





युगों-युगों से भारतीय मन के समक्ष एक ही प्रश्न रहा है कि वह कौन-कौन सा उपाय है जिससे मनुष्य की सहज चेतना न ही उन्मादित हो और नही कुंठित। यही प्रश्न भारतीय जीवन-चिंतन का सर्वाधिक विवादास्पद प्रश्न भी रहा है, क्योंकि युगो-युगो से इसकी विविध रूपों में व्याख्या के उपरान्त भी कोई समाधान ऐसा नहीं मिला है जिसके प्रतिपक्ष को लेकर विराधी मुखर न हुए हो।
वसंत पंचमी पूर्ण आनन्द का पर्व है। साधकों के लिए तो यह दिन वरदान स्वरूप है। अध्यात्म में रुचि रखने वाले साधक इस दिन की प्रतीक्षा सरस्वती सिद्धि के लिए करते ही हैं। सामान्य धारणा केवल इतनी भर ही रह गई है, कि सरस्वती को पढ़ने लिखने वाले बालक-बालिकाओं द्वारा ही पूजा जाना चाहिए, जबकि सरस्वती तो ज्ञान की देवी हैं और ज्ञान प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है, चाहे वह किसी भी उम्र का हो। ज्ञान ही वह शक्ति होती है, जिसके द्वारा व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षण में निर्णय लेने में अनुकूलता होती है। शिष्य को गुरु द्वारा ज्ञान ही तो प्राप्त होता है, जिसके द्वारा वह क्रिया कर जीवन में सिद्धि प्राप्त करता है। गुरु का कार्य ज्ञान देना ही होता है, क्रिया तो शिष्य को ही करनी होती है।
यदि व्यक्ति को आत्म ज्ञान की उपलब्धि हो जाये, तो उसे अपने अन्दर से ही प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होते रहते हैं। फिर उसे कहीं भटकने की आवश्यकता भी नहीं होती, उसके अन्तसः में स्थित आत्मस्थ गुरु द्वारा ही उसे मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता है और गुरु की उसी ज्ञान शक्ति को वाग्देवी सरस्वती कहते हैं। इसी दिवस पर साधना सम्पन्न करने से साधक बुद्धत्व को प्राप्त हो पाता है, तथा यह ज्ञानश्चेतना का स्तर ही होता है, जो किसी को मूढ़, किसी को कालीदास और किसी को बुद्ध जैसी श्रेणियों में विभक्त कर देता है।
प्राचीन ग्रंथों में किसी भी साधना को एक या दो दिन में सिद्ध कर लेने का वर्णन है। किन्तु इसमें जो गुह्य तथ्य था, वह था इसी साधनामयता का। कदाचित उन मंत्रवेत्ताओं की कल्पना में ही न रहा होगा, कि आगे चलकर युग इतना अधिक भौतिक हो जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार मनन करने व साधनामय बनने का चिंतन छोड़ साधना को एक व्यापारिक भाव से देखने लग जाएगा। पत्रिका के पन्नों के माध्यम से इसी बात को पुनः स्पष्ट करने का प्रयास है, क्योंकि जब ये सभी बातें स्पष्ट होगी तभी आगे कुछ और स्पष्ट हो सकेगा, तभी वंसत भी स्पष्ट हो सकेगा। किन्तु कितना भी प्रयास क्यों न कर लिया जाये, पन्नों के माध्यम से उस सुगन्ध का कैसे परिचय दिया जा सकता है जो माघी मास में वंसत ऋतु की फिजा को बिखेर देता है, प्रकृति में हरियाली, सुगन्ध, आनन्द का भाव चित्रित हो जाता है। उस खुमारी को कैसे बताया जा सकता है, जो वंसत की उन नशीली रातों में अंगड़ाइयों के साथ टूट कर बिखरती रहती है। इस इशारे और लुका छिपी के कैसे चित्र बनाए जा सकते है, जो हर पुरूष में कामदेव व हर स्त्री में रति उतर कर मिलकर कभी किसी घनी अमराई में कभी किसी नदी के तट पर झुरमुट में रचने बैठ जाते है। उनका तो बस एक इंगित ही दिया जा सकता है। उनकी तो कोई व्याख्या संभव ही नहीं है।
यद्यपि यह अवश्य है कि प्रारम्भ में कोई व्याख्या समझ ली तो फिर और किसी व्याख्या को समझने की आवश्यकता ही कहां शेष रह जाएगी? फिर तो वह साधक स्वयं व्याख्या करने योग्य बन जाएगा। उसकी चाल को देख किसी के मन में कविता फूट पड़ेगी, तो कहीं उसकी मदमस्त ठोकरों से भरी चाल से किसी सख्त जमीन पर जल का कोई सोता ही फूट पड़ेगा।
