





रूद्रयामल तंत्र में कहा गया है कि गकार सिद्धिदायक है और रु पाप का दाह करने वाला है, उकार को शुभ कहा गया है, इस प्रकार इन तीनों के समन्वित स्वरूप को ‘‘गुरू’’ शब्द से सम्बोधित किया गया है। कंकाल मालिनी तंत्र के पहले पटल में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि ‘गुरू’ शब्द के दोनों अक्षर क्रमशः निर्गुण और परब्रह्म हैं, एक प्रकार से कहा जाय तो यह गोपनीय महामंत्र हैं, और संसार के सभी मंत्रों से श्रेष्ठ है। गुरू तंत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जिसकी जीभ के अग्रभाग में गुरू शब्द रहता है, उसे जीवन में व्यर्थ का कोई तनाव नहीं रहता, उसे वेद और शास्त्र पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं रहती, केवल मात्र ‘गुरू’ के उच्चारण से ही ब्रह्म शक्ति की प्राप्ति होती हैं। प्रशुराम अपनी माता के वधा से और इन्द्र ब्रह्म हिंसा के पाप से केवल ‘गुरू’ शब्द के उच्चारण करने से ही मुक्त हुए थे।
गकारः सिद्धिदः प्रोक्त रे: पापस्य दाहकः।
उकार शम्भुरित्युक्तस्त्रितयात्मा गुरूः स्मृताः।।
निर्गुणं च परं ब्रह्मं गुरूरित्यक्षर द्वयम्।
महामंत्रम् महादेवी गोपनीयं परात्परम्।।
गुरू रित्यक्षरं यस्य जिह्वाग्रे देवि वर्तते।
तस्य किं विद्यते मोहः पाठेवदस्व किं वृथा।।
गुकारोच्चारण मात्रेण ब्रह्महत्या व्यपोहति।
उकारोच्चारण मात्रेण मुच्यते जन्म पातकः।।
जिस दिन शिष्य अपने आप को गुरू चरणों में समर्पित कर देता है गुरू सेवा को साधना को आधार बना लेता है तब शिष्य एक नये सिद्धि के मार्ग पर चल पड़ता है और तब वह ‘‘निगुरा’’ नहीं रहता। गुरू से युक्त हो जाता है, उसके जीवन में आत्मिक सौन्दर्य आ जाता है। मन के भ्रम एक के बाद एक दूर होने लगते हैं। भीतर ही भीतर एक नया प्रकाश उदयमान होने लगता है। एकलव्य के नाम से शायद ही कोई भारतीय अपरिचित हो। आध्यात्मिक जगत के व्यक्तियों के लिए तो यह नाम केवल एक व्यक्तित्व का सूचक ही नहीं, साक्षात् तीर्थ के समान पवित्र है, शिष्यों के लिए वह हिमालय की ऐसी चोटी है, जहां तक वे चढ़ना चाहते हैं।
ऐसा क्या है, इस नाम में ? वह न तो समाज के उच्च वर्ग से सम्बन्धित था, न लक्ष्मीपति था, न किसी राज्य का स्वामी था, फिर भी प्रत्येक भारतीय का सिर, एकलव्य शब्द सुनकर श्रद्धा से झुक ही जाता है। वह अपने आप में शिष्यता के आकाश में धुव्र तारे के समान हैं, महासागरों में प्रशांत महासागर है, पर्वतों में हिमालय है जो कि अपने आप में पूर्णता का प्रतीक है। उसकी उपमा दी जाती है, एक शिष्य के लिए इससे बड़ा सम्मान हो भी क्या सकता है ? क्या एकलव्य ने यह स्थान अपनी विद्या के कारण अर्जित किया ? क्या वह अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर होने के कारण विख्यात हुआ या फिर गुरू द्रोणाचार्य द्वारा दक्षिणा में अंगूठा मांग लिए जाने के कारण अपने त्याग से अमर हो गया। ये सभी बातें सत्य है, किन्तु इन बातों से भी अधिक महत्वपूर्ण तथ्य एक बात में छिपा हुआ है। वस्तुतः जो तथ्य कहे नहीं जाते, वे तथ्य ही व्यक्ति के, समाज के अन्तर्मन में बैठ जाते हैं और वे पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परा के रूप में गतिशील होते हैं। जिस प्रकार छल से एकलव्य का अंगूठा लिया गया, उसे समाज कभी न भुला सका और यही कारण है कि, श्रेष्ठतम योद्धा व भगवान कृष्ण के सखा होते हुए भी अर्जुन देवताओं की भांति पूज्य न हो सके।
