





जीवन के प्रत्येक क्षण का आनन्द लेने का भाव है। बस आप इन्हें सम्पन्न करें और अपने अनुभव अवश्य लिख भेजें—— वंसत ऋतु बीत रही है, वृक्षों में नई बहार आई है। होली का रस उत्सव सम्पन्न किया है। जीवन में आशा, उमंग, विश्वास का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ क्योंकि हम पुराने वर्ष की दुःख भरी बातों को भूल कर आशा और उत्साह से शुक्ल पक्ष में नये वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं और यह महोत्सव है, पर्व है, नवरात्रि का जब साधक के कण-कण में शक्ति तत्व प्रज्जवलित होता है। यही समय है कि विशेष साधनाएं करने का और दोनों बाहे फैला कर नववर्ष के स्वागत का।
क्योंकि उसी समय नयी फसले कटती हैं। सुनहला वातावरण अत्यंत ही सुहावना प्रतीत होने लगाता है, ऐसा लगता है, मानों किसी नयी-नवेली दुल्हन ने थोड़ा-सा घूंघट उठाकर अपने चन्द्रमुख से सबको निहार दिया हो। वे क्षण होते हैं जीवंतता के, सप्राणता के, चैतन्यता के, जब पूरी पृथ्वी आनन्दविभोर हो उठती है और उन्हीं क्षणों में ही मनुष्य नये-नये कार्यों का शुभारम्भ करके प्रसन्नता का अनुभव करता है, क्योंकि वे क्षण ही हर दृष्टि से पूर्ण हो जाने के हैं, अप्रतिम सौन्दर्य, धन, ऐश्वर्य, मान-सम्मान, श्री, वैभव, समृद्धि, सम्पन्नता प्राप्त कर लेने के हैं।
यही क्षण है, जो पूर्णता प्रदान करने में सक्षम है, मनोनुकूल इच्छाओं को पूर्ण कर लेने के हैं, तभी तो देशभर में नवरात्रि की इस पावन बेला को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है, क्योंकि रात्रि के बाद ही सूर्य का तेज पृथ्वी को प्रकाशवान करता है। अतः नवरात्रि समस्त साधकों एवं शिष्यों के जीवन को आलोकित करने का पर्व है, पूर्ण कर देने का पर्व है, क्योंकि तब वह पावन बेला प्रत्येक जीवन को प्रकाशवान, सौन्दर्यवान, ऐश्वर्यवान, धनवान, हर दृष्टि से समर्थवान बना देने में सहायक सिद्ध होती है और तब व्यक्ति उस शक्ति स्वरूपा की शक्ति प्राप्त कर अपने भाग्य को भी परिवर्तित करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। यह मानव स्वभाव रहा है, कि शुरू से ही बलवान शक्तिहीनों पर, विद्वान बुद्धिहीनों पर तथा धनवान निर्धनों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए व्यर्थ ही उन पर अपनी शक्ति का प्रयोग करते रहे हैं।
नवरात्रि ऐसा ही शक्ति पर्व है, जो व्यक्ति को शक्तिहीन से शक्तिवान बना देता है, मां अपने बालक को असहाय और कमजोर नहीं देख सकती, वह उसकी परेशानियों में, विपत्तियों में हमेशा ढाल बनकर खड़ी रहती है, अतः मां दुर्गा अपने भक्तों को जीवन की अनेक विपत्तियों से उन्हें सुरक्षा प्रदान करती है। वर्ष में केवल दो बार ही वे क्षण आते हैं, जब सम्पूर्ण प्रकृति सज-धज कर, पूर्ण श्रृंगार युक्त हो, शक्ति स्वरूपा बनकर अपनी आभा से, अपने तेज से धरती को आप्लावित करती है।
व्यापार का क्षेत्र एक जंगल की भांति होता है तथा उसमें जो भी व्यापारी व्याघ्र की भांति फुर्ती एवं चतुराई से कार्य करता है, सफलता की चरम सीमाओं पर पहुंच जाता है। जरा सी भी लापरवाही हुई नहीं, कि अन्य व्यापारी झपट कर मौका छीन ले जाते हैं, परन्तु व्यक्ति विशेष अगर व्याघ्र के समान हिम्मतवान, निडर तथा चतुर है तो कोई भी प्रतिद्वन्द्वि पास फटकने का साहस भी नहीं कर पाता और ऐसे ही व्यक्ति पर सभी विश्वास भी कर पाते हैं, कि यह वह व्यापारी है जो कार्य का निष्पादन सूझ-बूझ से सफलता पूर्वक कर पाएगा।
