





आत्मतत्व स्थिर होते हुये भी गतिमान से भी ज्यादा गतिमान है। आत्मतत्व इंद्रियों और मन की दौड़ के परे है, क्योंकि इंद्रियों और मन दोनों के पूर्व है, दोनों के पहले है, दोनों के पार है।
आत्मतत्व जिससे हम अपरिचित हैं, जिसका हमें कोई पता नहीं, जो हम हैं और फिर भी जिसकी हमें कोई पहचान नहीं है। हमारी चेतना की जो अंतिम गहराई है, जहां से हमारा होना जन्मता है और विकसित होता है…………….।
अगर हम एक वृक्ष की तरह सोचें, तो वृक्ष में पत्ते भी हैं ऊपर आकाश में फैले हुए, पत्तों के पीछे छिपी हुई शाखाएं भी हैं, शाखाओं के पीछे वृक्ष की पीड़ भी है। और उन सबके नीचे वृक्ष की, अंधेरे में पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुई, जड़े भी है। कोई वृक्ष अगर अपने को पत्ते ही मान ले….. और ऐसा मानने में बहुत कठिनाई नहीं है, क्योंकि जड़े प्रगट नहीं है, दूर अंतर-गर्भ में छिपी हैं। तो हो सकता है, वृक्ष समझ ले कि मैं पत्तों का समूह हूं। और भूल जाये यह कि जड़े भी हैं। उसके भूलने से अंतर नहीं पड़ता। पत्ते क्षणभर भी जी न सकेंगे जड़ों के बिना। जड़ें फिर भी अंधेरे में काम करती रहेंगी। पत्ते तो जड़ों के बिना नहीं हो सकते, लेकिन जड़ें पत्तों के बिना हो सकती हैं। अगर हम पूरे वृक्ष को भी काट डालें तो भी जड़ें सक्रिय रहेंगी और नये वृक्ष को अंकुरित कर जायेंगी। लेकिन हम पूरी जड़ों को काट डालें तो पत्ते सिर्फ कुम्हलायेंगे, सूखेंगे, नये पत्तो को जन्म न दे पायेंगे। वह जो अंधेरे में गहरे में छिपी हुई जड़ें हैं, वही प्राण हैं।
अगर मनुष्य को भी हम एक वृक्ष मान लें, तो जिन्हें हम विचार कहते हैं, वे पत्तों से ज्यादा नहीं हैं। और विचारों के जोड़ को ही हम अपने को समझ लेते हैं कि यह मैं हूं, पत्तों के जोड़ को! जड़े तो गहरे में आत्मतत्व हैं। लेकिन जैसे जमीन के गहरे में और अंधेरे में वृक्ष की जड़े छिपी हैं, वैसे ही हमारे आत्मतत्व की जड़ें परमात्मा में, गहरे में, बहुत गहरे में छिपी हैं। वहां से ही हम रस पाते हैं। वहां से ही जीवन मिलता है। वहां से ही प्राण की धाराएं बहती हैं और हमारे पत्तों तक आती हैं। हमारे पत्ते न हो सकेंगे, अगर वे जड़े न हों। तो जिस दिन वे जड़े अपने को सिकोड़ लेती हैं परमात्मा में, उसी दिन हमारे पत्ते कुम्हला जाते हैं, शाखाएं सूख जाती हैं। जब तक वे जड़ें रस को पीए चली जाती हैं, जब तक वह आत्मतत्व हमारे पत्तों को फैलाए चला जाता है, तब तक लगता है हम जीवित हैं।
हमारे विचार पत्तों की भांति हैं, हमारी वासनाएं शाखाओं की भांति है। और इन पत्तों और शाखाओं के जोड़ से हमारा अहंकार निर्मित होता है। यह बहुत गौण हिस्सा है हमारे अस्तित्व का। हमारे अस्तित्व का मूल हिस्सा तो नीचे छिपा है, उसे ही आत्मतत्व कहा गया है। वह, जिसके बिना हमारा कुछ भी न हो सकेगा, लेकिन फिर भी वह इतने भूगर्भ में है, अस्तित्व की इतनी गहराई में है कि हम उसे विस्मरण कर सकते हैं। आत्मतत्व विस्मरण कर दिया जाता है।
