





हम आज करोडों रूपया, धन सम्पत्ति अथवा स्वयं के प्राण दे कर भी भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य, उनका स्पर्श, उनका दर्शन, उनसे बात-चीत करने में सफल नहीं हो सकते है। आदि गुरु शंकराचार्य के चरणों में नहीं बैठ सकते। सद्गुरुदेव निखिल का दिव्य स्पर्श नहीं पा सकते, उनके संग वार्तालाप नहीं कर सकते।
परन्तु जो त्रिकाल दर्शी गुरु होते हैं, वे भविष्य के घटना क्रम को भी निर्धारित कर देते हैं। ऐसा ही सद्गुरुदेव निखिल हम शिष्य, साधकों के लिये प्राणवायु प्रदान की है। अपने पश्चात् अपने पुत्रों की कल्पवृक्ष स्वरूपी मार्गदर्शक के रूप में चेतना पुंज स्वरूप में पौत्र श्री गुरुदेव विनीत श्रीमाली जी को गुरुत्व पद देकर शिष्यों को पूर्ण आत्मीयमा और स्नेह प्राप्त हो सके।
कहा जाता है कि सांसारिक जीवन में दादा के प्राण अपने पोते में बसते हैं। सामान्यतः जीवन में जब कोई व्यक्ति पहली बार दादा बनता है तो वह अपना सारा वात्सल्य, स्नेह, प्रेम, ममत्व उस पर न्यौछावर कर देता है। अपना सभी समय पौत्र के साथ क्रीड़ा करने में ही व्यतीत करता है तथा अपनी जीवन की सारी संपत्ति, पूंजी का एक भाग या सारा भाग अपने पौत्र के नाम वसीयत कर देता है। श्री विनीत जी के जन्म समय की एक घटना याद आ रही है—–! जब दादा गुरुदेव निखिल जी अपने बड़े पौत्र श्री विनीत जी के जन्म पर स्वयं जीप ड्राईव करते हुये नंगे पांव पाल बाला जी मन्दिर (जोधपुर का पौराणिक मन्दिर) में बाला जी को भारी मात्रा में लड्डु अर्पित करने स्वयं अकेले गये थे, इस बात से ही यह अनुमान लगाया जा सकता है, कि वे अपने बड़े पौत्र से कितना स्नेह, प्रेम रखते हैं। यह तो एक सांसारिक जीवन की घटना हुयी अपितु आध्यात्मिक दृष्टि से भी वे श्री विनीत जी को गुरु पद का श्रेष्ठ अधिकारत्व सौंप गये हैं।
सद्गुरुदेव निखिल तो स्वयं एक अवतार है उनके पास तो हर वस्तु के आध्यात्मिक शक्तियों के भंडार भरे हुये हैं। उन्होंने अपने पौत्र गुरुदेव विनीत श्रीमाली जी को शैशव काल से ही आध्यात्मिक अलौकिक शक्तियों का अतुल भंडार योग बल से सुरक्षित कर उनके शरीर में चेतना स्वरूप समाहित कर गये थे। तथा स्वयं अपनी संपूर्ण कलाओं के साथ समाहित हो गये थे जिससे वे अपने शेष कार्यों को शिष्य समुदाय को साथ लेकर सृष्टि में अपने साधकों के जीवन के प्रयोजन को पूर्ण कर सकें। यह भविष्य में जनमानस के सामने उजागर होगा। इसके लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि वह तो पूर्ण गुरु थे उन्हें पता था कि आने वाले समय में मेरे पश्चात मेरे शिष्यों वे उनके पुत्र-पुत्रियों आदि को कौन मार्ग दिखायेगा? कौन स्पर्श दीक्षा उपलब्ध करायेगा, कौन उन्हें दिव्य शक्तियों से परिचय करायेगा जो शिष्य पुनः जन्म लेंगे उन्हें ज्ञान मार्ग से कौन सिंचित करेगा?
