





सदियों पूर्व से ही नारी की इच्छा शक्ति से यह जगत् परिचित होता आया है। नारी के अन्दर इतनी क्षमता होती है, कि वह अपने पति को यमराज से छीन कर वापिस ला सकती है। नारी के दृढ़ निश्चय के आगे तो काल को भी बाध्य होकर अपनी गति रोक देनी पड़ती है।
वास्तव में नारी शक्ति स्वरूपा है यह बात अलग है, कि आज नारी अपने इस स्वरूप को बिसरा बैठी है, इसीलिये तो वह तमाम तरह की परेशानियों से घिरी रहती है, किन्तु ऐसा नहीं है, कि आज के युग में भी यदि कोई नारी ठान ले, तो अपने पूर्ण सौभाग्य को प्राप्त न कर सके।
यह बात और है कि, किसी को मालूम नहीं है कि किन विधियों से उस शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है, जिसके माध्यम से पूर्ण सौभाग्य प्राप्त हो सके, उसके परिवार पर से अकाल मृत्यु की छाया का निवारण हो सके, उसका पति दीर्घायु हो, साथ ही अपनी पत्नी को, अपनी अर्द्धागिनी समझते हुए पूर्ण सुख प्रदान करें।
नारी की इसी शक्ति को जगाने के लिये ही शास्त्रों में वर्णित है-‘पूर्ण सौभाग्य साधना’ जिसे प्रत्येक सौभाग्यवती स्त्री करना अपना धर्म समझती है, और प्रत्येक पुरूष अपनी स्त्री से यह व्रत करवा कर या स्वयं इस प्रयोग को सम्पन्न करके सभी आधि-व्याधि, अकाल-मृत्यु से छुटकारा पा लेता है, साथ ही यह प्रत्येक कुमारी कन्याओं के लिये योग्य वर प्राप्ति हेतु अद्वितीय साधना है।
चन्द्रमा का अमृतमय पुरूष स्वरूप में ही वर्णन प्राप्त होता है, इसीलिये शास्त्रों में उचित मुहूर्त में चन्द्र पूजन विधान रखा गया है, उस दिन चन्द्रमा की जिस कला की रश्मियां पृथ्वी को आप्लावित करती है, उनका यह गुण है, कि वे विशेष मंत्रों के माध्यम से साधना करने वाले साधक अथवा साधिका को पूर्ण सौभाग्य एवं पूर्ण आयु प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करती है, इसी तथ्य को ध्यान में रखकर अखण्ड सौभाग्य पर्व-पूजन का विधान निर्मित किया गया है।
पूर्वकाल में यह पूजन पुरूष एवं स्त्री अर्थात् पति-पत्नी दोनों ही सम्मिलित रूप से करते थे। यह कहने की आवश्यकता नहीं रही, कि ये दोनों मिलकर ही एक है। समय के प्रवाह में बहुत सी परम्पराएं लुप्त हो गई, आधुनिकता के प्रवाह के कारण पुरूषों को व्रत, उपवास रखने में बहुत ही हीन भावना महसूस होने लगी, इसीलिए धीरे-धीरे वे अपने दायित्व से दूर होते चले गये, किन्तु ऐसा करके उन्होंने कोई उत्तम कार्य नहीं किया है। यह बात तो सर्वविदित है, कि कोई भी यज्ञ, पूजा आदि पति-पत्नी दोनों को एक साथ मिलकर ही करनी चाहिये, इसीलिये अखण्ड सौभाग्यवती पर्व की सम्पूर्ण सौभाग्य साधना भी पति-पत्नी दोनों को ही मिलकर करनी चाहिये।
इस प्रकार मंत्र जप पूर्ण करने के पश्चात् एक तांबे के बर्तन में जल, घी, अक्षत, कपूर, श्वेत चंदन तथा श्वेत पुष्प डाल कर चन्द्रमा को पति-पत्नी दोनों मिलकर अर्घ्य प्रदान करें- ‘हे चन्द्र देव! आप ही सबको परम आनन्द और मुक्ति प्रदान करने वाले हैं। आपकी कृपा से हमें भी सम्पूर्ण सौभाग्य, दीर्घायु सम्पन्नता एवं पूर्ण दाम्पत्य सुख की प्राप्ति हो।’
इस प्रकार पूर्ण पूजन करने के पश्चात् बाजोट पर बिछे श्वेत वस्त्र में ही यंत्र, माला तथा सभी गुटिका को लपेट कर पोटली बना ले एवं उसी रात्रि को अथवा अगले दिन ही नदीं में उन्हें विसर्जित कर दें।
चन्द्र-पूजन पूर्ण होने के पश्चात् पूरे परिवार के साथ बैठकर आनन्द पूर्वक भोजन ग्रहण करें।
मूल मंत्र का जप यदि पति-पत्नी दोनों मिलकर करते है, तो 8 माला पति और 8 माला पत्नी को मंत्र-जप करना है, किसी प्रकार की यदि कोई असुविधा हो तो पति या पत्नी दोनों में से कोई एक भी इस साधना को सम्पन्न कर सकता है।
यह तो बताने की आवश्यकता ही नहीं रही, कि प्रत्येक साधना या पूजन प्रारम्भ करने से पूर्व गुरू पूजन तथा गुरू मंत्र की एक माला जप करना आवश्यक है, अनुष्ठान पूर्ण होने के पश्चात् गुरू चित्र के सम्मुख भक्ति भाव से नमन कर गुरू आरती सम्पन्न करना तो प्रत्येक साधक का कर्त्तव्य है ही।
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