





तंत्र शास्त्र में पुरूष को शिव और नारी को शक्ति कहा गया है। शक्ति द्वारा संचरण गति और कर्म सामर्थ्य प्राप्त किये बगैर शिव की स्थिति भी शव जैसी होती है। नवरात्रि संपूर्ण ब्रह्माण्ड को संचालित करने वाली शक्ति आराधना का श्रेष्ठतम काल होता है, जिसमें समस्त देवों की सम्मिलित शक्ति से अवतरित दुर्गा की आराधना के द्वारा शक्ति प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
नवरात्रि में नौ दुर्गाओं के पूजन की परम्परा पौराणिक काल से चली आ रही है। मार्कण्डेय पुराण में दुर्गा के नौ स्वरूपों का वर्णन मिलता है। ये हैः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्धमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। नवरात्रि के नौ दिनों में इन रूपों की ही पूजा की जाती है, किन्तु शुद्ध चैतन्य की उपासक तांत्रिक परम्परा में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। ये हैं – काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला। दुर्गा सप्तशती द्वारा शक्ति आराधना तो अधिक गोपनीय नहीं होती।
विधि-विधान के साथ सामान्य व्यक्ति भी इसे आसानी से कर सकता है। सामान्य जन के मंगल अनुष्ठानों में तो षोडश मातृकाओं की पूजा अनिवार्य रूप से की जाती है। विवाह आदि मंगल अवसरों पर भी गौरी, पद्मा, सचि, मेधा आदि पंद्रह माताओं के साथ सोलहवीं कुलदेवी का पूजन होता है। महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र में युद्ध आरंभ करने से पूर्व योगेश्वर कृष्ण से परामर्श पर अर्जुन ने भी विजय के लिए दुर्गा की अनूठी आराधना की थी। अपनी आराधना से प्रसन्न दुर्गा ने प्रकट होकर अर्जुन को विजय आशीर्वाद दिया था।
भारतवर्ष में ऐसा कोई स्थान नहीं, जहां नवरात्रि के पर्व पर मां दुर्गा का आह्नान न किया जाता हो, और हर बार की तरह इस बार भी आपके सामने वासंन्तिक नवरात्रि पूर्ण शक्तियुक्त होकर उपस्थित हो रही है, जब मां दुर्गा अपना पूर्ण वात्सल्य स्वरूप धारण कर जगत में विद्यमान होती हैं, और प्रदान करती हैं, अपने पुत्रों को वह सब कुछ, जो उनकी इच्छा होती हे, जो उनकी मनोकामना होती है, क्योंकि ‘माँ’ शब्द ही ऐसा है, जो अपने सुपुत्र या कुपुत्र दोनों पर ही समान रूप से प्रेम व आशीर्वाद की नौ दिनों तक निरन्तर वर्षा करती है।
यह वांसन्तिक नवरात्रि पर्व तो शक्ति, साधना, सौभाग्य, का पर्व है, जब साधक पूर्ण तन्मयता से लीन हो, मां दुर्गा की पूजा-अर्चना व साधना कर उसका पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकता है, क्योंकि शरीर और मन, दोनों प्रकार से कष्टों का निवारण मां दुर्गा के चरणों में ही निहित है।
शक्ति के बिना कोई सिद्धि नहीं है, और शक्ति तत्व जाग्रत हो सकता है साधना द्वारा, इस शक्ति और सिद्धि द्वारा भाग्य तत्व प्रबल होता है, कर्म-तत्व पूर्ण फल देता है, क्योंकि शक्ति और सिद्धि एक महान् प्रक्रिया है आत्म-साक्षात्कार की, अपने बल, अपनी बुद्धि को पहचान कर जीवन-दिशा को निर्धारित करने की। मां दुर्गा तो आद्या शक्ति है, और विश्व का प्रत्येक स्वरूप इसी महान् शक्ति से उत्पन्न होती है। ये परम विद्या तथा वेदों की आधार है, इसीलिए नवरात्रि पर्व को ‘शक्ति पर्व’ के रूप में सम्बोधित किया जाता है।