ऐसा हौसला और जोश प्राप्त करने हेतु ‘व्याघ्रमुखी व्यापार वृद्धि साधना’। रात्रि में श्वेत आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठें। सामने चौकी पर ‘व्याघ्रमुखी’ स्थापित करें तथा इस का पूजन कर घी का दीपक लगा दें। ‘व्याघ्रमुखी दिव्य माला’ से 11 माला निम्न मंत्र की जप करें।
व्याघ्रमुखी को अपने व्यापार के स्थान अथवा दुकान पर स्थापित करें, 21 दिन पश्चात् माला तथा व्याघ्रमुखी को जल में प्रवाहित करें। आप अनुभव करेंगे, कि आपके व्यापार में दिन दुगनी रात चौगुनी प्रगति होने लगी है।
पुरूष वह है (और स्त्री भी पुरूषत्व युक्त हो सकती है), जो शत्रुओं पर सिंह की भांति झपट कर उनका संहार कर दें, जिसकी एक हुंकार से ही शत्रु दुम दबाकर भाग खड़े हों तथा फिर समस्या उत्पन्न करने का प्रयास न करें। राजस्थान में वही व्यक्ति पौरूषवान माना जाता है, जिसके असंख्य शत्रु हो, परन्तु साथ-साथ उनसे निपटने का साहस एवं धैर्य भी होना चाहिए। फिर शत्रु किसी भी रूप में हो सकता है, प्रत्यक्ष रूप में, मित्रों के वेश में, रिश्तेदार के रूप में अथवा परिवार के सदस्य के रूप में।
शत्रु पर हावी बने रहने के लिए यह अचूक साधना है और शक्ति के आशीर्वाद से ऐसा साहस प्राप्त हो जाता है कि शत्रु सामने टिक ही नहीं पाते। लाल आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुख कर बैठ जाएं तथा सामने चौकी पर तेल का दीपक जलाकर ‘शत्रु दमनिका’ स्थापित करें। कुंकुंम और पुष्प से पूजन करें। तत्पश्चात निम्न मंत्र की ‘शत्रु संहारिणी माला’ से 11 माला मंत्र जप करें।
21 दिन तक पहने रहने के पश्चात शत्रु दमनिका तथा माला को जल में प्रवाहित करें।
कई बार कोशिशों के बावजूद भी व्यक्ति को पदोन्नति प्राप्त नहीं होती और उससे कम अनुभव तथा आयु के व्यक्ति भी उससे आगे निकल जाते हैं, अधिकारी रूष्ट रहते हैं एवं घर पर और बाहर भी कोई सम्मान प्राप्त नहीं होता तथा इसके साथ ही शत्रु भी तंग करते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के पास एक ही उपाय शेष रह जाता है और वह है ‘नीलमणि तारा साधना’ क्योंकि इस साधना को सम्पन्न करने के बाद से ही व्यक्ति का जीवन परिवर्तित हो जाता है। उसकी पदोन्नति हो जाती है, निरन्तर उन्नति होने लगती है। अधिकारी गण उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं तथा उसका सारा व्यक्तित्व आकर्षक, तेजस्वी एवं प्रचण्ड हो जाता है और उसके शत्रु उसके नाम से ही कांपते हैं।
यह साधना रात दस बजे के उपरान्त करें। साधक स्नान कर सफेद धोती धारण करें तथा गुलाबी आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाएं। अपने सामने गुलाबी कपड़े से ढके बाजोट पर ‘नीलमणि तारा यंत्र’ स्थापित कर अपनी इच्छा का उच्चारण करें और यंत्र का पंचोपचार पूजन करें, इसके उपरान्त निम्न मंत्र का 50 मिनट तक उच्चारण करें।
अगले दिन साधक यंत्र को किसी जलाशय में अर्पित कर दे। ऐसा करने से साधना सफल होती है और साधक सभी प्रकार से पूर्णता की ओर अग्रसर होता है।
विपत्ति तो जीवन में कभी भी आ सकती है तथा उसके निवारण हेतु मां दुर्गा की साधना फलदायक सिद्ध होती है। मां दुर्गा का तंत्रात्मक स्वरूप भी है तथा इस स्वरूप से सम्बंधित सभी साधनाएं अचूक एवं तीव्र भी हैं। पति का पत्नी से विमुख हो जाना, प्रेमी-प्रेमिका से सम्बन्ध विच्छेद हो जाना, पुत्र-पुत्री अथवा घर के किसी सदस्य का रूष्ट होकर घर छोड़कर चले जाना जैसी अनेक समस्याएं हैं। इन सबका उचित समाधान है ‘दुर्गा सर्वाकर्षण साधना’।
