

साबर मंत्र प्रयोग करने के लिए किसी विशेष विधि-विधान की आवश्यकता नहीं होती है, कुछ लघु नियम है जिन्हें अवश्य ध्यान में रखना चाहिए- 1- किसी भी पुस्तक को पढ़कर, उसमें छपे साबर मंत्रों को पढ़ कर प्रयोग कर लेना और इच्छित फल न प्राप्त होने पर साबर मंत्र को दोष देना उचित नहीं है, क्योंकि भ्रष्ट, विकृत और शब्दान्तरित मंत्र अपने प्रभावशीलता से वंचित हो जाते है। इसलिए साबर मंत्र किसी प्रामाणिक पुस्तक अथवा योग्य गुरु द्वारा ही ग्रहण करना चाहिए।
2- अपनी सुविधानुसार दिवस चुन कर, उस दिन स्नानादि से निवृत्त हो, श्वेत वस्त्र धारण कर, किसी एकान्त स्थान में अथवा अपने पूजा स्थान में, अपने इष्ट देव के सम्मुख उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख होकर ऊनी आसन पर बैठ कर पूर्व निर्धारित संख्या में मंत्र जप सम्पन्न करे।
3- मंत्र जप समाप्ति के पश्चात लोबान, धूप अथवा हवन सामग्री किसी भी एक वस्तु के द्वारा मूल मंत्र को पढ़ते हुए ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन या एक सौ आठ बार हवन में आहुति दें। इस प्रकार करने पर मंत्र सिद्ध होता जाता है।
4- सिद्ध किये हुए मंत्र को जब भी जरूरत पड़े, तो मात्र पांच, सात या ग्यारह बार पढ़ कर जल या कोई पदार्थ मंत्राभिषिक्त करके प्रक्षिप्त कर देने पर अभीष्ट कार्य पूरा हो जाता है।
5- मंत्र की शक्ति यथावत बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि थोड़े-थोड़े समय अन्तराल पर, अर्थात साल में दो या तीन बार उसी विशिष्ट पर्व या मुहूर्त पर मंत्र जप और हवन कर दिया जाये। ऐसा करने से मंत्र की शक्ति सम्वर्द्धित हो जाती है।
6- अपने द्वारा सिद्ध किये गये मंत्र तथा विधि को अपने प्रिय व्यक्ति को भी नहीं बताना चाहिए, क्योंकि बताने पर मंत्र-शक्ति क्षीण हो जाती है।
साबर मंत्र सिद्ध कर रहे साधक को ध्यान में रखना चाहिए कि वह शब्द-शुद्धि, व्याकरण, मूल धातु और भाषा-बोली के चक्कर में न पड़ कर उसे उसी रूप में पढ़े जिस रूप में वे लिखे गये है, क्योंकि इनके अव्यवस्थित क्रम में ही निहित है, वह दिव्य शक्ति जिसके माध्यम से हमारे कार्य सम्पादित होते है। साबर मंत्र की महत्ता बताते हुए ‘तुलसीदास जी’ ने लिखा है-
अनमिल आखर अरथ ना जापू,
प्रगट प्रभाव महेस प्रतापू।
कलि विलोकि जगहित हर गिरिजा,
साबर मंत्र जाल जिन सिरिजा।।
कलियुग में साबर मंत्र जल्दी और तुरन्त असर करते है। जो साधक ज्यादा जटिल विधि-विधान में जाने की जरूरत महसूस नहीं करते, उन साधकों को चाहिए कि वे अवश्य ही साबर साधनाओं का उपयोग करे और इसके माध्यम से अचूक सफलता प्राप्त करे। कुछ महत्वपूर्ण लक्ष्मी प्राप्ति के लिए साबर साधनाएं दी जा रही हं, जो यदि की जाये तो निश्चय ही कार्य में सफलता होती है।
यह कार्य सिद्धि साधना यो तो किसी भी दिन किया जा सकता है, परन्तु साबर साधनाओं के अनुसार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन इस साधना को करने से आश्चर्यजनक रूप से सफलता प्राप्त होती है।
रात्रि को साधक स्नान कर लाल आसन पर बैठ जाये और लाल धोती धारण करे। इसके बाद जमीन पर कुंकुंम से एक त्रिकोण बनाए और उसके सामने चौमुखा दीपक लगाऐं, एक ही दीपक में चार बत्तियां डाल कर लगाने से वह चौमुखा दीपक माना जाता है। यह तेल का दीपक होना चाहिए।
