





समस्त विश्व के इतिहास में शायद ही कभी ऐसा व्यक्तित्व पैदा हुआ हो, जो एक ओर तो पूर्ण प्रेमी था, पूर्ण भौतिक जीवन जीने वाला राजा था, तो दूसरी तरफ उच्चकोटि का योगी भी था, ब्रह्ममय था, जिसके चरणों में श्रेष्ठतम ऋषि- मुनि भी बैठ कर गद्-गद् हो उठते थे।
अथवा
क्या ये शब्द कोई सामान्य व्यक्ति बोल सकता है? क्या इस तरह के चैलेंज युक्त शब्द कोई बोलने की हिम्मत कर सकता है? नहीं।
यह तो केवल वही कह सकता, जिसके सीने में एक ज्वाला हो, एक चिन्गारी हो, जो पूर्ण पुरुष हो एवं जिसने ब्रह्म को पूरी तरह अपने अन्दर आत्मसात किया हो। परन्तु कृष्ण इस श्रेष्ठ भाव-भूमि पर पहुंचे कैसे? यह प्रश्न आज तब सबके मानस पर अंकित है, पर फिर भी इसका उत्तर प्राप्त नहीं हो सका है——।
द्वापर युग के सूत्रधार कृष्ण का जब उपनयन संस्कार किया गया, तो उनके कुलगुरु महर्षि गर्ग इस विषय पर चिन्तित थे, कि कृष्ण को किस गुरु के पास भेजा जाये, जिससे कि वे अनुपम बन सकें। हालांकि वे स्वयं उच्चकोटि के योगी थे, परन्तु वे इस बात से भी अनभिज्ञ न थे, कि यदि कृष्ण को युगपुरुष बनाना है, यदि कृष्ण को इतिहास पुरुष बनाना है, यदि कृष्ण को सोलह कला पूर्ण व्यक्तित्व बनाना है, तो उन्हें मुझसे भी श्रेष्ठ गुरु के पास जाना होगा और वे जानते थे, कि उस काल में महर्षि सांदीपन, जो उज्जैन के पास रहते थे, सबसे अधिक सामर्थ्यवान और योग्य गुरु थे। अतः कृष्ण को सांदीपन ऋषि के पास ही शिक्षा-दीक्षा के लिए भेजा गया।
और यहीं से शुरु हुआ इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय शिष्य को एक श्रेष्ठ गुरु मिल गया था, तो गुरु को भी योग्यतम शिष्य प्राप्त हुआ जहां गुरु ने कुछ सिखाने में न्यूनता नहीं बरती, शिष्य ने भी ग्रहण करने में शिथिलता नहीं दिखाई और परिणाम यह हुआ, कि वह सामान्य सा बालक उस उच्चतम शिखर पर पहुंच गया, कि आज करोड़ों लोगों के द्वारा वह पूजा जाता है, हजारों मंदिरों में उसकी आरती होती है।
यह सब सम्भव हो सका उन अद्वितीय, गोपनीय साधनाओं से, जो सांदीपन ने कृष्ण को सम्पन्न कराईं। उन्होंने कठिन से कठिन परीक्षाओं के द्वारा कृष्ण को कई बार परखा, पर हर बार कृष्ण कसौटी पर खरे उतरे। सांदीपन ने उन्हें ऐसी दिव्य सिद्धियां प्रदान कीं, जिसके द्वारा कृष्ण कभी भी जीवन में पराजित नहीं हुए, हमेशा चिरयौवनवान और सम्मोहक बने रहे, पूर्ण सम्पन्नता एवं वैभव प्राप्त कर सके और अंत में समस्त विश्व में जगद्गुरु के नाम से विख्यात हुए।
हालांकि ये साधनायें अत्यन्त गोपनीय हैं एवं ग्रंथों के अनुसार तो इन्हें अपने पुत्र को भी नहीं देना चाहिए, फिर भी गुरु-शिष्य परम्परा के द्वारा आज भी ये साधनाएं सुरक्षित हैं। सर्वजन हिताय के उद्देश्य से ये साधनाएं पत्रिका में प्रकाशित की जा रहीं हैं। आप सबको इन अत्यन्त दुर्लभ साधनाओं का लाभ उठाना चाहिए और भूल कर भी किसी दुर्जन व्यक्ति को इन्हें नहीं बताना चाहिए। साधना तो व्यक्ति एवं समाज के योग-क्षेम के लिए होती है, अतः इनका उपयोग अच्छे कार्यों के लिए ही होना चाहिए।
यह साधना अत्यन्त गुप्त है और शायद ही किसी योगी को इसका ज्ञान हो। श्रीयंत्र स्थायी लक्ष्मी के लिए श्रेष्ठ माना जाता है, पारदेश्वरी लक्ष्मी भी इस विषय में अत्यन्त लाभकारी है, परन्तु अक्षणा साधना तो इनका भी सिरमौर है, क्योंकि जो व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न कर लेता है, तो चाहे उसने दरिद्र के घर में ही क्यों न जन्म लिया हो, चाहे ब्रह्मा ने उसके भाग्य में सात जन्मों के लिए दरिद्रता ही क्यों न लिख दी हो, वह जीवन में तीव्र गति से उन्नति की ओर गतिशील होता जाता है, धन स्वतः ही उसकी ओर खिंचा आता है और घर में षोड़श लक्ष्मी चिर निवास करती है।
