





पहला सुख निरोगी काया को प्राप्त करने के लिये भगवान धन्वन्तरी की साधना करना अनिवार्य ही है। भगवान धन्वन्तरी तो स्वयं सृष्टि के प्राणियो के चिकित्सक हैं,इसी के फलस्वरूप सामान्य जन के लिये रोगों का शमन करना तो उनके लिए अत्यन्त ही सरलतम उपाय भगवान धन्वंतरी की साधना ही है। आरोग्मय देह को सबसे बडा धन कहा गया है।
समुद्र मंथन से उत्पन्न चौदह रत्नों में से धन्वन्तरी प्रमुख रल हैं, जिन्होंने इस संसार को आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान किया। आयुर्वेद को पांचवा वेद माना जाता है तथा आयुर्वेद के नियमों का पालन कर मनुष्य सदेव निरोग रह सकता है। धन्वन्तरी साधना जीवन का एक वरदान है, जिसे धन त्रयोदशी अथवा किसी भी त्रयोदशी को सम्पन्न कर आरोग्यमय जीवन की प्राप्ति संभव है।
पुराणों के अनुसार अमृत प्राप्ति हेतु देवताओं और असुरों ने जब समुद्र मंथन किया तब उसमें से एक अत्यन्त दिव्य कांतियुक्त आभूषणों से सुसज्जित सर्वांग सुन्दर और तेजस्वी, हाथ में अमृत कलश लिए हुए एक अलौकिक पुरुष प्रकट हुए। यह ही आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धन्वन्तरी के नाम से विख्यात हुए। इनका अविर्भाव कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को हुआ और इसी लिए इनकी जयन्ती आरोग्य देवता के रुप में प्रतिवर्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, जिसे धन त्रयोदशी कहा जाता हे, के दिन सम्पन्न किया जाता है। भगवान धन्वन्तरी ने ही देवताओं के जीवन के लिए और स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद शास्त्र का उपदेश ऋषि विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत को दिया। रोग के सम्पूर्ण नाश के लिए भगवान धन्वन्तरी द्वारा रचित धन्वन्तरी संहिता आयुर्वेद का आधार ग्रंथ हे।
भगवान धन्वन्तरी विष्णु के अंश हैं और उनका नाम मात्र लेने से रोगों का नाश हो जाता है। विष्णु पुराण के अनुसार –
धन्वन्तरी ने प्रकट होने पर अपने समक्ष उपस्थित भगवान विष्णु का दर्शन किया। भगवान ने उनसे कहा कि- तुम अप् अर्थात् जल से उत्पन्न हो इसलिए तुम्हारा नाम अब्ज होगा। इस पर अब्ज ने कहा कि ‘भगवन्! मुझे लोक में कोई स्थान प्रदान करें। मेरे यज्ञ भाग की व्यवस्था करें।’ प्रभु ने कहा, “तुम्हारा अविर्भाव देवताओं के पश्चात हुआ है। देवताओं के ही निमित महार्षियों ने यज्ञ-आहुतियों का विधान किया है। अतएव तुम यज्ञ भाग के अधिकारी नहीं हो सकते, किन्तु अगले जन्म में मातृ-गर्भ में ही तुम्हे अणिमादि सम्पूर्ण सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाएंगी और तुम देवत्व को प्राप्त हो जाओगे। तुम काशीराज के वंश में उत्पन्न होकर अष्टांग आयुर्वेद शास्त्र का प्रचार करोगे।’ इतना कह कर भगवान अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् भगवान धन्वन्तरी इन्द्र के अनुरोध पर देवताओं के चिकित्सक के रुप में अमरावती में रहने लगे।
यही धन्वन्तरी भगवान के पूर्व वचनानुसार पुनः अगले जन्म में काशीराज दिवोदास धन्वन्तरी हुए। उन्होने लोक कल्याणार्थ ‘धन्वन्तरी संहिता’ ग्रन्थ की रचना की। आचार्य धन्वन्तरी ने विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत को सौ मुनि पुत्रों सहित आयुर्वेद की शिक्षा दी थी।
