





महर्षि वाल्मीकि किसी ग्रंथ में पिता प्रचेता (प्राचीन ब्रह्मर्षि) माता चर्षिणी के दसवें पुत्र, कहीं वरूण पुत्र, कहीं भृगु भ्राता भार्गव कहलाये। इनको ब्रह्मा का अवतार भी माना गया है। जिस प्रकार श्री नारद ब्रह्मपुत्र होते हुये भी शापादि के कारण दासी पुत्र के रूप में उत्पन्न हुये। इसी प्रकार ब्रह्मा अवतार वाल्मीकि का जन्म भृगुवंशीय ब्राह्मणों के घर हुआ। उपनिषद के अनुसार ये भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे।
प्रायः अधिकांश ग्रन्थों में दुष्ट कर्म के कारण दस्यु, व्याधा अथवा निषाद जाति के कहलायें। कहीं वर्णन आता है कि महर्षि वाल्मीकि सप्तर्षियों द्वारा, कहीं नारद जी द्वारा अथवा ब्रह्माजी के द्वारा उपदेशित ज्ञान प्राप्त कर चौर्य कर्म से मुक्त हुये थे। किन्तु यह वर्णन सभी ग्रन्थों में आता है कि महर्षि वाल्मीकि राम नाम को मरा-मरा जप करते हुये राम को सिद्ध किये थे। कुछ ग्रन्थों के अनुसार वे श्रीराम अवतार से भी पूर्ववर्ती हैं, कहीं श्रीराम को सिद्ध कर वे पूर्णत्व प्राप्त किये ऐसा वर्णन ग्रंथों में मिलता है। किन्तु इन सब के बाद भी यह सत्य है कि वे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के रचियता हैं।
स्कन्द पुराण वैष्णव खण्ड में वाल्मीकि के राम-नाम के प्रभाव से ऋषि रूप पाने का वर्णन है। स्कन्द पुराण अवन्ती खण्ड के 24 वें अध्याय में वर्णन मिलता है कि अग्नि शर्मा नामक ब्राह्मण जो दस्यु वृत्ति से अपनी आजीविका चलाते थे। एक बार सप्तर्षियों से भेंट होने पर उनकों यह यथार्थ ज्ञान हुआ कि जिस पाप कर्म के कर्ता वे हैं उस कर्म के भोक्ता भी मात्र वे ही रहेंगे। वे अपने माता-पिता, पत्नी, संतान सभी की इस विषय में भागीदारी न होने से निराश हो कर ऋषि चरणों में समर्पित हुये। परिवारजनों से पर्याप्त संतोष न प्राप्त होने पर उन्होनें प्रायश्चित करने का निश्चय किया। तभी ऋषिगणों ने नाम जप का मार्ग बताया। वे ही ब्राह्मण अग्नि शर्मा जप में लीन होने पर वल्मीका वृत्त हो गये।
और वे ही परम सिद्ध वाल्मीकि कहलाये। इसी प्रकार स्कन्द पुराण नागर खण्ड में प्रभास खण्ड के 217 वें अध्याय में वैशाख नामक दस्युवृत्ति प्रवत्त ब्राह्मण का सप्तर्षियों की भेंट से तपोपरान्त वाल्मीकि ऋषि होने का उल्लेख है।
अध्यात्म रामायण में श्री वाल्मीकि स्वयं कहते हैं कि ‘मैं द्विज के घर में जन्म लेकर भी शूद्र संसर्ग के कारण सदोष ही नहीं चौर्यादि निकृष्ट कार्यों में भी लिप्त रहा। महर्षि वाल्मीकि ने कहा है कि चौर कर्म करते हुये एक बार सप्तर्षियों के शरणापन्न होने पर पापधिक्य कार्यों से राम नाम ना जप पाने के कारण मुझे मरा-मरा मन्त्र उन्होंने दिया।
इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम्
एकाग्रमनसात्रैव मरेति जप सर्वदा।।
अर्थात् हे राम ऐसा विचार करके सप्तर्षियों ने आपके नामक्षरों को उल्टा करके मुझसे कहा-‘तू इसी स्थान पर रह कर एकाग्रचित से सदा मरा-मरा जपा कर।’ इसी प्रकार का ‘मरा-मरा’ मन्त्र जपने का उल्लेख भविष्य पुराण में भी है। जप काल की निमग्नता के कारण कब चीटियों ने इनके पूरे शरीर पर वाल्मीकि बना लिया इनको पता ही ना चला वाल्मीकि से निकलने के पश्चात् इनका नाम वाल्मीकि पड़ा। यही प्रमाण आनन्द रामायण में भी प्राप्त होता है। श्रीविष्णु धमोत्तर पुराण में वाल्मीकि मूर्ति निर्माण का प्रमाणित वर्णन है।