जगत्जननी आद्याशक्ति, जिनके विभिन्न स्वरूप है, जो अपने विभिन्न स्वरूपों में भक्तों का कल्याण करते हुए चराचर जगत में विचरण करती है, जो मनुष्य तो क्या शिव के लिए भी शक्ति है, जिसके बिना ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी अपूर्ण है, उस आदि शक्ति का ध्यान न करने वाले, साधना न करने वाले दुर्भाग्यशाली ही कहे जायेंगे, जिसके एक-एक स्वरूप की माया निराली है, जो शीघ्र प्रसन्न होने वाली है, और अपने भक्तों को अभय प्रदान करती हैं।
वर्ष में वासंन्तिक नवरात्रि को सर्वाधिक विशेष महत्व दिया जाता है, इसके कई कारण है –
1 इस दिन से नया वर्ष आरम्भ होता है।
2 नये कलयुग का प्रारम्भ भी इसी तिथि से होता है।
3 यह नवरात्रि ‘सकाम्य नवरात्रि’ कहलाती है।
4- भगवान श्रीराम का अवतरण दिवस राम नवमी का पर्व इसी नवरात्रि में आता है।
5- 2070 की वांसन्तिक नवरात्रि की पूर्णता दिवस से सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द जी का जन्मोत्सव पर्व प्रारम्भ होता है।
जिस व्यक्ति को भी यदि किसी प्रकार की कामना होती है, चाहे वह अर्थ प्राप्ति, रोग मुक्ति, कर्ज उतारना, शीघ्र विवाह, व्यापार वृद्धि या अन्य किसी भी प्रकार की कामना हो, तो इस नवरात्रि में गुरु सानिध्य में देवी-साधना करने से निश्चय ही सफलता प्राप्त होती है।
नवरात्रि पूजन के कई उपाय है, कई प्रयोग है, और कई तरीके है, परन्तु जो साधक किसी कारणवश गुरु के समीप न पहुंच सके, उनके सानिध्य में बैठकर साधना सम्पन्न न कर सके, उसे घर पर बैठकर ही इस नवरात्रि पूजा-साधना को विधिवत् ढंग से सम्पन्न करना चाहिए, क्योंकि नवरात्रि का तो प्रत्येक दिन शुभ एवं विशेष मुहूर्त सिद्ध होता है, परन्तु विशेष रूप से अष्टमी, नवमी और दशमी का दिवस इस वर्ष पूर्णतया श्रेष्ठमय और फलप्रद से युक्त है और यह दिवस अप्रेल मास की 19, 20, 21 को साधनात्मक दृष्टि से भौतिक मनोकामनाओं की पूर्णता के लिए मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं है।
आदि शक्ति के मुख्यतः तीन स्वरूप साधकों की श्रद्धा भावना के केन्द्र बिन्दु है, इन्हीं के भेद-प्रभेद को लेकर सैकड़ों चरित्रों से युक्त साहित्य रचा गया है। इसके तीन रुप है –
दुर्गा का एक रूप काली है। मां दुर्गा अपने तीव्र और शांत दोनों ही स्वरूपों में विद्यमान होती हैं। जहां वे मनुष्य की तामसिक वृत्तियों का नाश करती हैं, वहीं वे विभिन्न प्रकार के कार्यों, जैसे-आर्थिक उन्नति, मानसिक शांति, पारिवारिक उन्नति, पुत्र-पौत्र प्राप्ति हेतु भी हर क्षण साधक के साथ शक्ति रूप में विद्यमान रहती हैं।
18 अप्रेल गुरुवार के दिन विशेष पूजन नीचे दी गई विधि के अनुसार संपन्न करनी चाहिए और अगले दो दिनों में गणपति पूजन, गुरू पूजन संपन्न करके ही सद्गुरुदेव के जन्मोत्सव 21 अप्रेल के दिन क्रमानुसार शक्ति चक्र हाथ में लेकर नवदुर्गा मंत्रों का जप करें, प्रत्येक दिन सरस्वती लक्ष्मी काली का जप एवं मंत्र संपन्न करना चाहिए।