आयुर्वेद शास्त्र में धन्वन्तरी ऋषि द्वारा दिए हुए ज्ञान से ही भारद्वाज, अश्वनीकुमार, सुश्रुत, चरक आदि ऋषियों ने इस धारा को आगे बढाया तथा मनुष्य के जीवन को स्वस्थ, निरोग एवं आनन्दयुक्त रखने के लिए विभिन्नी उपायों की रचना को।
संसार के सारे चिकित्सा शास्त्र आयुर्वेद से निकले हैं और जो व्यक्ति आयुर्वेद को अपना लेता है वह मानसिक एवं शारीरिक रुप से पूर्ण रुप से स्वस्थ रहता है।
वर्तमान युग में जीवन का सबसे बड़ा दुःख ही रोग है। जीवन में हम कई कारणों से व्यथित रहतें हैं धीरे-धीरे यह क्लिष्ट रोग का रुप ले लेती है। यह व्यथा सामाजिक हो या किसी अन्य प्रकार की, हमारे दैनिक जीवन में इसका प्रभाव हमारे शरीर पर भी पड़ता है। आज के प्रदूषित वातावरण में पूर्ण स्वस्थ रहना तो एक दिव्यतम घटना है, प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होने लग गए हैं। न केवल शारीरिक अपितु मानसिक भी।
इनमें से विभिन्न प्रकार के रोगों का कोई स्थायी इलाज नहीं है, वरन ये रोग दवाओं के द्वारा दबा दिये जाते हें या फिर रोग को उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं को दवाओं के द्वारा निष्क्रिय कर देते हैं लेकिन पुन: कुछ समय बाद दूषित वातावरण पा कर वह रोग पुनः उभर आता है या फिर दवाओं के नियमित प्रयोग से अनेक व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं, जिससे एक प्रकार से रोगों की श्रृंखला निर्मित हो जाती है। एक रोग समाप्त होता है तो दूसरे रोग के लक्षण दिखने लग जाते हैं। वर्तमान चिकित्सा कुछ इस प्रकार की ही है।
यदि हम पूर्व काल की ओर लोटें, तो हम पायेंगे कि उस समय लोग वर्तमान समय से ज्यादा स्वस्थ थे, लेकिन वर्तमान युग में 40-45 वर्ष पूरा करते ही व्यक्ति में धीरे-धीरे जीवन जीने की आशा क्षीण हो जाती है। 55-60 वर्ष को आयु तक तो वह स्वयं वृद्ध तथा जर्जर अवस्था में पहुंच जाता है, उसके अंदर का जोश, उमंग, उल्लास, कार्य करने की शक्ति क्षीण हो जाती है। वह सिर्फ देह की समाप्ति की प्रतीक्षा करता रहता है। मानसिक रुप से वह स्वयं को अशक्त तथा असहाय अनुभव करने लगता है।
आज मानव इस प्रकार का जीवन जी रहा है कि उसे ज्ञात नहीं होता है कि कब उसका योवनकाल आता हे, कब उसकी शैशवास्था समाप्त हो जाती है, कब वह प्रौढ़ बन जाता है। यदि सर्वेक्षण किया जाए तो मानव के अंदर का जोश व उल्लास मात्र 25 या 30 वर्ष की अवस्था तक ही रहता है।
वहीं हम यदि अपने पूर्वजों को देखें तो वे 100 वर्ष पूर्ण कर के भी थके नहीं, जीवन से निरुत्साहित नहीं हुए। हमारे पूर्वज दीर्घायु तो थे। उनकी कार्य क्षमता आज के व्यक्ति से कहीं अधिक थी क्योंकि उनके पास ऐसी चिकित्सा पद्धति थी जिसका वे प्रयोग कर अपनी बीमारियां ठीक कर लेते थे। ऐसा तो नहीं है कि वे रोग ग्रस्त नहीं होते थे, रोग तो पहले भी थे। भगवान कृष्ण के दो पुत्रों को कुष्ठ रोग हुआ था, जिसे उन्होने मंत्रों के द्वारा समाप्त किया।
आज के आदिवासी क्षेत्रों में, जहां आधुनिक सुविधायें नहीं पहुंच सकी हैं, वहां पर रोगों का इलाज मंत्रों के द्वारा तथा उनके अपने प्रयोगों द्वारा होता है तथा वे प्रयोग पूर्ण रुप से प्रभावी होते हैं।
