





किसी भी अनुभव का दो तरह से मूल्यांकन किया जाता है। एक सकारात्मक अथवा उचित शिक्षा प्रदान करती है। दूसरा हम उसी अनुभव से अनुचित मार्ग की ओर बढ़ जाते हैं, यहीं पर सद्गुरु का ज्ञान, उनकी चेतना, उनकी प्रेरणा हमारा प्रत्यक्ष मार्गदर्शक बनती हैं। आपके जीवन में अनेक बार ऐसे क्षण आये होंगे, जब आपके अन्दर से ऐसी आवाज, ऐसी प्रेरणा आयी होगी, जैसे आपको कोई रोक रहा हो, कोई आपको अपनी ओर खींच रहा हो, यह प्रेरणा, चेतना उन्हीं सद्गुरुदेव रूपी प्राप्त ज्ञान की होती है, जो प्रत्येक क्षण आपमें आत्मिक रूप से विद्यमान हैं, आपके प्राण तत्व में समाहित हैं, जहां भी, जिस भी स्थिति में आपका अहित जुड़ा होगा, वहां सद्गुरु आपके मन में, आपके विचारों में आपको एक बार रोकता-टोकता है और आपको आत्मिक प्रेरणा प्रदान करता है।
यह अलग विषय है कि आपकी चेतना, आपका समर्पण, आपकी श्रद्धा, आपका विश्वास, आपका चिंतन उसे किस रूप में ग्रहण करता है, या कर भी पाते हैं अथवा नहीं, लेकिन गुरु अपनी उपस्थिति, अपना कर्तव्य पूरा करता है और वह अपनी सोच व चिंतन निरन्तर प्रदान करता है, जो उसके मर्यादा, उसकी गरिमा और उसके कर्त्तव्य के अनुरूप होता है। इसके बाद की स्थितियां शिष्य के कर्मो पर निर्धारित होती हैं और सद्गुरु आपको जीवन के सिद्धान्तों व अनुभवों का उचित मूल्यांकन करने की चेतना प्रदान करता है।
प्रवचन तो आप कहीं पर भी सुन सकते हैं, अनेक माध्यम है, सुनने-सुनाने के, बहुत मिल जायेंगे, एक-एक शहर में सैकड़ों-सैकड़ों लोग हैं, प्रवचन करने वाले, अनेक किताबों, ग्रंथों में ऐसे लाखों-लाखों शब्द मिल जायेंगे, जिनके द्वारा जीवन की धुरी ही बदल जाये, लेकिन बहुत ही कष्टदायी है कि वे सभी ग्रंथ केवल पढ़ने की वस्तु बनकर रह गयी, कोई बिरला ही उन पुस्तको, उन विचारों को अपने जीवन में पूर्णतया उतार पाया होगा, ऐसे में वे सारी बातें निरर्थक सी लगती हैं और वे प्रयास उन महापुरूषों का व्यर्थ प्रतीत होता है और यदि ऐसा नहीं होता, तो भगवद् गीता पढ़ने वालों के जीवन में मूलभूत परिवर्तन अवश्य दिखाई देता, परन्तु ऐसा दिखाई देने जैसा कुछ मालूम नहीं पड़ता है। गीता अब तक करोड़ो, अरबों लोगों ने अध्ययन की होगी। बदलाव किसी-किसी के जीवन में हुआ होगा, क्योंकि कोई पूर्ण जाग्रत, चैतन्य व्यक्ति ही उस ज्ञान को पूर्ण रूप से आत्मसात कर सकता है। हजारों वर्षों में केवल श्री कृष्ण ही ऐसे अद्वितीय व्यक्तित्व हुये जो भागवद् गीता के मूल चिंतन, भाव को पूर्णता से अर्जुन में उतार पायें, अब गीता केवल पढ़ने, सुनने की वस्तु ही बन कर रह गयी है, कोई दूसरा अद्वितीय व्यक्ति ऐसा इस धरा पर पैदा ही नहीं हुआ जो, उन चिंतनो को किसी अर्जुन में उतार सके। आप प्रवचन तो कहीं भी सुन सकते हैं, नृत्य तो कहीं भी कर सकते हैं, परन्तु आपको श्रेष्ठतम भाव, विचार, चिन्तन, प्रेरणा वही प्रदान कर सकता है, जो जीवन्त जाग्रत चेतनावान हो, क्रियात्मक रूप से आपको वह प्रेरणा प्रदान करने में सक्षम हो, ऐसी चेतना से पूर्ण व्यक्तित्व ही आपके जीवन में मूलभूत परिवर्तन ला सकता है।
ध्यान रखना, प्रदान करने वाला जितना अधिक गंभीर, धैर्यवान होता है, उतना ही ग्रहण करने वाले में संयम, धैर्य और गंभीरता होनी चाहिये। प्रदान करने वाला तो सबकुछ प्रदान कर देगा, लेकिन यदि ग्रहण करने वाला उस पात्र का नहीं होगा, तो सब निरर्थक, व्यर्थ चला जायेगा। इसलिये पात्रता का होना भी उतना ही आवश्यक है, जितना प्रदान करने वाले की योग्यता। ये दोनों संयोग हजारों हजारों वर्षों में कभी, किसी कालखण्ड में ही घटित होते हैं।
