





गुरू का अर्थ है – ज्ञान, तृप्ति, आनन्द, मस्ती और पूर्णता, जिसकी खोज सदैव इस जीवात्मा को रही है—और रहेगी। उपनिषद् काल में ऋषियों, महर्षियों और ज्ञानियों की श्रेणी उजागर हुई, अवश्य ही उन्होंने गुरू साधना में पूर्णता प्राप्त की होगी, तभी तो यह ज्ञान पूर्णत्व प्रदाता है। सूर्य नित्य ही इस धरा की यात्रा में गतिशील बना रहता है। सूर्य किसी अर्घ्य प्राप्ति की आशा में इस धरा पर नहीं आता वरन् व्यक्ति उन्हें अर्घ्य देकर स्वयं अपने, ही जीवन को उदात्त व पवित्र बनाने की ही चेष्टा करता है।
यही कार्य सद्गुरू का भी होता है। उनका आगमन और प्रस्थान सदैव इसी भांति होता रहा है। वे इस धरा पर ‘उदित’ होते हैं और फिर प्रकाश करने के लिये बढ़ जाते हैं, उस ओर, जो अंधकार में डूबा हो, क्योंकि विराट होता है उनका पथ और विराट होते हैं उनके लक्ष्य! सूर्य तो वस्तुतः कभी अस्त होता ही नहीं और इसी प्रकार से गुरू भी कभी विरत नहीं होते, केवल उनके क्रिया-कलापों के क्षेत्र इस ग्रह से अन्य ग्रहों पर विस्तारित भर होते रहते हैं।
यदि हम सूर्य का वैज्ञानिक विश्लेषण करें, तो ज्ञात होता है, कि उस ग्रह मात्र में निरन्तर विस्फोट होते रहते हैं, जिससे अपरिमित ऊर्जा व ताप उत्पन्न होता रहता है। इसी वैज्ञानिक तथ्य को यदि भावमय ढंग से कहें, तो सूर्य की ऊर्जा का रहस्य मानो उसके अन्दर निरन्तर रहने वाले किसी आलोड़न-विलोड़न में छिपा होता है और स्वयं में प्रतिपल विखंडित होता हुआ, उस विखंडन के उद्वेगों को सहन करता हुआ ताप से भरा होने के उपरान्त भी वह निरन्तर प्रकाश को देने की क्रिया में संलग्न रहता है।
सद्गुरू के अन्तर्मन में भी इसी प्रकार प्रतिक्षण अनेकों-अनेक ज्वालामुखी फटते रहते हैं, उन्हें संताप व वेदना देते ही रहते हैं और ये ज्वालामुखी होते हैं, शिष्य की न्यूनताओं के, उसकी अहंमन्यता के, उसकी कृतघ्नता के, उसके व्यभिचार के, उसकी धूर्तता के, उसके छल-कपट, द्वेष और मक्कारी के। इसके उपरान्त भी गुरू के प्रयास उसी प्रकार मंद नहीं पड़ते हैं, जिस प्रकार से सूर्य का प्रकाश मंद नहीं पड़ता है। वे तो अपना प्रकाश बिखेरने की क्रिया में संलग्न रहते ही हैं।
अपने भावमय व क्रियाशील स्वरूप में सूर्य सदृश्य होने के उपरान्त भी सद्गुरू इस ब्रह्माण्ड के कोई निर्जीव ग्रह नहीं होते हैं अपितु अपने हृदय, अपनी चेतना और अपनी करूणा के विस्तार के कारण ब्रह्माण्ड के सर्वाधिक चैतन्य व्यक्तित्व ही होते हैं। यदि उनमें करूणा और जीवों के प्रति एक प्रकार का आग्रह न होता तो वे अपनी परम शांत स्थिति, अपनी समाधि त्यागना ही क्यों चाहते? जिस समाधि के सुख को प्राप्त कर कोई भी साधक इस जगत के क्षुद्र द्वन्द्वों में लौटना चाहता ही नहीं, गुरूदेव उसी सर्वोच्च सुख को त्यागने की क्रिया कर स्वयं को बलात् अपने शिष्यों के जीवन के छोटे-छोटे द्वन्द्वों में उलझा देते हैं।
जीवन तो स्वयं में एक श्रृंखला होती है और उस श्रृंखला का तो केवल ज्ञान चक्षुओं से ही साक्षात् किया जा सकता है। सद्गुरू अपने आगमन के पश्चात् उन कारणों की श्रृंखला जानने के उपरान्त भी, अपने शिष्य को, उससे मुक्त कराने की चेष्टा करते हैं जिनके कारण वह विविध कष्टों एवं बन्धनों में फंसा छटपटा रहा होता है। ऐसा करना उनकी कोई विवशता नहीं होती है अपितु विशुद्ध रूप से करूणा ही होती है। इसी कारणवश सद्गुरू को सर्वोच्च रूप से प्रणम्य माना गया है। जीव तो अपने कर्मों के फलानुसार निरन्तर जन्म-मरण के चक्र में, एक प्रकार से कहें तो वह बस बह ही रहा होता है, उसमें गुरू को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता ही क्या और क्यों? किन्तु करूणा का कोई प्रवाह होता है, चिन्तन की कोई पृथक् भावभूमि होती है, जिसे आत्मसात् करना सामान्य जीव की धारणा-शक्ति में सम्भव नहीं हो सकता है।
और इसके प्रत्युक्त में कोई शिष्य उन्हें क्या देता है? केवल अपने पाप-ताप-दुःख अथवा अपने अहंकार रूपी नाखूनों के तीखे घाव! कभी मैंने एक कथा पढी थी, कि एक साधु पानी में बहते एक बिच्छू को बार-बार बचाने की कोशिश कर रहा था और वह बिच्छू बार-बार उस साधु को ही डंक मारता जा रहा था। किनारे पर खड़े एक ग्रामीण से जब नहीं रहा गया, तो उसने उस साधु से जानना चाहा, कि वह फिर भी उस बिच्छू को क्यों बचाना चाह रहा है? साधु का सहज स्मित उत्तर था- अपनी-अपनी प्रकृति है!