दूसरी ओर एकलव्य इसलिए महान और पूज्य हुए, क्योंकि उन्होंने यथार्थ में गुरू तत्व को हृदयंगम किया था। उन्होंने यथार्थ में गुरू तत्व की महता समझी थी और उसे अपने प्राणों से पूजा था। यही कारण था, कि वह गुरू द्रोणाचार्य के संपर्क में आये बिना धनुर्विद्या की पराकाष्ठा तक कैसे पहुंच सका। गुरू द्रोणाचार्य भी इस तथ्य को समझते थे, किन्तु वे अर्जुन से वचनबद्ध थे और उन्होंने दक्षिणा में अंगूठा मांग लिया। एकलव्य को इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता था। क्योंकि वह अपने गुरू की दृष्टि में ऊंचा उठ चुके थे और वे ही सही अर्थों में ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये’ की भावना को समझ सके थे। एकलव्य की कथा जहां एक ओर गुरू शिष्य मर्यादा की पराकाष्ठा सूचक है, वहीं गुरू तत्व को आत्मसात् करने का भी सूचक है। जब गुरू को देह से परे जाकर पूजा जाता है, तभी वे हृदय में समा सकते हैं और जिसके हृदय में गुरूदेव समा गए हों, उसे ज्ञान के लिए कहीं भटकने की आवश्यकता ही क्या ? जो अपने गुरू की दृष्टि में ऊंचा उठ गया उसे फिर यथार्थ में किसी अन्य सम्मान की आशा ही कहां और क्यों ?
गुरूतत्व के आत्मसात् द्वारा एकलव्य खुद का दीपक स्वयं बन गये थे। स्वयं का दीपक का अर्थ है कि स्वयं ही पूर्ण बनना और यही साधना की अंतिम अवस्था होती है। गुरू का सारा प्रयास इसी बिन्दु तक लाने के लिए होता है। जब हमारे जीवन में हताशा, निराशा, अविश्वास रूपी विष घर बना लेता है तब यह गुरु ज्ञान रूपी दीपक ही हमारे अंदर प्रज्ज्वलित होता है और हमारे लिये साधनात्मक मार्ग को प्रशस्त करता है। जब जीवन से रस, आनन्द, हर्षोल्लास चला जाता है, स्वयं को अशक्त, दुर्बल और पापी मनोदशा में बांध— लेते हैं तब यही प्रकाश आकर हमें सहारा देता है और जीवन की अविराम यात्रा पर चलने का बल देता है। यही गुरू का वास्तविक बल होता है।
बुद्धिमता और सौभाग्य इसी में है, जिन्होंने गुरू शरण में जाकर अपने अन्तः करण में स्थित इस दीपक को प्रज्ज्वलित कर लिया और भविष्य के पथ पर बिना ठोकर खाए आगे बढ़ सके। एक बात और स्मरण रखने योग्य है कि जहां-जहां प्रकाश की बात है, वहां पीड़ा का पक्ष भी जुड़ा ही हुआ है, क्योंकि प्रकाश उत्पन्न होता है जलने से और जलने में पीड़ा तो होगी ही, फिर भी यह पीड़ा उस अंधकार में घिरे, निराश बैठे रहने से श्रेष्ठ है। पीड़ा तो प्रत्येक कार्य में है। जिसे हम भौतिक सुख कहते हैं, उसे प्राप्त करने में भी तो पीड़ा ही है। जीवन को सजाने संवारने के लिए हम कड़ी मेहनत करते हैं, क्या वह भी एक प्रकार की पीड़ा नहीं है ? जहां भौतिक पक्ष में यह पीड़ा अंत में भी कोई विशेष सुखदायी नहीं है, वहीं आध्यात्मिक पक्ष में यह पीड़ा अंत में निश्चित सुख दायी है।