सांदीपन ने यह साधना सम्पन्न कराने से पूर्व कृष्ण को कहा था- हे कृष्ण! इस पृथ्वी पर धनवान व्यक्ति ही जीवित और पूजनीय है, दरिद्र व्यक्ति तो अपनों के द्वारा भी प्रताडि़त एक मृतप्राय व्यक्ति की भांति होता है, इसलिए कृष्ण! धनवान बनो।
इस साधना को सम्पन्न करने के बाद कृष्ण तीनों लोकों के अधिपति बन सके और उस युग में उनके समान सम्पत्तिवान शायद ही कोई व्यक्ति हुआ हो।
यह साधना 03 सितम्बर प्रातः 7 बजे स्नान कर पीत वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख कर पीले आसन पर बैठ सम्पन्न करनी चाहिए। सामने पीले वस्त्र से ढ़के बाजोट पर कमला महायंत्र स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन करना चाहिए। उसके उपरान्त साधक को धनवर्षिणी माला से निम्न मंत्र का 5 माला मंत्र जप सम्पन्न करें।
यह साधना तीन दिनों की है, जिसके उपरान्त व्यक्ति को 13 दिन तक यंत्र, माला को पूजा स्थान में रख देना चाहिए, फिर 13 दिन के बाद माला व यंत्र को नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए।
एक बार कृष्ण गुरु सांदीपन के चरण दबा रहे थे, कि अचानक जंगल की ओर से एक हिरण दौड़ता हुआ उस ओर आ पहुंचा। उसी के पीछे-पीछे एक विकराल व्याघ्र था, जिसके शरीर में साक्षात यम ही मानों उस हिरण को लीलने के लिए व्यग्र हो। परन्तु अचानक यह क्या——गुरु सांदीपन के प्रभाव क्षेत्र अर्थात् उनके आश्रम में आते ही व्याघ्र अपनी हिंसा भूल गया, हिरण अपना भय भूल गया और वे दोनों वैर-भाव भूल कर परस्पर क्रीडा करने लगे। कृष्ण तो मानो कुछ क्षण के लिए स्तब्ध हो देखते ही रह गए। पूछने पर गुरु सांदीपन ने बताया, यह सब सूर्य सम्मोहन साधना से ही सम्भव हो सका है। किसी भी जीव को उसकी प्रकृति के विपरीत कर देना कोई सरल कार्य नहीं है, अपितु दुष्कर कार्य है।
फिर उन्होंने कहा- कृष्ण! तुम्हें अपने जीवन में अनेक विपरीत परिस्थितियों से गुजरना पड़ेगा, जब समस्त लोग तुम्हारे खिलाफ हो जायेंगे, अतः यह साधना तुम्हें सम्पन्न करनी ही है, जिससे कि तुम सबको अपने अनुकूल बनाने में समर्थ हो सको।
इसके बाद सांदीपन ने कृष्ण को यह साधना सम्पन्न कराई, जिसके बलबूते पर जीवन्त वस्तुएं तो क्या, जड़ वस्तुएं भी उनके आकर्षण पाश में बंध जाती थीं। एक बार जो उन्हें देखता था, बस देखता ही रह जाता था और कभी उनकी इच्छा के विपरीत कार्य नहीं कर पाता था। गोपियां तो कृष्ण की दीवानी ही हो गई थीं।
यह साधना 02 सितम्बर रविवार को रात्रि दस बजे के उपरान्त स्नान कर सफेद वस्त्र धारण कर सफेद आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठ सम्पन्न करनी चाहिए। फिर सामने सफेद वस्त्र से ढ़के बाजोट पर क्लीं शक्ति यंत्र स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन करें और उसके पास ही माणिक माला स्थापित कर उसका भी पूजन कर घी का दीपक लगायें। फिर माणिक माला से निम्न मंत्र का 11 माला मंत्र जप करें।
साधना समाप्ति पर यंत्र और माला को किसी नदी व तालाब में विसर्जित कर दें। साधना सम्पन्न करने के दूसरे दिन इसी मंत्र के जाप के साथ उगते सूर्य को अर्घ्यं अर्पित करना चाहिए।
ऐसा करने से साधना पूर्ण होती है और साधक को अपने व्यक्तित्व में आश्चर्यजनक परिवर्तन अनुभव होता है। उसमें गजब का आकर्षण एवं सम्मोहन आ जाता है और वह प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। सभी जड़-चेतन पदार्थ उसके प्रति आकर्षित हो जाते हैं और सदैव उसके अनूकूल रहते हैं।
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