





वही व्यक्ति तीनों लोको में धन्य है। प्रिये! बदरिकाश्रम में जो त्रुटि (सूक्ष्म परिमाण) मात्र सोना ब्राह्मण को देता है, उसके पुण्यफल को बताने में कौन समर्थ हो सकता है।
वहाँ केदार का सम्यक् पूजन करके मनुष्य शिवलोक में पूजित होता है ।
जो व्यक्ति बदरीनायक श्रेष्ठदेव की परिक्रमा कर लेता है वह महात्मा समुद्र, वन तथा द्वीप समेत पृथ्वी दान का फल पा जाता है।
और उसके पितर विष्णु को परम पद को चले जाते हैं। वे ही लोग धन्य हैं, जिन्होने बदरीवृक्ष को देखा है।
अथवा जो बदरिकाश्रम में विष्णुपरायण होकर रहे हैं। जहाँ विष्णुलोक देने वाली नारदीय शिला है।
और जहाँ उत्तम मुनियोंद्वारा की गई वेदध्वनियाँ सुनाई पड़ती है। वहाँ जो कर्म किया जाता है वह करोड़ गुना अधिक फल देने वाला होता है।
वहाँ नारदीय कुंड में स्नान करने से पुनः माता का दूध नहीं पीना पड़ता है। वहाँ का चिह्न बताता हूँ, जिससे तुम्हें विश्वास हो जाएगा।
वहाँ की मिट्टी कुंकुम के वर्ण की आभावाली बहुत सुन्दर दिखाई पड़ती है। वहाँ लक्ष्मी तथा विभु लक्ष्मीपति की बहुत-सी मूर्तियाँ विद्यमान हैं।
युग-युग में विष्णु के अंशभूत मुनिराज बदरीनाथ नामक देवेश्वर की स्थापना करते रहेंगे।
वहाँ वाराही शिला पापनाशिनी एवं सकलकामनादायिनी है। मेरी प्रिये! विष्णुपदी में वाराह कुण्ड प्रसिद्ध है।
उसमें स्नान तथा जप करके मनुष्य अनन्त फल प्राप्त करता है। वहाँ नारसिंही शिला समस्त पापों का नाश करने वाली है।
वहाँ भोगमोक्षदायक कुण्ड भी प्रसिद्ध है। वहाँ मार्कण्डेयशिला सभी लोकों में दुर्लभ है।
जिसके छूने से भी मनुष्य सभी पापों से छूट जाता है। गारूडी शिला भी कही गई है, जहाँ महात्मा गरूड ने विष्णु का वाहनत्व एवं उनकी परम मित्रता प्राप्त की ।
उस(शिला) का दर्शन, स्पर्श तथा अर्चना करने से नर नारायण हो जाता है।
इन पाँच शिलाओं के बीच बदरीनाथ का आसन है। शिवे! वह वह्नितीर्थ से युक्त तथा विष्णुलोक देने वाला है।
देवि! वह्नितीर्थ वह है, जहाँ अग्नि देव ने हरि की आराधना की थी। उस अग्नि को विश्वात्मा और विश्वोत्पादक प्रभु ने सबसे अधिक पवित्रता प्रदान की।
इससे बढ़कर तीनों लोक में दुर्लभ कोई तीर्थ नहीं है। इस क्षेत्र में बहुत से श्रेष्ठ तीर्थ हैं।
सकलकामनादायक उन तीर्थों को संक्षेप में कहता हूँ। ब्रह्मकपाल में पितर अपने वंशज की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इसलिए वहाँ पिण्डदान करना चाहिए, ऐसा मुनियों ने कहा है।
ज्ञान से अथवा अज्ञान से और भक्ति से अथवा अभक्ति से जो यहाँ पिण्ड चढ़ाते हैं
और जल से तर्पण करते हैं, उनके पापी और दुर्गति को प्राप्त पितर भी तर जाते हैं।
देवि! सुन्दरि (उन्हें) गया जाने से क्या लाभ और अन्य तीर्थों में तर्पण करने से क्या लाभ? जिन मनुष्यों ने ब्रह्मकपाल में पितरों को उद्देश्य करके तर्पण कर लिया है। (ब्रह्मकपाल) में किया गया सभी कर्म कोटिकोटि गुणा अधिक फल देता है।
