





नवरात्रि का वह पावनतम दिन, जब उनकी आंखे मुंदी जा रही थी— पूज्य सद्गुरुदेव का सौ-सौ सूर्यों के समान दैदीप्यमान एवं तेजस्वी मुख, काल भी जिनके सामने नतमस्तक हो रहा था उस दृश्य को देखकर तो समस्त शिष्य व साधकगण ही नहीं, अपितु पूरे ब्रह्माण्ड में ही हलचल मच गई थी, और वे सभी दृश्य-अदृश्य शक्तियां पूज्य गुरुदेव जी द्वारा घटित घटनाक्रम को टकटकी लगाये देख रही थी– कितना अनोखा था वह क्षण, जब वे एक अत्यंत विशिष्ट क्रिया के माध्यम से अपने जैसा ही एक प्रतिरूप समाज के सामने प्रस्तुत कर रहे थे – वह भी प्रत्यक्ष रूप में —जिन्हे ये स्थूल चक्षु हतप्रभ हो, सहजता से देखने का प्रयास कर रहे थे —- वह क्रिया थी, मनुष्यत्व को देवत्व प्रदान करने की क्रिया, लघु से महान् बना देने की क्रिया, कुछ से सम्पूर्ण हो जाने की क्रिया।
– और उस क्रिया के पूर्ण होते ही अकस्मात् —- वे लड़खड़ाकर बैठ गये, क्योंकि उस तीव्र शक्तिपात को सहन कर लेना किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात ही नहीं है, उनका पूरा शरीर कम्पायमान हो रहा था— ऐसा लग रहा था, कि वे इस विस्फ़ोटजनक स्थिति को सहन करने का पूरा प्रयास कर रहे है, क्योंकि उन पर जो शक्तिपात किया गया था, वह मात्र शक्तिपात अथवा दिव्यपात न होकर इससे भी अत्यन्त आगे की क्रिया ‘‘ऊर्घ्वपात’’ थी—- यह था पूज्य गुरुदेव कैलाश चन्द्र जी पर ऊर्घ्वपात।
अनेकों साधना सम्पन्न किसी संन्यासी पर यदि पूर्ण क्षमता के साथ ऊर्घ्वपात प्रदान कर दिया जाय, तो वह भी इसकी तेजस् शक्ति को सहन करने की सामर्थ्य नहीं रखता, क्योंकि इस क्रिया के द्वारा कुण्डलिनी में व्याप्त ऊर्जा-शक्ति अत्यन्त तीव्रता के साथ क्रमशः समस्त चक्रों को आघात पहुंचाती हुई उन्हें अत्यधिक तीव्र स्पन्दन युक्त बना देती हे, जिसके कारण शरीर की समस्त नाडि़यों में खून का प्रवाह अत्यधिक बढ़ जाता है। इतने तीव्र गति से हो रहे प्रवाह को सहन न कर पाने के कारण नाडि़यां फ़ट जाती है, और उस संन्यासी को मृत्यु सम्भावित दिखने लगती है। —–एकजुट हो सभी की दृष्टि पूज्य गुरुदेव द्वारा किये जा रहे उस ऊर्घ्वपात पर केन्द्रित हो गई थी, पता नहीं अगले ही क्षण क्या हो जाय। – किन्तु उनकी देह ने वह सब कुछ सहन कर लिया। जब ऊर्घ्वपात क्रिया सम्पन्न हुई, तो उनके प्रभास से आस-पास के लोगों की आंखे भी चुंधिया सी गई और वे कुछ देर के लिए ही सही ध्यानस्थ हो गये थे।
‘गुरु-पुत्र’ थे, इसलिए उस असीमित शक्ति को आत्मसात् कर सके— और कुछ क्षणों बाद स्वयं को संभाल कर गुरुदेव के चरणों में साष्टांग दण्डवत् कर, उनके श्री चरणों का अपने प्रेमाश्रुओं से अभिषेक कर डाला— और कुछ क्षणों के लिए मौन हो गये, किन्तु वे मौन न होकर मन ही मन गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने हेतु विशिष्ट मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, और गुरुदेव भी अपने कृपा-दृष्टिपात से तथा अपनी मादक मुस्कान के साथ उन्हें वह सब कुछ प्रदान कर रहे थे, जो उन्हें देना था – वह परम पद, जिसका अधिकारी केवल मात्र योग्य गुरु ही हो सकता है।