जो प्रकाशवान होते हैं, वे ही श्रेष्ठ होते हैं, क्योंकि उनके प्रकाश में कई और भी दिशा पाते हैं। प्रकाश का यह गुण होता है, कि वह स्वयं के लिए नहीं होता। बिना इस प्रकाश के, बिना आत्मचेतना की निर्मल आभा के कोई भी जनकल्याण या समाज कल्याण की बात कहना भी व्यर्थ है। इसी अवस्था को प्राप्त करने हेतु सतत् चलना ही पड़ता है और सतत् हमें दैनन्दिनी जीवन में भी नित्य चलना पड़ता है। प्रतिदिन भोजन करना पड़ता है, प्रतिक्षण श्वास-प्रश्वास लेनी पड़ती है, हृदय को प्रतिक्षण धड़कना पड़ता है और स्नायु तंत्र को प्रतिक्षण सतर्क रहना पड़ता है और ऐसी ही अपने शरीर की सैकड़ों ज्ञात-अज्ञात क्रियाओं के कारण ही हम जीवित रहते हैं, तो यही बात अधयात्म के क्षेत्र में भी रहती हैं।
—और हम तभी प्रकाशवान बन सकते हैं जब हम भी एकलव्य की तरह गुरूतत्व को आत्मसात् करेंगे। क्योंकि गुरू शब्द ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ और महत्वपूर्ण शब्द हैं। इस शब्द का तात्पर्य है कि तन, मन और जीवन के अन्धकार को दूर करने वाले व्यक्तित्व का चिन्तन है, जो व्यक्ति हमारे जीवन के अन्धकार को दूर कर शुद्ध बना सकते हैं, वही गुरू है। शास्त्रों में तीन महान देवता माने गए हैं। जो कि ब्रह्मा, विष्णु, और महादेव हैं। इसी प्रकार धरती के भी तीन महान देवता हैं, जिन्हें माता, पिता और गुरू कहा गया है। ब्रह्मा तो केवल जन्म ही प्रदान करते हैं, इसीलिए माता को ब्रह्मा कहा गया है, पुराणों के अनुसार विष्णु पालन-पोषण करता है, इसलिए पिता को विष्णु की संज्ञा दी जाती है, पर इन दोनों देवताओं से महान भगवान शिव हैं, इसीलिए उनको सामान्य देव न मानकर ‘महादेव’ कहा जाता है, धरती पर भी गुरू को महादेव ही माना गया है, क्योंकि वह एक साथ व्यक्ति की आत्मा का सृजन करते हैं, उसका चिन्तन, पालन पोषण करते हैं और सही अर्थों मे कहा जाय तो उसको पूर्णत्व प्रदान करते हैं। बिना गुरू के इस प्रकार का संस्कार होना संभव नहीं है। माता-पिता केवल व्यक्ति के शरीर को ही जन्म देते हैं, जबकि गुरू उसकी आत्मा का सृजन करता है, आत्मा को दृढ़ बनाकर उसका पालन-पोषण करते हैं, और आत्मा में निहित तुच्छ भावनाओं का संहार कर उसे पूर्णता प्रदान करते हैं, ऐसा करके ही वह एक प्रकार से बालक को दूसरा जन्म प्रदान करते हैं, ‘जन्मना जायते शुद्र संस्करात् द्विज उच्यते’ अर्थात् माता-पिता तो एक प्रकार से शूद्र को ही जन्म देते हैं, क्योंकि शूद्र को पवित्रता-अपवित्रता का ज्ञान नही होता, शूद्र को संस्कार असंस्कार का चिन्तन भी नहीं होता, बालक की स्थिति भी वैसी ही होती है। परन्तु गुरू ऐसे असंस्कारित बालक को लेकर उसका सही प्रकार से निर्माण करते हैं, तभी वह ‘द्विज’ कहलाता है, ‘द्विज’ का तात्पर्य दूसरी बार जन्म लेना, एक प्रकार से गुरू उसको दूसरा जन्म प्रदान करते हैं।
