





स्वास्थ्य के नियमों का पालन करके यानी प्रातः भ्रमण, योगाभ्यास, खान-पान में नियन्त्रण, विचारों में शीलता एवं राग-द्वेष से रहित होकर वृद्धता युक्त जीवन युवा के समान व्यतीत कर सकते हैं। ठीक, इसके विपरीत असंयमित खान-पान एवं रहन-सहन, राग-द्वेष से ग्रसित विचार, अभक्ष्य एवं अनावश्यक चीजों के भक्षण से जीवन अल्प आयु की ओर बढ़ता है। व्यक्ति की कार्य-क्षमता उसके अच्छे-बुरे विचारों पर निर्भर करती है, जीवन जीने की शैली कैसी है? इस पर निर्भर करती है। स्वस्थ रहने के प्रति यदि हममें सही चेतना जागृत हो जाये तो अवस्था से वृद्ध हो जाने पर भी सुखी और स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकते हैं।
प्राचीन काल में भारतीय परिवारों में अविभक््त रूप से साथ-साथ रहने की परम्परा रही है। तीन-तीन, चार-चार पीढि़यां साथ रहती रहीं हैं। अभी भी ऐसे सम्पन्न परिवार देखने को मिल जायेंगे, जहाँ विभक्त परिवारों की अपेक्षा अधिक सुख-शान्ति है। हमारी सामाजिक व्यवस्था विदेशों से एकदम भिन्न है। विदेशों में युवक-युवतियां जहाँ 15-16 वर्ष की उम्र के हुये कि माता-पिता से अलग होकर अपना स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करने लग जाते हैं।
अपना जीवन यापन स्वयं करते हैं। अलग रहते हैं, वहां के इस प्रकार परिवार विहीन समाज में क्या-क्या विसंगतियां उत्पन्न हो रही हैं, यह बात छिपी नहीं है। विडम्बना है कि वहां की संस्कृति अब भारत में भी तेजी से बढ़ रही है। भारतीय प्राचीन परम्परायें पश्चिमी देशों के तौर-तरीकों से प्रभावित होने लग गयी हैं और परिणाम यह हो रहा है कि माता-पिता अकेले रहने को विवश हैं।
पश्चिम देशों में वृद्ध होना अभिशाप के समान है। वहां की स्थितियां अत्यन्त भयावह होती हैं, उनकी देख-भाल करने के लिये कोई नहीं होता। परिणाम स्वरूप वे नारकीय जीवन व्यतीत करने को विवश होते हैं। उन्हें वहां सामाजिक और कानूनी तौर पर पूरी सामाजिक सुरक्षा-व्यवस्था है, चिकित्सा सुविधा आजीवन निःशुल्क मिल जाती है, खाने-पीने-रहने की कोई समस्या नहीं होती। लेकिन अपनत्व और प्रेम का अभाव उनके जीवन में निराशा का संचार करता है। लेकिन हमारी संस्कृति में वृद्ध माता-पिता के लिये अत्यन्त कष्टकारक होता है। क्योंकि भारत में जो अपनत्व, प्रेम का वातावरण परिवार में होता है, ऐसा संस्कार होता है, कि वे इस प्रकार अकेले रह ही नहीं पाते। उनके हृदय में इसकी पीड़ा हमेशा बनी रहती है। अपने बच्चों, नाती-पोते के बीच ही उन्हें खुशियां मिलती हैं।
पूर्व में कई पीढि़यां एक साथ एक परिवार के रूप में रहती थीं, किंतु अब परिवारों मे बिखराव बढ़ गया है। इसके पीछे कारण क्या है। इस पर विचार किया जाये तो प्रतीत होता है कि पहले वैज्ञानिक उपलब्धियां बहुत धीमी थीं, जिसके कारण वृद्धों एवं बच्चों के विचारों में ज्यादा अन्तर नहीं था। अब इतनी तेजी से वैज्ञानिक उपलब्धियां बढ़ रही हैं कि बच्चों एवं वृद्धजनों की विचारों में बड़ा अन्तर आ गया है। अब नई पीढ़ी अपने को अपनी पुरानी पीढ़ी से अधिक बुद्धिमान मान रही है। इसी कारण युवाओं और वृद्धजनों के विचारों में अन्तर आ गया। आज-कल बच्चे पढ़ने के लिये घर से बाहर बड़े शहरों में या विदेशों जाते हैं। वहां के वातावरण, संस्कृति में पढ़ने-लिखने के कारण घर के बड़े बुजुर्गों के प्रति ममता-मोह में भी कमी आती है। विचारों में अन्तर एवं मोह-ममता में कमी के कारण परिवारों में बिखराव बढ़ रहा है।
