





नया बही खाता लेकर कुंकुंम से स्वस्तिक चिन्ह बनायें, उसके चारों दिशाओं में स्वस्तिक का चिन्ह बनायें और ‘श्री सरस्वत्यै नमः’ लिखें। ‘गणेश संग सरस्वती’ का चित्र लगायें। इसके बाद निम्न मंत्र से सरस्वती का आह्नान करें-
सरस्वती महाभागे रक्षार्थं मम सर्वदा।
आवाहयाम्यहं देवि! सर्व कामार्थ सिद्धये।।
फिर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए जल का अर्घ्य, आचमन, पंचामृत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य समर्पित करें।
नई लेखनी लेकर उसे स्टील की पलेट में रखें। फिर ‘लेखट’ को उसके ऊपर स्थापित कर दोनों को पूजन करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
और श्रेष्ठ भाव विचार लिखने की प्रार्थना करें-
लेखनी निर्मिता पूर्वं ब्रह्मणा पारमेष्ठिना।
लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयासम्यहम्।।
तुला को किसी थाली में रखिये, और उस पर ‘तलटिका’ बांध कर जल छिड़क कर कुंकुंम से तिलक करें। अक्षत, धूप, दीप, पुष्प से पूजन करें तथा प्रार्थना करें।
त्वं तुले सर्व देवानां प्रमाणमिह कीर्तिता।
पूजयिष्यामि धर्मार्थसुख हेतवे।।
फिर मंत्र बोलकर नमस्कार करें।
निम्न मंत्र बोलते हुए कुंकुंम से ‘कुबेर यंत्र’ पर स्वस्तिक बना कर तिजोरी में स्थापित करें।
स्वर्ण भासं कुबेरं च गदापाण्याश्व वाहनम्।
चित्रणी पद्मायहितं निधीश्वरमहं भजे।।
धन त्रयोदशी के दिन पूजा स्थान में नवीन चैतन्य पंचदेव यंत्रों का पूजन करना श्रेष्ठ रहता है, जिससे नूतन रूप में पूर्णता की प्राप्ति होती हैं। निम्न मंत्र का पांच बार उच्चारण करे।
।। सदाभवानी दाहिनी सम्मुख रहो गणेश
पंचदेव रक्षा करे ब्रह्मा विष्णु महेश ।।
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