साधु पुरूष सद्गुरूदेव ‘निखिल’ आज भी इस समाज में इसी ढंग से निरन्तर गतिशील बने हुये हैं। शिष्य कितना भी दुख, पाप-दोष, कुविचार, छल से उनके चित्त पर डंक मारे किन्तु सद्गुरू का समस्त आग्रह इसी बात पर केन्द्रित है, कि किस प्रकार से उनको (शिष्यों को) सुखी और सम्पन्न बनाया जा सके साथ ही इस जन्म मरण की अविरल बहती धारा से बाहर निकालने के उनके प्रयास सफल हों। जिस प्रकार से उस साधु ने अपने स्नान की बात को भूल कर बिच्छू को निकालने के प्रयासों में ही स्वयं को केन्द्रित कर दिया था, उसी प्रकार से अनेक शिष्यों को जीवन चक्र से निकालने के प्रयासों में गुरूदेव ने भी अपने आनन्द के अवगाहन को, जिसे महान योगीजन नित्यप्रति ध्यान, समाधि के माध्यम से करते रहते हैं, विस्मृत कर दिया है।
निखिल शाश्वत हैं, सत्य हैं, शिव हैं और सुन्दरतम् हैं। इसलिये गुरू को सत्यम् शिवम् सुन्दरम् कहा गया है। और हम प्रतीक्षा करते हैं, हमारे जीवन के सूर्योदय दिवस 21 अप्रैल की, जिस दिन इस धरा पर सद्गुरूदेव ने अपनी पहली प्रकाश किरण और हम शिष्यों को ऊर्जा तथा चैतन्यता प्रदान की, इसलिये अवतरण दिवस की महामहिमा है। परमहंस सद्गुरूदेव भगवान जब पुनः इस धारा पर नारायण स्वरूप में अवतरित हुये, तो उसी क्षण एक नये युग का प्रारम्भ हुआ। पुनः एक ज्ञानवान सूर्य का उदय हुआ, जिसके जाज्वल्यमान प्रकाश से सभी शिष्य, साधक आलोकित हो रहें। वास्तविक रूप से यह शिष्यों के जीवन की नूतनता का दिवस है, अपनी अज्ञानता, निर्धनता, अभाव को समाप्त करने का अवसर है, इस जन्मोत्सव से शिष्य अपने जीवन में हर स्वरूप में श्रेष्ठता और नूतनता की प्राप्ति के लिये क्रियाशील होता है, क्योंकि इसी दिव्य दिवस पर सिद्धाश्रम की चैतन्य रश्मियां साधक के रोम-रोम में समाहित होकर सद्गुरूमय रंग से सराबोर कर देती हैं, सिद्धाश्रम के सभी ऋषि-मुनि-योगी सद्गुरूदेव संग अपने आशीर्वाद की वर्षा करते ही हैं। इसी हेतु महामाया अम्बे सिद्धदात्री सद्गुरू जन्मोत्सव साधना शिविर 19, 20, 21 अप्रैल को धरमजयगढ़ रायगढ़ में सम्पन्न होगा। जिससे साधक सिद्धदात्री महामाया अम्बे की चैतन्य भूमि पर ज्ञान, क्रिया, इच्छा शक्ति को पूर्णता आत्मसात कर सकेंगे साथ ही ज्ञान, धन लक्ष्मी, कर्म शीलता, आयु वृद्धि, आरोग्यता और सभी सुखों से युक्त होकर सद्गुरूमय पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते! पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते को प्राप्त कर सकेंगे।
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