





पूज्यपाद सद्गुरुदेव का एक तेजस्वी प्रवचन जिसमें उन्होंने शिष्यों को बन्धु से सम्बोधन करते हुए जीवन में निरन्तर गतिशिलता की बात कही है, प्रस्तुत है सद्गुरुदेव की चिर-परिचित शैली ।
मैंने “बन्धु” शब्द का प्रयोग किया है, “बन्धु’ शब्द का तात्पर्य है जो बन्धन से रहित हो, जो स्वर विचारों से सम्पन्न हो, जो किसी भी प्रकार से ‘बन्धन! के अधीन न हो, जो आगे बढ़ने की हिम्मत और हौसला रखता हो, जिसमें जोश हो, तूफान हो आकाश को ठोकर मारने की क्षमता हो ।
और मैंने तुम्हें इसी प्रकार से बनाने का प्रयत्न किया है। तुम मेरे शिष्य हो, और ‘शिष्य! या “आत्मीय” शब्द से आगे बढ़ कर इस बार तुम्हें “बन्धु’ शब्द से सम्बोधित किया है, क्योंकि बन्धन में रह कर आदमी जीवन का वह आनन्द प्राप्त नहीं कर सकता जो कि उसका आधार होता है, जीवन की वह मस्ती प्राप्त नहीं कर सकता, जिसके बिना जीवन निरर्थक होता है, घुटा हुआ, दबा हुआ, बेबस और बंधनों से जकड़ा हुआ व्यक्ति, न तो सही अर्थों में मनुष्य हो सकता है और न ही शिष्य ।
तुमने अपनी नाव जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे सांसारिक समुद्र में डाल दी है, परन्तु तुम्हे इस नाव को चलाने का ज्ञान नहीं है, समुद्र की लहरें विकराल और निरन्तर ऊंचे उठने वाली नाव को एक ही थपेडे में उलट देने के लिए प्रयत्नशील है। तुम्हारे गृहस्थ रूपी समुद्र में खारे पानी के अलावा कुछ नहीं है। तुम्हारे इस गृहस्थ रूपी सागर में मगरमच्छ, केकड़े और विकराल जलचल भरे पड़े हैं, जिनका एक ही प्रयत्न है कि कब मौका मिले और कब इस नाव को उलट दिया जाए। कब यह गाफिल हो और कब ये गृहस्थ के खारे पानी की उत्ताल लहरें इस नाव को लील जाएं, परन्तु फिर भी तुम्हारी नाव हिचकोले खाती हुई, थपेड़े और झटके खाती हुई आगे बढ़ रही है और यह पूरे समुद्र के लिए आश्चर्य की बात है।
पूरा समुद्र विस्फारित नेत्रों से इस नाव को लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए देख रहा है और हैरान है, कि जर्जर और कमजोर नाव आगे कैसे बढ़ रही है, इस कमजोर नाव में इतनी ताकत और क्षमता कहां से आ गई है, कि यह आकाश को छूती हुई, लहरों के थपेड़ों की मार खाती हुए भी बराबर आगे बढ़ रही है।
और समुद्र को यह गुमान रहा है, उसने अच्छी-अच्छी नावों को डूबो दिया है। समुद्र को अभिमान रहा है कि नाव तो एक मामूली बात है, रावण, कुम्भकरण जैसे जंगी जहाजों को भी इसने डुबो कर रख दिया है। समुद्र को यह गुमान रहा है, कि उसके दानवी पंजे से कोई बच नहीं सकता, क्योंकि उसने चारों तरफ भीमकाय लहरों का जाल ही इस प्रकार का बनाया है। तुम्हारे इस समुद्र में कहीं पर भी विश्वाम करने का स्थान नहीं है, कहीं पर भी छायादार पेड़ नहीं है, जहां प्यास बुझाई जा सके। कहीं पर भी क्षण भर के लिए सुस्ताने की जमीन नहीं है, इसमें तो घात-प्रतिघात है, छल, झूठ, कपट और असत्य है। चारों तरफ ऊंची-ऊंची कड़वे खारे पानी की लहरों का माया जाल है और जहां तक दृष्टि डालें, वहा एक केवल कड़वा पानी और लहरो के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। और तुम ज्यों-ज्यों सुलझ कर आगे बढ़ना चाहते | त्यों-त्यों जीवन में आंधियां और तूफान, लहरें और ऊंची उठा देती हैं। कभी खारे पानी के रूप में, कभी माया जाल के रूप में, कभी गृहस्थ के घात-प्रतिघात के रूप में। उनका एक ही लक्ष्य, एक ही चिन्तन, एक ही प्रयत्न है, तुम्हें इस खारे पानी के समुद्र में ही रहना है, किनारे पर पहुंचने ही नहीं देना है।
