





सभी शास्त्रें, वेदों, पुराणों, उपनिषदों, विद्वानों, यहां तक कि स्वयं भगवान ने भी अवतार रूप में सद्गुरू की महिमा के बारे मे बड़ी ही मर्म स्पर्शी महत्ता का वर्णन किया है। सिद्ध पुरूषों द्वारा, ऋषियों द्वारा, अनेकों विद्वानों द्वारा भी सद्गुरू के विषय में अपने विचारों और वाणी से गुणगान किया गया है।
मनुष्य जन्म लेने के पश्चात् भौतिक उपलब्धियों को प्राप्त करने में तो स्वयं सफल हो जाता है लेकिन आध्यात्मिक सिद्धियों के लिए केवल और केवल सद्गुरू की भत्तिफ़, सद्गुरू की शरण, सद्गुरू को समर्पण ही एकमात्र उपाय है।
सद्गुरू की महिमा अनन्त होती है, वह शिष्य पर अनगिनत उपकार करता है, सद्गुरू की कृपा से ही अमृत पद, एवं ब्रह्म का साक्षात्कार करता है, योग शास्त्र का मत है कि शरीर में स्थित चक्रों को ध्यान करने से, शुद्ध चित्त से सद्गुरू का मानसिक पूजन तथा श्वास द्वारा अजपा-जप से सभी प्रकार की सिद्धियां मिल जाती है। मानसिक पूजन का विधान करते हुए ये बताया गया है कि ब्रह्मरन्ध्र में सहस्र दल का कमल अधोमुख है, उसी में वर एवं अभय प्रदान करने वाले हंस स्वरूप श्री सद्गुरू का निवास है।
शिष्यों की दिलो की धड़कन, और उन्ही के सहस्रदल कमल तथा हृदय में स्थित सद्गुरूदेव के जन्म दिवस निखिल जयन्ती अमृतोत्सव 21 अप्रैल का आगमन समीप ही है, शिष्यों साधकों में ही नहीं समस्त प्रकृति में ही एक हलचल मच जाती है तथा वातावरण में उर्जा का प्रवाह अनुभव होने लगता है। इस दिवस से अनेकों शिष्य, अनन्त साधकों की भावनाएं जुड़ी हुई है तथा सद्गुरूदेव निखिल की अलौकिक शत्तिफ़यों का वरदहस्त उनके शिशुवत् शिष्यों पर अपनी अनुकम्पा, कृपा इस दिवस पर बरसाती ही है।
होली व नवरात्रि के पर्व बीत जाने के बाद तुम्हारे गुरुदेव के जन्मोत्सव पर्व के क्षण सम्मुख हैं और मुझे विश्वास है, कि तुम सभी ने इस पर्व को अमृतोत्सव के रूप में सम्पन्न करने का मानस बनाया है जिससे जीवन के विष चिन्ता संताप दोष समाप्त होकर जीवन रस, आनन्द, ओज, वीर्य, बल, काम शक्ति व सद्गुरु रूपी चेतना से युक्त हो सकें।
जिस तरह से शरद ट्टतु के घने कोहरे को बेधती हुई पौष माह के शुक्ल पक्ष के सूर्य की कोमल स्वर्णिम किरणें हर एक द्वार पर जाकर दस्तक देकर बताने लग जाती हैं, कि अब जड़ता को व्यर्थ में ओढ़ कर बैठे रहने का कोई अर्थ नहीं, अब उदासियों के घने कोहरे में स्वयं को घिरा मानते रहने की विवशता नहीं।
इस पर्व के आने से कई दिनों पूर्व से ही प्रकृति स्वयं हर एक हृदय द्वार पर दस्तक दे-दे कर कुछ कहने को आतुर हो जाती है? कोई प्रकाश सा तुम्हारे हृदय में, कोई सुखद उष्मा सी तुम्हारे प्राणों में नर्तन करने लग जाती है? कुछ बड़ा अद्भुत सा, कुछ बड़ा मनोहर सा और कुछ बड़ा विलक्षण सा!