बहुत कुछ बनने, प्राप्त करने के लिए बहुत अधिक तप-साधना करनी पड़ती है, आग में जलना पड़ता है, लहुलुहान हो जाना पड़ता है, अपने ‘स्व’ को समर्पित करना पड़ता है, अपने-आप को फ़ना कर देना पड़ता है,—– ओर जब सब कुछ समाप्त हो जाता है, तभी नव निर्माण की प्रक्रिया का प्रारम्भ होता है। केवल मात्र सद्गुरु में ही वह शक्ति, वह सामर्थ्य होती है, कि नव निर्माण कर सके— और ऐसी ही सम्पूर्ण क्रिया नवरात्रि के शक्ति पर्व पर पूज्य सद्गुरुदेव ने नववर्ष के नव सूर्य रूपी गुरुदेव कैलाश चन्द्र का धरती पर निर्माण कर – जो अपने ज्ञान के प्रकाश की रश्मियों से अंधकार आच्छादित जगत को प्रकाशवान कर सके, आलोकित कर सके—- और फि़र ‘गुरु-पुत्र’ तो स्वयं गुरु के ही तेज से उत्पन्न उन्हीं का देहांश होते है।
शास्त्रों, पुराणों आदि में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखनीय है, कि गुरु पद प्राप्त करने हेतु या तो किसी व्यक्ति में गुरु बनने की पात्रता हो, योग्यता हो या फि़र गुरु का ही योग्य पुत्र शिष्यवत् बने—- यदि उसमें वह क्षमता और सामर्थ्य है, तो वह उस परम पद का अधिकारी होता है। पूज्य गुरुदेव डॉ- श्रीमाली जी जब संन्यासी जीवन में थे, तो उनके दर्शन मात्र से ही कितने व्यक्तियों पर शक्तिपात हो जाया करता था, ऐसे तेजस्वी की निकटता और आत्मीयता पाने का अर्थ है, कि उस व्यक्ति के कई जन्मों के पुण्य एकत्र हुए होंगे, जो वह उनका सानिध्य प्राप्त कर सका— और फि़र वे तो गुरु-पुत्र है – यों ही वे गुरुदेव के पुत्र रूप में नहीं उत्पन्न हो गये। उन्हें गुरुदेव के पुत्र रूप में जन्म लेने के लिए न जाने कितनी कठोर तपस्या और घोरतम् साधनाए करनी पड़ती होगी, ओर उनके न जाने कितने ही जन्मों के पुण्य इकट्ठे हुए होंगे, जो वे गुरु-पुत्र बन पाये – यह कोई मामूली बात नहीं है। गुरु गृह में जन्म लेना कोई साधारण बात हो भी नहीं सकती, यह तो अवश्य ही कोई दिव्यात्मा होगी, जो कि उनके अंश स्वरूप वहां उपस्थित है, इसमे कोई दो राय नहीं।
गुरुगृह में लालन-पालन होना, और उस आध्यात्मिक वातावरण में जन्म लेकर बड़ा होना, जहां चारों प्रहर विशिष्ट यज्ञों की अग्नि के धूम्र वातावरण को दिव्यता प्रदान कर रहा हो तथा वेद मंत्रों का उच्चारण हो रहा हो—- अल्पायु में ही जहां उन्हें विभिन्न शास्त्रादि के ज्ञान के साथ ही साथ साधना, जप-तप आदि क्रियाओं का भी ज्ञान भली-भांति दिया जा रहा हो, और वह भी ऐसे योग्य सद्गुरु के द्वारा जिनके चरण-कमलों में बैठना ही जीवन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि कही जाती है— जरूर उनमें कोई न कोई विशेषता तो होगी, तभी तो वे इस अद्वितीय सौभाग्य को प्राप्त करने के अधिकारी बन सके—- और जो कुछ न्यूनता उनमें रह गई थी, वह गुरुदेव ने ‘‘ऊर्घ्वपात दीक्षा’’ द्वारा अपनी समस्त साधनाएं एवं सिद्धियां उनमें समाहित कर उन्हें पूर्ण कर दिया, क्योंकि सद्गुरु में शिष्य को अपने जैसा बना लेने की सामर्थ्य होती है-
दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवनजटरे सद्गुरोर्ज्ञानदातुः।