परिवर्तन हमारे जीवन में आते हैं, और प्रत्येक परिवर्तन अपने साथ गूढ़ रहस्य, चिंतन लिये होता है, इस भूल में मत रहना कि यह एक स्वभाविक क्रिया है, हां यह स्वीकार करना आवश्यक है कि मानव जीवन में कुछ मूलभूत क्रियायें होती हैं, परन्तु जो विशिष्ट व्यक्तित्व होते हैं, उनकी प्रत्येक क्रिया में अनेक रहस्य छिपे होते हैं। इसलिये परिवर्तन पर अपनी नजरे जमायें रखना है और बड़ी विनम्रता से आग्रह करता हूं, अपनी सक्रियता बढ़ा दो, निष्क्रियता का त्याग कर दो, यदि वास्तव में अपने जीवन में परिवर्तन चाहते हो, तुम्हारी सक्रियता ही तुम्हें शीर्ष तक पहुंचा सकेगी।
आज जब सद्गुरुदेव नारायण व भगवती माता जी सिद्धाश्रम में अवस्थित हैं, और उन्होंने अनेक प्रत्यक्ष माध्यमों से आप तक अपनी उपस्थिति का अनुभव कराया है, यह जीवन का अहोभाग्य है, उनकी असीम करूणा है कि वे सिद्धाश्रम में अवस्थित होने के पश्चात् भी प्रत्यक्ष माध्यम स्वरूप में आपकी बाते सुनते हैं, आपकी समस्याओं का समाधान करते हैं, यह उनके विराट दयामय स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन है, लेकिन यह याद रखना कि कोई भी रेलगाड़ी, वाहन गंतव्य तक पहुंचने का माध्यम होता है, यदि वह गाड़ी छूट गयी तो पुनः दूसरी रेलगाड़ी, माध्यम का इंतजार करना होगा और माध्यम, रेलगाड़ी कब आये कोई पता नहीं, एक-दो दिन भी लग सकते है, एक-दो साल भी लग सकते हैं और पांच-दस जन्म भी लग सकते हैं, यह आपकी तपस्या, आपके भाव, आपके समर्पण पर निर्भर होगा, कि माध्यम कब उपलब्ध होगा।
अभी सभी सुलभता उपलब्ध है, थोड़ी भी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। चिंतन करने की अनिवार्यता है, और चिंतन आतंरिक होना चाहिये, चिंतन करोगे, मंथन करोगे तो अमृत निकल कर आयेगा, और उस अमृत से अपना, अपने परिवार का, समाज का मंगल करने में समर्थ हो सकोगे।
पहले से अधिक सक्रिय होना होगा तुम्हें, तुम्हारी निष्क्रियता तुम्हें संकट में डाल सकती है, तुम्हारी श्रद्धा, तुम्हारे भाव, तुम्हारे चिंतन, तुम्हारा समर्पण तुम्हारे आने वाले जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे। इसलिये मैंने कहा आत्म-मंथन करो, क्योंकि वर्ष के साथ-साथ जीवन में भी बहुत कुछ बीता जा रहा है, उन्हें समय रहते पकड़ो, जाग्रत, चैतन्य और सक्रिय बनो। अपनी मंजिल की ओर बढ़ो, मैं तुम्हारे साथ हूं, तुम्हारी जिम्मेदारी सद्गुरुदेव नारायण भगवती ने मुझे सौंपी है, मैं अपनी जिम्मेदारी, अपने कर्तव्यों के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध हूं, प्रत्येक क्षण सजग हूं, चिंतनशील और क्रियाशील हूं, उन्होंने मेरे हाथों में जब से तुम्हारी बागडोर दी है, तब से लेकर आज तक मैंने तुम्हारे बारे में ही सोचा है, तुम्हारे साथ, तुम्हारे बीच, तुम्हारे हर सुख-दुःख में साथ रहा हूं और जब तक जीवन है, मैं प्रभु भगवती नारायण की आज्ञा को शिरोधार्य रख कर पालन करता रहूंगा।
मेरा आपसे यही आग्रह है, आप अपनी निष्क्रियता को त्यागकर नारायण भगवती की आत्मिक चेतना स्वरूप में प्राप्त प्रेरणा से अपने जीवन के उस पथ पर अग्रसर हों, जिस मार्ग पर प्रेम, करूणा और अपनत्व की भावना है, जहां वास्तव में आपका कोई अपना है, जहां के मार्ग पर चलने से केवल और केवल आनन्द, उत्सव, सुख और मंगलमय जीवन का आशीर्वाद् प्राप्त होता है। आप इस नूतन वर्ष में सद्गुरुदेव नारायण भगवती की चेतना से अपने व्यक्तित्व को और अधिक निखार सकें, उनके चिंतन को साकार रूप देने के लिये पूर्ण सक्रिय, जाग्रत हो सकें, भारतवर्ष के प्रत्येक क्षेत्र में सिद्धाश्रम शक्ति के ज्ञान की धारा का प्रवाह पहुंचाने हेतु संकल्पित, क्रियाशील हों और इन सभी के माध्यम से अपने जीवन में मंगलमय चेतना ग्रहण कर सकें, सभी प्रकार से मंगलमय चेतना से युक्त हो सकें, यही शुभकामना आर्शीवाद प्रदान करता हूं—-!!!
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,