इसलिए सब प्रयत्न से यहाँ अच्छी तरह तर्पण करना चाहिए। जिन लोगों के पूर्वज (माता-पिता, भाई बन्धु, दादा-परदादा आदि) शरीर त्यागने के पश्चात् निकृष्ट योनि, भूत-प्रेत, पिशाच आदि योनियों मे चले जाते है) वे अपनी मुक्ति हेतु अपने रक्त सम्बन्धियों को अनेक-अनेक प्रकार से प्रेरित करते रहते है कि वे किसी न किसी प्रकार किसी तीर्थ स्थान पर जाकर हमारे निमित्त पिण्डदान क्रिया करें जिससे हमारी मुक्ति हो सके। उनके प्रयास के पश्चात् जब यह क्रियाये नहीं हो पाती तो वह अपने रक्त सम्बन्धी परिवार में बाधाएं डालना शुरू कर देती है। वे व्यक्ति में असाध्य व्याधि, व्यापार में रूकावट, संतान का न होना, आपसी लड़ाई झगड़े, समय पर शादी न होना, मुकदमेबाजी आदि अनेकों समस्याएं उत्पन्न कर देते है। अनेकों जगह से उस पर तंत्र प्रयोग होते रहते हैं, जिससे व्यक्ति के सभी कार्य एवं लक्ष्य अवरूद्ध हो जाते हैं। और ऐसा तब तक होता रहता है जब तक उस दिवंगत आत्मा को मुक्ति नहीं मिल जाती, तब तक वह किसी भी प्रकार की साधनाओं मे सिद्धि नहीं होने देते।
पिण्डदान क्रिया अपने पूर्वजो के निमित्त की गई ऐसी क्रिया होती है जिसके करने पर व्यक्ति के दिवंगत पूर्वजो को तृप्ति एवं मुक्ति प्राप्त होती है। जिसे पाकर वे पिण्डदान करने वाले को अपने आशीर्वाद तथा वरदान से निहाल कर देते है और उसके जीवन में किसी प्रकार की बाधाएं व्याप्त नहीं होती। ये पिण्ड जौ(यव), चावल एवं उड़द (माह) के आटे मे काले तिल आदि मिलाकर छोटे-छोटे गोले के आकार में बनाए जाते है। उनको पूजन संस्कार तथा प्राण-प्रतिष्ठित कर उस विशिष्ट स्थान जैसे कि बद्रीनारायण में ब्रह्मकपाल शिला पर श्रद्धापूर्वक अपने पितरो का नाम लेकर चढ़ाने से उन्हें मुक्ति प्राप्त हो जाती है। यह पिण्डदान क्रिया पितरों के लिए ब्रह्मास्त्र के समान है।
सर्व प्रथम पंजीकृत साधकों के लिये 17 मई को हरिद्वार में पहुंचने के बाद ठहरने, विश्राम, भोजन की व्यवस्था स्वामी नारायण मंदिर, निकट सप्तऋषि आश्रम, पावन धाम, भूपतवाला, हरिद्वार में की गयी है।
इस यात्रा का प्रबन्ध शिविर आयोजन से बहुत पहले से व्यवस्थित करना होता है। इस स्वरूप में साधकों के ठहरने, भोजन, आने-जाने के लिये बसों की व्यवस्था, टेंट, होटल, गरम बिस्तर आदि अनेक-अनेक तरह की सामग्री हरिद्वार से ही संभव हो पाती है, अतः जो भी साधक-शिष्य सद्गुरुदेव नारायण का दिव्यपात प्राप्त करना चाहें और अपने जीवन को सर्व भौतिक सुखमय बनाने के इच्छुक हों वे ही पंजीकरण करायें। इस हेतु अपना व अपने पिता का नाम जन्म तारीख, जन्म स्थान अवश्य लिखे जिससे उसकी गणना कर पूर्ण व्यक्तिगत रूप से चैतन्य मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त साधनात्मक सामग्री निर्मित हो सकेगी ।
सरकारी नियमानुसार अपना परिचय पत्र और उसकी दो फ़ोटो कापी अवश्य साथ रखें ।
सर्वप्रथम यह ध्यान रखें कि आप कितने भी श्रेष्ठ आयोजक, कार्यकर्ता या समर्पित शिष्य रहें हों परन्तु ऐसे दिव्यतम स्थान पर आप केवल साधक ही हैं, अतः प्रत्येक का पंजीकरण अनिवार्य है, धार्मिक व साधनात्मक यात्रा हेतु परिवार के सभी सदस्यों के साथ पंजीकरण कराने से सांसारिक सुखों को पूर्ण रूपेण समवेत स्वरूप में प्राप्त कर सकेंगे।