स्पर्शश्चेतत्र कल्प्यः स नयति यदहो स्वर्णतामश्मसारम्।।
न स्पर्शत्वं तथापि श्रितचरणयुगे सद्गुरुः स्वीय शिष्ये।
स्वीयं साम्यं विधात्ते भवति निरुपमस्तेन वा लौकिकोऽपि।।
अर्थात् ‘‘इस संसार में शिष्यों को ज्ञान प्रदान करने वाले सद्गुरु की साम्यता के लिए कोई दृष्टांत (उदाहरण) देना संभव नहीं है। पारस-पत्थर लोहे को अपने स्पर्श से सोना तो बना देता है, किन्तु अपने जैसा पारस नहीं बना सकता। सद्गुरु शिष्य को बिना स्पर्श किये, दृष्टिमात्र से ही अपने जैसा चैतन्य पुरुष बना देते है, अतः सद्गुरू के लिए समस्त लौकिक उपमा व्यर्थ है— और यही हुआ भी, उन्होंने अपने जैसा ही चैतन्य पुरुष बना दिया उन्हें।
ऊर्घ्वपात क्रिया के पश्चात् निश्चित रूप से गुरु-पुत्र एक पूर्ण समर्थ गुरु बन चुके हैं, इसकी प्रामाणिकता का साधकों को ‘‘सद्गुरुदेव श्री परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी महाराज जी’’ के सान्निध्य में बैठने पर स्वयं ही अनुभव होता है, जिनके आभामयी मुखमण्डल को देखकर कोई भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता, उनके मुख से झलकती सौम्यता, सहजता, मधुरता और उनकी शांत चित्त प्रवृति को देखकर, कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता, कि इस व्यक्तित्व के अन्दर भी इतना गूढ़तम ज्ञान समाहित होगा, क्योंकि वे स्वयं प्रदर्शन से परे रहना चाहते हैं। धीरे-धीरे, एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए, अर्थात् किसी भी विषय पर अजस्त्र गति से धाराप्रवाह बोलना, वाणी में मधुरता, सम्मोहकता, एक विशेष प्रकार का आकर्षण, जिसे सुनते ही मानो कानों में एक दिव्य नाद झंकृत हो रहा हो, उनके दीक्षा देने के अपक्रम तथा अन्य क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से अब उनकी उच्चता और श्रेष्ठता का स्पष्टतः भान भी होने लगा है।
उन्होंने अपने शिष्यों का मार्ग प्रशस्त कर, उन्हें सफ़लता प्रदान की है, जिसका उदाहरण वे शिष्य स्वयं है, जो उनके बताये मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रहे है, और जीवनोन्नति एवं जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिए गतिशील हैं।
श्री कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी अर्थात् गुरुदेव के कार्य करने का तो ढ़ंग ही निराला है, वे एक तरफ़ जहां बाह्य रूप से जितने शांत, मधुर, हास्य प्रिय, करुणामयी दिखाई देते हैं, वही वे साधना, प्रयोग, अनुष्ठान आदि करवाते समय उतने ही कठोर और दृढ़ स्वभाव के भी दिखाई देते है, क्योंकि साधना आदि गुह्म एवं महत्वपूर्ण क्रिया पद्धतियों में किसी भी प्रकार की शिथिलता बरतना एवं चूक हो जाना उन्हें असहनीय हो जाता है, न तो वे स्वयं साधना आदि सम्पन्न करते समय कोई शिथिलता बरतते है, और न ही वे शिष्यों को ऐसा करते देख पाते हैं, क्योंकि वे किसी भी प्रकार से अपने शिष्य को न्यून नहीं रहने देना चाहते। शिष्य को साधना या उसके इच्छित कार्य में पूर्णता प्राप्त हो, इसके लिए अब वे समय-समय पर दीक्षा द्वारा शक्तिपात की दिव्य क्रिया को भी सम्पन्न कर रहे हैं।
