





नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्कचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-
भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति।।
श्रीराम की भक्ति में शिव की कृपा आधारभूत है। अपने प्रभु श्रीराम की भक्ति में श्रीतुलसीदासजी सर्वप्रथम रामकथा के अलौकिक प्रणेता एवं आदि आचार्य योगिराज शिव की कृपा को ही इसमें हेतु मानते हैं-
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।।
स्वयं प्रभु श्रीराम, मुनिवर नारद जी से भी यही कहते हैं-
कोउ नहीं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें।।
श्रीतुलसीदासजी के भक्ति चिन्तन की दूसरी विशेषता है- विषयासक्त जनमानस को विकाररहित करना। उन्होंने भक्ति की विशुद्ध भावभूमि निर्मित करने हेतु मन की निर्मलता को आवश्यक माना है। एतदर्थ उन्होंने मानव के मनोगत विकारों का उल्लेख करते हुए मन के निर्मलीकरण की विधि भी बतलायी है। मन की निर्मलता में जो प्रमुख बाधक विकार है, उनको इंगित करते हुए उन्होंने मानस में कहा है-
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु जेहि संत।।
अर्थात् काम, क्रोध, मद, लोभ, आदि विकार मन को पतनोन्मुख करने वाले हैं, जिनका परिहार कर प्रभु श्रीराम को भजना ही अभीष्ट है।
मनोगत विकार अनर्थ के कारण है। इन सभी का जन्म आसक्ति या मोह से होता है- इन सत्य को उद्धृत करते हुये वे कहते हैं-
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सुला।।
सांसारिकता के प्रति आसक्ति होना मोह है और ईश्वर के प्रति आसक्ति होना भक्ति है। आशय यह है कि जब आसक्ति संसार के नश्वर भोगों के प्रति होती है तो आत्मा के साक्षीपन की अनुभूति समाप्त हो जाती है, जिससे इन्द्रियों को प्रेरित करने वाला मन विकारग्रस्त हो जाता है और परिणाम स्वरूप मानव सांसारिकता की ओर उन्मुख होकर अपने चरम लक्ष्य से भटक जाता है। इसके विपरीत प्रभुपद की आसक्ति से सांसारिकता विस्मृत हो जाती है और आत्मा के साक्षीपन की अनुभूति जाग्रत् होती है।
श्रीतुलसीदास जी ने इसे साररूप में इस प्रकार कहा है-
जहाँ राम तहुँ काम नहिं जहाँ काम नहिं राम।
तुलसी कबहूँ होत नहिं रबि रजनी इक ठाम।।
इस प्रकार भक्तशिरोमणि तुलसीदास जी ने मनोगत विकारों और उसके मूल-मोह का उल्लेख करते हुये उसे त्याग देने पर विशेष बल दिया है। मोह के सर्वथा त्याग करने हेतु किये जाने वाले प्रयासों को उन्होंने एक निश्चित क्रम दिया है-
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग।।
अर्थात् सत्संग से हरिचरित का ज्ञान होता है और ज्ञान से मोह का नाश होता है। मोह के नष्ट होने पर प्रभु के चरणों में प्रीति दृढ़ होती है। इस भक्ति की प्राप्ति में सत्संग को प्रथम सोपान माना गया है। वे कहते हैं-‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’ विवेकी पुरूष ही मोह जाल को छिन्न-भिन्न कर पाता है। मोहरहित मनुष्य के हृदय में विनम्र श्रद्धा का संचार होता है, जो भक्ति पर विश्वास दृढ़ करता है। इस विवेक की प्राप्ति सत्संग से होती है। ज्ञान होने पर ही विश्वास टिकता है, विश्वास ही प्रीति (प्रेम) स्थिर होता है। यह प्रीति जितनी प्रगाढ़ होती है भक्ति उतनी ही अनन्य सिद्ध होती है। हरि कथा का ज्ञान अथवा भक्तों का संग करना इसीलिये महत्त्वपूर्ण है। इसे अनुभूत कर गोस्वामी जी ने श्रीरामचरितमानस में काकभुषुण्डिजी के माध्यम से प्रामाणिक कथन उपस्थित किया है-
जानें बिनु न होई परतीती। बिनु परतीति होई नहिं प्रींती।।
प्रीति बिना नहीं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।
इस प्रकार सत्संग से जो विवेक (ज्ञान) प्राप्त होता है, वह मनोगत विकारों के मूल-मोह को नष्ट करने वाला, भक्ति हेतु प्रेरणा, प्रीति और विश्वास को बढ़ाने वाला है। इससे अन्ततः भक्ति सुदृढ़ होती है और मन के निर्मल होने से सहज ही भगवत्प्राप्ति हो जाती है। यथा-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
विकारयुक्त मन सदैव अविश्वासी होता है। अविश्वासी मन को भक्ति सिद्ध नहीं होती। बिना भक्ति के भगवत्कृपा की प्राप्ति नहीं होती और बिना भगवत्कृपा के संतप्त जीव को स्वप्न में भी विश्राम नहीं मिलता। यथा-
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।।
गोस्वामी जी भक्ति के स्वरूप, प्रभाव और माहात्म्य का वर्णन वेद, वेदान्त के अनुरूप अपनी भाषा-शैली में किया है, तथापि, समर्पण या दास्यभक्ति की सर्वोच्च प्रतिष्ठा में उनका मौलिक चिन्तन भी सम्मिलित हुआ है। उन्होंने ज्ञान की अपेक्षा सगुण भक्ति का विशेष प्रतिपादन किया है। श्रीरामचरितमानस के अन्तर्गत अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत और विशिष्टाद्वैत की भी झलक मिलती है। ज्ञानमार्गियों की निर्गुण भक्ति का भी यत्किंचित् वर्णन है, जो सगुण ब्रह्म की निर्गुणता के रूप में आया है, किंतु इन सबसे ऊपर उठकर तुलसी ने सेवक-सेव्य भाव को ही महिमामण्डित किया है। तुलसी ने दास्यभक्ति को अधिक सहज और सरल घोषित किया है। उन्होंने ज्ञान को भक्ति के अधीन कहा है।
तुलसी की भावना ज्ञान, योग और कर्म की अपेक्षा भक्ति में अधिक रमी है। इसलिये वे भक्ति को सभी उपासना-साधनों का सार मानते हैं। यथा-
जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी।
भक्ति को सर्वोपरि मानते हुये उनकी स्पष्ट धारणा है कि भक्ति के व्यापक प्रभाव से भक्त हृदय में स्वयमेव परमप्रकाश हो जाता है। इन अर्थो में वह चिन्तामणि के सदृश है। वह जिसके हृदय में वास करती है, उसका सभी प्रकार से कल्याण हो जाता है। मोह और दारिद्रय निकट नहीं आते हैं, लोभ की प्रवृति नहीं होती, शक्तिशाली अविद्या का प्रभाव (अन्धकार) नष्ट हो जाता है, सभी विकार शान्त हो जाते हैं। जिसके हृदय में भक्ति बसती है, उसके निकट कामादि षड्रिपु भी नहीं आते है, विष अमृत और शत्रु मित्र हो जाते है। जिनके वशीभूत होकर सामान्य जीव दुःखी रहता है, वे मानस रोग भक्त से सदा दूर रहते हैं। ऐसी प्रभावशाली भक्ति जिसके हृदय में निवास करती है, उसे स्वप्न में भी दुःख नहीं होता।
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