

यों तो जीवन में सैकड़ों साधनाएं हैं और अगर देखा जाए, तो हमारा जीवन भी हजार-हजार बाधाओं से भरा हुआ हैं, न चाहते हुए भी हमारे जीवन में शत्रु हैं, बाधाएं हैं, अड़चने है, कठिनाइयां है, समस्याएं है। हम भूख से लड़ रहे हैं, हम गरीबी से लड़ रहे है, हम व्यापार की न्यूनता से लड़ रहे है, और चाहे या न चाहें तो भी हमारे शत्रु मारने के लिए तत्पर हैं। उनसे हम भयभीत हैं, फिर अखिर कौन सा रास्ता हैं जिसके माध्यम से हम निर्भीक बन सकें? शत्रु मानसिक रूप से मन में चिन्ता, तनाव, परेशानी, बाधा व अड़चने पैदा करते है।
जिससे शत्रु- रोग, दुःख, पीड़ा दरिद्रता हमारे प्रति वैर भाव रखते है, जो व्यक्ति को बर्बाद करने पर तुले हुए हों, जो व्यापार को नुकसान पहुंचा रहे हों, जो पद-सम्मान पर आघात कर रहे हों, या मुकदमों में सफलता नहीं मिल रही हैं, तो प्रत्येक स्थिति में एक मात्र- केवल एक ही उपाय साधना रूपी दैवीय शक्ति ही है जो जीवन में आने वाली हर तरह की कठिनाईयों का स्वतः समाधान कर सके, मानसिक शारीरिक बाधाओं को समाप्त कर सके, उसे बगलामुखी शक्ति साधना कहते हैं। जो शत्रुओं पर वज्र की तरह प्रहार करती है और पूर्ण रूपेण अभय का वरदान देती है।
भगवान नारायण और ब्रह्मा की परम शक्ति वैष्णवी बगलामुखी है। ऋण, पारिवारिक समस्याएं, जीवन के उतार-चढ़ाव यह सब तो ऐसी स्थितियां है जिनसे व्यत्तिफ़ एक बार फिर भी अपने प्रयासों से जूझ कर पुनः श्रेष्ठ स्थिति ला सकता है, मानव जीवन में तो अनेक प्रकार की स्थितियां बनती-बिगड़ती रहती है। कहीं घात लगाकर आक्रमण करने वाले शत्रु होते है, तो कभी आकस्मिक रूप से घट जाने वाली दुर्घटनायें होती हैं। ऐसे अज्ञात अनिष्ट शत्रुओं से पूर्णतया निज़ात पाने का एक मात्र उपाय इस दैवीय बल का आश्रय ही होता है ऐसी समस्त अप्रिय स्थितियों से निपटने के लिये अहैतुकी कृपा से बढ़कर कोई वरदान नहीं है जिसके रोम-रोम में बगलामुखी समा जाय उसका तो विरोध करने वाला स्वतः पूर्णरूपेण समाप्त ही हो जाता है।
1- इस शिविर का उद्देश्य जीवन को साधने की क्रिया की अग्रसर होना है। इसी कारण केवल वे ही साधक आयें जो जीवन में श्रेष्ठता के आकांक्षी हों।
2-प्रत्येक साधक को प्रातः 4:00 बजे उठना है और अपनी पूजा-साधना प्रारम्भ करनी है।
3- साधक अपने साथ स्वच्छ पीली धोती, गुरु चादर, आसन, पंच पात्र और सद्गुरुदेव का चैतन्य चित्र लेकर आयें।
4- साधना काल में व्यर्थ की बातों में समय व्यय न कर गुरुदेव द्वारा प्रदान किए गए मंत्रों का अधिक से अधिक जप करना है जिससे इष्ट से तारतम्य जुड सके।
5- साधना काल में बाहर का भोजन वर्जित है। गुरुधाम में ही सभी साधक स्वयं खाना बना कर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें। जिससे आपको किसी प्रकार का अन्न दोष न लगे।
6- किसी भी प्रकार का व्यसन सर्वथा वर्जित है।
7- आपको रहने, खाने पीने का कोई अन्य व्यय नहीं उठाना है। यह स्नेह आपको गुरुदेव की ओर से ही प्राप्त होगा।
8- प्रत्येक साधक को 4100- रु अग्रिम भेज कर अपना पंजीकरण 10 मई तक सुनिश्चित करवा लेना अनिवार्य है। इस न्यौछावर राशि में ही गुरुदेव द्वारा आपको इस विशिष्ट पीताम्बरा बगलामुखी साधना विधान, साधना सामग्री एवं दीक्षा प्रदान की जायेगी।
9- केवल साधना में भाग लेने वाले साधक ही पंजीकरण कराये और अपने साथ परिवार के अन्य सदस्यों को साथ नहीं लाये है। बहिन, बेटिया, मातायें अकेली कभी नहीं आये। यह साधनात्मक वातावरण बनाये रखने की दृष्टि से अनिवार्य है।
शक्तिपात समये विचारणं प्राप्तमीश न करोषि कर्हिचित्।
अद्य मां प्रति किमागतं यतः स्वप्रकाशन विधौ विलम्बसे।।
हे सद्गुरूदेव! आप शक्तिपात के समय अर्थात् जीव के प्रति कृपा करते समय न्यायतः उचित होने पर भी कभी पात्र-अपात्र का विचार नहीं करते। तो फि़र आज मुझमें ऐसा नया क्या हुआ है कि आप मेरे प्रति आत्म प्रकाशन में विलम्ब कर रहे हैं ?
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