भारत में वृद्धावस्था सुरक्षित नहीं है। क्योंकि यहां पर ना ही कोई चिकित्सा सुविधा निःशुल्क है, ना ही खाने-पीने की व्यवस्था है। यदि वृद्ध माता-पिता में किसी एक की मृत्यु हो जाये तो एक अकेले का जीवन जीना दूभर हो जाता है। उसे नारकीय कष्ट की अनुभूति होती है। ऐसा इसलिये है कि भारतीयों ने अपनी संस्कृति, आदर्शों पर कुठारघात किया, उसे सुरक्षित रखने का प्रयास नहीं किया। जिसका परिणाम आज अनेक वृद्धाश्रम के रूप में सामने हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि वर्तमान में भी पीढि़यां पूर्ववत् की भांति ही रह सकें। इसके लिये उपयुक्त उपाय करना चाहिये। माता-पिता अपने पुत्र-पुत्रियों के साथ अपना जीवन निर्वाह कर सकते हैं। ऐसी व्यवस्था हमें अपने परिवार में बनानी चाहिये। पूर्व में माता-पिता की सेवा करना सौभाग्य की बात थी। आज के समय लोगो में सेवा भाव समाप्त हो गया है। केवल और केवल कार्य पूर्ति ही शेष रह गयी है।
भारतीय संस्कृति में माता-पिता के जीवन काल तक ही सेवा करना नही है। उनके मरणोपरान्त भी उन्हें पिण्ड-दान तथा प्रतिवर्ष श्राद्ध द्वारा उनके स्मरण से आशीर्वाद् निरन्तर मिलता रहता है व संतानों की वृद्धि, उन्नति, प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है। यह सेवा भाव अथवा कर्तव्य भाव से हो तभी श्रेष्ठ है। साथ ही अपनी दिनचर्या में कुछ उपाय से वृद्धावस्था को सुखद बना सकते हैं।
सुखद जीवन का पहला सूत्र है अपने शरीर को रोगमुक्त रखने का प्रयास करना। रोगमुक्त रहने के लिये नियमित प्रातः भ्रमण एवं योगाभ्यास करें। खान-पान पर नियन्त्रण रखें। आचार-विचार को शुद्ध रखें। अनावश्यक एवं स्वास्थ्य के लिये प्रतिकूल पदार्थों के सेवन से परहेज करें।
बच्चों की आलोचना करने के बजाय उन्हें यह बोध करायें कि यह काम ऐसे नहीं, ऐसे कर लेते तो और अच्छा होता। रामायण में बूढ़े जामवन्त से यही ज्ञान प्राप्त होता है कि जब उन्होंने हनुमान जी महाराज को लंका जाने के लिये प्रेरित किया। उन्होंने हनुमान जी महाराज को केवल उनके अन्दर छिपे बल का बोध कराया। जैसे ही बोध कराया तो उनके अन्दर छिपा महापुरूष रूपी महावीर जागृत हो गया।
यह खयाल रखें कि बच्चों को पूरी जिम्मेदारी देने के समय अपनी क्षमता के अनुसार अपने लिये कुछ धन संभाल कर रख लें और अपनी आवश्यकताओं को यथा-सम्भव सीमित रखें।
चिन्ता करना बन्द कर दें। चिन्ता हमेशा काल्पनिक होती है।
अपनी चिन्ता को चिन्तन में बदल दें। यह ध्यान रखें कि चिता तो एक बार जलाकर आपका अस्तित्व समाप्त कर देती है, लेकिन चिन्तायें तब तक जलाती रहती हैं जब तक आप जीवित रहेंगे। चेहरे पर हमेशा हँसी, खुशी एवं प्रसन्नता रखें तो चिन्तायें अपने-आप दूर हो जायेंगी, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रकाश के आने पर अँधेरा अपने-आप चला जाता है। अँधेरे को भगाना नहीं पड़ता। अपने को निराशा, उदासी, से दूर रखें।
