





पूरे भारत वर्ष एवं पश्चिमी देशों में भारतीय संस्कृति की ज्योति प्रज्ज्वलित करने वाले व्यक्तित्व निखिलेश्वरानन्द, जिनका गृहस्थ नाम डॉ- नारायण दत्त श्रीमाली की छवि आज भी सूक्ष्म रूप में सर्वत्र विद्यमान है तथा साधकों शिष्यों को उनका दिव्य दर्शन होता ही है। ऐसे सद्गुरू का सानिध्य और शिष्यता पाकर मेरी आत्मा तृप्त हो गई, कई जन्मों का भटकाव आपको पाकर समाप्त हो गया। सद्गुरूदेव अपने सशरीर रहते गृहस्थ शिष्यों को अपने परिवार से भी ज्यादा अपनत्व दिया, शिष्यों के लिये अपने खून का एक-एक कतरा न्यौछावर करने को तत्पर रहें। अपनी तपस्यांश एवं साधनाओं की शक्ति से शिष्यों को साधनात्मक ऊंचाई पर पहुंचाने में निरन्तर अपने जीवन में प्रयत्नशील रहें। अपने अन्दर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की अगम्य अगोचर साधनाओं को समेटे हुये।
साधारण से घर में जन्म लेकर जिस प्रकार से भारतवर्ष की लुप्त होती हुई प्राचीन संस्कृति ज्ञान, विज्ञान, मंत्र, योग दर्शन और आध्यात्मिकता को जिस प्रकार से अपने व्यक्तित्व के बल पर पुनजीर्वित कर समाज को यह ज्ञान दिया कि एक छोटा सा व्यक्ति भी अपनी क्षमता के बल पर साधनाजयी बन सकता है कि जिससे वह पूरे विश्व के साधकों के हृदय पर छा जाये, जिसने आयुर्वेद और दुर्लभ जड़ी बूटियों की शोध कर प्रायः विज्ञान को जो नये आयाम दिये हैं, मृतप्राय आयुर्वेद को जिस प्रकार से संजीवनी देकर जीवन्त किया हैं। सद्गुरूदेव निखिल आप कहां हो?
तुमने निगाहें लुत्फ़ से, देखा था एक बार दुनिया बदल गयी मेरी, इतनी सी बात में लाखों गृहस्थों को अपनी तेजस्विता एवं शक्ति प्रदान कर उनसे गुरू-शिष्य का सर्वोच्च प्रेम संबंध जोड़ने वाले मसीहा जिन्होंने गृहस्थ शिष्यों के लिये अपना पूरा जीवन न्यौछावर कर दिया, सद्गुरूदेव ने गृहस्थ शिष्यों को साधना एवं सिद्धियों को प्रदान करने के लिये अपने संन्यास जीवन में साथ रहें शिष्यों, योगियो से विद्रोह किया, जिन्होंने अपने परिवार से भी विद्रोह करके गृहस्थ शिष्यों को अपना जीवनदान किया, उन्होंने अपनी साधनाओं एवं सिद्धियों के प्रभाव से गृहस्थ शिष्यों को अनगिनत कष्टों को अपने ऊपर झेलकर उनकी मनोकामनायें पूर्ण की।
शिविरों के माध्यम से गृहस्थ शिष्यों को द्वापर युग में भगवान कृष्ण की तरह प्रेम का रसपान कराया, बुद्ध की तरह ध्यान योग सिखाया। जिन्होंने शिष्यों को अपनी तपस्यांश से तेजस्वी बनाया, साधनाओं के माध्यम से उन्हें साधकत्व प्रदान करते हुये देव तुल्य बनाया। अपने शिष्यों में पुनः जोश और उमंग भरी। शिष्यों को आत्मलीन होने की क्रिया समझाकर आत्म सौन्दर्य से परिचित कराया। जिसने प्रेम करने की कला सिखाई, जिसने गृहस्थ शिष्यों के रूप में विश्व को नयी दिशा देने के लिये सिद्धियां प्रदान की। जिसने इस भारतवर्ष को पुनः विश्व का आध्यात्मिक गुरू बनाने के लिये अपनी तेजस्विता से कई दीपक आलोकित किये, ऐसा महातेजस्वी सूर्य साधनाओं का शक्ति पुंज से विश्व को आलोकित करने वाले सद्गुरूदेव निखिल आप कहां है?
