





हम पृथ्वी वासी अपना गणित लगाते हैं, हर व्यक्ति पृथ्वी निवासी है और उसकी धारणा भी पृथ्वी की भांति अपने जीवन चक्र के गोल घेरे में घूमती हुई, कभी वर्षा, कभी सर्दी, कभी गर्मी का अनुभव करती है। मनुष्य जीवन में भी कभी दुःख, शंका, कभी बाधाएं, कभी खुशियां, कभी आह्लाद ऋतुओं की भांति आते और जाते रहते हैं। लेकिन एक बात हम विशेष ध्यान रखते हैं कि अंधकार में भी हमें प्रतीक्षा रहती है कि सूर्य अवश्य उगेगा और इस धरती को प्रकाशवान करेगा। और हम भी बाधाओं, परेशानियों को अंधकार समझते हैं और यह आशा रखते हैं कि ये बाधाएं अंधकार की भांति अवश्य समाप्त होगी और हमारे जीवन में भी सूर्य अवश्य आयेगा। यह सूर्य कौन हैं?
जिस दिन शिष्य विचार कर लेता है कि उसके जीवन में गुरु ही सूर्य हैं और वे ही उसे प्रकाश, ऊष्मा, ऊर्जा, शक्ति विकास की गति प्रदान कर देते हैं, उस क्षण वह गुरु रूपी सूर्य के सामने नमन करते हुए पुनः अर्घ्य अर्पित करता है, उगते हुए सूर्य को लालिमा को देखकर प्रसन्न होता है। 21 अप्रैल तो हमारे जीवन का सूर्योदय है सद्गुरु शाश्वत हैं, सत्य है, शिव और सुन्दरतम् हैं।
इसलिये गुरु को ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ कहा गया है। और हम प्रतीक्षा करते हैं, हमारे जीवन के सूर्योदय दिवस 21 अप्रैल की, जिस दिन इस धरा पर सद्गुरुदेव ने अपनी पहली प्रकाश किरण और हम शिष्यों को ऊर्जा तथा चैतन्यता प्रदान की, इसलिए अवतरण दिवस की महामहिमा है। यह दिवस शिष्य के लिये रामनवमी है, कृष्ण जन्माष्टमी है, महाशिवरात्रि है और इससे भी बढ़कर शिष्य के स्वयं के जीवन-उदय का क्षण है, जब उसने पहली बार जाना की सूर्य कैसा होता है और उसका प्रकाश किस प्रकार आनन्द देता है। उसके पहले तो हम संसार के अंधकार में भटक रहे थे और हमने स्वयं अपनी आंखों पर अज्ञान का ही पर्दा लगा रखा था। जब हमनें सद्गुरुदेव के ज्ञान प्रकाश को अपने शरीर, मन, रोम-रोम, कण-कण में भर लिया है तो यह दिवस हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण स्वरूप में शिष्य का नवीन रूप में उदय दिवस बन गया। नमन है सद्गुरुदेव को और नमन है 21 अप्रैल के उस महान् क्षण को, जिस दिन सद्गुरुदेव का पृथ्वी पर अवतरण हुआ।
महापुरूष, आराध्य देव धरा पर अवश्य ही किसी कोख से जन्म लेते हैं, मूलतः यह उनकी अपनी स्वयं की ही क्रिया होता है, अपने भक्त जनों पर उद्धार करने हेतु संसार को श्रेष्ठ मार्ग दर्शाने हेतु धर्म संस्कृति की ध्वजा को पुनर्स्थापित करने हेतु ही इस धरा पर अवतरित होते हैं। सद्गुरुदेव का जन्मदिवस 21 अप्रैल है और आज यह निखिल जयंती बन गई है, आज भक्तों और साधकों को यह दिवस है, महान सिद्धि दिवस।
जब देवलोक और सिद्धाश्रम धरती से ईर्ष्या करने लग जाएं, तो सद्गुरुदेव स्वयं ही अपना ज्ञान इस धरा पर फैलाकर सिद्धाश्रम की ओर प्रस्थान कर गए। और जो बीज उन्होंने धरती पर बोए, जिन साधकों शिष्यों को अपने रक्त की बूंदों से तैयार किया, वे कभी यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि सद्गुरुदेव इस धरा पर नहीं है। वे तो प्रकाश पुंज, ज्ञान पुंज हैं जो कि कभी भी अस्त नहीं हो सकता है। बेखूदी में हम तो एक दर समझ कर झुक गए अब खुदा मालूम वह काबा था या बुतखाना था। होश ही कहां रह गया समझने का, एक लहर थमती तब तक दूसरी लहर जो उमड़ती हुई चली आई, भिगोती और बिखरती हुई—
पतझड़ में आखिरी पत्ता भी जब साख से अलग हुआ तब भी वृक्ष का विश्वास नहीं टूटा, आशा नहीं छूटी, उसे पता था कि उसकी जड़े जिस पृथ्वी से जुड़ी है, जिसकी छाती से उसे रस मिल रहा है, वह फिर कुछ नया घटित कर ही देगा। जीवन की धूप-छांव के बीच, पतझड़ और सूखी हवाओं के बीच भी साधक और साधिकाएं चलते ही रहे, केवल ज्यों-त्यों जीवन पूरा कर देने के लिए ही नहीं, उत्सव की तलाश में, महोत्सव की खोज में, क्योंकि उत्सव ही जीवन का सार है।