लेखन इस तत्व की भाषा को शब्द में बांध नहीं सकता, क्योंकि गुरू महिमा का वर्णन केवल वेद पुराण उपनिषद आदि शास्त्रों में नहीं है अपितु विश्व में निश्चित आधार के रूप में विख्यात है। गुरू का चिन्तन हमेशा शिष्य का अन्तश्चेतना को जागृत कर उसकी तुच्छ भावनाऐं, विकार, उसके अंदर व्याप्त अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करना ही होता है। गुरू चाहे वशिष्ठ हों, याज्ञवल्क्य हों, गोरखनाथ हों अथवा रामतीर्थ एक ही प्रयास रहा कि शिष्य को कालिमामय अंधकार में सूर्य रूपी प्रकाशवान बनने की क्रिया की ओर गतिशील कराना। उनके लिए शिष्य की कोई श्रेणी नहीं थी, जो भी शिष्य भावना से युक्त होता था, अपने भीतर आत्म साक्षात्कार करना चाहता था, अपनी कुण्डलिनी जागरण करना चाहता था, अपने जीवन के वास्तविक स्वरूप को देखना चाहता था, उस प्रत्येक शिष्य को अपने हृदय से लगाया, अपने पुत्र से अधिक माना और उनको मानस पुत्र से संबोधित करके उनके जीवन को आलोकित किया। आत्मवत् बनते ही शिष्य की भावना असत्य से सत्य की खोज के लिए बढ़ते हुए, सारतत्व को प्राप्त करना है, जिसे गुरू ही सरलता से सूर्य के सदृश तेजपुंज बनाकर शिष्य को जाग्रत कर देते हैं। जैसे ही शिष्य के अंतर में गुरू यह क्रिया संपन्न करते हैं, उसके जीवन में अज्ञान अंधकार के बादल स्वतः छटते जाते हैं, एक नयी सिहरन, नयी उमंग, नयी गति, नयी तरंग जीवन में नाचने लगती है, उसे अहसास होने लगता है कि यही वह सब कुछ नहीं है, जिसे पाने के लिए उसने अनमोल मानव रत्न यह देह रूपी मन्दिर प्राप्त किया है, इसमें स्थापित आत्मा और ब्रह्म का संयुक्त स्वरूप ही उसका अभीष्ट है। गुरू का ‘‘गु’’ अक्षर और ‘‘रू’’ अक्षर निश्चय ही अज्ञान से सत्य एवं अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की एक मधुर तांत्रोक्त क्रिया है। इसीलिए कहा गया है कि
गुकारस्त्वदन्धाकारश्च रूकारस्तेज उच्यते।
ज्ञानाग्रासक ब्रह्म गुरूदेव न संशयः।।
गुरू के पावन चरणों में मानव अपने संचित पुण्यों को लेकर जब दीक्षा का सौभाग्य प्राप्त करता है, तो गुरू का मिलन दिव्य वात्सल्य और ममतायुक्त पिता और माता का शिशु में आत्म मिलन जैसा मनोहारी दृश्य पैदा कर देता है, जब गुरू शिष्य को सीने से लगाकर उसे प्यार से दुलारते हुए ‘बेटा’ का उच्चारण करते हैं, गुरू अपने हाथ के स्पर्श से आंखों के तेज से शिष्य को नया जीवन, नया दर्शन प्रदान करते हैं यही तो ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ की पादाम्बुज कल्प कथ्य है।
साधना ग्रंथ में अपने आप में अनेक अनेक उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जहां शिष्य ने या साधक ने किसी प्रकार की कोई साधना संपन्न नहीं की, किसी प्रकार का कोई मंत्र जप नहीं किया, किसी प्रकार का कोई पूजा-अर्चना नहीं की, अपितु अपने हृदय में गुरू को पूर्ण रूप से उतारने की क्रिया ही संपन्न की, इस क्रिया के माध्यम से अपने जीवन को प्रकाशित करने का ही प्रयत्न किया और जब गुरूदेव किसी शिष्य या साधक को पूर्णता, श्रेष्ठता प्रदान करते हैं, उसके जीवन में वह चैतन्यता रूपी दीपक प्रज्ज्वलित करते हैं तो वह अनुभव करता है कि वह जीवन में जिस सिद्धि को प्राप्त करना चाहता था वह तो उसके सामने खड़ी है, वह जीवन में जो कुछ प्राप्त करना चाहता था वह उसे अनायास मिल गयी है, यह गुरू की तरफ से शिष्य को अपूर्व भेंट और श्रेष्ठ वरदान है।