शिष्यों को भी गुरुदेव द्वारा किये गये दीक्षा एवं शक्तिपात से उन साधनाओं में सिद्धि प्राप्त हो सकी, जिनमें उन्हें सफ़लता नहीं मिल पा रही थी, इस बात को तो मैंने स्वयं भी अनुभव किया है, और सफ़लता व सिद्धि प्राप्त की है, तथा मेरे मनोवांछित कार्य भी पूर्ण हुए है, यह तो उनके ललाट और तेजस्वी मुखमण्डल पर व्याप्त आभामण्डल को देखकर ही ज्ञात होने लगा है, कि वे सामान्य व्यक्ति से भिन्न विशिष्ट व्यक्तित्व है।
वे स्वयं भी पूजनीय सद्गुरुदेव डॉ- श्रीमाली जी द्वारा बताई गई गुह्य साधनाओं को रात्रिकालीन समय में सम्पन्न करते हैं। समय-समय पर पूजनीय गुरुदेव जी स्वयं उन्हें अपने पास बैठाकर, अत्यन्त उच्चकोटि की साधनाओं को सम्पन्न करवाते रहते है, क्योंकि वे अपने ही समकालीन अथवा समरूप उन्हें भी बना देना चाहते हैं। वे चाहते हैं, कि वे भी उच्च श्रेणी के ज्योतिषी, वेदज्ञ, मंत्र-तंत्र के ज्ञाता तथा कालज्ञानी कहला सकें, और सद्गुरुदेव जी की इच्छा के अनुरूप ही गुरुदेव कैलाश जी भी उन क्रियाओं को बड़े परिश्रम और लगन के साथ गुरुदेव के निर्देशानुसार तथा उनके द्वारा समय-समय पर विभिन्न साधनाओं हेतु दिव्य शक्तिपात को प्राप्त कर अपने में आत्मसात् करने की प्रक्रिया कर रहे है, जिससे कि वे पूजनीय गुरुदेव की तरह ही वास्तविक एवं प्रामाणिक ज्ञान से लोगों का मार्ग प्रशस्त कर सकें, और उनके जीवन को चैतन्यता, सप्राणता, रसमयता, आनन्दमयता से आपूरित कर सकें, तथा लुप्त होती भारतीय विद्याओं का वास्तविक परिचय एवं वास्तविक स्वरूप, जो सिद्धाश्रम संस्था द्वारा उधर्व गति से समाज के सामने प्रस्तुत हो रहा है, उसे अनवरत् क्रम से आगे बढ़ाते हुए, समाज को उससे अवगत करा सकें, और स्थान-स्थान पर दीक्षा, शक्तिपात तथा प्रवचन द्वारा आध्यात्मिक चेतना की ज्ञान-गंगा के प्रवाह को आगे बढ़ा कर, समस्त विश्व को उससे ओत-प्रोत कर विश्व में शांति, मधुरता और प्रेम की स्थापना करने के लिए ही प्रयासरत् हैं।
मैं यहां पर कुछ लोंगों की तुच्छ मानसिकता को भी स्पष्ट कर देना चाहता हूं, जो इस बात को सुनकर ही, कि दीक्षा के लिए इतनी धनराशि लोंगों से क्यों ली जाती है, जैसी धारणा बना बैठे हैं, जो कि सर्वथा गलत है, उन्हे वास्तविकता से परिचित करा देना चाहता हूं। प्रारम्भ में मैं भी कुछ ऐसी ही बेसिर-पैर की बातें सोचता रहता था, किन्तु वास्तविकता क्या है, इसे जान लेने के लिए मैं हर क्षण बेचैन रहता और, फि़र वह अवसर भी मुझे प्राप्त हुआ, जब मैं पूजनीय कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी से मिला और उनसे दीक्षा प्राप्त कर, उन्हीं के सान्निध्य में रहने का अवसर भी मुझे प्राप्त हुआ। धीरे-धीरे जब मुझे वास्तविकता का बोध हुआ, तब अपने आप पर बहुत आत्म-ग्लानि हुई, और तब अनुभव हुआ, कि दीक्षा कोई जादू की छड़ी नहीं है, कि घुमाया और अगले ही पल काम हो गया, वह तो एक ऐसी शक्ति है, जो व्यक्ति के उद्देश्यों की पूर्णता हेतु उसका मार्ग प्रशस्त करती है, और उसकी इच्छा पूर्ण होने की सम्भावना बनती है।