इस साधना में मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त सामग्री के साथ साथ नियमों का पालन विशेष आवश्यक है।
1 प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठ जायें और समय पर दैनिक क्रम सम्पन्न कर, पूजन सम्पन्न करें।
2- यदि प्रातः पूजन संभव नहीं है तो स्नान इत्यादि कर, गुरु मंत्र की एक माला जप कर पूजन सम्पन्न कर सकते हैं।
3- नवरात्रि दिवसों में निराहार रहना आवश्यक नहीं है लेकिन सात्विक भोजन ग्रहण करें तो शारीरिक रूप से और मानसिक रूप से चेतना होगी और अधिक मंत्र जप से शुद्धता का भाव आत्मसात होता है।
4- ब्रह्मचार्य नियम का पालन अवश्य करें। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करना विशेष फलप्रद रहता है। पूरा पाठ न कर सकें तो एक-एक अध्याय का पाठ अवश्य करना चाहिए।
5- भगवती दुर्गा पर मांसादि भोग, शराब इत्यादि अर्पित करना अत्यन्त अशुभ है और जिन शास्त्रों में यह वर्णन आया है, उन टीकाकारों को वास्तव में शक्ति पूजा का महत्व ही मालूम नहीं है।
6- नवरात्रि में शक्ति से सम्बन्धित जितनी अधिक साधनाएं सम्पन्न कर सकते है उतनी अधिक साधनाएं सम्पन्न करें।
7- वास्तविक शक्ति पूजन तो गुरु चरणों में गुरु के सान्निध्य में ही सम्पन्न किया जाता है लेकिन यदि किसी कारण वश आप गुरु के पास न पहुंच सके तो नीचे दी गई विधि से पूजन अवश्य सम्पन्न करें।
8- नवरात्रि में अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलित करना उत्तम माना गया है।
9- गुरु गीता और निखिलेश्वरानन्द स्तवन का पाठ अवश्य करें।
नवरात्रि पूजन में मंत्र का, तंत्र का और यंत्र का अद्भुत संयोग है और इन चीजों के संयोग से ही साधना सम्पन्न होती है।
साधना सामग्री आद्या शक्ति दुर्गेश्वरी यंत्र, सद्गुरु गुटिका, शक्ति माला, और गुरु-शक्ति स्वरूप शक्ति चक्र।
साधक प्रातः काल स्नान करके आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सामने चौकी के ऊपर लाल वस्त्र बिछाकर भगवती दुर्गा का सुन्दर सा आकर्षक चित्र स्थापित करें। भगवती के चित्र के सामने कुंकुम से रंगे हुए लाल चावल की ढे़री बना कर उस पर ‘आद्या शक्ति दुर्गेश्वरी यंत्र’ को स्थापित करे। इसके सामने ‘गुरु शक्तिचक्र’ स्थापित करे। यंत्र के समक्ष दीप-धूप प्रज्ज्वलित कर दें। गुरु शक्तिचक्र में नवदुर्गा शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्रि के प्रतीक रूप में समाहित होते हैं शक्तिचक्र का पूजन गुलाब, अबीर, कुंकुम, अक्षत, मौली इत्यादि से करें।
आचमन
दाहिने हाथ में जल लेकर स्वयं आचमन करें –
ऊँ ऐं आत्मतत्वं शोधायामि नमः।।
ऊँ ऐं विद्यातत्वं शोधायामि नमः।।
ऊँ ऐं सर्वतत्वं शोधायामि नमः।।
आसन शुद्धि
आसन पर जल छिड़कें।
ऊँ पृथ्विा त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रां कुरु चासनं।।
संकल्प
दाहिने हाथ में जल लें –
ऊँ विष्णु र्विष्णु र्विष्णुः श्रीमद्भगवतो
विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अस्य ब्राह्मणो द्वितीय
परार्द्वे श्वेत वाराह कल्पे जम्बूद्धीपे भरतखण्डे