—–और यही तो एक उच्चकोटि के साधक, सही अर्थों में जो शिष्यता के भाव भूमि पर खड़ा होता है चाहता है, पर इसके लिए मन में पूर्ण शिष्य बनने की क्रिया होनी चाहिए, मन में संशय, द्वंद आदि का जड़ से समाप्त होना चाहिए। ‘गर्व’, ‘अहं’, ‘मैं’ आदि शब्द का चिन्तन, भाव का पूर्ण रूप से विनाश होना चाहिए। ज्यों ही शिष्य या साधक के मन में यह भाव पैदा हुआ वहीं वह इस दिव्यता को आलिंगन करने से चूक जाता है।
एक बार भगवान श्री राम चन्द्र जब समुद्र पर सेतु बांध रहे थे, तब विघ्न निवारण हेतु पहले गणेश जी की स्थापना कर नवग्रहों की नौ प्रतिमाऐं नल के हाथों स्थापित करायी। तत्पश्चात् उनका विचार सागर पर एक अपने नाम से शिवलिंग स्थापित कराने का हुआ। इसके लिये वे उनके भक्त हनुमान जी को बुलाकर कहा- ‘‘काशी जाकर भगवान शंकर से लिंग मॉंगकर लाओ। पर देखना, मुहुर्त न टलने पाये।’’ हनुमान् जी क्षणभर में वाराणसी पहुंच गये। भगवान् शंकर ने कहा- मैं पहले से दक्षिण जाने के विचार में था, परन्तु तुम्हें जब श्रीराम ने भेजा हैं तो तुम एक तो श्रीराम के तथा दूसरा अपने नाम पर स्थापित करने के लिए इन दो लिंगों को ले चलो। इस पर हनुमान जी को अपनी महत्ता तथा तीव्रगामिता का थोड़ा सा गर्वाभास हो आया।
—इधर कृपासिन्धु भगवान को अपने भक्त की इस रोग की बात मालूम हो गयी। उन्होंने सुग्रीव को बुलाया और कहा-‘अब मुहुर्त बीतता ही जा रहा है, अंतएव मैं बालू मय लिंग की ही स्थापना करता हूं।’ यों कहकर मुनियों की सम्मति से उन्हीं के बीच बैठकर विधि-विधान से उस बालू के लिंग की स्थापना कर दी। दक्षिणा-दान के लिये प्रभु ने कौस्तुभमणि को स्मरण किया। स्मरण करते ही वह मणि आकाशमार्ग से सूर्यवत् आ पहुंची। प्रभु ने उसे गले में बांध लिया। उस मणि के प्रभाव से वहा धन, वस्त्र, अश्व, आभूषण और पायसादि द्रव्यों का ढेर लग गया। भगवान से अभिपूजित होकर ऋषिगण अपने घर चले गए। रास्ते में उन्हें हनुमान जी मिले। उन्होंने मुनियों से पूछा, महाराज ! आप लोगों की किसने पूजा की है ? उन्होंने कहा- श्री राघवेन्द्र ने शिवलिंग की प्रतिष्ठा की है, उन्होंने ही हमारी दक्षिणा से पूजा की है।’ अब हनुमान जी को भगवान के मायावश क्रोध आ गया। वे सोचने लगे ‘देखो ! प्रभु ने व्यर्थ का श्रम कराकर मेरे साथ यह कैसा व्यवहार किया है !’ दूसरे ही क्षण वे प्रभु के पास पहुंचे ओर कहने लगे-‘क्या लंका जाकर सीता का पता लगा आने का यही इनाम है ? यों काशी भेजकर लिंग मंगाकर मेरा उपहास किया जा रहा है ? यदि आपके मन में यही बात थी तो व्यर्थ का मेरे द्वारा श्रम क्यों कराया ?
