





अनन्त संसारमहासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपे विनियोजितात्मा ह्मनन्तरूपया नमो नमस्ते।।
बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक व्यक्ति के जीवन में हर क्षण इच्छाएं व्याप्त रहती ही हैं, जो कभी खत्म नहीं होती, एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी……. मृत्योपरान्त भी उसमें मोक्ष की इच्छा व्याप्त रहती ही है।
जब मनुष्य है, तो इच्छाएं भी होगी, और अगर इच्छाएं नहीं है, तो फिर वह मनुष्य भी नहीं है, प्रत्येक मानव की यह इच्छा होती है, कि वह अच्छे-से-अच्छे खाये, अच्छे-से-अच्छा पहिने और भली प्रकार तथा व्यवस्थित ढंग से अपने जीवन का निर्वाह कर सके, जिसके लिये उसे पग-पग पर संघर्षशील बने रहना पड़ता है, किन्तु इतनी मेहनत और प्रयत्न करने पर भी वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने में असफल ही रहता है ….. अक्षम ही रहता है, और फिर इस प्रकार उसे एक अधूरा, एक निराशाजनक जीवन जीना पड़ता है …… क्योंकि उसकी इच्छाएं अनन्त है, असीमित है, और उन इच्छाओं की पूर्ति करना सामान्य मनुष्य के बस की बात नहीं है।
किन्तु यदि ‘अनन्त चतुर्दशी’ के दिन ‘अनन्त साधना’ सम्पन्न की जाय, तो व्यक्ति की मनेच्छाएं स्वतः ही पूर्ण होने लगती है, फिर उसके कार्य अधिक परिश्रम किये बिना ही सहज रूप से सम्पन्न होने लगते है, क्योंकि अनन्त साधना सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली, कल्याणकारी और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली एकमात्र साधना है, जिसे भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को सम्पन्न किया जाना ज्यादा श्रेयस्कर है, ज्यादा हितकारी है, क्योंकि सही क्षणों को पकड़ना-मानव-जीवन की सफलता का मूल रहस्य है।
साधना विधि-
सामग्री-सुदर्शन माल्य, अनन्त पात्र, जनार्दन यंत्र।
दिवस -अनन्त चतुर्दशी 06.09.2025 को या फिर किसी भी बृहस्पतिवार को।
समय- प्रातःकाल 4 बजे से 5 बजे के मध्य।
दिशा-पूर्व या उत्तर।
अनन्त चतुर्दशी को प्रातःकाल अपनी सुविधानुसार समय निर्धारित कर, स्नानादि से निवृत होकर, पूर्ण पवित्रता एवं श्रद्धा के भाव से युक्त होकर अपने आसन पर बैठ जाये, साधना के समय पीले वस्त्र ही धारण करें।
तत्पश्चात् अपने सामने किसी बाजोट पर पीले वस्त्र को बिछाकर उसके ऊपर पुष्प की पंखुड़ियां बिखेर दें, इन पंखुड़ियों के ऊपर ‘जनार्दन यंत्र’ को स्थापित करें और केसर, चन्दन तथा पुष्प माला समर्पित करें। यंत्र के दाहिनी और ‘अनन्त पात्र’ को स्थापित करें तथा बाईं और ‘सुदर्शन माल्य ’ को इन दोनों का भी संक्षिप्त पूजन सम्पन्न करें।
पूजन के बाद किसी पात्र में अक्षत अर्थात् ऐसे चावल के दाने लें, जो टूटे न हों, उन्हें हल्दी से रंग ले, तथा निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए लगातार 15 मिनट तक बायें हाथ में रखे अक्षत को दाहिने हाथ से अनन्त पात्र में डालते रहें।
15 मिनट तक मंत्र-जप करने के पश्चात् हाथ जोड़कर भगवान अनन्त से क्षमा-याचना करें, कि यदि हमारे पूजन और साधना में कोई कमी रह गई हो, तो उसे क्षमा करें, हमें पूर्णता प्रदान करें तथा हमारी इच्छित कामनाओं को शीघ्र ही पूर्ण करें।
पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पाप सम्भवः
पाहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव।।
अद्य मे सफल जन्म जीवितं च सुजीवितम्।
इसके पश्चात् ‘सदुर्शन माल्यं’ को अपने गले में धारण कर लें, क्योंकि यह माल्य भगवान् अनन्त के आशीर्वाद से युक्त है। अनन्त पात्र में रखे अक्षत को अपने घर में विशेषकर भण्डार में डाल दें, ऐसा करने से घर में अनाज की पूर्णता बनी रहती है। अनन्त पात्र और यंत्र दोनों को ही उसी दिन अथवा अगले दिन जल में विसर्जित कर दें।
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