हम अपने को जब पकड़ने जाते हैं, तो अपने विचारों के जोड़ को ही समझ लेते हैं कि यह मैं हूं। मन को ही समझ लेते हैं कि मैं हूँ। मनसतत्व हमारे पत्तों का जोड़ है, आत्मतत्व हमारी जड़ों का। और ध्यान रहे, जो जड़ों तक नहीं पहुंचेगा वह उस भूमि को तो कभी पहचान ही नहीं पायेगा, जिससे जड़े रस पीती है। जड़ तक जो पहुंचेगा वह पायेगा कि जड़ भी रस पाती है पृथ्वी से। और भी एक बड़ी अंतरधारा है जीवन की। आत्मतत्व को जो पहचानेगा वह परमात्मतत्व को भी पहचान लेगा।
लेकिन हम तो जीते हैं पत्तों में और उन पत्तों के जोड़ को ही समझ लेते हैं कि यह मैं हूं। इसलिये एक जरा सा पत्ता कुम्हला जाता है, गिरता है, तो हम सोचते हैं- मरे, गए, नष्ट हुए। सब पत्ते कुम्हला जाते है तो सोचते हैं, जीवन गया, खोया। जीवन का हमें पता ही नहीं है। जीवन की बहुत ऊपरी आवरण, बहुत ऊपरी आच्छादन, वही हम अपने को मानकर जीते हैं।
इस आवरण के नीचे, गहरे में, वहां तक जाने वाला, जहां जड़ें मिल जाये, जहां से अस्तित्व अपने मूल उदगम को पा ले, गंगोत्री मिल जाये जहां प्राणों की, तब हमने जाना आत्मतत्व। उसे जान लेने वाला ही प्रकाश को उपलब्ध होता है, जीवन को उपलब्ध होता है।
हमारे जीवन में सब परिवर्तन है। जहां तक परिवर्तन है वहां तक जानना पत्ते हैं। आयेंगे अभी इस बसंत में और झड़ेंगे कल पतझड़ में। क्षण को भी कुछ ठहरा नहीं होगा, आच्छादन बदलता ही रहेगा। लेकिन गहरे में, भीतर कहीं न कहीं कोई तत्व है, जो ठहरा हुआ है, जो सारे परिवर्तन को सम्हाले हुए है। वह थिर तत्व आत्मतत्व है। वह सदा थिर है, ठहरा ही हुआ है। वह कभी बदला नहीं है। जब तक उस अपरिवर्तित और न बदलने वाले का स्मरण न आ जाये, पहचान न आ जाये, तब तक जानना कि जीवन को हमने नहीं जाना।
आत्मतत्व थिर है, इसका अर्थ है कि आत्मतत्व इतना पूर्ण है कि परिवर्तन का उपाय नहीं है। आत्मतत्व इतना परिपूर्ण है, इतना निरपेक्ष है। इतना पूरा है कि उसमें और कुछ उपाय नहीं है होने का। परिवर्तन वहीं होता है, जहां अपूर्णता होती है। बदलाहट वहीं होती है, जहां कुछ और होने की गुंजाइश, जहां कुछ और होने की सुविधा होता है।
इंद्रिया इसे पा न सकेंगी, क्योंकि यह इंद्रियों के पहले हैं। इंद्रियां उन चीजों को देखने का, जानने का माध्यम बनती हैं, जो इंद्रियों के सामने हैं। इंद्रियां उन चीजों को देखने का माध्यम नहीं बनती, जो इंद्रियों के पीछे हैं। पीछे का अर्थ सिर्फ पीछे नहीं, पूर्व भी। इंद्रिया ऊपर हैं। वे भी जीवन का आवरण है। इसलिये इंद्रियों से आत्मा को कोई जान नहीं सकता।
मन भी इंद्रिय है। इतना तेज दौड़ने वाला मन भी उस आत्मा को नहीं पा पाता, जो कि ठहरी ही हुई है, थिर है। इतने तेजी से चलने वाला मन उसे चूक जाता है। जीवन में ठहरी हुई चीजों को ठहरकर ही पाया जा सकता है, दौड़कर नहीं पाया जा सकता। अगर मन बिलकुल ठहर जाये तो ही आत्म को जान सकेगा, जो ठहरा हुआ है।
मन तभी तक है, जब तक दौड़ता है। ठहरा हुआ मन अ-मन हो जाता है। इसलिये आप मन को कभी भी ठहरा न पायेंगे। ठहर जायेंगे तो पायेंगे मन नहीं है। मन कभी आत्मा को न जान सकेगा। क्योंकि दौड़ से कभी आत्मा जानी न जा सकेगी, और मन दौड़ का ही नाम है। जिस दिन मन नहीं होता, उस दिन आत्मा जानी जाती है। मन से हम सारे जगत को जान लेंगे, सिर्फ एक आत्मतत्व अनजाना रह जायेगा। मन जब नहीं होगा तब हम आत्मतत्व को जान लेंगे।