रात्रि में पीले वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठ जाएं। सामने चौकी पर ‘दुर्गा सर्वाकर्षण गुटिका’ स्थापित करें तथा उसका पूजन करें। जिस व्यक्ति विशेष के लिए प्रयोग किया जा रहा है, उसका नाम पर्चे पर लिखकर गुटिका के नीचे रख दें। अपनी कामना व्यक्त करे, फिर निम्न मंत्र का 35 मिनट तक मंत्र जप करें।
इसके पश्चात गुटिका को उसी पर्ची में लपेट दें तथा उसे किसी पेड़ के नीचे दबा दे। कुछ दिनो के पश्चात् ही व्यक्ति के मानस में परिवर्तन होगा। यह साधना दुर्गा शक्ति पर आधारित है, इसलिए शुद्ध मन से तथा अच्छे परिणाम के लिए ही इसका प्रयोग किया जाना चाहिए। गलत उद्देश्य से प्रयोग सम्पन्न किया गया, तो लाभ की आकांक्षा न रखे। दैविक शक्तियों का प्रयोग बुरे कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता है।
जीवन में अगर चारों ओर से निराशा घिर आई है, कोई भी काम सही ढंग से नहीं हो रहा है, रोग, दरिद्रता, परेशानियों ने घर में निवास कर लिया हो, तो इससे उत्तम प्रयोग और कोई नहीं है। ‘उर्ध्व’ का मतलब ही होता है निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर होना, ऊंचाइयों की ओर उठना।
इस साधना से जहां व्यक्ति को धन लाभ, ऐश्वर्य, यश, कीर्ति प्राप्त होती है, वहीं व्यक्ति आरोग्य प्राप्त करता हुआ अपने समस्त शत्रुओं का विनाश करने में सफल होता है। यह साधना रात्रि के दस बजे के उपरान्त, लाल आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर सम्पन्न किया जाता है। अपने सामने बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर ‘उर्ध्व शक्ति यंत्र’ को स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन करें, दीपक प्रज्जवलित करके निम्न मंत्र का 40 मिनट तक यंत्र पर त्रटक करते हुए मंत्र जप करें।
मंत्र जप के उपरान्त साधक यंत्र को किसी जलाशय में अर्पित कर दें और घर पर किसी बालिका को भोजन एवं उपहार भेंट करें। ऐसा करने से यह साधना सफल होती है और व्यक्ति अपने जीवन में निरन्तर ऊंचाइयों की ओर अग्रसर होता है।
अगर विवाह के कई वर्षों के उपरान्त भी घर में बालक की किलकारी न गूंजे, तो इससे ज्यादा अवसाद पूर्ण स्थिति स्त्री-पुरूष के लिए और कोई नहीं हो सकती या पुत्र की इच्छा रखते हुए भी पुत्र प्राप्ति नहीं हो रही हो, तो भी जीवन निराशा की ओर अग्रसर होता है। सैकड़ो इच्छायें व्यक्ति के मन में यदि दबी पड़ी हों और पूरी न होती हों, तो भी व्यक्ति का जीवन नर्क बन जाता है। ऐसी स्थिति में फिर एक ही विकल्प शेष रह जाता है और वह है ‘त्रिपुर भैरवी वरवरद साधना’।
इस साधना को सम्पन्न करने से व्यक्ति के रोग नष्ट होते हैं और उसकी सभी इच्छायें पूर्ण होने लग जाती हैं। वह त्रैलोक्य को वशीभूत करने में सक्षम होने लग जाता है और सब प्रकार से उन्नति और ऐश्वर्य प्राप्त करता है।
इस साधना में ‘त्रिपुर वरवरद यंत्र’ एवं ‘वशीभूत माला’ की आवश्यकता होती है। साधक स्वच्छ पीले धारण कर पीले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठे और अपने सामने पीले वस्त्र से ढके बाजोट पर ‘त्रिपुर वरवद यंत्र’ स्थापित कर उसका इत्र से पूजन करें, फिर ‘वशीभूत माला’ से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जाप करें।
अगले दिन यंत्र एवं माला किसी जलाशय में अर्पित कर दें।