यह प्रमाण भी उनके तपस्वी तथा ब्रह्मर्षि स्वरूप को प्रमाणित करता है। वहीं श्रीविष्णु धर्मोत्तर पुराण में वाल्मीकि जी को विष्णु अंश कहा गया है तथा यह भी बताया गया कि कलियुग में ये तुलसी दास जी के रूप में श्रीराम कथा का लोक सरल भाषा में प्रणयन करेंगें।
यह सर्व विदित है कि जैसी रचना महर्षि वाल्मीकि जी ने की, वैसी उनके पूर्वज च्यवन या कोई अन्य ऋषिगण नहीं कर सके थे। ‘प्रचेतस’ ग्रंथ के अनुसार वाल्मीकि रामायण के निर्माता वाल्मीकि का सम्बन्ध प्रचेता (वरूण का नाम प्रचेता है) से है। वरूण वंश से अगस्त्यादि ऋषियों का जन्म हुआ। वैसे ही वाल्मीकि का जन्म भी है। इनकों ब्रह्मवतार भी माना जाता है। जिस प्रकार श्री नारद ब्रह्मपुत्र होते हुये भी शापादि के कारण दासी पुत्र हुये। इसी प्रकार वाल्मीकि भी ब्रह्मवतार होकर भी भृगु वंशीय ब्राह्मणों के घर जन्म लेकर आये।
महर्षि वाल्मीकि काव्य निर्माण में भार्गव के तुल्य होने के कारण भार्गव (उशना) कहे गये हैं। उशना कवि सभी कवियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं। पर मानव लोक में श्री वाल्मीकि ही आदि कवि हैं। भृगु ऋषि भी वरूण के ही पुत्र हैं। अतः महर्षि वाल्मीकि को भृगु भ्राता और भार्गव कहा गया है। भार्गव शब्द वाल्मीकि के वरूण स्वरूप प्रचेता के पुत्र होने से एवं वरूण पुत्र भृगु से सम्बन्ध होने से उचित ही है। एतावता उनको भृगुवंशीय होने पर औपचारिक रूप से च्यवन पुत्र कहा गया है।
शिव रामायण में वर्णन है कि ब्रह्मा जी के शाप से श्री वाल्मीकि निषाद हुये, पुनः भृगु वंश में तपस्वी हुये। तत्व संग्रह रामायण के अनुसार भगवान सूर्य तथा भगवान् विष्णु ने श्री वाल्मीकि को रामायण कार होने का आशीर्वाद दिया था।
कृत्ति वासीय रामायण के अनुसार ये रत्नाकर नामक व्याध हुये, इनके पिता का नाम च्यवन ऋषि था। ये व्याध कर्मरत रहते थे। ब्रह्मा के द्वारा राम नाम जप का उपदेश मिला, किंतु पापधिक्य से श्रीराम नामोच्चारण न करने से ‘मरा-मरा’ का उच्चारण किया। फलतः परमसिद्धि के साथ रामायण प्रणेता हुये। मत्स्य पुराण तथा पद्म पुराण में इन्हें भार्गव श्रेष्ठ वाल्मीकि कहा गया। महाभारत के आदिपर्व, सभा पर्व, आरण्यक पर्व, उद्योग पर्व, शान्ति पर्व में वाल्मीकि को महान् पराक्रमी, ऋषि प्रवर, महर्षि तथा ब्रह्मार्षि के रूप में निरूपित किया गया है।
महर्षि वाल्मीकि हिन्दू धर्म के आदि कवि थे जिन्होंने सम्पूर्ण आर्यावत् को एक नवीन चिंतन, मार्ग का ज्ञान दिया। साथ ही उन्होंने यह उपदेश दिया कि जीवन के किसी भी कालखण्ड में जीवन को जिस भी रूप में चाहे निर्माण कर सकता है। उसके मनोवृत्ति और सही मार्गदर्शक, उपदेशक, गुरू पर ही व्यक्ति का जीवन निर्भर होता है। ऐसे श्रेष्ठतम ब्रह्मर्षि श्री श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के रचियता महर्षि वाल्मीकि के चरणों में उनके जंयती पर कैलाश सिद्धाश्रम परिवार की ओर से कोटि-कोटि वन्दन।
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