मन अकारण तो नहीं दौड़ सकता, इसलिये मन कारण निर्मित करता है। उन कारणों का नाम वासनाएं है। मन कहता है, वह चीज पानी है। नहीं तो दौड़ेगा कैसे! अगर आगे भविष्य में कुछ पाने को न हो, कोई मंजिल न हो, तो दोड़ेगा कैसे? इसलिये रोज भविष्य में मन मंजिल तय करता है कि वह रही मंझिल, वहां तक पहुंचना है। तब दौड़ शुरू हो जाती है। इसलिये जिस मंजिल पर मन पहुंच जाता है, वह बेकार हो जाती है। क्योंकि वह तो सिर्फ बहाना था दौड़ का। तब दूसरा बहाना निर्मित करता है कि ठीक है, यह तो पा लिया, अब इसमें कुछ सार नहीं। अब रही मंझिल वह-और आगे।
तो मन मील के उस पत्थर की तरह है जिस पर तीर हमेशा आगे बताता रहता है। लेकिन मील के पत्थर पर तो कहीं-कहीं शून्य का पत्थर भी आ जाता है। शून्य के पत्थर पर तीर नहीं होता।
मन की यात्रा में कभी वह पत्थर नहीं आता है जिस पर शून्य बना हो। और अगर किसी दिन वह पत्थर आ जाये तो उस जगह का नाम ‘ध्यान’ है। जहां शून्य बना हो, कोई तीर न हो। और अगर कभी वैसा पत्थर आ जाये मन की यात्रा में तो वहीं आत्मा की अनुभूति है।
ध्यान रहे, धार्मिक आदमी वह नहीं है जो परमात्मा को पाना चाहता है। क्योंकि जब तक कोई कुछ भी पाना चाहता है, तब तक मन है। जो खड़ा हो जाता है उसको परमात्मा मिल जाते है। जो परमात्मा को पाने के लिये भी दौड़ता है, उसको भी परमात्मा नहीं मिलते है। क्योंकि दौड़ मन की है, मन से कोई आत्मतत्व उपलब्ध नहीं होने वाला है।
इंद्रियों को, इंद्रियों के सहारे को छोड़ देना पड़ता है। मन को, मन की दौड़ को, गति को छोड़ देना पड़ता है। ऐसा जो आत्मतत्व है, जो सदा उपलब्ध हमारे पास, लेकिन जिसे हम ही बड़ी व्यवस्था से चूकते चले जाते है। जिसे हमने कभी नहीं खोया, सिर्फ विस्मरण करते हैं। लेकिन उसके विस्मरण में सारा जीवन अंधकारमय, नारकीयमय हो जाता है, जीवन में सिवाय कांटों के कोई फूल नहीं खिलता, जीवन एक रेगिस्तान हो जाता है। कितना ही चलते है, कहीं कोई छाया नहीं मिलती, कहीं कोई विश्राम दिखाई नहीं पड़ता, कहीं कोई विराम नहीं मालूम पड़ता। उस आत्मतत्व की छाया को पाये बिना कोई विश्राम नहीं है और उस आत्मतत्व को पाये बिना जीवन में कभी कोई रस की धारा नहीं बही, न बहेगी। वही है सब!
माना कि पत्ते जड़ों से ही आते हैं, फिर भी पत्तों से जो अटक गये, वे जड़ों तक नहीं पहुंच पाते। पत्तों को छोड़ें, नीचे गहरे उतरें-भीतर जाएं, पार, भावातीत, इंद्रियातीत, विचारातीत-पीछे और पीछे सरकते जायें। उस जगह पहुंच जाना है जहां शून्य का पत्थर आ जाता है। वह सबके भीतर है। उस शून्य को हम सब लेकर घूम रहे हैं। नहीं तो घूम न पाते। अगर वह थिर पूर्ण भीतर न हो, तो यह सारी परिवर्तन की धारा, यह इतना बड़ा चक्रजाल चल नहीं सकता है। यह सब उस शून्य के ऊपर।
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