फिर इस त्रिकोण के मध्य में सरसो की ढेरी बना कर उस पर एक सर्वकार्य सिद्धि यंत्र रख देना चाहिए, यह अपने आप में साबर मंत्र में सिद्ध होना चाहिए, रखने में पूर्व उसे सिन्दूर से रंग देना चाहिए, और फिर त्रिकोण के सामने नैवेद्य रख देना चाहिए।
इसके साथ ही साथ एक सफेद कागज पर साधक कम से कम तीन प्रश्न या अपनी तीन इच्छाएं रख दे, जिन इच्छाओं को वे जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहता है। इसके बाद हकीक माला से निम्न मंत्र की पांच माला मंत्र जप करे।
मंत्र
ऊँ नमो काली कंकाली महाकाली के
पूत कंकाली भैरव हुक्मे हाजिर रहे मेरा भेजा
तुरन्त करे रक्षा करे आन बांधू बान बांधू चलते
फिरते को औसन बांधू दश मुखा बांधू नौ नाड़ी
बहत्तर कोठा बांधू फूल में भेजू फेल में जाय
काठे जी पड़े थर थर कांपे, हल हल हले गिर
गिर पड़े उठ उठ भागे बक बक बके मेरा भेजा
सवा घड़ी पहर सवा दिन सवा मास सवा बरस
का बावला न करे तो काली माता की सैया पर
पांव धरे, वचन जो चूके समुद्र सूखे, वाचा छोड़
कुवाचा करे तो धोबी की नांद चमार के कुण्ड मे
पड़े, मेरा भेजा बावला न करे तो रुद्र के नेत्र से
अग्नी ज्वाला कढ़े, सिर की जटा टूटी भूमि पर
गिरे, माता पार्वती के चीर पै चोट पड़े, बिना
हुक्म नहीं मारना हो, काली कंकाल भैरव फुरो
मंत्र ईश्वरो वाचा।।
ऐसा करने पर हाथों-हाथों कार्य में सफलता मिल जाती है और यह साधना अपने आप में इतनी महत्वपूर्ण है कि देखते ही देखते व्यक्ति आर्थिक उन्नति, व्यापारिक सफलता, शत्रु नाश तथा प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है।
मंत्र जप करने के बाद सर्वकार्य सिद्धि यंत्र को सम्भाल कर जहां रूपये पैसे रखते हैं वहां रख देनी चाहिए। यह साधना आश्चर्यजनक रूप से सफलतादायक है और इसके माध्यम से कई साधकों ने अपने कठिन कार्य सम्पन्न किये है।
यह अटूट धन प्राप्ति की साधना है और इस साधना को किसी भी शुक्रवार की रात्रि को सम्पन्न किया जा सकता है। साबर ग्रन्थों में यह बताया है, कि यदि कार्तिक पूर्णिमा को यह साधना कि जाये तो विशेष रूप से अनुकूल रहता है।
कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को साधक ठीक आधी रात के समय स्नान करके लाल वस्त्र धारण करके, लाल आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाये और सामने जमीन पर ही एक त्रिकोण बनाए जो कि कुंकुम से बनाया जा सकता है। त्रिकोण के एक कोने पर ‘पांच हकीक पत्थर’, दूसरे कोने पर ‘पांच मूंगे के टुकड़े’ तथा तीसरे कोने पर ‘पांच रुद्राक्ष के दाने’ रख दें। इसमें किसी भी कोने को किसी भी सामग्री के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
इसके बाद प्रत्येक कोने के सामने एक एक तेल का दीपक लगा दें और त्रिकोण के मध्य में सरसों की ढेरी बना कर उस पर चौमुखा तेल का दीपक लगा लें । इसके बाद ‘इन्द्राक्षी लक्ष्मी माला’ से 21 माला मंत्र जप करे।
मंत्र
ऊॅं नमो आदेश श्री गुरु को गजानन वीर बसे मसान अब दो ऋषि का वरदान जो जो मांगू सो
सो आन पांच लड्डू सिर सिन्दूर हाट बाट का, माटी मसान की, सब ऋद्धि हमारे पास पठेव शब्द
सांचा फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।
मंत्र जप पूरा होने पर साधक को चाहिए कि वह रात को वहीं पर सोए और सुबह उठ कर पूजा में प्रयुक्त हकीक पत्थर आदि सारी सामग्री इकट्ठी कर लाल कपड़े में पोटली बांध कर घर के किसी कोने में रख दे तो अटूट लक्ष्मी प्राप्ति होती रहती है और कुछ ही दिनों में इसका अनुभव एवं लाभ मिलने लग जाता है।
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