वंसत मन की सख्त जमीन पर किसी सोते के फूट पड़ने का ही तो अवसर है, जिसमें खुद भी भीग लें और साथी को भी भिगो दें। यहीं तो होती है यौवन की अठखेलियां, नहीं तो क्या हर वर्ष एक नई संतान को जन्म दे देना ही यौवन कहा जा सकता है? यौवन एकाएक उतर आने वाली कोई घटना नहीं होती है। पहले तो अठखेलियां ही आती हैं, अठखेलियों के आने से ही वह ‘यौवन’ आता है, जो सही अर्थों में यौवन होता है, नहीं तो अठारह से चौबीस-छब्बीस वर्ष का काल तो हर एक स्त्री-पुरूष में आकर गुजर जाता है और गुजर जाने के बाद ही पता चल पाता है कि क्या खो गया। किन्तु हर वर्ष नूतन करते रहने का पर्व होता है तभी तो वंसतोत्सव कहा जाता है।
राजनैतिक जीवन में भी वही व्यक्ति उच्च शिखर पर पहुंच सकता है जो दूसरों के मन की भावनाओं को समझते हुए श्रेष्ठ वक्ता के रूप में अभिभाषण कर सकता हो। सरस्वती तो कालज्ञान वार्ता, प्रशासन की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी सिद्धि के बिना मनुष्य अपने जीवन में किसी भी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता है। मोहिनी शक्ति सरस्वती का ही रूप है और आकर्षण केवल विचार और वाणी के द्वारा ही मनुष्य के हाव-भाव इत्यादि में प्रकट होता है। सरस्वती का साधक आभायुक्त, आकर्षण युक्त, शांत चित्त वाला अवश्य बनता है।
सरस्वती की शक्ति न होने पर मनुष्य के जीवन में केवल देह बल रह सकता है और यदि पूर्व जन्मों का कुछ पुण्य हुआ तो थोड़ी बहुत लक्ष्मी रह सकती है, लेकिन यदि सरस्वती ही जीवन से निःसृत हो जाए तो देह शक्ति और लक्ष्मी भी चली ही जाती है। संसार में जितने भी महान् व्यक्ति हुए हैं, चाहे वे राजा महाराजा हों, सम्राट हों, ऋषि-मुनि हो या अपने क्षेत्र में उच्चतम शिखर पर पहुंचने वाले व्यक्ति हों, वे सब भगवती सरस्वती के कारण ही महान बन सके।
माघ मास की पंचमी शारदाम्बा का आविर्भाव दिवस माना जाता है। सरस्वती जयंती से ही वसंत ऋतु प्रारम्भ मानी जाती है। जीवन में नित्य प्रति नवीन वसंत आये और प्रतिदिन भगवती शारदा की आराधना हो उसके लिए नियमों का बालक, गृहस्थ, व्यापारी प्रत्येक को पालन करना चाहिए।
वसंत पचमी जहां वसंत के आगमन का द्योतक है, वहीं पर यह दिन ‘सरस्वती दिवस’ भी कहलाता है, इस वर्ष वंसत पंचमी और सरस्वती जयन्ती 04 फरवरी को सम्पन्न हो रही है।
वसंत पंचमी और सरस्वती जयन्ती भगवती सरस्वती का सिद्धि दिवस है। इस दिन साधना करने से वाणी-कण्ठ में सरस्वती स्थापित होती है और बच्चों की जीभ पर सरस्वती मंत्र का अंकन करने से उन्हें शिक्षा, ज्ञान और कार्य के क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त होती है। गुरु गोरख नाथ ने अपने अवतरण दिवस पर्व पर अद्वितीय साधना सम्पन्न कर उच्च कोटि के सिद्ध और सरस्वती के वरद पुत्र कहलाये।
भारतीय जीवन की यह व्याख्या करने की प्रवृत्ति का साहस ही उसकी गतिशीलता का आधार है। उसमें जीवंतता और नीत नूतनता भी इसी कारण से है। कृष्ण ने इसी परम्परा को कुछ यूं धधका दिया, जो कई सहस्त्र वर्षों से तो बुझी नहीं है और शायद कुछ सहस्त्र वर्षों तक अभी बुझेगी भी नहीं।
जीवन की संरचना आपकी उत्पत्ति है, लेकिन उस संरचना में विशुद्ध भाव को जाग्रत करना और उसके साथ ही दुर्बल, क्षीण व दरिद्र मानसिकता को समाप्त करना, व्यक्ति अर्थात साधक के स्वयं के भीतर निहित है। सरस्वती सरसता प्रदान करने वाली देवी हैं, यह उस शक्ति तत्व से संयोजित हैं, जिससे जीवन में सौन्दर्य, राग, संगीत की उत्पति हो सके, जीवन में शुष्कता समाप्त हो सके।
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