





सांसारिक मनुष्यों द्वारा अपने भीतर आत्मिक और शारीरिक बल, ज्ञान और चेतना शक्ति से विद्या, बल और धन-धान्य की परिपूर्णता से जीवन निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हो सके इन्हीं सोपानो को प्राप्त करने के लिए निरन्तर शक्ति स्वरूपा की आराधना की जाती है।
शक्ति को आत्मसात करने के लिए स्त्री स्वरूप में दुर्गा, ज्ञान स्वरूप में सरस्वती और धन-धान्य वृद्धि में महालक्ष्मी की ही वंदना की जाती है। संसार में मनुष्यों द्वारा हर तरह की शक्ति से ओत-प्रोत होने के लिए इन्हीं शक्तियों की आराधना से पूर्णता प्राप्त होती है। आध्यात्मिक रूप से आद्या शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के प्रतीक स्वरूप में इसी की वंदना की जाती है क्योंकि सुखी जीवन के लिए बुद्धि, धन और आरोग्यमय देह की प्राप्ति हेतु माँ शक्ति के तीनों स्वरूपों की वंदना अनिवार्य है।
माता वैष्णो देवी आदि शक्ति का स्वरूप है इस शक्ति का कोई ओर-छोर नहीं है इसका अवतरण असुरों के संहार के लिए सृष्टि के रचियता, पालन कर्त्ता और संहार कर्त्ता के सामूहिक शक्तियों से माता को प्रकट किया गया है। इस शक्ति में सृष्टि के निर्माण कर्त्ता ब्रह्मा ने महा-सरस्वती रूप प्रदान किया, पालन कर्त्ता विष्णु ने महालक्ष्मी का तथा संहार कर्त्ता भगवान सदाशिव महादेव ने महाकाली की चेतना का प्रार्दुभाव किया। कटरा जम्मू से 14 कि- की दूरी पर त्रिकूट पर्वत की गुफा में इन तीनों ही देवी स्वरूप में पिण्डियाँ अवस्थित है। सर्व कार्यसिद्धि के लिए तीन रूप धारण किये हुए हैं। ये तीनों ही शक्तियाँ भले ही आदि शक्ति का स्वरूप हैं किन्तु महा-सरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के स्वरूपों का समवेत नाम ही माता वैष्णों देवी कहलाती हैं।
आस्तिक व्यक्ति इन्हीं त्रिशक्तियों को प्राप्त करने के लिए जीवन में अनेक तरह के व्रत-उपवास, पूजा-अर्चना, ध्यान-साधना अपनी बुद्धि के अनुरूप समय-समय पर करता रहता है और साथ ही अनेक पवित्र नदियों में स्नान-दान, तप आदि की क्रियाएं करता है। इतना सब कुछ करने के बाद भी जीवन में यथार्थ रूप से किसी भी तरह से अनुकुलता नहीं आती और जीवन अनेक-अनेक उलझनों और विसंगतियो से घिरा रहता है। आस्तिक रहते हुए भी वह चिंतन, आत्मियता और देव भाव और उनकी शक्तियों की क्रियाएं जीवन में स्थापित नहीं हो पाती क्योंकि उसे सही सद्गुरु रूपी तपस्वी का सानिध्य और मार्गदर्शन नहीं मिलता इसीलिए अनेक तरह की क्रियाएं करने के बाद भी जीवन में केवल अवसाद दुःख, रोग-शोक, दीनता जैसे अन्धकार का भाव स्थायी रूप से बना रहता है इसीलिए अनेक तरह की तीर्थ यात्राऐं और धार्मिक प्रयोजन मात्र एक भटकाव और समय पूर्ति के चिंतन बन जाते हैं और जीवन में चिंताओं का विस्तार, देह की वृद्धि के साथ-साथ बढ़ता रहता है।
ठीक इसके विपरित श्रेष्ठमय अवसर और दिव्यता तथा तेजमय सद्गुरु का सानिध्य हो तो पूजा-अर्चना, ध्यान-साधना, स्नान-दान, तपयुक्त धार्मिक यात्रा का कोटी-कोटी अक्षुण लाभ साधक को जीवन में निश्चित रूप से मिलता ही है क्योंकि साधक अपने जीवन को सुस्थिति में साधना चाहता है और साथ ही गुरु का कर्त्तव्य हो जाता है कि वह अपने शिष्य के जीवन की दीनता और सड़ी-गली स्थितियों से निजात दिला सके क्योंकि संकल्पवान साधक के पास गुरु की ज्ञान शक्ति और चेतना का भाव साथ रहता है। भक्त और भगवान के बीच क्रियाओं को जोड़ने की चेतना का भाव गुरु प्रदान करता है।