कई बार व्यक्ति मुकदमों में इतना उलझ जाता है कि उसका जीवन ही भार स्वरूप हो जाता है, उसका धन मुकदमें की अग्नि में नष्ट होता रहता है और उसके शत्रु हमेशा उस पर हावी रहते हैं। ऐसे में व्यक्ति पूर्णतः असहाय महसूस करने लगता है और उसे अपना भाग्य अंधकारमय प्रतीत होता है। असहाय स्थिति से निवृति हेतु केवल ‘छिन्नमस्ता शिरोमणि साधना’ से ही लाभ होता है। ‘शिरोमणि’ का अर्थ है, कि व्यक्ति जहां भी जाए, जिस क्षेत्र में भी प्रवेश करे, उसका स्थान सर्वोपरि हो और वास्तव में ही इस साधना को करने के बाद जहां व्यक्ति शत्रुओं के ऊपर हावी हो जाता है, मुकदमों में पूर्णतः विजयी होती है, वहीं विद्या के क्षेत्र में अग्रणी हो जाता है। समाज में उसका सम्मान होता है, यहां तक कि विद्वत समाज भी उसे इज्जत की दृष्टि से देखता है। साथ ही साथ धन प्राप्ति में भी वह सर्वोच्च स्थिति पर होता है और समाज के सबसे सम्पन्न व्यक्तियों में गिना जाता है।
इस साधना में ‘छिन्नमस्ता शिरोमणि यंत्र’ एवं ‘साफल्य माला’ की आवश्यकता होती है। साधक स्वच्छ वस्त्र धारण कर लाल आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठे और अपने सामने लाल वस्त्र पर ढके बाजोट पर ‘छिन्नमस्ता शिरोमणि यंत्र’ स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन करें। इसके उपरान्त ‘साफल्य माला’ से निम्न मंत्र की 16 माला मंत्र जप करें।
यह मंत्र अत्यधिक तेजस्वी और शीघ्र फल देने वाला है। साधक को चाहिए, कि अगले दिन यंत्र एवं माला को किसी जलाशय में प्रवाहित कर दें। ऐसा करने से यह साधना सफल होती है और साधक निरन्तर श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होने लगता है।
इस साधना का वर्णन कई ग्रन्थों में बड़े आदर के साथ किया गया है, क्योंकि यह साधना जहां व्यक्ति के जीवन में धन, व्यापार, बुद्धि, आर्थिक उन्नति एवं भौतिक सुखों को प्रदान करता है, वहीं साथ ही साथ आत्मिक उन्नति एवं आध्यात्मिक उत्थान भी प्रदान करता है। ऐसे व्यक्ति के एक हाथ में भोग दूसरे हाथ में मोक्ष होता है। इसके द्वारा व्यक्ति भौतिक क्षेत्र में उच्चतम शिखर पर पहुंचने में समर्थ होता है और हर प्रकार से सफलता की ओर अग्रसर रहता है।
साधक स्वच्छ पीली धोती धारण कर लाल आसन पर पश्चिम दिशा की ओर मुख कर बैठे और अपने सामने लाल वस्त्र से ढके बाजोट पर ‘कमला कंचन’ स्थापित कर उसका कुंकुंम तथा गुलाब से पूजन करें। फिर निम्न मंत्र का 30 मिनट तक जप कमला कंचन पर त्राटक करते हुए करें।
अगले दिन ‘कमला कंचन’ को किसी जलाशय में अर्पित कर दें। ऐसा करने से साधना सिद्ध होती है और साधक वह प्राप्त कर सकता है जो वह चाहता है।
कभी-कभी ग्रहों की विपरीत चाल अथवा किन्हीं अन्य बाहरी कारणों के फलस्वरूप घर की शांति में विघ्न पड़ जाता है और ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी पारिवारिक सम्बन्ध बिगड़ते जा रहे हैं, जिनके कारण मन अशान्त एवं अधीर हो उठता है, हर समय कुछ अनिष्ट हो जाने का भय मन में बना रहता है। इस स्थिति के उन्मूलन के लिए नवरात्रि ही उचित अवसर होता है।
क्लेश हारक विजया साधना एक अत्यन्त विलक्षण साधना है, जिसके द्वारा गृह क्लेश मिटाया जा सकता है। इसके लिए पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठे एवं लाल रंग का आसन बिछा हो, सामने आसन पर ‘सिद्ध विजया क्लेश हारक गुटिका’ स्थापित करें। संकल्प करें-जिस विशेष विघ्न निवारण हेतु मैं मंत्र जप कर रहा हूं उसमें सफलता मिले।