इस बार तेरे साथ मुस्कराने की ऐसी सजा मिली ता उम्र मेरी आंख से आंसु निकल रहें।। हे गुरूदेव! यह काल की कौन सी क्रूर विडम्बना, विधाता की लेखनी, गृहस्थ शिष्यों का दुर्भाग्य है कि जिसकी छाया तले अभी हम गृहस्थ शिष्यों में कुछ कर गुजरने की क्षमता विकसित होने की क्रिया प्रारम्भ होने वाली थी। साधना एवं सिद्धियों का रस कण्ठ को आप्लावित करने के लिये अपने प्रारम्भिक स्तर पर था। जिनमें सद्गुरु निखिल की ज्योति प्रज्वलित होने लगी थी। जिनमें शेर की हुंकार गुंजरित होने को थी। जिनमें प्रेम रस संचार होने लगा था। जिनमें पाश्चात् संस्कृति से विमुख होकर भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाने का भाव पैदा हुआ। जिनमें भक्ति नहीं शक्ति चाहिये। उसके कारण यह पूछना पड़ रहा है कि सद्गुरूदेव निखिल आप कहां हो?
ये क्या चंद ही कदमो पे, छोड़ कर चले गये।
तुम्हे तो मेरा साथ, दूर तक निभाना था।।
निखिलेश्वरानंद जी का सिद्धाश्रम गमन करना विधाता के लेख में सही हो सकता है। परन्तु आपके पृथ्वी तल पर न रहने के कारण हम शिष्यों में प्राण तत्व नहीं है। मैं ही नहीं पूरी पृथ्वी के गृहस्थ शिष्य निष्प्राय और गतिहीन हो गये हैं। जिसमें हलचल नहीं है, स्पन्दन नहीं है। हमें दुख है कि जब तक हमारे अन्दर कोई चेतना नहीं थी, समझ नहीं थी। तब तक आपने हमें अपने सीने से लगाया, हमारे हमदर्द बने रहें, जब हममें समझ आने लगी। जब हमें कुछ अहसास होने लगा, जब हमें आपसे प्रेम होने लगा। जब हमें आपका पृथ्वी तल पर उपस्थित होने का महत्व समझ में आने लगा। जब हमें कुछ अहसास होने लगा। तब आप हमें अकेला छोड़कर सिद्धाश्रम गमन कर गये।
यह सही हो सकता है कि गृहस्थ शिष्यों ने आपके साथ घात-प्रतिघात किये हैं, यह हो सकता है आपकी आलोचनायें की हों, हमारे कारण आपको जरूरत से ज्यादा विषपान करना पड़ा। यह भी हो सकता है कि हमने आपको तिल-तिल कर जलाया है, परन्तु क्या यह सही नहीं कि हमे आपसे बहुत प्रेम है, क्या यह सही नहीं है कि हमारे जीवन के आधार तत्व आप ही हो। क्या पुत्रों से पिता इसी आधार पर निष्ठुर होकर अलग हो सकते हैं। जबकि उनमें सही समझ नही हैं, और अब समझ आयी है तो फिर पूछना पड़ रहा है। सद्गुरूदेव निखिल आप कहां हो?
दुनिया ने जो जख्म दिये, बयां तुमसे कर दिये।
तुमने जो जख्म दिया, बयां किसी से कर न सका।।
समाज से जो दर्द हमें मिला, जो जख्म मिले वो तो आपने अपने ऊपर सहन कर लिया। पर जो जख्म आपने दिया वो असहनीय है, वो किससे कहें, संन्यासी शिष्यों के पास एक आस थी कि आप वापस आओगे हमसे तो आपने हर आस, हर उम्मीद छीन ली। हमारे जीवन की यह घनघोर कालिमा कभी समाप्त ना होने जैसा प्रतीत होता है।
तुमने कहा था जी भर के देख लो मुझे।
अब आंख भर आती है पर तुम नजर नहीं आते।।
अभी तो हमने जी भर कर तुम्हे देखा भी नहीं था।
अभी-अभी तो हम मिले थे, अभी हमने अपने पैर जमीन पर रखें ही थे, अभी हमारा संभलना शुरू ही हुआ था। एक बार प्रवचन के दौरान आपने गुरू और शिष्य के महत्व को समझाते हुये कहा था, कि जो पक्षी हरे-भरे पेड़ का आश्रय लेता है, वह उसी के छाया तले विश्राम करता है, भविष्य में पेड़ सूख भी जाता है, तब भी वह पेड़ को छोड़ता नहीं। पर यहां तो विपरीत ही हो गया है, पक्षी तो उस हरे या सूखे हुये पेड़ पर विश्राम कर ही रहा है, परन्तु पेड़ स्वयं ही अपने स्थान से उठकर बहुत दूर जा चुका है। फिर उस पंछी का कहां आश्रय रह जाता है, वह किसकी गोद में अपना आशियाना बनायें। ये आंखे कहती हैं हे सद्गुरूदेव निखिल आप कहां हो?
