





संसार का नाम दुःखालय है। दुखालय का अर्थ स्पष्ट है- दुखों का घर, यहां पर जिसने भी जन्म लिया है, उसे सुख और दुःख दोनों को अपने जीवन में अनुभव करना पड़ता है। मनुष्य को अपने जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि, यश-अपयश, उन्नति-अवनति और सम्पत्ति-विपत्ति का मिला-जुला जीवन जीना पड़ता है। प्रकृति की तरह मनुष्य जीवन भी परिवर्तनशील होता है। प्रकृति में सर्दी, गर्मी और वर्षा का मौसम बदलता रहता है। इसी प्रकार मनुष्य जीवन में भी अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं का आना-जाना क्रमशः होता रहता है।
कोई भी परिस्थिति हमेशा स्थायी नहीं रहती। सुख के पश्चात दुःख और दुःख के पश्चात सुख होता है। सुख दुख मनुष्य के साथ पहिये की तरह घूमते रहते हैं। स्वयं मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम, श्रीकृष्ण, गौतम बुद्ध, प्रभु ईसा आदि अवतारी पुरूषों ने भी इस संसार में जन्म लेकर अनेक प्रकार के कष्टों और कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना किया था। वे प्रत्येक परिस्थितियों में सम रहे। वे कष्टों- दुखों में थोड़ा भी विचलित नहीं हुए।
वाल्मीकि जी ने रामायण में कहा था- ‘दुर्लभं हि सदा सुखम्’ अर्थात मनुष्य को सदा सुख तो नहीं मिलता। सुख और दुःख दोनों का जीवन जीने के लिये मनुष्य बाध्य है। मनुष्य को कष्टों और विपत्तियों में हमेशा धीरज रखना चाहिये। बुरे दिनों में आशावादी दृष्टिकोण रखकर अच्छे दिनों की प्रतीक्षा करना ही बुद्धिमानी है। महापुरूष सुख-दुख और सम्पत्ति-विपत्तियों में सदैव समान रहते हैं। इस सन्दर्भ में भगवान सूर्य का उदाहरण स्पष्ट है।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।।
अर्थात सूर्य उदयकाल में भी रक्तवर्ण के तथा अस्तकाल में भी रक्त वर्ण के ही रहते हैं। महापुरूषों की शिक्षा है कि जीवन में कठिनाइयाँ तो आती ही हैं, परन्तु उनका सामना करना ही बुद्धिमानी है। कठिनाइयों के साथ जीना भी प्रत्येक मनुष्य को सीखना चाहिये, क्योंकि पानी में डूबने, चाक पर घूमने और आग में पकने के बाद ही मिट्टी मूल्यवान बनती है। इसी प्रकार मनुष्य भी जीवन की विषम परिस्थितियों, विपत्तियों और ठोकरें सहने के बाद ही परिपक्व होता है। मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम भी राज सिंहासन के मोह में चौदह वर्ष के वनवास जाने की आज्ञा शिरोधार्य नहीं करते और अयोध्या में ही बने रहते तो उनके पराक्रम और शक्तियों का पता कैसे चलता? पृथ्वी से राक्षसों का नाश कैसे होता और क्या आज उनको कोई जान पाता? सर्वथा नहीं। श्रीराम ने महा शक्तिशाली लंकाधिपति रावण की राक्षसी सत्ता को समाप्त किया। इसीलिये आज वे घर-घर में मर्यादा पुरुषोतम रूप में पूजे जाते हैं। कहा जाता है कि समुद्र में अनेकों नदियों के समा जाने पर भी वह विचलित नहीं होता, हमेशा अचल शान्त बना रहता है। ठीक इसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्य भी जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में विचलित नहीं होते।
हितोपदेश की सूक्ति है- ‘विपदि धैर्यम्’ अर्थात् विपत्तियों के आने पर मनुष्य को धैर्य रखना चाहिए। कठिन दुखद परिस्थितियों में धैर्य का सहारा ही मनुष्य को शक्ति प्रदान करता है। अनुकूल और सुखद परिस्थितियों में तो प्रत्येक व्यक्ति आनन्दित और उत्साहित रहता है, परंतु प्रतिकूल परिस्थितियों में जो शान्त और उत्साहित रहे, अपना मानसिक सन्तुलन ठीक रखें, सूझ-बूझ से काम करता रहे, वही सफलता प्राप्त करता है और संसार में उसी की प्रशंसा होती है।
महाभारत के अनुसार पाण्डवों ने बारह वर्ष के वनवास में अनेकों प्रकार की विपत्तियों का धैर्यपूर्वक सामना किया। अज्ञातवास में उन्होंने विराट- नरेश के यहां शरण ली। युधिष्ठिर राजा के यहां कंक नाम से ब्राह्मण बने और सेवक के रूप में कार्य किया, सर्वश्रेष्ठ गदाधर बलशाली भीम को रसोइये के रूप में कार्य करना पड़ा, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन ने एक वर्ष बृहन्नला बनकर राजकुमारी उत्तरा को नृत्यगान सिखाया, नकुल ने ग्रन्थिक के रूप में घोड़ों की जिम्मेदारी ली, सहदेव अरिष्टनेमि के रूप में मवेशियों की देखभाल के लिये नियुक्त हुए और द्रौपदी सैरन्ध्री बन रानी की सेविका के रूप में नियुक्त हुई। इस प्रकार पाण्डवों ने विपत्तियों में परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाला और पूरी तरह वैसा ही जीवन जिया, जैसा कि उस परिस्थितियों में आवश्यक था।
रामचरित मानस में महाकवि गोस्वामी श्री तुलसी दास जी ने कहा- धीरज धर्म मित्र अरू नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।। अर्थात विपत्तियों के समय में ही धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी की परीक्षा होती है। विपत्तियों में उक्त चारों का सहारा लेना चाहिये। सबसे पहले धैर्य ही धारण करना आवश्यक है। धीरज का फल हमेशा मीठा होता है।
रहिमन बिपदा हू भली जो थोरे
दिन होय। हित अनहित या जगत
में जानि परत सब कोय।।
अर्थात थोड़े दिनों कि विपत्तियों सदा ही भली होती है। इस थोड़े ही समय में ही हमें अपने हितैषी- भला चाहने वाले मित्रों तथा सम्बन्धियों का पता चल जाता है। जो हितैषी होते हैं, वे मदद करने में आगे आते हैं।
पाण्डवों की माता देवी कुन्ती ने भगवान श्रीकृष्ण से वरदान मांगा था कि आप हम लोगों को बार-बार विपत्ति दिया करें। बार-बार विपत्ति से स्मृति रूप में आप हमें मिलते हैं और आपका मिलना मोक्षदायक होता है।
विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।।
बुआ की याचना सुनकर भगवान श्रीकृष्ण स्तब्ध रह गये और बोले- तुम दुखों को मांग रही हो बुआ। क्यों? कुन्ती ने कहा- कृष्ण! तुम्हारा एक नाम दीनबन्धु है, लोग तुम्हें आरतिहरण और दुःखहारी भी कहते हैं। विपत्तियों- बुरे दिनों में तुम्हारा निरन्तर स्मरण होता रहता है, किन्तु सुख में मनुष्य भूल जाता है, इसी बहाने यदि मनुष्य ईश्वर को स्मरण करता है तो भी ठीक है। वास्तव में जिस प्रकार आग में तपाये जाने के बाद ही सोने में चमक आती है, उसी प्रकार मनुष्य के चरित्र में अनेक सद्गुणों का विकास विपत्तियों में ही होता है।
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