किसी भी ऐतिहासिक घटना का साक्षी होना स्वयं का सौभाग्य ही होता है। ऐसे ही कुछ क्षण निखिल धर्म का विस्तार हेतु एक शिष्य का गुरुत्व पद पर आसीन होना अध्यात्म में एक ऐतिहासिक घटना ही है। इस कलिकाल में धर्म का विस्तार करना स्वयं में एक चुनौती से कम नहीं है क्योंकि जहां ढोंगियों का क्रिया-कलाप अपनी चरम सीमा पर है तो वहीं ज्ञान पिपासु सच्चे गुरु की तलाश में जन्म-जन्म भटकते है और केवल सद्गुरु स्वयं अपनी कृपा से अथवा ईश्वर कृपा से ही मिला करते हैं। गुरुदेव विनीत श्रीमाली का रायपुर गुरुपूर्णिमा के शिविर में गुरु पद पर एक औपचारिकता थी वरना उन्हें तो सद्गुरुदेव निखिल ने उनके जन्म लेने के तुरन्त पश्चात ही एक साधना शिविर में घोषणा की थी की तीसरी पीढ़ी के गुरु का आगमन हो चुका है। उनका इतना कहना ही उनके (विनीत श्रीमाली) गुरु होने का प्रमाण था, परन्तु एक राजा के पुत्र का युवराज पद से राजा बनने के पद पर राज्याभिषेक करना पड़ता है। यही परंपरा निभाई जाती है। जब हजारो साधको, शिष्यो के उपस्थिति में यह दिव्य क्रिया उर्ध्वपात दीक्षा सद्गुरुदेव कैलाश चन्द श्रीमाली द्वारा की गई तो गुरुदेव विनीत श्रीमाली जी की छवि शिष्य समुदाय के मानस पटल पर जिस प्रकार अंकित हुयी उसे उन्होने पत्रों, इ-मेल, SMS द्वारा कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर व दिल्ली कार्यालय में प्रेषित किये। किसी साधक को उनमें आदि गुरु शंकराचार्य कि छवि दिखाई दी तो किसी ने उन्हे ओजस्वी सन्यासी विवेकानन्द का प्रतिरूप कहा। यह सब अपने-अपने श्रद्धा अनुरूप साधकों ने भाव व्यक्त की है। ऊर्ध्वपात दीक्षा के उपरांत उनके गौर वर्ण युक्त भोले-भाले मुख मंडल पर शत दल के समान प्रस्फुटित दो कमल नयन, साधारण कद, योगियों के समान सुगठित हष्ट-पुष्ट शरीर तथा अपने शरीर व वस्त्रों के प्रति बेपरवाह वह सिद्धाश्रम का योगी सदृश्य गुरुत्व पद की गरिमा से अभिभूत सभी साधकों वह शिष्य समुदाय को अपनी ओर आकृष्ट कर रहा था।
जीवन में सभी सम्बन्ध स्वार्थ पर आधारित होते हैं चाहे वह माता-पिता का हो, भाई-बहन, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्रियों का किसी से भी हो मृत्यु के पश्चात समाप्त हो जाता है और आगे कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता। जीवन काल में भी धन संपत्ति जमीन जायदाद, तक ही सीमित होता है। यदि हमारे पास भौतिक वस्तुओं की कमी हो तो सब सम्बन्ध समाप्त हो जाता है। कोई रिश्ते नहीं बन पाते। केवल एक सम्बन्ध ऐसा है जो निस्वार्थ और प्रेम युक्त होता है तथा जन्म-जन्म तक साथ चलता रहता है, वह गुरु का शिष्य से सम्बन्ध है। गुरु प्रत्येक जन्म में अपने शिष्य को खोजता रहता है, पुकारता रहता है और पास बुलाकर उसे मोक्ष मार्ग पर गतिशील करता रहता है। इसमें गुरु का कोई स्वार्थ नहीं होता वरन् गुरु को इसमें अपनी तपस्या खर्च करनी पड़ती है और गुरु को एक संतुष्टि होती है की मेरा शिष्य पूर्ण से साक्षात्कार कर सका।
गुरु एक मेघ खण्ड है, बादल है, जिसमें अमृत रस भरा हुआ है शिष्य को कुछ ऐसी क्रिया तथा ऐसे कार्य करना चाहिये कि वह गुरु रूपी मेघ शिष्य के ऊपर बरस कर उसे अमृत रस से सरोबार कर उसे पूर्ण रूप से तृप्त कर दें। ऐसा हो सकता है यदि हम सद्गुरुदेव निखिल के कार्यो को पूर्णता देने के लिये, उनके ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने के लिये एक जुट हों तथा दूसरों को स्वयं के संगठन कैलाश सिद्धाश्रम साधक परिवार से योग कर उन्हे सद्गुरुदेव के ज्ञान से परिचित करायें। गुरुदेव विनीत श्रीमाली जी के नेतृत्व में यह क्रिया देश में ही नहीं विदेशों में भी अपना-अपना स्थान बनाते हुये निरंतर-निरंतर उन्नति की ओर गतिशील हो रही है।
उनमें दो-दो सद्गुरु की शक्ति का समावेश हो गया है। प्रथम सद्गुरु निखिल व सद्गुरु कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी की आध्यात्मिक शक्तियां से वे युक्त हैं। यह सब आने वाले समय में शिष्य समुदाय एवं साधक अपनी साधनाओं की सिद्धि के रूप में उनके आशीर्वाद से पा सकेंगे।
19 जुलाई 2016 रायपुर की यह गुरु पूर्णिमा इतिहास की एक अमूल्यवान धरोहर के क्षण है जहां ऋषिकालीन युक्त की याद मानस पटल पर उभर आती है जो सद्गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी के कठिन तपस्या, साधना, परिश्रम एवं अथक प्रयासों से संभव हो सका जिससे हमें एक और चेतनावान जीवित जागृत चैतन्य गुरु का सानिध्य मिल सकेगा। शिष्य समुदाय एवं साधक सद्गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी का सदैव ऋणी रहेगा। यह जाज्वल्यमान ज्योति निरंतर-निरंतर हमारे आत्मीय भाव और संगठन से ही प्रकाशित रह सकती है। क्योंकि सद्गुरुदेव का चिंतन केवल और केवल साधकों के प्रति प्रेम और सामीप्य का भाव है।
अरूण मिश्रा
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