





जो व्यक्ति अपने आप का सम्मान करता है, वह दूसरों से सुरक्षित है, क्योंकि उसने एक ऐसा अभेद्य आवरण ओढ़ रखा है, जिसे कोई हानि नहीं पहुंचा सकता।
हर शिष्य का रक्त लाल है और हर शिष्य के आंसू खारे हैं। हर शिष्य को ऐसा मार्ग अवश्य ही खोजना चाहिए, जिससे उसके सम्मान की रक्षा और अनन्त सम्भावनाओं की पूर्ण प्राप्ति हो सके।
वास्तविकता को केवल शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता। आम का स्वाद, उसे चख कर ही जाना जा सकता है। साधना द्वारा विकसित ज्ञान से ही परम सत्य का साक्षात्कार सम्भव है।
जो शिष्य गुरु स्थान के निकट रहता हो उसे प्रतिदिन एक बार जाकर गुरुदेव को प्रणाम करना चाहिए। परन्तु यदि कोई शिष्य अनेक योजन अथवा काफ़ी दूर रहता हो। तो भी उसे वर्ष में तीन बार और नहीं तो एक बार तो जाकर गुरुदेव को अवश्य प्रणाम करना चाहिए।
गुरु से बढ़कर न शास्त्र हैं, न तपस्या, न मंत्र और न ही स्वर्गादि फ़लक! गुरु से बढ़कर न देवी है। न देव ही गुरु से बढ़कर है और न ही मोक्ष या मंत्र जप। एक मात्र सद्गुरु ही सर्वश्रेष्ठ हैं।
मलिन बुद्धि और गुरु भक्ति से रहित तथा क्रोध, लोभादि से ग्रस्त, नष्ट आचार विचार वाले व्यक्ति के समक्ष गुरु तंत्र के इन दुर्लभ पवित्र रहस्यों को स्पष्ट नहीं करना चाहिए।
बीज को बोध नहीं होता अपनी पूर्णता का और इसी तरह शिष्य को भी अपनी पूर्णता का भान नहीं होता, गुरु का कार्य मात्र उसे उसकी पूर्णता का बोध कराना ही तो होता है।
गुरु जो भी आज्ञा देते हैं, उसके पीछे कोई रहस्य अवश्य होता है। अतः शिष्य को बिना किसी संशय के गुरु आज्ञा का अविलम्ब पूर्ण तत्परता से पालन करना चाहिए, क्योंकि शिष्य इस जीवन में क्यों आया है, उसका इस युग में क्यों जन्म हुआ हैं? वह इस पृथ्वी पर क्या कर सकता है, इन सबका ज्ञान केवल गुरु को ही होता है।
हिरण की नाभि में ही कस्तूरी होती है, लेकिन फि़र भी वह उसकी खोज में वन-वन भटकता है। ऐसे ही सद्गुरुदेव तो अपने प्रत्येक शिष्य के हृदय में ही विराजमान होते हैं, उनका आभास शिष्य को नहीं हो पाता है।
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