दयाधाम भगवान ने बड़ी शांति से कहा ‘पवन नन्दन ! तुम बिल्कुल ठीक ही तो कहते हो। क्या हुआ ? तुम मेरे द्वारा स्थापित इस बालू रूपी लिंग को उठा दो। मैं अभी तुम्हारे लाये लिंग को स्थापित कर दूं।’
यह सुनते ही अपनी पूंछ में लपेटकर हनुमान ने उस लिंग को बड़े जोर से खींचा। पर आश्चर्य लिंग का हिलना-डूलना तो दूर की बात रही वह टस से मस तक न हुआ, उल्टे हनुमान जी की पूंछ ही टूट गयी। वीरशिरोमणि मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। वानर सब जोरों से हंस पड़े। स्वस्थ होने पर हनुमान जी पूर्णतया गर्वविहीन हो गये। उन्होंने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और क्षमा मांगी। प्रभु को क्या था ?
क्षमा तो पहले से ही दी हुई थी। तत्पश्चात् विधिपूर्वक अपने स्थापित शिवलिंग के उत्तर में विश्वनाथ लिंग के नाम से उन्होंने हनुमान जी के द्वारा लाये गये लिंगों की स्थापना करायी और वर दिया ‘कोई यदि पहले हनुमत प्रतिष्ठित विश्वनाथ लिंग की पूजा न कर मेरे द्वारा स्थापित रामेश्वर लिंग की पूजा करेगा तो उसकी पूजा व्यर्थ होगी।’ फि़र प्रभु ने हनुमान से कहा ‘तुम भी यहां छिन्न-पुच्छ, गुप्त पाद रूप से गतगर्व होकर निवास करो।’ इस पर हनुमान जी ने अपनी भी एक वैसी ही छिन्न-पुच्छ, गुप्तपाद, गतगर्व मुद्रामयी प्रतिमा स्थापित कर दी। वह आज भी वहां स्थित है।
इससे पता चलता है कि कोई कितना भी बड़ा साधक क्यों न हो, शिष्य क्यों न हो प्रभु के प्रति, इष्ट के प्रति सर्मपण भाव से, श्रद्धा भाव से, गर्व, अहं रहित हो कर ही वह पूर्णता प्राप्त कर सकता है। और श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है। साधना के उस अंतिम महासागर में स्वयं का दीपक जलाने हेतु, स्वयं को प्रकाशवान बनाने हेतु मन में समर्पण, धैर्य और लक्ष्य के प्रति एकाग्रता होनी चाहिए। क्योंकि इन गुणों से अशक्य भी शक्य होता है। द्रोणाचार्य पाण्डव एवं कौरव राजकुमारों को अस्त्र-शिक्षा दे रहे थे। बीच-बीच में आचार्य अपने शिष्यों के हस्तलाघव, लक्ष्यवेध, शस्त्र-चालन की परीक्षा भी लिया करते थे। एक बार उन्होंने एक लकड़ी का पक्षी बनवाकर एक सघन वृक्ष की ऊंची डाल पर रखवा दिया। राजकुमारों को कहा गया कि उस पक्षी के बायें नेत्र में उन्हें बाण चलाना है।
सबसे बड़े राजकुमार युधिष्ठिर ने धनुष उठाकर उस पर बाण चढ़ाया। इसी समय आचार्य ने उनके पूछा -तुम क्या देख रहे हो ? युधिष्ठिर सहज भाव से बोले -‘ मैं वृक्ष को, आपको तथा अपने सभी भाइयों को देख रहा हूं। आचार्य ने आज्ञा दी ‘तुम धनुष रख दो।’ युधिष्ठिर ने चुपचाप धनुष रख दिया। अब दुर्योधन उठे। बाण चढ़ाते ही उनसे भी यह प्रश्न आचार्य ने किया। दुर्योधन बोले-‘सभी कुछ तो देख रहा हूं। इसमें पूछने की क्या बात है।’ उन्हें भी धनुष रख देने का आदेश हुआ। इसी प्रकार बारी-बारी से सभी पाण्डव एवं कौरव राजकुमार उठे। सबने धनुष चढ़ाया। सबसे वही प्रश्न आचार्य ने किया। सबने लगभग एक ही उत्तर दिया।