तदुपरान्त तेल का दीपक जलाकर निम्न मंत्र का ‘विजया माला’ से 11 माला मंत्र जप करें।
अगले दिन माला एवं गुटिका को भूमि में दबा दें अथवा जल में प्रवाहित कर दें।
रोग, व्याधि, अवसाद, पीड़ा, बेचैनी ये सब शारीरिक लक्षण हैं जो व्यक्ति को प्रभावित करते हैं, जिसके कारण व्यक्ति स्वयं को असहज अनुभव करता है, तथा ऋतु परिवर्तन के कारण भी अनेक सामयिक रोग भी उत्पन्न हो जाते हैं। इनका निवारण करना सहज नहीं होता, ये हर ऋतु परिवर्तन के समय होते ही हैं। यह साधना ऐसे ही रोगों से छुटकारा दिलाती है ।
स्वच्छ स्थान पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर, श्वेत आसन पर बैठ जाएं। सामने चौकी पर पुष्पों के आसन पर ‘जया गुटिका’ स्थापित कर संकल्प लें, कि मैं (अपना नाम या रोगी का नाम लें) अपने अथवा सम्पूर्ण परिवार के स्वास्थ्य लाभ हेतु यह साधना कर रहा हूं। घी का दीपक जलाएं तथा ‘जया माला’ से निम्न मंत्र की 11 माला जप करें।
नवरात्रि के दौरान सरस्वती पूजन का विशिष्ट महत्व है तथा संतान की विद्योन्नति के लिए इस साधना को सम्पन्न करना उचित और अनिवार्य भी है। बंगाल में तो यों भी नवरात्रि में सरस्वती पूजन भी विधि-विधान के साथ किया जाता है। संतान की पढ़ाई में रूचि बढ़ाने के लिए इस अचूक साधना को करना श्रेष्ठ रहता है।
अष्टमी की रात्रि में सरस्वती पूजन का विशेष मुहूर्त है। रात्रि को श्वेत आसन पर बैठ जाएं, उत्तर दिशा की ओर मुख हो। बालक छोटा हो, तो माता-पिता साधना सम्पन्न करें। ‘विद्या भारती यंत्र’ का पूजन कर, यंत्र को शहद में डुबा दें। इसके उपरान्त ‘ज्ञान शक्ति माला’ से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप करें।
मंत्र जप के पश्चात यंत्र पर लगे शहद से अनामिका उंगली से बालक/बालिका की जीभ कर ‘ऐं’ बीज मंत्र लिखें। अगले दिन यंत्र तथा माला को जल में प्रवाहित कर दें।
महामया स्वरूप रूपी मां दुर्गा अपने भक्तों को जीवन की अनेक विपत्तियों से उन्हें सुरक्षा प्रदान करती है। नववर्ष सवत् 2071 को पूर्ण आरोग्यमय, मंगलमय शक्तियुक्त बनाने और ब्रह्मा विष्णु महेश के भाव को पूर्णतः भौतिक जीवन में प्राप्त करने हेतु चैत्रीय नवरात्रि त्रिपुर भैरवी शक्ति महोत्सव साधको के महाकुंभ छतीसगढ़ की चेतनामय महामाया शक्ति स्थली दल्ली राजहरा (बालोद) में 30-31 मार्च को तथा शक्ति स्वरूपा माता चन्द्रहासिनी नवरात्रि पर्व की पूर्णता को साक्षीभूत स्वरूप में नवरात्रि को पूर्ण चैतन्यमय बनाने और शाश्वत रूप में जगत् जननी माता भगवती और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्मोत्सव को पूर्णरूपेण गृहस्थ जीवन में आत्मसात करने का महोत्सव चन्द्रहासिनी की तप स्थली डभरा (जांजगीर) में 7-8 अप्रैल को सम्पन्न होगा।
नवरात्रि ऐसा ही शक्ति पर्व है, जो व्यक्ति को शक्तिहीन से शक्तिवान बना देता है, मां अपने बालक को असहाय और कमजोर नहीं देख सकती, वह साधक की परेशानियों में, विपत्तियों में हमेशा ढाल बनकर खड़ी रहती है, अपने को ऐसी सुस्थितियों से सरोबार करने हेतु नवरात्रि के पावन अवसर पर परिवार के किन्हीं दो सदस्यों को शक्तिपात दीक्षा और दो साधना पैकेट उपहार स्वरूप भेजे जायेगे। इस साधना से जीवन की सर्व अपूर्ण स्थितियों का क्षय होता है और जीवन में धन, वैभव, सुख-सम्पन्नता की ओर साधक अग्रसर होता है।
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