आर्यावर्तके देशार्न्तगते पुण्य क्षेत्रे कलियुगे,
कलि प्रथम चरणे अमुक गोत्रेत्पन्नोऽहं (अपना
गोत्र बोले) अमुक शर्माऽहं (अपना नाम बोलें)
सकल दुःख दारिद्रय निवृत्त्मिम मनोकामना पूर्ति
निमित्तं भगवती दुर्गा गुरु-शक्ति सिद्धि प्राप्ति
निमित्तं च पूजनं करिष्ये।।
गणपति पूजन ऊँ गं गणपतिम् आवाहयामि
स्थापयामि पूजयामि नमः। पुष्पासनं समर्पयामि।
स्नानं समर्पयामि। तिलंक अक्षतान् च
समर्पयामि। धूपं दीपं नैवेद्यं निवेदयामि नमः।।
गुरु पूजन इसके बाद गुरुदेव का पंचोपचार पूजन
जल, केशर, कुंकुम, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य से करें
– गुर्रुब्रह्मा गुर्रुविष्णु——–।
कलश-स्थापन अपनी बांयी ओर जमीन पर कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर उस पर कलश स्थापित करे। उसमें जल भर दें। इसके बाद कलश के चारों और कुंकुम से चार तिलक लगा दें। कलश में सुपारी, अक्षत, दूब पुष्प तथा गंगाजल डालें। ऊपर नारियल रख दें और निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
ऊँ श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यां वहो रात्रे
पार्श्वे नक्षत्रणि रूपमश्विनौ व्यातम्।
इष्णान्निषाण मुम्मऽइषाण सर्वलोकम्मइषाणः।
इसके बाद कुंकुम से रंगे हुए चावल को दाहिने हाथ निम्न मंत्र को पढ़ते हुए कलश पर चढ़ावें।
ऊँ महाकाल्यै नमः।, ऊँ महालक्ष्म्यै नमः।, ऊँ महासरस्वत्यै नमः।,
ऊँ धूमाय नमः।, ऊँ शाकम्भर्यै नमः।, ऊँ भ्रामर्यै नमः।,
ऊँ दुर्गोयै नमः। ऊँ क्रीं नमः। ऊँ श्रीं नमः। ऊँ ह्रीं नमः।
भगवती दुर्गा के चित्र पर पानी का छिड़क कर साफ कपड़े से पोंछ दे और पूजन करें-
ध्यान
दोनो हाथ जोड़कर, दुर्गुणों के नाश हेतु ध्यान करे –
दुर्गे स्मृता हरसि भितिमशेष जन्तोः,
स्वस्थयैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्रय दुःख भय हारिणी कात्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदार्द्र चित्ता।
आह्वान- भगवती का आवाहन करें –
ऊँ जगदम्बायै नमः आह्वाययामि स्थापयामि।
पाद्य- जल में दूध मिलाकर नारियल पर चढ़ावें।
आचमन-लौंग तथा जायफल चढ़ायें –
ऊँ जगदम्बायै आचमन समर्पयामि नमः।।
अर्घ्य- दूब, तिल, चावल एवं कुंकुम जल में डाल कर चढ़ायें –
ऊँ जगदम्बायै मधुपर्क समर्पयामि नमः।।
स्नान-स्नान हेतु जल चढ़ायें।
परमानन्द सुधाब्धि निमग्न निजमूर्तये।
सांगोपांग मिदं स्नानं कल्पयाम्यहमीश ते।।
वस्त्र-वस्त्र के स्थान पर मौली चढ़ायें –
ऊँ जगदम्बायै वस्त्रेपवस्त्रं समर्पयामि नमः।
गन्धं अक्षतान् समर्पयामि नमः।।
पुष्प, धूप, दीप
ऊँ जगदम्बायै पुष्पं धूपं दीपं दर्शयामि नमः।।
नैवेद्य, दक्षिणा
ऊँ जगदम्बायै नैवेद्यं निवेदयामि नमः।
दक्षिणां द्रव्यं समर्पयामि नमः।।
नवदुर्गा के नौ स्वरूप की पूजा सद्गुरु रूप में करें-
शैलपुत्री- ऊँ भूर्भुवः स्वः शैलपुत्रि। इहागच्छ
इहतिष्ठ, शैलपुत्रयै नमः शैलपुत्रीमावाहयामि
स्थापयामि नमः।
ऊँ जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरूपपिणी।
पूजां गृहाण कौमारि जगन्तामतातमोऽस्तुते।
ब्रह्मचारिणी-ऊँ भूर्भुवः स्वः ब्रह्मचारिणी!