सबको बिना बाण चलाये धनुष रख देने की आज्ञा आचार्य ने दे दी। अन्त में आचार्य की आज्ञा से अर्जुन उठे और उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाया। उनसे भी आचार्य ने पूछा-‘तुम क्या देख रहे हो ?’ अर्जुन ने उत्तर दिया ‘मैं केवल यह वृक्ष देख रहा हूं।’ आचार्य ने फिर पूछा- ‘मुझे और अपने भाईयों को तुम नहीं देखते हो ?’ अर्जुन -‘इस समय तो मैं आपमें किसी का नहीं देख रहा हूं।’
आचार्य ‘इस वृक्ष को तो तुम पूरा देखते हो ?’ अर्जुन- ‘पूरा वृक्ष मुझे अब नहीं दिखता। मैं तो केवल वह डाल देख रहा हूं, जिस पर पक्षी है।’ आचार्य ‘तुम्हें दिख रहा है कि पक्षी का रंग क्या है ?’ अर्जुन- ‘पक्षी का रंग तो तुझे इस समय दिखता नहीं। मुझे केवल उसका वाम नेत्र दिखता है और वह नेत्र काले रंग का है।’
आचार्य- ठीक है। ‘तुम्ही लक्ष्यवेध कर सकते हो। बाण छोड़ो।’ अर्जुन के बाण छोड़ने पर पक्षी उस शाखा से नीचे गिर पड़ा । अर्जुन के द्वारा छोड़ा गया बाण उसके बायें नेत्र में गहरा चुभा हुआ था। आचार्य ने अपने शिष्यों को समझाया -‘जब तक लक्ष्य पर दृष्टि इतनी स्थिर न हो कि लक्ष्य के अतिरिक्त दूसरा कुछ दिखे ही नहीं, तब तक लक्ष्यवेध ठीक नहीं होता। इसी प्रकार जीवन में जब तक लक्ष्य-प्राप्ति में पूरी एकाग्रता न हो, सफलता संदिग्ध ही रहती है। पूर्णता तक पहुंचना ही जीवन का उद्देश्य और कर्त्तव्य है, उसी व्यक्ति का जीवन सफल और पूर्ण माना जाता है जिसने अपने जीवन में पूर्णता का स्वाद चखा हो, जो जमीन पर आकर आसमान को छूने का आनन्द लिया हो, वही समझ सकता है कि पूर्णता का आनन्द क्या है, वही समझ सकता है कि जीवन की मधुरिमा क्या है, और वही इस बात को अहसास कर सकता है कि जीवन का अंतिम सत्य क्या है।
और इस पूर्णता तक पहुंचने के लिए यह जरूरी है, कि साधक गुरू के हृदय में अपने आपको स्थापित करे, इसके लिए कोई निमन्त्रण की आवश्यकता नहीं होती, इसके लिए कोई औपचारिकता की जरूरत नहीं होती, यह तो एक वेग है, एक तीव्रता है, एक जीवन का सत्य है, कि वह अत्यंत तेज गति से दौड़ता हुआ गुरू के हृदय में पूर्ण रूप से समा जाय, अपने आपको उसके हृदय में स्थापित कर दे, अपने छोटे से दीपक को उसके हृदय रूपी दीपक से एकाकार कर दे। इसके लिए किसी प्रकार के शब्दों के आडम्बर की आवश्यकता नहीं होती, इसके पीछे कोई लेन-देन का भाव भी नहीं होता, यह तो जीवन का एक पाथेय है, जिस पर चल कर साधक या शिष्य अपने आपको गुरू के हृदय में स्थापित कर सकता है, यह तो एक विश्वास है जिसके बल पर वह गुरू का प्रिय बन सकता है, और इस विश्वास के आधार पर शिष्य तेजी के साथ उस परम सत्ता में लीन हो सकता है, जिसे सिद्धि या सफलता कहा गया है। शिष्य ज्ञानी नहीं होता, जिसने होशियारी दिखाई, जिसने ज्ञान का प्रपंच रचा है वह पंडित तो हो सकता है, शिष्य नहीं हो सकता, जो गुरू के सामने अपने आपका बखान करे, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयत्न करे, उसे गुरू दे भी क्या सकता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में गुरू और शिष्य के बीच में एक पर्दा खड़ा हो जाता है, जिसके आर-पार देखना संभव नहीं होता, और जब तक यह पर्दा तार-तार नहीं होता, तब तक पूर्ण रूप से एक दूसरे में समा जाने की क्रिया कैसे संभव है ?