क्योंकि इसी खारे पानी में, इन तूफानों हे टकराते-टकराते तुम्हारे पिता की, तुम्हारे दादा की और तुम्हारी कई पीढ़ियों की जल समाधि हो गई। वे अपने जीवन में नाव तो अच्छी और नई लेकर चले थे, परन्तु थपेड़ों ने उस नाव को जर्जर और कमजोर बना दिया था, और वह नाव बीच समुद्र में ढी डूब गई। उन लोगों में हिम्मत और होसला नहीं बचा था, उनकी शक्ति इन तूफान से टक्कोर हि समाप्त हो गई थी। वे जीवन से पस्त हो गए थे, और अपने लक्ष्य को, अपने किनारे को प्राप्त नहीं कर सके थे। और इन सब घटनाओं का यह समुद्र साक्षीभूत रहा है।
यही नहीं अपितु तुम्हारे आस-पास अन्य जितनी भी नावें इस समुद्र मे चल रही हैं, वे भी हिचकोले खाती ‘. आगे बढ़ रही हैं। एक कदम आगे बढ़ाती हैं तो थपेड़ों के प्रभाव से, तूफानों के प्रह्मार से, पांच कदम पीछे हटना पड़ता डै। तुमने देखा होगा कि तुम्हारे इन भाइयों, सम्बन्धियों और रिश्तेदारों की नावें भी डगमगाने लगी हैं, उनकी आंखों में उदासी और मौत की काली छाया मंडराने लगी है, उनकी नावें कमजोर और जर्जर होने लगी हैं, उनके बाजुओं की ताकत चुकने लगी है, और किसी क्षण इन नावों को समुद्र निकल जाएगा। ये नाव मझधार में ही डूब जाएंगी और ये सगे-सम्बन्धी चाहे कितना ही हो-हल्ला करें, उनकी नाव को बचाने के लिए कोई आगे बढ़ नही रहा क्योंकि सभी अपनी-अपनी नावें सम्भालने में लगे हुए हैं। सभी की नावें उलट-पुलट रही हैं, सभी की आंखों में कड़वाहट है और मुंह में खारा पानी चले जाने की वजह से, उनके जीवन का स्वाद कसैला हो गया है। ऐसी हालत में किसको चिन्ता है, जो खुद डूबने वाला है, और डूबने वाला दूसरों को कैसे बचा सकता है ?
पर ये सभी लोग तुम्हें आश्चर्यजनक दृष्टि से देखने लगे हैं। उनको यह आश्चर्य हो रहा है कि जब उनका चेहरा आक्रांत बुझा-बुझा सा, डरा-डरा सा है, तब तुम्हारे चेहरे पर मुस्क्राहट क्यों है ? जब वे मौत के भये से संत्रस्त हैं तब तुम्हारे चेहरे पर बेफिक्री क्यों है ? जब उनकी नावें हिचकोले खा रही हैं, तूफान में डगमगाने लगी हैं, किसी भी क्षण डूब जाने की आशंका लिए हुए हैं, तब तुम्हारी नाव निरन्तर कैसे आगे बढ़ रही है, और यह उनके लिए अत्यधिक आश्चर्य की बात है।
वे अपने चप्पू को चलाना भूल गए हैं, और तुम्हारी तरफ ताक रहे हैं। वे यह सोच रहे हैं, कि हम तो डूबेंगे ही, पर यह कैसे बच जाए, यह क्यों बचे ? और इसीलिए वे तुम्हें भी अपने शब्दों में भ्रमित कर रहे हैं, वे तुम्हें भी सलाह दे रहे है, कि यह नाव तो समुद्र में डूबने ही वाली है फिर तुम परेशान क्योंय हो रहे हो परन्तु तुम्हें निरन्तर आगे बढ़ना है और तुम आगे बढ़ रहे हो, मस्ती के साथ, जीवन का संगीत गुनगुनाते हुए अपनी धड़कनों की आवाज सुनते हुए और गीत गाते हुए, जिस बेफिक्री से अपनी नाव को आगे लक्ष्य की ओर बढ़ा रहे हो, यह उनके लिए तो आश्चर्य और हैरानी की बात है ही, शायद तुम भी हैरान हो रहे हो।
इसमें हैरान होने की बात नहीं है, क्योंकि तुम्हारी नाव के साथ मैं हूं, तुम्हारी नाव और तूफान के बीच मैं खड़ा हूं और घनघोर अंधेरे में तुम्हारे लिए मैं दीप स्तम्भ की तरह हूं, जिससे कि तुम्हारी नाव समुद्र पार कर सके जिससे कि अब तक तुम्हारी पीढ़ियां जो कुछ प्राप्त नहीं कर सकीं वह तुम प्राप्त कर सको। तुम्हारी पीढ़ियां किनारे को नहीं पकड़ सकी, हरियाली को नहीं देख सकी, आनन्द और मस्ती में नहीं डूब सकी, हिम्मत और हौसले के साथ नाव को किनारे तक नहीं ले जा सकीं। पर तुम यह सब कुछ प्राप्त कर सकते हो, ऐसा करके तुम अपने कुल में एक नया इतिहास रच सकते हो, जीवन का एक नया पन्नात लिख सकते हो। जो काम तुम्हारी कई-कई पीढ़ियों ने नहीं किया वह तुम्हें करना है, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूं, तुम्हारे बाजुओं की शक्ति हूं।
