





शिष्य ऐसा हो, जो कफ़न बांध कर निकले, जो समाज की परवाह नहीं करे, जो चुनौतियों को झेल सके, जिसकी आंखों में तेवर हो—- अग्नि स्फ़ुलिंग हो, जिसके हाथों में वज्र की तरह प्रहार करने की क्षमता हो और जो सही अर्थों में गुरु चरणों में समर्पित होने की भावना रखता हो।
प्रेम तो एक उत्फ़ुल्ल सुवास है, एक सुगन्ध है, प्रेम तो एक छल-छल बहता हुआ झरना है, जिसके नीचे स्नान करने से पूरे तन-मन को मस्ती की हिलोरे सी आकर के एक फ़ुहार सी पड़कर उसे भिगो देती है।
परन्तु गुरु के प्रेम का रास्ता इतना आसान नहीं है, यह तो तलवार की एक धार है जिस पर चलने से पैर लहुलुहान हो जाते हैं। यह ऐसी पगडण्डी नहीं है जिसके नीचे पुष्प बिछे हों, प्रेम करना तो बहुत कठिन है, तकलीफ़ दायक है। पूर्ण हृदय से प्रेम करने की क्रिया बिरले को ही आती है।
इसलिए कहता हूं कि तुम नदी बन जाओ, क्योंकि प्रेम की कल्पना, प्रेम की भावना नदी जानती है। नदी इस बात को नहीं मानती, कि यह पहाड़ है, पत्थर है, चट्टान है। वह तो बस आगे की ओर गतिशील रहती है। उसका लक्ष्य उसका चिन्तन, उसकी धारणा एक ही है कि मुझे उस समुद्र में जाकर लीन हो जाना है।
इस ढंग से कोई हीरे नहीं लुटाता जिस ढंग से मैं ज्ञान आप पर लुटा रहा हूं। यह आपका सौभाग्य है, कि मैं आपको उस जगह तक ले जाना चाहता हूं, कि पूरे विश्व में आप विजयी हों, आप सफ़लता युक्त बन सकें और मैं अपने शब्दों पर दृढ़ हूं। और मैं आपको अद्वितीय बना रहा हूं। अणु से विराट बनाने की क्रिया केवल गुरु जानता है, मनुष्य से देवता बनाने की क्रिया केवल गुरु जानता है, मूलाधार से सहस्त्रार तक पहुंचाने की क्रिया केवल गुरु जानता है और इसीलिए जीवन का आधार केवल और केवल गुरु ही है।
तुम्हें बीज बनना है और बीज बनोगे, तभी तुम आगे जाकर छायादार वृक्ष बन सकते हो, मगर तब बन सकते हो, जब बीज धारती के अन्दर मिल जाए। यदि बीज कहे कि मैं माटी में मिलना नहीं चाहता, तो बीज छायादार पेड़ नहीं बन सकता और जब वह माटी में मिल जाएगा, तब उसमें निश्चित रूप से अंकुर फ़ूटेगा और आगे चलकर वह छायादार पेड़ बन सकेगा, जिसके नीचे हजारों-हजारों व्यक्ति बैठ सकेंगे।
जो भी बनें, अद्वितीय बनें। सामान्य जीवन जीना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। सामान्य जीवन जीकर तुम खुद का नाम तो डूबोते ही हो, मेरा नाम भी डुबोते हो। कोई देवता या भगवान पैदा नहीं होते, बनते हैं। जन्म आपके हाथ मे नहीं था लेकिन अगर जन्म लेकर आपको गुरु मिल जाए, तो फि़र आप अद्वितीय बन सकते हैं – राम बन सकते हैं, कृष्ण बन सकते हैं।
मैं पूर्ण हूं और तुम मेरे सामने पूर्ण होने के लिए बैठे हो। आवश्यकता है इस बात की, कि तुम उस जगह पर खड़े रह सको, जहां से छलांग लगानी है। ज्यों ही छलांग लगाई, तुम समुद्र में विसर्जित हो जाओगे और समुद्र अपनी बांहे फ़ैलाए तुम्हें अपने सीने में समेट लेगा, क्योंकि मैं तो प्रत्येक स्थिति में तुम्हारे सामने हूं।
मैं हर क्षण तुम्हारे साथ हूं, तुम कहीं अकेले नहीं हो। इस वीरान पगडण्डी पर तुम्हें अपने-आप को अकेला समझने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें ब्रह्म तक पहुंचाना है, निश्चित रूप से तुम्हें ब्रह्म के दर्शन कराने हैं और इस जीवन में ही तुम्हें जन्म मरण के इस भय से, इस समस्या से मुक्त कर देना है।
तुम खाली बूंद हो और तुम्हें समुद्र बनना है। आज तुम समुद्र में मिलोगे, तो कल तुम मेघ बनकर आकाश में छाओगे। आज तुम समुद्र में मिलोगे, तो कल तुम उमड़-घुमड़ कर बादल बन सकोगे और जब बादल बनकर हवाओं के साथ बहोगे, वर्षा करोगे, तो नदियां बहेंगी और नदियां सैकड़ों खेतों को लहलहाऐंगी, सैकड़ों किसानों के चेहरों पर खुशियां पैदा करेंगी, सैकड़ों प्रकार से इस भूमि को हरी-भरी करेंगी और फि़र वापस समुद्र में विसर्जित हो जाएंगी और ऐसा करने के लिए आवश्यक है कि तुम अपने आप को गुरु के प्राणों में विसर्जित कर सको।
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