

भारतीय संस्कृति में विभिन्न व्रत, पर्व, त्यौहार इत्यादि की रचनाएं जीवन के चार पक्षों को ध्यान में रखते हुए ही की गई हैं। मकर संक्राति का अलग महत्व है तो होली, दीपावली, शिवरात्रि, नवरात्रि, गुरुपूर्णिमा, श्राद्ध प्रत्येक पर्व का जीवन के किसी न किसी पक्ष से सम्बन्ध है।
हमारे यहां होली पर्व की मान्यता दीपावली पर्व के समान ही महत्वपूर्ण मानी गई है और सामान्य रूप से यह मान लिया जाता है कि होली रंगों का त्यौहार है। एक दूसरे पर रंग फेकना, उत्पात करना इत्यादि इस पर्व के साथ जोड़ दिया गया है। मूलतः होली पर्व का महत्व अत्यन्त ही विशेष है और इसका वर्णन महाऋषि जैमीनी के मीमांसा सूत्र में तथा कत्थक, ग्रहसूत्र में आया है। होली का पूर्ण नाम होलिका, होलिकोत्सव है जो कि समाज के सभी वर्गों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। वास्तव में होली के दिन, जिस दिन पूर्णिमा होती है उस दिन विवाहिता स्त्रियों द्वारा अपने परिवार की सुख-शांति के लिये पूर्ण चन्द्र ‘ऋक’ की पूजा सम्पन्न की जाती है।
होली के दिन से एक और विशेष कथा जुड़ी है कि मथुरा के राजा कंस श्रीकृष्ण का वध करना चाहते थे। इसलिये उन्होंने ‘पूतना’ नामक राक्षसी को वृंदावन भेजा। राक्षसी के जहर पिलाकर बालक कृष्ण का वध करना चाहा और अपने शरीर का आकार विशालतम कर लिया लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने पूतना राक्षसी का दुग्ध का पान करते हुए उसे शिथिल कर उसका जीवन अंत कर दिया। इसी कारण होली के दिन कृष्ण की बाल स्वरूप में विशेष पूजा सम्पन्न की जाती है।
होली के साथ ढूंढी नामक एक राक्षसी भगवान राम के पूर्वज पृथु (रघु) के राज्य में बालकों को अत्यधिक तंग करती थी और उन्हें बीमार इत्यादि बना देती थी। उसे भगवान शिव से तंत्र विद्या का वरदान था जिसके कारण से यह अदृश्य रहती थी। लेकिन भगवान शिव ने यह भी कहा था कि जहां बालकों का शोर, चंचलता इत्यादि होगी वहां तू नहीं रह सकेगी और इसी परम्परा को निभाते हुए इस दिन बालक अत्याधिक मौज मस्ती, चंचलता करते हैं। जिससे उन पर किसी प्रकार का तंत्र प्रभाव न आ सके।
बंगाल, उड़ीसा तथा मथुरा, वृंदावन में कृष्ण चैतन्य प्रभु जो कि भगवान कृष्ण के महान् भक्त हुए और जिन्हें महाप्रभु की उपाधि दी गई उनका जन्मोत्सव होली के दिन ही हुआ और अत्यन्त धूम-धाम से यह उत्सव सम्पन्न किया जाता है।
किसी भी चन्द्र मास की गिनती के दो प्रकार है। पूर्णिमा और अमावस्या। पूर्णिमा पूर्ण चन्द्र के साथ प्रारम्भ होती है और अमावस्या से नया चन्द्रमा धीरे-धीरे अपनी कला बढ़ाता हुआ पूर्णिमा की और अग्रसर होता है। ‘जैमिनी सूत्र’ के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष का अन्तिम दिन है और इसक पश्चात् वसन्त ऋतु प्रारम्भ होती है इस प्रकार होली का यह पूर्ण चन्द्र पूर्णिमा आनन्द पर्व कहा जाता है। इसीलिये पुराणों में इसे ‘वसन्त महोत्सव’ और ‘काम महोत्सव’ की उपमा दी गई है।
इसके अलावा भारत में कामदेव की पूजा होली के दिन ही सम्पन्न की जाती है और घर के आंगन में कामदेव के चित्र, मूर्ति स्थापित की जाती है। तथा चंदन और आम पीस कर के प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। (संभवतः इसी काल से अचार का प्रचलन हुआ है क्योंकि आम खटाई और मिठास का प्रतीक माना जाता है जो जिह्ना को विशेष स्वाद देता है और आचार ग्रहण करने से काम भावना जाग्रत भी होती है।