यह धनराशि लेने का प्रयास नहीं है, अपितु उन्हीं की भलाई और उन्हीं के जीवन-निर्माण को सम्पूर्ण करने का प्रयास है, जिसका उदाहरण ‘सिद्धाश्रम साधक परिवार’ है। जहां हमारी ही तरह हजारों-लांखों शिष्य जीवन के सभी आयामों को स्पर्श कर, श्रेष्ठ एवं उच्च जीवन को प्राप्त कर सकें और अपने जीवन के स्वप्न को साकार रूप दे सकें। उन्हें एक नई चेतना, प्राणस्विता, उर्जस्विता मिल सके, जिससे कि वे तनावमुक्त हो अपने भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों पक्षों में पूर्णता प्राप्त कर सकें। – और यही सिद्धाश्रम का उद्देश्य भी है, भौतिक और आध्यात्मिक पक्ष में पूर्ण होना ही जीवन की सम्पूर्णता है।
आज के इस भौतिकतामय जीवन को जीने के लिए धन की आवश्यकता होती ही है, किन्तु यह मुझे पूर्णतः ज्ञात हो चुका है, कि शिष्यों से प्राप्त धन का हजारवां हिस्सा भी गुरुगृह में व्यय नहीं होता, और न ही उस धन का प्रयोग वे स्वयं के लिए करते हैं, वह धन तो शिष्यों के कार्यों में, उन्हें उच्चकोटि की साधनाओं आदि कार्यों को पूर्णतः सम्पन्न कराने के लिए आवश्यक सामग्री हेतु या इसी ज्ञान-गंगा के प्रचार व प्रसार एवं आश्रम हेतु व्यय किया जा रहा है – इसमें कोई दो राय नहीं, और यही सत्य है। तथ्य से परिचित होते हुए भी लोग शायद अपरिचित होने का ढोंग व उपहास कर अपने ही मू़ढ़ता और अज्ञानता को प्रदर्शित कर रहें हैं।
दीक्षा प्राप्त करना तो हमारे जीवन का अहोभाग्य है, कि वे हमें इतनी सरलता व सुगमता से पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रदान की जा रही है। प्राचीन काल में तो गुरु से दीक्षा प्राप्त करने के लिए बहुत ही दुर्लभ प्रक्रियाओं को सम्पन्न करना पड़ता था, अपना घरबार छोड़कर, गुरु की सेवा में दिन-रात एक कर— और यही नहीं, पूरा जीवन ही उनके चरणों में समर्पित करने के बाद भी गुरु से दीक्षा प्राप्त हो जाय, वह क्षण उनके जीवन का स्वर्णिम क्षण कहा जाता था, इसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को बहुत प्रयत्न करने पड़ते थे।
आज जितनी सरलता से दीक्षा कार्य को सम्पन्न किया जा रहा है, और विभिन्न उच्चकोटि की दीक्षाएं जितनी सुगमता से प्राप्त हो रही है, इसे तो जीवन का अद्वितीय सौभाग्य ही कहा जा सकता है। पूज्य गुरुदेव से अपनी मनोवांछित दीक्षा प्राप्त कर शीघ्र उसमें पूर्णता प्राप्त हो, इससे ज्यादा सरल और शीघ्र ही मनोरथ पूर्ण होने का इस प्रगतिशील, भौतिकतामयी युग में अन्य कोई उपाय नहीं। – फि़र भी जो कुछ आपने सोचा है, आप उसके लिए स्वतंत्र है, क्योंकि –
श्रीमान् आप पधारे हृदय में धन्य हुए हम सब,
कैसे व्यक्त करे शिष्य भावों को आप से,
लाखों में एक है आप गुरुवर और माया आपकी,
शरणागत होते ही सोया भाग्य जागृत हो जाता,
चले जो कोई साथ आपके हारी बाजी जीत जाता,
न्याय धर्म पर चलना और विजय पाना सीख जाता,
द्रवित मन हो जाता सुन कर वाणी आपकी,
श्रीमुख से निकले जो शब्द मंत्र वही बन जाता,
माने या न माने कोई आप सा नहीं गुरुवर संसार में,
लीला पढ़ी बहुतों की पर आप सा लीलाधारी कोई नहीं।
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