– क्योंकि कुछ अलग हट कर ही तो होती है यह प्रकाश के आने की क्रिया। भले ही कोई अपने द्वारों को कितना भी जकड़ कर क्यों न बैठा हो, भले ही उसने क्यों कर न सोच रखा हो, अब ताक द्वारों को मजबूती से बंद कर लेना ही अच्छा रहेगा लेकिन जो ‘प्रकाश’ होता है वह प्रविष्ट होने का उपाय ढूंढ ही निकाल लेता है। वह कहीं न कहीं से एक सुराख जितनी जगह पाकर प्रविष्ट हो ही जाता है।
प्रकाश तो एक स्वयमेव आने की क्रिया होती है, उसके लिये तुमको कोई प्रयास करने की आवश्यकता ही नहीं। यदि प्रयास जैसा कुछ करना ही चाहते हो, तो तुम बस इतना ही करना कि जब गुरुरूपी ज्ञान का प्रकाश तुम्हारे द्वार पर दस्तक दे तो उस समय किसी सोच विचार या संकोच में न रह जाना, यह मत सोचने लग जाना कि प्रकाश तो बार-बार आता ही रहेगा, कल इसका स्वागत कर लेंगे, आज क्यों न इसी स्वप्निल तंद्रा में कुछ समय और व्यतीत कर लिया जाये। और बड़ी मोहक होती है यह स्वप्निल तंद्रा! कुछ भी नहीं होता लेकिन मन पता नहीं किन लहरों में डूब कर निकलना चाहता ही नहीं है।
प्रकाश रूपी ज्ञान का स्वागत करोगे, तो उसका सहज प्रतिफल उष्मा प्राप्त होगी ही। केवल तन को ही नहीं मन को भी। और जो तुम्हारे जीवन के लिये अत्यावश्यक हो चला है वह यही है कि तुम ऊष्मा के अर्थ को समझ सको, ऊष्मा का तुम्हारे जीवन में समावेश हो सके, प्राणों की निर्जीवता में स्पंदन आ सके, नृत्य, हास्य आ सके और सर्वोपरि तो यह कि इन सभी की समायुक्ति से मेरी उपस्थिति को सार्थक बनाने का बोध आ सके।
कभी देखा है तुमने, कि यह सम्पूर्ण प्रकृति ही कैसे एक लय में बंधी हुई है? खो जाते हो पता नहीं किस शून्य में रोम-रोम से उल्लास सृजित करते हुये और जुड़ जाते हो सहसा किसी विराट बोध के साथ, आनन्द मग्न होते हुये, जीवन के संगीत को सुनते हुये, बिखर कर जुड़ते हुये और जुड़-जुड़ कर फिर बिखरते हुये? – यही है वह समाधि की अनूठी अवस्था, जो तुम न जाने कब से खोज रहे हो, शास्त्रें में विवरण पढ़-पढ़ कर जिसका स्वरूप समझने की व्यर्थ चेष्टा कर रहे हो। जिस अद्वितीय तत्व का निरूपण वे शास्त्र ‘नेति-नेति’ कर करते हैं उसका स्वरूप तुम समझ भी सकोगे तो कैसे? और जब तक स्वरूप दर्शन न प्राप्त कर सके तब तक समाधि की चर्चा तक करना व्यर्थ है।
मुख्य बात तो यह है, कि तुम वह स्वरूप साक्षात् कर लो, उसका दर्शन प्राप्त कर लो, जिसे निहारने के बाद समाधि कोई पृथक् भावभूमि रह ही नहीं जाती। गुरु से मिलना, ऐसा ही साक्षात् करने का क्षण होता है। वही समाधि की वास्तविक दशा होती है और ऐसी समाधि किसी भी परिभाषा से बद्ध नहीं होती। न यह निर्विकल्प होती है न सविकल्प। किन्तु यह स्थिति तो प्रत्येक जड़ता से उन्मुक्त होने की घटना होती है।
—जब सूर्य की पहली किरण नववधु सी बन अपनी स्वर्णिम उंगलियों से जाकर किसी वृक्ष की एक शाख को छू देती है और उड़ चलते हैं अलसाये से पक्षी अपनी सारी तंद्रा को छोड़, डैनों में नयी चेतना को भर कर इस नृत्य के संदेश को, जो दूर-दूर तक फैलता चला जाता है प्रकृति के कण-कण में। एक ऐसा लास्य जिसमें छिपा होता है जीवन का हास्य। यही वास्तविक नृत्य होता है और केवल एक वृक्ष ही नहीं प्रकृति का एक-एक उपादान समवेत् रूप से इस नृत्य में तल्लीन हो जाता है।
आज इस 21 अप्रैल के पर्व पर मैं तुम्हें जीवन के इसी मर्म को बताने के लिये उपस्थित हुआ हूं, कि जब तक जीवन में लास्य व हास्य का समावेश नहीं होगा, जब तक तुम सूर्य की पहली किरण तक को प्रवेश का अधिकार नहीं दोगे, उसका स्वागत, उसकी अभ्यर्थना नहीं करोगे तब तक तुम्हारे जीवन में नृत्य का समावेश होना कठिन ही नहीं असम्भव भी है।