अपनी दिनचर्या में अपने को व्यस्त रखें। यह ध्यान रखें कि आलसी जीवन भी शरीर को रोगी बना देता है। वृद्धावस्था में व्यस्त रहने के लिये पढ़ने का अभ्यास डाल लें। आध्यात्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करें तो ज्यादा शान्ति मिलेगी। लिखने का अभ्यास हो जाये तो पढ़ना भी सार्थक हो जायेगा। किसी सेवा संस्था के सेवा कार्यों में अपनी सेवायें दें। आप मानकर चलें कि सेवा ही आपकी पूजा हो जाये तथा मानव सेवा भी माधव सेवा हो जाये। किसी प्यासे को पानी पिलाना भी भगवान् शंकर का जलाभिषेक हो जाये। इस भावना से सेवा कार्य करेंगे तो सेवा भी पूजा हो जायेगी।
अपने बच्चों एवं परिवार को उनके काम में पूरा सहयोग दें। उनको यह अनुभव न होने दें कि आप उनके लिये भार-स्वरूप हैं। किसी काम में बच्चों को आपकी आवश्यकता हो तो पूरा सहयोग करें। बच्चों की मानसिकता का पूरा ख्याल रखें।
जब बच्चे काम को संभाल लें तो आप पीछे हो जायें एवं बच्चों को आगे कर दें। बच्चे आगे रहेंगे तो आप बच्चों के कार्य पर निगरानी रख सकेंगे। पीछे रहने का एवं बच्चों को आगे रखने का एक लाभ और भी है कि बच्चे आपके सामने ही काम को पूरी तरह सँभालने में सक्षम हो जायेंगे।
बच्चों के कर्तव्य को वृद्ध अपना अधिकार न समझ लें। वृद्ध ऐसी गलती करेंगे तो उनका जीवन अशान्त हो जायेगा।
वृद्धावस्था में अध्यात्म की ओर बढ़े। धर्म शास्त्रों का अध्ययन करें। आध्यात्मिक कार्यों में अपना अधिक से अधिक समय व्यय करें। गुरू-जन के आर्शीवचनों का श्रवण करें, इससे बड़ी शान्ति मिलेगी और परिवार में आदर बढ़ेगा।
ऐसा कोई काम न करें कि बच्चों से अपमानित होना पड़े। ध्यान रखें कि अप्रिय वचन सुनना बड़ा कष्ट-कारक होता है। अपने ही बच्चों द्वारा अपमानित होना बड़ा कष्ट-कारक होता है। अतः वृद्धजनों को ही परिवार के सभी सदस्यों से तालमेल बैठाना होगा ताकि अप्रिय वचन न सुनना पड़े।
साथ रहने के लिये आवश्यक है कि एक-दूसरे की न्यूनताओं पर ध्यान ना देते हुये, एक-दूसरे के गुणों को लेकर आगे बढ़ें। प्रत्येक व्यक्ति में अच्छाइयां एवं कमियां होती हैं। अतः दूसरों के विचारों व भावनाओं का आदर करना चाहिये।
वृद्धजन अगर इन सूत्रों का पालन करने लग जायें तो उनका जीवन सुखद हो सकता है और नई पीढ़ी के साथ में रहने की समझदारी बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में जीवन न तो अपने लिये भार-स्वरूप होगा और न अपने परिवार के लिये और सच मानें तो मृत्यु भी महोत्सव हो जाती है।
नई पीढ़ी का अपने माता-पिता, वृद्धजनों के प्रति क्या कर्तव्य है, वे किस प्रकार उनसे सामंजस्य बनाकर, उनका सम्मान कर, अपने माता-पिता का आशीर्वाद् प्राप्त कर सकते हैं, साथ ही मानव जीवन के सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य का निर्वाह कर, माता-पिता के ऋण से मुक्त होने का प्रयास किस प्रकार से कर सकते हैं? पढ़े अगले अंक में——————————-!
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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