लेकिन चिकित्सा विज्ञान इसको स्वीकार कर पाने में असमर्थ है। वह मंत्र शक्ति के उपयोग को भली प्रकार से नहीं जान पाया हे। मंत्र तथा साधना बल से जर्जर देह को पूर्ण रूप से युवा बनाया जा सकता हे।
आज भी कुछ ऐसी साधनायें हैं जिनको सम्पन्न कर आज भी सन्यासी जनशून्य कन्दराओं में रहने के बाद भी स्वस्थ रहते हैं। उनके पास ऐसी ही साधनाओं में एक रोग मुक्ति हेतु अद्वितीय साधना है ‘पूर्ण आरोग्यमय धन्वन्तरी साधना ‘ जिसे सम्पन्न कर व्यक्ति समस्त प्रकार के रोगों से निवृति प्राप्त कर सकता है। यह प्रयोग हमारे ऋषियों की ओर से हमें वरदान स्वरुप प्राप्त हुआ है। धन्वन्तरी अपने काल में सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक और आयुर्वेदज्ञ रहे हैं। उन्होंने अपने काल में क्लिष्ट से क्लिष्ट रोगों को समाप्त करने के श्रेष्ठमय उपाय बताये है। जिनसे अनेकों ऋषियों और साधकों ने अपने आप को निरोगी रखा हे।
इस साधना को सम्पन्न करने वाला व्यक्ति सदेव ही प्रसन्ना, जोशीला और उत्साहित रहता है और उसकी कार्य क्षमता बढ़ जाती है तथा रोग उसके पास नहीं फटकते। इस साधना में आवश्यक सामग्री हें धन्वन्तरी यंत्र, अश्मिनी ओर आरोग्य माला।
इस साधना को धन त्रयोदशी पर अर्थात इस वर्ष 21 अक्टूबर भौम दिवस उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के श्रेष्ठ मुहुर्त में सम्पन्न करने का विधान है। यह तीन दिनों की साधना हे। साधक को साधना काल में एक समय ही अन्न ग्रहण करना चाहिये। साधक मंत्र जप पूर्ण कर ही आसन से उठे। यदि किसी कारणवश उठना पडे तो पुनः हाथ-मुंह धो कर आसन पर बेठे। यथासंभव दिन भर मोन रहे।
साधक स्नान कर साफ पीले रंग की धोती धारण करे और काले रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करे। अब अपने सामने किसी बाजोट पर लाल रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछा कर उस पर धनवन्तरी यंत्र स्थापित करें व संकल्प लेकर धन्वंतरी यंत्र का पंचोपचार पूजन करें। अब यंत्र की बायीं ओर कुकुम से रंगे चावलों की एक ढेरी बनाए और उस पर अश्मिनी स्थापित करें व उसका पूजन करें। घी का दीपक जला दें। धन्वन्तरी का ध्यान करते हुए यंत्र पर पुष्प अर्पित करें।
पांच मिनट तक गणपति का ध्यान कर ऊँ गण गणपतये नम: का अजपा जाप करें। फिर धन्वन्तरी माला से निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जाप करें।
साधना समाप्ति पर उसी दिन एक मिट्टी के पात्र में यंत्र, माला, अश्मिनी व दो मुट्ठी चावल डाल कर उसे नदी में प्रवाहित कर दें।
जीवन में का प्रथम सुख निरोगी काया होती है चाहे आप कितने ही धनवान हो परन्तु आपको नित्य स्वास्थ्य सम्बन्धी कष्ट-पीडा परेशानियों से ग्रस्त है तो धन का कोई मूल्य नहीं रह जाता। अपने सांसारिक जीवन में निरोग काया सुख् प्राप्ति और दीर्घायु जीवन प्राप्ति हेतु किन्ही तीन मित्रों रिश्तेदारों को पत्रिका सदस्य बनाने पए आपको आरोग्मय धन्वन्तरी शक्तिपात दीक्षा ओर साधना सामग्री उपहार स्वरूप प्रदान की जायेगी।
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