पथरा गई हैं आंखे तेरे दीदार को।
कोई तो बता दे तेरा ठिकाना कहां है।।
वर्षों बीत गये आपके दर्शन हुये, गुरूवर हम तो आपके जाने के बाद एक पल के लिये भी आपको भूल नहीं पाये, प्रातः आपके दर्शन की आस लिये आता है, शाम मुझे पुनः वेदना अंधेरी गलियों में छोड़ जाता है, ऐसा प्रतिदिन होता है। लेकिन सांस की अन्तिम आस अभी भी बाकी है। गुरूवर बहुत से शिष्यों को आपका सानिध्य, आपके दर्शन नहीं प्राप्त हुये, हम सिर्फ एक ही उम्मीद के सहारे जीवित हैं कि कभी तो आप हमें अपना दर्शन देंगे आपके प्रेम रस में सरोबार होने का सौभाग्य हमें भी प्राप्त होगा। किसी जन्म में तो यह प्यास बुझेगी ही। हमारे इस पीड़ान्तक गहराई की ओर कभी तो आपका ध्यान जायेगा। हमें यह पूरा विश्वास है कि हम भटक सकते हैं, पर आप हमारा साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। जब दर्द की सीमा अपने प्रगाढ़ अवस्था में होती है तो आपके प्राणवान चित्र से बातें करके अश्रुपूर्ण श्रंद्धाजलि प्रदान कर संतोष अनुभव करते हैं। कि शायद आपके प्राणवान चित्र से दो बाते हो जायेंगी, परन्तु यहां भी हमारा दुर्भाग्य हमारे साथ होता है। आपके आडियो, वीडियो कैसेट, पत्रिका में प्रकाशित प्रवचन पढ़कर हम अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं, और अपने जीवन की दुर्भाग्यहीन रेखाओं को कोसते हैं।
खुश तो होगा तू सिद्धाश्रम की वादियों में।
पर हमारे प्रेम से अनजान तो नहीं ।।
सिद्धाश्रम में सन्यासी शिष्यों के समर्पण, प्रेम के बीच आप प्रसन्न तो होंगे ही। सिद्धाश्रम का जीवन आपके लिये सुखद और अनुकूल होगा। छल, कपट, झूठ से परे आपके जीवन के लक्ष्य हेतु सहायक होगा। सिद्धाश्रम का वातावरण और गुरुदेव सच्चिदानंद जी के सानिध्य में आपका जीवन आनन्दमय तो होगा ही। यही हम शिष्यों की इच्छा भी है। सिद्धाश्रम के ऋषि, मुनि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग, अत्रि अन्य पूज्य ऋषिवर देवता अपने बीच आपको पाकर खुश हो रहे होंगे और खुश भी क्यों ना हो, आप सभी सिद्धाश्रम वासियों को परम पूज्य सद्गुरूदेव निखिलेश्वरानंद जी का सानिध्य पाने की बधाई! परन्तु इस चिंतन का क्या होगा, जिस चिंतन के कारण आपने गृहस्थ शिष्यों के रूप में छोटे-छोटे दीपक प्रज्ज्वलित किये थे।
परन्तु यह भी ध्रुव सत्य है कि आपने हमें पूरी तरह से अनाथ नहीं किया। अपने ज्ञान दीप को निरंतर प्रकाशित करने के लिये सद्गुरूदेव कैलाश जी जैसे महान व्यक्तित्व दिये है। जो आपके ही प्राण अंश हैं, आपकी प्रतिमूर्ति स्वरूप सद्गुरूदेव कैलाश जी हम गृहस्थ शिष्यों को प्रकाशमान कर रहें हैं। यह आपकी ही महती कृपा है कि आपने हमें जीवन रेगिस्तान में अकेला नहीं छोड़ा, तफ़ूानों में भी हाथ थामने के लिये भौतिक रूप से अपनी मूर्ति सद्गुरूदेव कैलाश जी के रूप में प्रदान की है। जिनके छाया तले हजारों शिष्य आनन्दित जीवन व्यतीत कर रहें हैं, और अपनी लक्ष्य की ओर निरंतर गतिशील है, आपकी चेतना आज भी करोड़ो शिष्यों के हृदय में दैदीप्यमान है और वे निरन्तर निखिल धर्म के प्रचार-प्रसार और आपके आदर्शों को स्थापित करने के लिये सद्गुरूदेव कैलाश जी के सानिध्य में पत्रिका के प्रचार-प्रसार और दुर्गम स्थानों पर शिविरों का आयोजन कर पूरे भारतवर्ष और अनेक देशों में निखिल धर्म को स्थापित कर रहें हैं, यह दृश्य देखकर निश्चय ही आपको प्रसन्नता हो रही होगी। कि आपके द्वारा रोपा गया ज्ञान रूपी पौधा आज विशाल वृक्ष के रूप में स्थापित हो रहा है। जिसकी शीतल हवा से अनेक शिष्य और सामान्य जनमानस शीतलता प्राप्त कर रहा है, और उनका जीवन आनन्दित व प्रसन्नता युक्त है। आपकी उपस्थिति प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निरतंर हमें अनुभव होती है। फि़र भी आपकी याद आती है तो इतना ही कह पाते हैं कि सद्गुरूदेव निखिल आप कहां हो?
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,