21 अप्रैल वस्तुतः तुम्हारे ही नूतन जन्म लेने का पर्व है, क्योंकि गुरु जन्म-मरण की उपाधियों से नितांत मुक्त ही होते हैं। गुरु का ‘जन्म’ तो प्रतिक्षण होता रहता है। प्रतिक्षण वे आतुर ही रहते हैं जन्म लेने को अपने शिष्य के हृदय में, उसकी मनोभावनाओं में। जिस प्रकार से प्रकाश का धर्म होता है, कि वह जहां-जहां अंधकार है, वहां-वहां प्रविष्ट होने के उपरांत अंधकार का चिन्ह भी नहीं रहने देता है, ठीक वही क्रिया गुरु की भी होती है व शिष्य के अन्धकार रूपी अनेक उपादानों को नाश करता है और संपूर्ण जीवन को आलोकित कर देता है। ठीक ऐसी ही क्रिया इस 19-20-21 अप्रैल को अमृतोत्सव पर सम्पन्न होगी।
यह मेरा धर्म नहीं था, कि मैं तुमसे स्वयं अपने परिचय के विषय में कहता। तुम्हारे शिष्यत्व का सौन्दर्य तो यह होता, कि तुम स्वयं अपने आत्म चक्षुओं से मुझे पहचानने की क्रिया में केवल संलग्न ही नहीं निमग्न से हो जाते और उमड़ते हुये आकर मुझमें विलीन हो जाते। मैं तो आज से ही नहीं कई-कई वर्षों, कई-कई जन्मों से बाहें फैलाये खड़ा हूं। इसके उपरान्त भी मैंने अपना परिचय देने की क्रिया की तो केवल इसी कारणवश, कि यदि मैंने तुम्हें अपने विषय में नहीं बताया, जो यह कार्य और कौन करेगा?
किन्तु पूर्णता मुझ तक आकर मिल जाने में ही नहीं है वरन् इस बात में है, कि मैं अत्यन्त आीांद के साथ तुम्हारे अन्तःस्थल में जन्म ले सकूं और इस प्रकार से तुम्हें ही नया जन्म दे सकूं। तुम्हारे विगत की काली परछांई को अपने प्रकाश से दूर कर सकूं और यह सब एक उत्सव के साथ हो।
21 अप्रैल का पर्व इसी कारणवश कोई मेरी वर्षगांठ का अवसर नहीं है वरन् स्वयं तुम्हारी ही अस्मिता के जन्मोत्सव का पर्व है और सदैव ध्यान रखना, कि जीवन केवल वही कहा जा सकता है, वे पल ही जीवन के पल कहे जा सकते हैं जो एक चैतन्य गुरु के सान्निध्य में व्यतीत हो अन्यथा जीवन को अनेक विद्रूपों में घेर कर, चाहे वह धन जमा करने का विद्रूप हो या पत्नी की मनुहारें करने का या जोड़-तोड़ कर पद प्रतिष्ठा ग्रहण करने का, वह ‘कला’ तो तुम्हें स्वयं ही आती है उसके लिये गुरु की आवश्यकता ही क्या?
शक्ति का स्वरूप मुख्यतः अनेक स्वरूपों मे मिलता है। यही शक्ति कहीं शिव के साथ संलग्न है तो कहीं पर नारायण भगवती लक्ष्मी का स्वरूप है, तो कहीं ब्रह्मा सावित्री के रूप में इन्ही स्वरूपों में से एक नारायण भगवती लक्ष्मी शक्ति तत्व जागरण शिष्यों के दिलो की धड़कन, और उन्ही के सहड्डदल कमल तथा हृदय में स्थित सद्गुरूदेव के जन्म दिवस निखिल जयन्ती अमृतोत्सव 19-20-21 अप्रैल को रायगढ़ (छत्तीसगढ़) में सम्पन्न होगा। इस अमृतोत्सव में साधक व शिष्य स्वयं को सद्गुरू सायुज्य रूप में निर्मित करने की ओर क्रियाशील होंगें। इस दिवस से अनेकों शिष्य, साधकों की भावनाएं जुड़ी हुई है तथा सद्गुरूदेव निखिल की अलौकिक शक्तियों का वरदहस्त व उनकी कृपा अपने शिशुवत शिष्यों पर इस दिवस पर बरसने के लिये आतुर है। आप सभी सर्व भौतिक सुखों से सम्पन्न हो सके ऐसा ही मातृ-पितृ स्वरूप में परिवार सहित को सद्गुरु की कृपा प्राप्त करने के लिये रायगढ़ शिविर में आमंत्रित है।
फिर भी विश्वास की कोई कड़ी है जिससे बंध कर मैं इस वर्ष 21 अप्रैल को रायगढ़ में अपने मानस के राजहंसों, अपने शिष्यों से मिलना चाहता हूं और चाहता हूं कि मेरे ही अन्तर्मन के दर्पण में वे स्वयं का स्वरूप निहार कर आत्म तृप्त हो सर्व भौतिक व गृहस्थ सुखों से परिपूर्ण हो सको।
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