न्यून मानसिकता, ओछी सोच व सदैव अनिर्णय के भाव से ग्रसित शिष्य नहीं आये। जिस साधक में सजगता, चेतना, ठोस निर्णय लेने की क्षमता होगी वे ही शिष्य अपने आपको अहम् ब्रह्मस्मि युक्त करने हेतु पंजीकरण करायेंगे।
वैशाख मास की अक्षय एकादशी के दिव्यतम अवसर पर जीवन अमृतमय प्राप्ति साधना व कर्ण पिशाचिनी शत्रुहन्ता दीक्षा तथा सिद्धाश्रम शक्ति दिवस पर वैभव धन लक्ष्मी साधना, सहस्त्र चक्र कुण्डलिनी जागरण दीक्षा, दिव्यतम पवित्र अलकनन्दा नदी, ब्रह्म कपाल मंदिर, गणेश गफ़ुा व चैतन्य स्थानों पर प्रदान की जायेगी। उक्त साधनात्मक क्रियायें बस यात्रा, भोजन, बद्रीनाथ में ठहरने की व्यवस्था पंजीकरण शुल्क में सम्मिलित है।
17 मई 2017 बुधवार को हरिद्वार पहुंचना अनिवार्य हैं, पंजीकृत साधकों के लिये ही ठहरने और भोजन की व्यवस्था हरिद्वार में 17 मई सांय 04 बजे से 18 मई प्रातः 4 बजे तक ही संभव हो सकेगी।
18 मई 2017 को प्रातः 04 बजे से आराम दायक बसों से बद्रीनाथ धाम की यात्रा प्रारम्भ करना आवश्यक होगा तब ही सांय 06 बजे तक बद्रीनाथ पहुंचना संभव हो सकेगा। रूद्र प्रयाग के पास रतूड़ा स्थान पर भोजन, चाय प्रदान की जायेगी।
प्रातः 04 बजे के बाद बद्रीनाथ की यात्रा के लिये रवाना होने पर किसी भी स्थिति में उस दिन बद्रीनाथ पहुचना संभव नहीं होगा और बीच में ही साधक को स्वयं की व्यवस्था से ही ठहरना होगा और दूसरे दिन बद्रीनाथ पहुंच सकेंगे।
बहन, बेटियां, मातायें किसी भी स्थिति में अकेली नहीं आये। अस्थमा, हृदय रोगी, गठिया रोगी व अन्य बीमारी से युक्त साधक इस शिविर में भाग नहीं लें। पूरी यात्रा में सामान की और स्वयं की सुरक्षा की जिम्मेदारी साधक की स्वयं की रहेगी।
अकाल मृत्यु, दोषो, क्लिष्ट रोगो से निवृत्ति हेतु महामृत्युज्ंय रूद्राभिषेक, दुर्गति नाशक सौभाग्य प्रदायक निखिल शक्ति व शिव गौरी नारायण दीक्षा, हवन, अंकन का न्यौछावर अलग से न्यूनतम रूप में प्रदान कर सिद्धाश्रम शक्ति युक्त हो सकेंगे।
बद्रीनाथ धाम में ठहरने हेतु Dormitory में अलग-अलग पलंग की व्यवस्था की गयी है।
22 मई 2017 को प्रातः 5 बजे से हरिद्वार लौटने की व्यवस्था बसों द्वारा होगी। हरिद्वार पहुंचने पर वंहा ठहरना या अपने घर को लौटने की व्यवस्था साधक को स्वयं ही करनी होगी।
पंजीकरण शुल्क केवल कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर या गुरुधाम दिल्ली में व्यक्तिगत रूप से जमा करायें। ड्रॉफ़ट या सीधे खाते में जमा कर पंजीकरण REGISTRATION कराना होगा। पंजीकरण शुल्क J 11000 ( Eleven Thousand Only)
पंजीकरण शुल्क भेजने के लिए आप प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान जोधपुर कार्यालय के फोन नं- 0291-2517025, 2517028, साथ ही मोबाईल नं- 7895727019, 8010088551 पर संपर्क कर विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,