा चंद्र मास है। अतः इस मास का लाभ अधिक से अधिक उठायें। और अपने जीवन को उन्नति के पथ पर अग्रसर करें।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,