





सद्गुरू के लिये प्रिय और अप्रिय शब्द नहीं होता है, उनके लिये सबसे महत्त्वपूर्ण शिष्य ही होता है और जो शिष्य बन गया, वह कभी भी अपने गुरू से दूर नहीं हो सकता। क्या परछाई को आकृति से अलग किया जा सकता है? शिष्य तो सद्गुरू की परछाई की भांति होते हैं।
अपने आपको बलिदान कर देने में सार्थकता नहीं है, अपने को समाज के सामने छाती ठोक कर खड़ा कर देने और अपनी पहचान के साथ-साथ गुरू की मर्यादा सम्मान समाज में स्थापित कर देना ही तो शिष्यत्व है।
गुरू से जुड़ने के बाद शिष्य का धर्म यही होता है, कि वह गुरू द्वारा बताए पथ पर गतिशील रहे। जो दिशा निर्देश गुरू ने उसे दिया है, उनका अपने दैनिक जीवन में पालन करें।
शिष्य को चाहिये कि वह जब भी अवकाश मिले, तो गुरू से मिलकर मार्गदर्शन प्राप्त करें।
यह आवश्यक नहीं कि कोई समस्या हो अथवा मिले, तो गुरू से मिलकर मार्गदर्शन प्राप्त करें।
यथा सम्भव व्यर्थ की चर्चाओं में न पड़कर गुरूदेव का ही ध्यान, मनन करें। दूसरे की आलोचना अथवा निन्दा करने से शिष्य का जो बहुमूल्य समय अपने कल्याण में लगाना चाहिये, वह व्यर्थ हो जाता है, इसका प्रभाव उसके द्वारा की गई साधनाओं पर भी पड़ता है।
व्यवस्था और कार्य की जटिलता को ध्यान में रखते हुये गुरू कई बार किसी कार्य विशेष की जिम्मेदारी कुछ व्यक्तियों को सौंप देते हैं, परन्तु इससे अन्य शिष्यों को कभी भी अपने आपको उससे छोटा अथवा हीन नहीं समझना चाहिये। गुरूदेव तो समान रूप से अपने प्रत्येक शिष्य में स्थापित होते हैं। क्या मां अपने बड़े पुत्र को अधिक प्यार करती है, और नन्हें शिशु को नहीं? सच्चाई तो ये है, कि माता को अपने नन्हें शिशु का और भी अधिक ध्यान देना पड़ता है, क्योंकि वह स्वयं अपना ध्यान नहीं रख पाता है। गुरूदेव का प्यार भी सभी के लिये समान ही होता है।
शिष्य चाहे वह बीस दिन पहले जुड़ा हो अथवा बीस साल पहले, गुरू की दृष्टि में सभी बराबर ही होते हैं। इसलिये प्रत्येक शिष्य को वरिष्ट गुरूभ्राताओं अथवा गुरूबहिनों को सम्मान तो देना चाहिये, आदर तो करना चाहिये, परन्तु उसे अपनी श्रद्धा को मात्र गुरूदेव के ही चरणों के लिये ही सुरक्षित रखना चाहिये।
शिष्य के लिये गुरू ही सर्वस्व होता है। यदि किसी व्यक्ति की मित्रता राजा से हो जाये, तो उसे किसी छोटे-मोटे अधिकारी की सिफारिश की क्या आवश्यकता है। इसलिये श्रेष्ठ शिष्य वह है, जो अपने मन के तारों को गुरू से ही जोड़ता है।
शिष्य यदि सच्चे हृदय से पुकार करें, तो ऐसा होता ही नहीं कि उसका स्वर गुरूदेव तक न पहुंचे। उसकी आवाज गुरू तक पहुंचती ही है, इसमें कभी सन्देह नहीं करना चाहिये।
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