क्योंकि जीवन ठूंठ बनकर नहीं जीना है, इतना तो एक स्थान पर खड़ा हुआ वृक्ष भी जानता है। और यह उत्सव केवल गुरुदेव ही दे सकते हैं, स्वप्नों की कोमल गुलाबी और यौवन की हल्की धानी कोंपलें वे ही इस मन में खिला सकते हैं- प्रेम की कोंपलें, आशा की कोंपलें, अंगड़ाइयों की कोंपलें, श्रद्धा और विश्वास के ओस से भीगी-भीगी नम कोंपलें, इस नम्र प्राय हो गए तन और मन को फिर से सजाने के लिए। पक गया था पिछला जीवन, थक गए थे वे पल, उन्हें पकने के बाद पीला होकर गिरना ही था कि एक नई कोंपल फूटे और वह सूखे दरख्त की उदास टहनियां में हलचल मचा दें, एक कोंपल दूसरी कोंपल को चिमगोईयां कर जगा दे।
एक आस दूसरी नई आशा को जन्म दे दे और देखते ही देखते सारा मन केवल गुलाबी हो गए। बस मन की नहीं आंखें भी। आंखें गुलाबी न हुई और उनमें सुर्ख डोरे न उतर आए, तो उत्सव ही क्या? उत्सव का अर्थ ही है मादकता और शरारत से भरी अंगड़ाइयां, विश्वास न हो तो वृक्ष को देख लें, उत्सव मनाने की कला वृक्ष से सीख लें कि उन नर्म-नर्म पत्तों से फूटी कोई मंद बयार चले और गीत की कड़ी बन फिजां में बिखरती ही चली जाए। गुमनगुनाती हुई आती है फलक से बूंदें कोई बदली तेरी पाजेब से टकराई है।
दीवानगी की बदली और यौवन की छलकाती पाजेब जब टकरायेगी तो देखते ही देखते रिमझिम-रिमझिम फुहारों, फुसफुसाहटों, खिलखिलाहटों, कानाफूसियों और इशारों की बरसात शुरु हो ही जाएगी, क्या इससे अधिक मादक कोई उत्सव हो सकता है? क्या इससे ज्यादा कोइ्र रास हो सकता है? क्योंकि ये सब बिखरने का उत्सव जो है! 21 अप्रैल जन्म दिवस सद्गुरुदेव का है, शिष्य के जीवन का सबसे प्यारा दिवस है, यह उसका अपना दिवस है जब उसके प्रिय धरा पर अवतरित हुए थे। यह तो आह्लाद, प्रेम, हष्र, रस, सत्य, नवयुग का दिवस है। यह दिवस तो उत्सव दिवस है, साधना, सिद्धि, संस्कृति, धर्म, चेतना का उत्थान दिवस है।
इस बार यह दिवस डालीगंज लखनऊ में सब शिष्य साधक मिलकर दिव्य गीत गांएगे। उस अमर संदेश को अपने हृदय में उतारेंगे, अपनी प्रेम भरी पुकार से अपने प्रिय सद्गुरुदेव को हृदय में उतार देने के लिए आतुर हो उठेंगे। हम सब मिलकर अपने हृदय सम्राट गुरु को अपने भावों का अर्घ्य, अंजलि अवश्य प्रदान करेंगे और यह सकंल्प लेंगे की हे सद्गुरुदेव! यह जीवन आपसे ही आलोकित है, यह महिमा आपकी ही दी हुई है। यह जीवन आपको समर्पित है। हमारे पास प्रेम, विश्वास, श्रद्धा, समर्पण के भाव है और आपका दिया हुआ गुरु मंत्र है।
इस श्रद्धा विश्वास को दिव्यतम चेतनावान बनाने हेतु हममें जो ज्ञान है, उसके विस्तार हेतु गुरु जो हर माह ज्ञान रूपी रचना हमे प्रदान करते है उस रचना का विस्तार हम संकल्प के साथ हर माह तीन पत्रिका सदस्य बनाकर अपने हृदय के समर्पण भाव को सद्गुरु के प्रति स्पष्ट कर सकेंगे तब ही सही अर्थों में हम अपने आप को गुरुमय बनाने की, निखिलमय बनाने की क्रिया की ओर अग्रसर हो सकेंगे। आपके जीवन की सार्थकता है कि आपने हृदय भाव से सद्गुरुदेव को आत्मसात किया है और हमारे रोम-रोम में उन्हीं के मंत्र का गुंजरण हो रहा है और उसी के फलस्वरूप जीवन में आनन्द रस प्रसन्नता उल्लास का भाव आ रहा है क्योंकि जितना हम अपने ज्ञान का विस्तार करते है उतनी ही जीवन में ऐसी श्रेष्ठमय स्थितियां आती है। तब ही सही अर्थों में हम अपने परमेश्वर का अवतरण दिवस मना सकेंगे।
परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी महाराज के पूर्ण दिव्यतम अवतरण दिवस पर अपने जीवन को भौतिक सुखों से निर्मित करने और पूर्णरूपेण इन्द्राक्षी वैभव लक्ष्मी से युक्त बनाने हेतु चौसठ कला युक्त जीवन निर्माण की साधनायें और धर्म, अर्थ, काम शक्ति व सर्व मनोकामना पूर्णता से अपने जीवन को युक्त करने हेतु दीक्षायें एवं प्रत्येक साधक द्वारा स्वः रूद्राभिषेक वन्दनीय माताजी के सानिध्य में 19-20-21 अप्रैल को सम्पन्न होगा।
शिविर स्थलः रामाधीन सिंह इन्टर कॉलेज ग्रॉउड, आई-टी-आई चौराहा, डालीगंज लखनऊ (उ-प्र-)
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,