इहागच्छ इहतिष्ठ ब्रह्मचारिण्यै नमः।
ब्रह्मचारिणीमावाहयामि स्थापयामि नमः।
ऊँ त्रिपुरां त्रिगुणाधारां मार्गज्ञानस्वरूपपिाणीम्,
त्रैलोक्यवंदितां देवौ त्रिमूर्ति पूजायाम्यहम्।।
चन्द्रघण्टा-ऊँ भूर्भुवः स्वः चन्द्रघंटे इहागच्छ
इतिष्ठ चन्द्रघंटायै नमः। चन्द्रघंटामायाहयामि
स्थापयामि नमः।।
ऊँ कालिकां तु कालातीतां कल्याण हृदयां शिवाम्,
क्ल्याणजननीं नित्यां कल्याणी पूजयाम्यहम्।।
कूष्माण्डा- ऊँ भूर्भुवः स्वः कूष्माण्डे इहागच्छ
इतिष्ठ कूष्माण्डायै नमः। कूष्माण्डमावाहयामि
स्थापयामि नमः।।
ऊँ अणिमादिगुणोदारां मकराकरक्षुषाम, अनन्त
शक्ति मेघां तां कूष्माण्डा पूजयाम्यहम्।।
स्कन्दमाता-ऊँ भूर्भुवः स्वः स्कन्दमातः।
इहागच्छ इतिष्ठ स्कन्दमात्र्यै नमः। स्कन्द
मातरमावाहयामि स्थापयामि नमः।।
चण्डवीरां चण्डगात्रं चण्डमुण्ड प्रभंजिनीम्,
तां नमामि च देवेशीं चण्डिकां पूजयाम्यहम्।।
कात्यायनी- ऊँ भूर्भुवः स्वः कात्यायनि।
इहागच्छ इतिष्ठ कात्यायन्यै नमः।
कात्यायनीमावाहयामि स्थापयामि नमः।।
ऊँ सुखानन्दकरीं शान्तां सर्व देवैर्नमस्कृताम्,
सर्वभूतात्मिकां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम्।।
कालरात्रि- ऊँ भूर्भुवः स्वः कालरात्रि।
इहागच्छ इतिष्ठ कालरात्र्यै नमः।
कालरात्रीमावाहयामि स्थापयामि नमः।।
चण्डवीरां चण्डमायां, रक्तबीज प्रभंजिनीम, तां
नमामि च देवेशीं गायत्रीं पूजयाम्यहम्।।
महागौरी- ऊँ भूर्भुवः स्वः महागौरी। इहागच्छ
इतिष्ठ महागौरये नमः। महागौरीमायाहयामि
स्थापयामि नमः।।
ऊँ सुन्दरीं स्वर्णवर्णांगी सुख सौभाग्यदायिनीम्,
सन्तोष जननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्।।
सिद्धिदात्री- ऊँ भूर्भुवः स्वः सिद्धिदे।
इहागच्छ इतिष्ठ सिद्धिदायै नमः।
सिद्धिदात्रिमावाहयामि स्थापयामि नमः।।
ऊँ दुर्गमे दुस्तरेकार्ये जयदुर्गे विनाशिनि। पूजयिाम
सदा भक्तवा दुर्गा दुर्गतिनाशिनीम्।।
शक्ति साधना विधान के अनुसार प्रत्येक दिन नवदुर्गाओं का ध्यान कर उनकी पूजा कर पुष्प अर्पित करने के पश्चात् ही मूल शक्ति जगदम्बा दुर्गा की साधना मंत्र जप सम्पन्न करना चाहिये –
स्नानं समर्पयामि, ऊँ जगदम्बायै नमः
पानी का छींटा देकर वस्त्र से यंत्र को पौछ लें।
तिलकं समर्पयामि, ऊँ जगदम्बायै नमः।।
कुंकुम को तिलक करें।
धूपं आघ्रापयामि, दीपं दर्शयामि, ऊँ जगदम्बायै नमः।।
धूप और दीप जलावें।
पुष्पं समर्पयामि, ऊँ जगदम्बायै नमः।।
नवदुर्गा माला से 5 माला निम्न मंत्र का जप करें –
।। ऊँ दु दुर्गे दुर्गतिनाशाय दुं ऊँ फट्।।
आरती
इसके पश्चात् मां भगवती जगदम्बा और गुरु आरती अवश्य सम्पन्न करनी चाहिए।
समर्पण स्तुति
गुह्यातिगुह्यगोप्तृ त्वं गुहाणास्मत् कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान महेश्वरि।।
इसके बाद गुरु को प्रणाम कर साधना स्थान पर ही प्रदक्षिणा करें। दोनों हाथ में पुष्प लेकर गुरु शक्ति चक्र पर चढ़ावे तथा प्रसाद वितरण करें।
गुरु-शक्ति साधना पूर्ण होने के बाद लाल वस्त्र में बांध कर समस्त सामग्री और माला को जल में प्रवाहित कर दें। कलश के जल को सारे घर में छिड़के, शेष जल तुलसी या पीपल के पौधे में डाल दें। कलश के ऊपर जो नारियल है, उसे प्रसाद के रूप में सपरिवार ग्रहण करें।
यदि संभव हो, तो अन्तिम दिन गुरु परिवार के नौ साधकों अथवा शिष्यों को प्रसाद अथवा भोजन कराये।
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