इसके साथ ही शिव पुराण में एक अत्यन्त सुन्दर कथा आती है कि भगवान शिव अपनी तपस्या में लीन थे और मां पार्वती ने उन से विवाह करने की इच्छा से कई प्रयत्न किये, लेकिन भगवान शिव अपनी तपस्या से नहीं हिले, तो पार्वती ने कामदेव का सहयोग लिया तथा अंनग अर्थात् कामदेव ने भगवान शिव पर कामरूपी पुष्प बाणों की वर्षा की, जिससे भगवान शिव की तपस्या भंग हुई तो उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला और उस तीसरे नेत्र की ज्वाला से कामदेव भस्म हो गये। उसके पश्चात् कामदेव एक आकृति रूप में नहीं रह सके और संसार में उनका स्वरूप भोग, दृष्टि, माया, इच्छा, भावना, कामना, विचार के रूप में प्रकट हुआ। जब मनुष्य में इन सारी भावनाओं में से कोई भावना जाग्रत होती है तो मनुष्य के जीवन में काम जाग्रत होता है। वास्तव में भगवान शिव ने यह लीला सृष्टि के विस्तार और स्त्री तथा पुरूषों में प्रेम की अभिवृद्धि के लिये की जिससे समान विचार वाले स्त्री पुरूष युवा स्त्री-पुरूष में इन भावनाओं के द्वारा आकर्षण आ सके तथा प्रणय में वृद्धि हो सके क्योंकि प्रणय ही जीवन का आधार है इसीलिये कामदेव को भस्म करने के उपरान्त भी भगवान शिव ने पार्वती से विवाह किया।
होली का पर्व पूर्णिमा के दिन आता है और इस रात्रि से ही जिस काम महोत्सव का प्रारम्भ होता है उसका भी पूरे संसार में विशेष महत्व है क्योंकि काम शिव के तृतीय नेत्र से भस्म होकर पूरे संसार में अदृश्य रूप में व्यापत हो गये। इस कारण उसे अपने भीतर स्थापित कर देने की क्रिया साधना इसी दिन से प्रारम्भ की जाती है। सौन्दर्य, आकर्षण, वशीकरण, सम्मोहन, उच्चाटन आदि से सम्बन्धित विशेष साधनाएं इसी दिन सम्पन्न की जाती हैं। शत्रु बाधा निवारण के लिये, शत्रु को पूर्ण रूप से भस्म कर उसे राख बना देना अर्थात् अपने जीवन की बाधाओं को पूर्ण रूप से नष्ट कर देने की तीव्र साधनाएं महाकाली, चामुण्डा, भैरवी, बगलामुखी, धूमावती, प्रत्यांगिरा इत्यादि साधनाएं करने का श्रेष्ठतम दिवस होता है तथा इन साधनाओं में विशेष सफलता शीघ्र प्राप्त होती है।
सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द जी महाराज की आज्ञा से पूज्य गुरुदेव की सानिध्य में सम्पन्न होने जा रहा है। इस साल यह पर्व 15,16, मार्च 2014 कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर में सम्पन्न हो रहा है। जो भी अपने जीवन को ओर अपने जीवन से भी आगे बढ़कर समाज व देश को संवारने की इच्छा रखते हैं, लाखों-लाखों लोगों का हित करने, उन्हें प्रभावित करने की शैली अपनाना चाहते हैं, उनके लिए तो यही एक सही अवसर है। इसी दिन कोई भी साधना सम्पन्न करने में भाग लिया जाये तो। तांत्रोक्त साधनाएं ही नहीं, दस महाविद्या साधनाएं, अप्सरा या यक्षिणी साधना या फिर वीर-वैताल, भैरव जैसी उग्र साधनाएं भी सम्पन्न की जाएं तो सफलता का एक प्रकार से सामने हाथ बांध खड़ी हो जाती है। जिन साधनाओं मे पूरे वर्ष भर सफलता न मिल पाई हो। उस साधना को गुरुधाम में होली पर्व पर सम्पन्न करने से शीघ्र सफलता प्राप्त होती है।
इस प्रकार होली लौकिक व्यवहार में एक त्यौहार तो है लेकिन साधना की दृष्टि से यह विशेष तांत्रोक्त-मांत्रोक्त पर्व है जिसकी किसी भी दृष्टि से उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। साधक को इस दिन संकल्प कर अवश्य ही साधना शिविर में गुरु के सानिध्य में भाग लेना चाहिए, जिससे कि हरहाल में सफलता प्राप्त की जा सके।
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