बस बाजुओं की शक्ति ही नहीं, मैं तो पूरा का पूरा तुममें समाया हूं, बाजू ही नहीं तुम्हारे सीने का ओज, तुम्हारें कंधों की क्षमता, तुम्हारे भींचे हुए ओटों का दर्प, सब कुछ मैं ही तो हूं! हर ओर से बल दे रहा हूं तुमको कि कहीं तुम्हारी नाव बीच में थम न जाएं। दृढ़ता से तुम्हारे टिके पावों का आत्मबल मैं ही तो हूं, मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी है अपनी ओर से ।
और बिना शक्ति के तुम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते, तुम्हारे बाजुओं में शक्ति का संचार होना आवश्यक है, तुम्हारे सीने में हौसला और हिम्मत होना आवश्यक है, तुम्हारी आंखों में चिनगारी का तेज होना आवश्यक है। तुम्हारे मन में एक नई संकल्प शक्ति का उदय होना आवश्यक है क्योंकि अभी तुम्हारी नाव समुद्र के बीच में है। अभी वह नाव बड़ी-बड़ी चट्टानों और तूफानों के बीच घिरी हुई है, जिसमें सम्बन्धी, रिश्तेदार, परेशानियां, बाधाएं, अड़चने, कठटिनाइयां, ऋण, रोग और जीवन की न्यूनता जैसी हजार-हजार लहरें चारों ओर उठ रही हैं और उनके बीच से नाव को ले कर जाना आसान काम नहीं है क्योंकि तुम्हारे अपने ही सम्बन्धियों ने तुम्हारे मन को कमजोर बना दिया है, तुम्हें हतोत्साहित कर दिया है, मन में एक भय और डर भर दिया है। इसलिए तुम्हारे बाजू थकने लगे हैं, इसलिए तुमने नाव को उन लहरों के भरोसे छोड़ने का विचार कर लिया है।
पर ऐसी कायरता, ऐसी बुजदिली तुम्हारे अन्दर आई कैसे ? तुम्हारे पास तो ऐसी जवानी होनी चाहिए, जो अपने सीने के जोर से हिमालय को पीछे धकेल दें, तुम्हारी ठोकर में तो यह ताकत होना चाहिए जो ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उछाल दे, तुम्हारी आंखों में तो आग की लपट होनी चाहिए जो इन लहरों को नेस्तनाबूद कर दें। तुम्हारे अन्दर कमजोरी होनी ही नहीं चाहिए, पर यह कमजोरी तुम्हें अपने परिवार से विरासत में मिली है, तुम्हारे खून में यह कायरता, यह बुजदिली आ गई है और इसीलिए तुमने नाव को बीच मझधार में थक कर छोड़ दिया है, तुमने दोनों चप्पू नाव में ही रख दिए हैं और तुम्हारे जीवन का हौसला, तुम्हारे जीवन की हिम्मत खत्म हो गई है।
परन्तु तुम कायरों की तरह इस नाव को इन लहरों की बलि नहीं चढ़ाओगे, अपना नाम कायरों की सूची में नहीं लिखाओगे, तुम्हारे पूर्वज जिस प्रकार से समुद्र के बीच बेदम होकर निढाल हो गए, उस प्रकार से तुम अपनी नाव को समाप्त नहीं होने दोगे, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूं।
धरती पर पांव रखना और इन तूफानों से टक्कर लेकर लक्ष्य पर पहुंच जाना मर्दानगी है। मार्कण्डेय ने पहली बार यमराज को डट कर उत्तर दिया, पहली बार अपने सामने आई हुई मौत की आंखे नोंची, मार्कण्डेय ने ही पहली बार मृत्यु के गाल पर थप्पड़ लगा कर यह स्पष्ट किया कि जीवन में असम्भव को भी सम्भव किया जा सकता है, मौत तो मामूली सी बात है, ब्रह्माण्ड को भी हिलाया जा सकता है और मार्कण्डेय ने यह सब कुछ किया।
तुमने पहली बार जन्म नहीं लिया है, तुम भी मा्कण्डेय युग में जीवित रहे हो, एक सामान्य प्राणी की तरह, एक अदने से आदमी की तरह, जीवन का एक लम्बा रास्ता तो पार किया पर माकंण्डेय ऋषि के समान नहीं बन सकें । इसलिए अब ठहरना नहीं है, समुद्र के बीच मझधार में चप्पू रखकर नाव को किनारे और लहरों की भेंट बढ़ाना उचित नहीं है ।
बन्धु ! इस ठांव पर नाव को बांधना उचित नहीं है, मैं तुम्हारे साथ हूं, मैं तुम्हें पूर्ण शक्ति देने का वायदा करता हूं, और तुम्हारी नाव को किनारे तक ले जाने की शक्ति दूंगा, यह मेरा वायदा है, और इसे मैं जरूर पूरा करूंगा ।
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