सद्गुरुदेव के गृहस्थ जीवन में पर्दापण के शुभ मांगलिक मंजुल महोत्सव के पावन अवसर पर सच्चिदानन्द जी की आज्ञा अनुरूप ही 8-9 जून 2013 को क्रियात्मक रूप से महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है क्योंकि गृहस्थ जीवन को सही रूप से निर्मित करने और साधने की क्रिया ही सही अर्थों में सृष्टि की दिव्यतम और श्रेष्ठमय साधना है। गृहस्थ जीवन में पारंगता प्राप्त करने से ही अन्य सिद्धियों का मार्ग प्रशस्त होना प्रारम्भ होता है।
इस मंजुल महोत्सव में भाग लेकर आप दैहिक-दैविक, भौतिक तापो को अर्थात देह के रूप में रोग-कष्ट, क्षीणता, नपुसंकता तथा देवीय रूप में पूर्व जन्म के पाप दोष, तंत्र क्रियाऐं, पितृ-दोष से युक्त जीवन और भौतिक ताप में धनहीनता, घर में कलह, तनाव, शत्रुभय आदि अनेक-अनेक भयों से आप मुक्त हो सके और जीवन में सुचिता और सरलता, श्रेष्ठता, उच्चता और पूर्णता आ सके ऐसी ही क्रियाओं के निर्माण के लिए यह मंजुल महोत्सव आप के जीवन में निश्चित रूप से एक युगान्तकारी परिर्वतन ला सकेगा।
इस मंजुल महोत्सव में, वे ही साधक और भक्त भाग ले जिनमें माता वैष्णों देवी और गुरु के प्रति आत्मिक भाव से श्रद्धा और जीवन में आमूलचूल परिर्वतन करने का चिंतन हो। मन्जुल महोत्सव में भाग लेने के लिए रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है। पंजीकरण कराने पर कटरा (जम्मू) में त्रिशक्ति भाव को आत्मसात करने के लिए ध्यान, योग, साधना प्रदान की जायेगी।
उसके बाद दूसरे दिन गुरूदेव के सानिध्य में कदम ताल मिलाते हुए माता वैष्णोदेवी के दर्शनों की अभिलाषा रखते हुए यात्रा प्रारंभ होगी। छः सात घण्टे की यात्रा के बाद माता के दरबार में पहुँचने पर अपने आपको शुद्ध स्वच्छता से युक्त कर त्रिशक्ति पिण्ड के दर्शन गुरूदेव के सानिध्य में संपन्न कर महाकाली, महासरस्वती, महालक्ष्मी से युक्त त्रिशक्ति दीक्षा प्रदान की जायेगी साथ ही विश्वप्रणीत लक्ष्मी माला गुरूदेव द्वारा धारण करायी जायेगी। थोड़े विश्राम के बाद भैरवनाथ मन्दिर प्रांगण में कालभैरव चैतन्य शक्ति दीक्षा प्राप्त होगी। दिव्य दीक्षा दर्शनों के बाद अपनी स्वयं की व्यवस्था से घर को प्रस्थान करेंगे।
कटरा से माता वैष्णो देवी तक की यात्रा केवल पैदल ही होगी। कटरा और माता वैष्णों देवी के दरबार में ठहरने और भोजन की व्यवस्था गुरूदेव द्वारा हॉल (Hall) में ही संभव हो सकेगी।
1- बहिन, बेटियां माताऐं किसी भी स्थिति में अकेली नहीं आऐं। बीमार, असक्त, क्लीष्ट रोगी इस शिविर में भाग नहीं लें। पंजीकरण शुल्क में ही ठहरने की व्यवस्था तथा महाप्रसाद दिया जायेगा साथ ही दिव्य अलौकिक चैतन्य त्रिपिण्ड माता रानी भूमि पर दिव्य शक्तिपात दीक्षाऐं प्रदान की जायेगी।
2- 8 जून 2013 शनिवार को कटरा पहुँचना अनिवार्य है। रात्रि में विश्राम की व्यवस्था की गई है।
3- 9 जून 2013 को प्रातः अमृत बेला में माता वैष्णो देवी की यात्रा प्रारंभ होगी।
4- वट सावित्री सौभाग्य दिवस पर महाआरती के बाद त्रिशक्ति लक्ष्मी दीक्षा प्रदान की जायेगी।
5- भैरव मन्दिर प्रांगण में पूजा-अर्चना ध्यान के साथ शत्रु संहारक कालभैरव दीक्षा प्रदान की जायेगी।
6- दर्शन, पूजा और दीक्षा प्राप्त करने के साथ ही अपनी स्वयं की व्यवस्था से घर को प्रस्थान करेंगे।
शुल्क राशि कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर अथवा गुरूधाम दिल्ली में व्यक्तिगत रूप से जमा कराऐं अथवा ड्राफ्रट/सीधे खाता में जमा कर पंजीकरण (Registration) कराना होगा।
(पंजीकरण शुल्क: 4300/-)
ऐसी देवभूमि पर गुरूदेव का सानिध्य हो और सद्गुरूदेव का मंजुल महोत्सव का दिव्यतम अवसर हो, ऐसी बेला में समर्पित साधक और शिष्य की समस्त इच्छाऐं निश्चित रूप से पूर्ण होती ही हैं।
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