और जीवन में जिसने साधना में सिद्धि प्राप्त नहीं की, जीवन में जिसने सफलता का आनन्द नहीं लिया उसके जीवन का प्रयोजन भी व्यर्थ हो जाता है। जिसने अपने छोटे से अस्तित्व को ही गुरू में विसर्जित होने की क्रिया संपन्न नहीं की, उस महासागर में नदी की धीर गति रूपी नम्रता से विलीन होने की प्रयास नहीं की, वह पूरे ब्रह्माण्ड का भेदन किस प्रकार से कर सकता है, जो गुरू का ही विश्वास पात्र नहीं बन सका वह सिद्धियों का विश्वास पात्र कैसे हो सकता है। और अपने अन्दर वह दैदीप्यमान दिव्यतम चैतन्य दीपक की प्रज्ज्वलित करना, गुरू के हृदय में स्थिति सूर्य रूपी आलोक को अपने अन्दर स्थापित करने हेतु उस परमतत्व को, गुरूतत्व को आत्मसात करना ही एक मात्र रास्ता है। यदि आप यह क्रिया को संपन्न कर लेते हैं तो तब आप सही अर्थों में शिष्यता के भाव भूमि पर खड़े हो कर अपने जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान रूपी दीपक के साथ पूर्णता की ओर, श्रेष्ठता की ओर अग्रसर हो सकते हैं। वह अपने आप में ही सिद्ध पुरूष बन जाता है, इसके लिए न तो किसी प्रकार की देवी-देवताओं के पूजन की आवश्यकता होती है और न साधना ग्रन्थों के अध्ययन की। क्योंकि व्यक्ति अपने आप में ही अद्वितीय व्यक्तित्व बन जाता है।
वह शिष्य के धरातल से ऊपर उठ कर उस जगह पहुँच जाता है, जहां सिद्धियां स्वयं अपने हाथों में विजय माला लिये खड़ी रहती है, जिसे आगे के जीवन में किसी प्रकार का प्रयास करना ही नहीं पड़ता, क्योंकि यह अपने आपमें पूर्ण प्रयास है, अपने आप में ही सफ़लता है, पूर्ण साधना है।
चिन्तन से, प्राणों से एक
स्थिति बन जाती है तो गुरू
सिद्धि की स्थिति शिष्य को
प्राप्त हो जाती है, अपना
चिन्तन, अपना ज्ञान, अपनी
तपस्या साधना सिद्धि सब कुछ प्रवाहित कर देता है, शिष्य के सिर पर हाथ रखकर ब्रह्मरंधा्र खोल देता है, दे देता है वह ब्रह्म सिद्धि जिसे योगी, ऋषि, मुनि, देवी-देवता भी पाने को आतुर रहते हैं, ब्रह्म से साक्षात्कार की यही सिद्धि गुरू का आशीर्वाद और वरदान बन जाती है। शिष्य में, सेवक में, साधक में भोग और मोक्ष दे कर पूर्णता देने वाली गुरू सिद्धि ही ब्रह्म सिद्धि कही गई है, शत् शत् नमन् है गुरू की अहैतु की कृपा हो—-
ध्यान मूलं गुरू मूर्तिं पूजामूलं गुरूपदं,
वेद मूलं गुरोर्वाक्यं मोक्ष मूलं गुरू कृपा
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